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सर्वकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

पृष्ठ 404, कुल 638 में से

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पृष्ठ 404

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'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : द्वितीयभाव : राहु
[कुण्डली संख्या २६४ : लग्न ८, द्वितीय भाव ९ में राहु]
दूसरे भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित
'राहु' के प्रभाव से जातक को धन-प्राप्ति के लिए कठिन
परिश्रम करना पड़ता है तथा कुटुम्ब के विषय में चिन्ताएँ
बनी रहती हैं।
अनेक गुप्त युक्तियों का आश्रय लेकर भी वह
ऋणी ही बना रहता है। आर्थिक चिन्ताओं से छुटकारा
नहीं पाता।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : तृतीयभाव : राहु
[कुण्डली संख्या २६५ : लग्न ८, तृतीय भाव १० में राहु]
तीसरे भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित
'राहु' के प्रभाव से जातक के पराक्रम में अत्यधिक वृद्धि
होती है। उसे भाई-बहिनों का सुख भी खूब मिलता है,
परन्तु उनके बारे में चिन्ताएँ भी बनी रहती हैं।
ऐसा व्यक्ति चतुर, हिम्मत वाला, धैर्यवान्,
असाधारण साहसी तथा कठिन परिश्रमी होता है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : चतुर्थभाव : राहु
[कुण्डली संख्या २६६ : लग्न ८, चतुर्थ भाव ११ में राहु]
चौथे भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित
'राहु' के प्रभाव से जातक की माता, भूमि तथा भवन के
सुख में कुछ कमी बनी रहती है।
कभी-कभी पारिवारिक संकटों का सामना भी
करना पड़ता है, जिनके निराकरण के लिए उसे गुप्त
युक्तियों, हिम्मत तथा धैर्य का सहारा लेना पड़ता है।
ऐसा व्यक्ति होशियार तथा परिश्रमी भी होता है।