भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
३८६
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली में 'पंचमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
वृश्चिकलग्न : पंचमभाव : सूर्य पाँचवें भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर
स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक को विद्या, बुद्धि
एवं सन्तान के क्षेत्र में विशेष सफलता प्राप्त होती
है। राज्य, पिता तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी
सम्मान, सहयोग एवं लाभ मिलता है। राजनैतिक
क्षेत्र में उन्नति मिलती है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से एकादश भाव को
देखने से लाभ के श्रेष्ठ साधन प्राप्त होते हैं। ऐसा
व्यक्ति उच्च कोटि का जीवन बिताता है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
वृश्चिकलग्न : षष्ठभाव : सूर्य
छठे भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित
'सूर्य' के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष पर विजय प्राप्त
करता है। राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में भी सफलता
मिलती है, परन्तु माता एवं पिता से कुछ मतभेद बना
रहता है।
सातवीं नीच-दृष्टि से द्वादश भाव को देखने से
खर्च के मामले में कठिनाइयाँ बनी रहती हैं तथा बाहरी
स्थानों का सम्बन्ध भी परेशानी देता है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
वृश्चिकलग्न : सप्तमभाव : सूर्य
सातवें भाव में मित्र 'चन्द्रमा' की राशि पर
स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक को स्त्री-पक्ष से संतोष
एवं शक्ति की प्राप्ति होती है तथा दैनिक व्यवसाय में
भी सफलता मिलती है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से प्रथम भाव को देखने से
जातक का शरीर सुन्दर तथा व्यक्तित्व प्रभावशाली
होता है। ऐसा व्यक्ति प्रभावशाली, त्यागी तथा उन्नति-
शील होता है।
३८७
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
वृश्चिकलग्न : अष्टमभाव : सूर्य
आठवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित
'सूर्य' के प्रभाव से जातक की आयु तथा पुरातत्त्व
में वृद्धि होती है। पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र
में सफलता, यश एवं लाभ की प्राप्ति होती है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से द्वितीय भाव को देखने
से परिश्रम द्वारा धन की पर्याप्त वृद्धि होती है तथा
कौटुम्बिक सुख भी प्राप्त होता है। बाहरी स्थानों से
भी सम्बन्ध जुड़ता है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
वृश्चिकलग्न : नवमभाव : सूर्य
नवें भाव में मित्र 'चन्द्रमा' की राशि पर
स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक के धर्म तथा
भाग्य की उन्नति होती है एवं पिता, राज्य और
व्यवसाय के क्षेत्र में भी सफलताएं मिलती हैं।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से तृतीय भाव को देखने
से भाई-बहिनों मतभेद रहता है तथा पराक्रम में
सामान्य वृद्धि होती है।
संक्षेप में, ऐसा व्यक्ति सुखी जीवन बिताता
है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
वृश्चिकलग्न : दशमभाव : सूर्य
दसवें भाव में स्वराशि-स्थित 'सूर्य' के प्रभाव
से जातक को पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र
में सफलता, सहयोग, लाभ एवं सम्मान की प्राप्ति
होती है। यह अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए उग्र
कर्म भी करता है।
सातवीं शत्रुदृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से
जातक का अपनी माता के साथ वैमनस्य रहता है
तथा भूमि एवं भवन के सुख में कमी रहती है।
३८८
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : एकादशभाव : सूर्य
ग्यारहवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर
स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक को अपने पिता
द्वारा श्रेष्ठ लाभ होता है तथा राज्य एवं व्यवसाय
के क्षेत्र में भी सम्मान, धन, लाभ एवं सहयोग की
प्राप्ति होती है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से पंचम भाव को देखने
से विद्या, बुद्धि एवं सन्तान-पक्ष से भी श्रेष्ठ लाभ
होता है। ऐसा व्यक्ति स्वाभिमानी, तेज स्वभाव का,
प्रतिष्ठित तथा यशस्वी होता है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : द्वादशभाव : सूर्य
बारहवें भाव में शत्रु 'शुक्र' की राशि पर स्थित
