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सर्वकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

पृष्ठ 409, कुल 638 में से

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'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : पंचमभाव : केतु
पाँचवें भाव में शत्रु 'बुध' की राशि पर
स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक को विद्याध्ययन
में कठिनाइयाँ आती हैं तथा सन्तान-पक्ष से भी
कष्ट मिलता है।
ऐसा व्यक्ति बड़ा साहसी, दृढ़-निश्चयी,
गुप्त युक्तियों से काम लेने वाला, धैर्यवान् तथा
निडर होता है। वह अपनी गुप्त चिन्ताओं को
किसी पर प्रकट नहीं होने देता ।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : षष्ठभाव : केतु
छठे भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर
स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष पर
अपना विशेष प्रभाव रखता है। वह झगड़ों,
कठिनाइयों आदि पर अपने साहस, गुप्त युक्ति,
धैर्य, परिश्रम एवं बहादुरी के बल पर विजयपाता
है। उसका ननिहाल-पक्ष कमजोर रहता है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : सप्तमभाव : केतु
सातवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर
स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक को स्त्री-पक्ष से
घोर कष्ट मिलता है। गृहस्थ जीवन में अनेक
संकट उठ खड़े होते हैं, दैनिक व्यवसाय के क्षेत्र में
भी बड़ी कठिनाइयां आती हैं।
ऐसा व्यक्ति अपनी गुप्त युक्तियों, धैर्य
साहस आदि के बल पर संकटों का कुछ निवारण
कर पाने में समर्थ हो जाता है।