नीच के 'सूर्य' के प्रभाव से जातक बड़ी कठिनाई से खर्च
चलाता है तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से भी कष्ट
होता है। पिता, राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी
कठिनाइयां आती हैं।
सातवीं उच्च मित्र-दृष्टि से षष्ठ भाव को
देखने से शत्रु-पक्ष पर प्रभाव स्थापित होता है तथा
झगड़े-मुकदमे आदि से भी लाभ मिलता है।
'वृश्चिक' लग्न में 'चन्द्रमा' का फलादेश
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'चन्द्र' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : प्रथमभाव : चन्द्र
पहले भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित
'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक का शरीर कुछ दुर्बल
रहता है तथा यश भी कठिनाई से मिलता है।
सातवीं उच्च दृष्टि से सप्तम भाव को देखने से
सुन्दर तथा मनोनुकूल स्त्री प्राप्त होती है एवं दैनिक
व्यवसाय के क्षेत्र में भी सफलताएँ मिलती रहती हैं।
३८६
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'चन्द्र' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : द्वितीयभाव : चन्द्र दूसरे भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित
'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक को धन-संचय में
सफलता मिलती है तथा कुटुम्ब का सुख भी प्राप्त
होता है। परन्तु वह धर्म का यथाविधि पालन नहीं
करता।
सातवीं मित्र-दृष्टि से अष्टम भाव को देखने से
पुरातत्त्व का लाभ होता है तथा आयु की वृद्धि होती
है। ऐसा व्यक्ति धनी, सुखी तथा भाग्यशाली
होता है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'चन्द्र' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : तृतीयभाव : चंद्र
तीसरे भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित
'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक के पराक्रम में वृद्धि
होती है, परन्तु भाई-बहिन के सुख में कुछ कमी
आती है। मानसिक शक्ति बहुत प्रबल होती है।
सातवीं दृष्टि से स्वराशि में नवम भाव को
देखने से धर्म तथा भाग्य की उन्नति होती है। ऐसा
व्यक्ति अपने पुरुषार्थ द्वारा यशस्वी एवं भाग्यशाली
बनता है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'चन्द्र' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : चतुर्थभाव : चंद्र चौथे भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित
'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक को कुछ असन्तोष के साथ
माता, भूमि एवं भवन का श्रेष्ठ सुख प्राप्त होता है।
यह धर्म का पालन करता है तथा मनोयोग के द्वारा
भाग्य की उन्नति करता है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से दशम भाव को देखने से
पिता, राज्य एवं व्यवसाय के पक्ष में सुख, सम्मान,
लाभ एवं सफलता की प्राप्ति होती है।
३६०
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'चन्द्र' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : पंचमभाव : चंद्र पाँचवें भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित
चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक को विद्या, बुद्धि एवं
सन्तान के क्षेत्र में अच्छी सफलता मिलती है। यह
सज्जन, विनम्र, मधुरभाषी, धर्मात्मा तथा अपने बुद्धि-
बल से भाग्य की उन्नति करने वाला भी होता है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से एकादश भाव को देखने
से भाग्य की वृद्धि होती है तथा लाभ भी खूब होता
रहता है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'चन्द्र' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : षष्ठभाव : चंद्र छठे भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित
चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक को शत्रु-पक्ष में अपनी
शान्ति-नीति से सफलता मिलती है। यों, शत्रुओं के
कारण मन में अशान्ति भी बनी रहती है।
सातवीं सामान्य मित्र-दृष्टि से द्वादश भाव को
देखने से भाग्य-बल पर खर्च चलता रहता है तथा
बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ एवं सफलताओं की
प्राप्ति भी होती है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'चन्द्र' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : सप्तमभाव : चंद्र सातवें भाव में सामान्य मित्र 'शुक्र' की राशि
पर स्थित उच्च के 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक को
सुन्दर तथा भाग्यशालिनी स्त्री मिलती है। उसका गृहस्थ
जीवन सुखमय रहता है। दैनिक व्यवसाय के क्षेत्र में भी
सफलताएँ मिलती हैं। मनोबल बढ़ा रहने के कारण
भाग्य तथा यश में भी वृद्धि होती है।
सातवीं नीच-दृष्टि से प्रथम भाव को देखने से
शरीर में कुछ कमजोरी रहती है तथा भाग्य एवं धर्म के
पक्ष में भी कुछ न्यूनता बनी रहती है।
३६१
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'चन्द्र' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : अष्टमभाव : चन्द्र आठवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर
स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक को आयु में वृद्धि
होती है तथा पुरातत्त्व का लाभ भी होता है।
सातवीं मित्रदृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से
धन तथा कुटुम्ब के सुख का लाभ भी पर्याप्त मिलता
है।
ऐसा व्यक्ति शान्त स्वभाव वाला, धनी, सुखी
तथा यशस्वी होता है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'चन्द्र' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : नवमभाव : चन्द्र नववें भाव में स्वराशिस्य 'चन्द्रमा' के प्रभाव
से जातक के धर्म तथा भाग्य की अच्छी उन्नति होती
है। यह यशस्वी तथा धनी होता है।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से तृतीय भाव को देखने से
भाई-बहिनों का सुख त्रुटिपूर्ण रहता है, परन्तु पराक्रम
की अत्यधिक वृद्धि होती है।
ऐसा व्यक्ति सुख तथा समृद्धि से युक्त जीवन
बिताता है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'चन्द्र' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : दशमभाव : चन्द्र दसवें भाव में मित्र 'सूर्य' की राशि पर स्थित
'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक को पिता, राज्य तथा
व्यवसाय के क्षेत्र में अत्यधिक सफलताएँ मिलती हैं।
वह धर्मात्मा तथा भाग्यशाली होता है।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से
माता, भूमि एवं भवन के सुख में कुछ कमी रहती है।
परन्तु जातक सुखी, यशस्वी, सन्तुष्ट तथा धनी जीवन
बिताता है।
३६२
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'चन्द्र' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : एकादशभाव : चन्द्र ग्यारहवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर
स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक को श्रेष्ठ लाभ
होता रहता है। वह धर्मपरायण, भाग्यशाली, सुखी तथा
यशस्वी होता है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से पंचम भाव को देखने से
विद्या-बुद्धि एवं सन्तान का श्रेष्ठ लाभ होता है, वाणी
में शक्ति रहती है तथा मनोबल बढ़ा-चढ़ा रहता है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'चन्द्र' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : द्वादशभाव : चन्द्र बारहवें भाव में सामान्य मित्र 'शुक्र' की
राशि पर स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक का खर्च
अधिक रहता है, परन्तु उसकी पूर्ति के लिए किसी
कठिनाई का अनुभव नहीं होता। बाहरी स्थानों के
सम्बन्ध से अत्यधिक लाभ होता है। स्वदेश में भाग्य
कमजोर रहता है, परन्तु विदेश में तरक्की होती है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से षष्ठ भाव को देखने से
शत्रु-पक्ष में शक्ति से काम निकालता है तथा भाग्य-
बल से कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करता है।
'वृश्चिक' लग्न में 'मंगल'
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : प्रथमभाव : मंगल पहले भाव में स्वराशि में स्थित 'मंगल' के प्रभाव
से जातक को शारीरिक शक्ति में वृद्धि होती है
तथा शत्रु-पक्ष में सफलता मिलती है।
चौथी शत्रुदृष्टि से चतुर्थ भाव को देखने से माता,
भूमि एवं भवन के सुख में कुछ कमी रहती है। सातवीं
शत्रुदृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री तथा व्यवसाय
के पक्ष में कुछ कठिनाइयों के साथ सफलता मिलती
है। आठवीं मित्र-दृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु
एवं पुरातत्त्व की शक्ति में वृद्धि होती है।
३६३
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : द्वितीयस्थान : मगल दूसरे भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित
'मंगल' के प्रभाव से जातक अपने शारीरिक श्रम द्वारा
धनोपार्जन करता है तथा कुछ परेशानियों के साथ
कौटुम्बिक सुख भी प्राप्त करता है। शारीरिक सुन्दरता व
स्वास्थ्य में कमी रहती है किन्तु शत्रु-पक्ष पर प्रभाव बना
रहता है। चौथी मित्र-दृष्टि से पंचमभाव को देखने से
विद्या-बुद्धि एवं सन्तान के क्षेत्र में सफलता प्राप्त होती
है।
सातवीं मित्रदृष्टि से अष्टम भाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व की वृद्धि
होती है। आठवीं नीच-दृष्टि से नवम भाव को देखने से धर्म तथा भाग्य की हानि
होती है और यश की भी कमी रहती है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : तृतीयभाव : मंगल तीसरे भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर
स्थित उच्च के मंगल के प्रभाव से जातक के पराक्रम
में वृद्धि होती है तथा भाई-बहिनों से सामान्य वैमनस्य
रहता है। चौथी दृष्टि से स्वराशि में षष्ठभाव को देखने
से शत्रु-पक्ष पर विजय प्राप्त होती है।
सातवीं नीच-दृष्टि से नवम भाव को देखने से धर्म
का यथाविधि पालन नहीं होता तथा भाग्य की
अपेक्षा पुरुषार्थ का अधिक भरोसा रखा जाता है।
आठवीं मित्र-दृष्टि से दशम भाव को देखने से पिता,
राज्य एवं व्यवसाय के पक्ष में सुख, सहयोग, लाभ तथा सम्मान की प्राप्ति होती है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : चतुर्थभाव : मंगल चौथे भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर
स्थित 'मंगल' के प्रभाव से जातक को माता, भूमि एवं
भवन के सुख में कुछ कमी रहती है। चौथी सामान्य
शत्रु-दृष्टि से सप्तम भाव को देखने से स्त्री-पक्ष से
सामान्य मतभेद-युक्त सुख प्राप्त होता है तथा दैनिक
व्यवसाय में सफलता मिलती है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से दशम भाव को देखने से
पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में सुख, सफलता,
लाभ एवं यश की प्राप्ति होती है। आठवीं मित्रदृष्टि
से एकादश भाव-को देखने से आमदनी बहुत अच्छी रहती है।
३६४
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश
वृश्चिकलग्न : पंचमभाव : मंगल पाँचवें भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर
स्थित 'मंगल' के प्रभाव से जातक को कुछ कठि-
नाइयों के साथ विद्या-वृद्धि एवं सन्तान के क्षेत्र
में सफलता मिलती है। शत्रु-पक्ष पर विजय पाने
के लिए गहरी चालें चलनी पड़ती हैं। चौथी मित्र-
दृष्टि से अष्टम भाव को देखने से आयु एवं पुरा-
तत्त्व की वृद्धि होती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से
एकादशभाव को देखने से आमदनी खूब होती है।
आठवीं शत्रु-दृष्टि से द्वादश भाव को देखने
के कारण खर्च अधिक रहने से परेशानी का अनुभव होता है तथा बाहरी स्थानों के
सम्बन्ध से कुछ कठिनाइयों के साथ लाभ होता है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश
वृश्चिकलग्न : षष्ठभाव : मंगल छठे भाव में स्वराशि में स्थित 'मंगल' के
प्रभाव से जातक को शत्रु-पक्ष में सफलता मिलती है।
चौथी नीच-दृष्टि से नवमभाव को देखने से भाग्य
तथा धर्म में कमी रहती है। सम्मान में भी कमी
आती है।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से द्वादश भाव को देखने
से खर्च अधिक रहता है, परन्तु बाहरी स्थानों से
सम्बन्ध से लाभ होता है। आठवीं दृष्टि से स्वराशि
में प्रथमभाव को देखने से शरीर के प्रभाव तथा आत्म-बल में सामान्य वृद्धि होती है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश
वृश्चिकलग्न : सप्तमभाव : मंगल सातवें भाव में शत्रु 'शुक्र' की राशि पर
स्थित 'मंगल' के प्रभाव से जातक की स्त्री-पक्ष से
कुछ परेशानी रहती है, जननेन्द्रिय में विकार होता
है तथा दैनिक व्यवसाय में भी कुछ कठिनाइयाँ
आती हैं। चौथी मित्र-दृष्टि से दशमभाव को देखने
से पिता, राज्य एवं व्यवसाय पक्ष में सुख-सम्मान
तथा सफलता की प्राप्ति होती है।
सातवीं दृष्टि से स्वराशि के प्रथमभाव को
देखने से शारीरिक शक्ति एवं व्यक्तित्व का विकास होता है। आठवीं मित्र-दृष्टि से
द्वितीयभाव को देखने से धन-कुटुम्ब का सुख प्राप्त होता है। ऐसा व्यक्ति सामान्यतः
सुखी रहता है।
३६५
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश
वृश्चिकलग्न : अष्टमभाव : मंगल आठवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर
स्थित 'मंगल' के प्रभाव से जातक के शारीरिक
सौन्दर्य तथा सुख में कमी आती है। आयु तथा
पुरातत्त्व के लाभ में भी कमी रहती है। पेट में
विकार रहता है तथा शत्रु-पक्ष से परेशानी होती
है। चौथी मित्रदृष्टि से एकादशभाव को देखने से
आमदनी अच्छी रहती है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने
से धन तथा कौटुम्बिक सुख की वृद्धि विशेष प्रयत्न
से होती है। आठवीं उच्च दृष्टि से तृतीयभाव को देखने से भाई-बहिन की शक्ति
प्राप्त होती है तथा पराक्रम में वृद्धि होती है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश
वृश्चिकलग्न : नवमभाव : मंगल नवें भाव में मित्र 'चन्द्रमा' की राशि पर
स्थित नीच के 'मंगल' के प्रभाव से जातक के धर्म
तथा भाग्य में कुछ कमी रहती है। शत्रु-पक्ष के
संकट से भी भाग्योन्नति में बाधा पड़ती है। वैसे
जातक धनी होता है। चौथी शत्रु-दृष्टि से द्वादश-
भाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी
स्थानों के सम्बन्ध से लाभ होता है।
सातवीं उच्च दृष्टि से तृतीयभाव को देखने
से पराक्रम तथा भाई-बहिन के सुख में वृद्धि होती
है। आठवीं शत्रुदृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि तथा भवन के सुख में
कमी रहती है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश
वृश्चिकलग्न : दशमभाव : मंगल दशवें भाव में मित्र 'सूर्य' की राशि पर
स्थित मंगल के प्रभाव से जातक को कुछ
कठिनाइयों के साथ पिता, राज्य एवं व्यवसाय के
क्षेत्र में सुख, सफलता, सहयोग तथा सम्मान की
प्राप्ति होती है। शत्रु-पक्ष पर विजय मिलती है।
चौथी दृष्टि से स्वराशि में प्रथम भाव को देखने से
शारीरिक शक्ति प्रबल रहती है। ऐसा व्यक्ति
सशक्त तथा स्वाभिमानी होता है।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि तथा भवन के सुख
में कुछ कमी रहती है। आठवीं मित्रदृष्टि से पंचम भाव को देखने से विद्या, बुद्धि
एवं सन्तान के क्षेत्र में सफलता मिलती है।
३६६
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश
वृश्चिकलग्न : एकादशभाव : मंगल ग्यारहवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि
पर स्थित 'मंगल' के प्रभाव से जातक शारीरिक
परिश्रम द्वारा पर्याप्त लाभ कमाता रहता है।
परन्तु शत्रु-पक्ष से कुछ कष्ट होता है तथा शरीर
रोगी भी हो जाया करता है। चौथी मित्र-दृष्टि से
द्वितीयभाव को देखने से धन एवं कुटुम्ब के सुख
में वृद्धि होती है।
सातवीं मित्रदृष्टि से पंचमभाव को देखने
से कुछ कठिनाइयों के साथ विद्या, बुद्धि एवं
सन्तान के क्षेत्र में सफलता मिलती है। आठवीं दृष्टि से स्वराशि में षष्ठम भाव को
देखने से शत्रु-पक्ष पर विजय प्राप्त होती है तथा ननसाल पक्ष से लाभ होता है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश
वृश्चिकलग्न : द्वादशभाव : मंगल बारहवें भाव में शत्रु 'शुक्र' की राशि पर
स्थित 'मंगल' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक
रहता है तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से सुख-
शान्ति मिलती है। चौथी उच्च-दृष्टि से तृतीयभाव
को देखने से भाई-बहिनों के सुख तथा पराक्रम में
वृद्धि होती है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में षष्ठ-
भाव को देखने से शत्रु-पक्ष पर विजय मिलती
रहती है।
आठवीं शत्रु-दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री से कुछ वैमनस्य रहते हुए
भी सुख मिलता है तथा दैनिक व्यवसाय में कुछ परेशानियों के साथ लाभ होता है।
'वृश्चिक' लग्न में 'बुध'
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
वृश्चिकलग्न : प्रथमभाव : मंगल पहले भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर
स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक के शारीरिक प्रभाव
में वृद्धि होती है। उसे आयु एवं शक्ति का लाभ भी
होता है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से
स्त्री-पक्ष में कुछ कठिनाई के साथ सहयोग मिलता
है तथा दैनिक व्यवसाय में भी परिश्रम के बाद ही
सफलता मिलती है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : द्वितीयभाव : बुध
दूसरे भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर
स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक को धन तथा
कुटुम्ब का श्रेष्ठ सुख प्राप्त होता है।
सातवीं दृष्टि से स्वराशि में अष्टमभाव
को देखने से आयु की वृद्धि होती है तथा पुरातत्त्व
का लाभ होता है।
ऐसी ग्रहस्थिति वाला व्यक्ति शान-शौकत
का जीवन बिताता है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : तृतीयभाव : बुध
तीसरे भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर
स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक के पराक्रम में वृद्धि
होती है तथा भाई-बहिनों का सुख भी प्राप्त होता है।
साथ ही आयु एवं पुरातत्त्व का लाभ भी होता है।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से नवम भाव को देखने से
जातक स्वविवेक-शक्ति द्वारा भाग्य एवं धर्म की उन्नति
करता है।
ऐसा व्यक्ति सुखी, धनी, धर्मात्मा तथा पराक्रमी
होता है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : चतुर्थभाव : बुध
चौथे भाव में, मित्र-'शनि' की राशि पर
स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक की माता, भूमि एवं
भवन का सुख प्राप्त होता है तथा आयु एवं पुरातत्त्व
की वृद्धि भी होती है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से दशमभाव को देखने से
कुछ कठिनाइयों के साथ पिता, राज्य एवं व्यवसाय
के क्षेत्र में भी सुख, सफलता, लाभ तथा यश की
प्राप्ति होती है।
३६८
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली से 'पंचमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : पंचमभाव : बुध पाँचवें भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर
स्थित नीच के 'बुध' के प्रभाव से जातक को
विद्या, बुद्धि एवं सन्तान-पक्ष में कष्ट का सामना
करना पड़ता है, परन्तु स्वविवेक-शक्ति से लाभ
भी होता है। आयु के क्षेत्र में कुछ परेशानी
आती है। पुरातत्त्व का स्वल्प लाभ होता है।
सातवीं उच्च-दृष्टि से स्वराशि में
एकादश भाव को देखने से आमदनी बहुत अच्छी
रहती है तथा जीवन सुख से बीतता है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : षष्ठभाव : बुध छठे भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर
स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक शत्रुपक्ष पर विजय
पाता है। कुछ कठिनाइयों के साथ आमदनी
बढ़ती है। आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ भी
होता है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से द्वादशभाव को देखने
से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों के
संबंध से लाभ भी मिलता है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : सप्तमभाव : बुध
सातवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि
पर स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक की स्त्री
तथा दैनिक व्यवसाय के क्षेत्र में सफलता
मिलती है तथा आयु एवं पुरातत्त्व का भी लाभ
होता है।
सातवीं मित्रदृष्टि से प्रथमभाव को देखने
से शारीरिक बल एवं प्रभाव की प्राप्ति होती है
तथा दैनिक जीवन शान-शौकत से व्यतीत
होता है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : अष्टम भाव : बुध
आठवें भाव में स्वराशि स्थित 'बुध' के
प्रभाव से जातक की आयु में वृद्धि होती है तथा
पुरातत्त्व का लाभ होता है।
सातवीं मित्रदृष्टि से द्वितीयभाव को देखने
से जातक स्वविवेक द्वारा धन का संचय करता
है। उसे कौटुम्बिक सुख भी प्राप्त होता है। ऐसा
व्यक्ति अमीरी ढंग का जीवन बिताता है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : नवमभाव : बुध
नवें भाव में मित्र 'चन्द्रमा' की राशि पर
स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक के भाग्य एवं धर्म
की वृद्धि होती है। साथ ही आयु तथा पुरातत्त्व
का लाभ भी होता है।
सातवीं मित्रदृष्टि से तृतीयभाव को देखने
से कुछ कमियों के साथ ही भाई-बहिन का सुख
मिलता है तथा पराक्रम की वृद्धि भी होती है।
ऐसा व्यक्ति प्रायः सुखी तथा भाग्यशाली जीवन
बिताता है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : दशमभाव : बुध
दसवें भाव में मित्र 'सूर्य' की राशि पर
स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक की कुछ कठिनाइयों
के साथ पिता का सुख एवं लाभ तथा राज्य एवं
व्यवसाय के क्षेत्र में सम्मान और सफलता की
प्राप्ति होती है। पुरातत्त्व एवं आयु का लाभ भी
होता है।
सातवीं मित्रदृष्टि से चतुर्थ भाव को देखने
से कुछ कठिनाइयों के साथ माता, भूमि एवं भवन
आदि का सुख भी प्राप्त होता है।
४००
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : एकादशभाव : बुध ग्यारहवें भाव में स्वराशि-स्थित उच्च
के 'बुध' के प्रभाव से जातक की आमदनी खूब
रहती है। आयु तथा पुरातत्त्व का भी लाभ
होता है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से पंचम भाव को
देखने से कुछ कठिनाइयों के साथ विद्या, बुद्धि
एवं सन्तान के क्षेत्र में अच्छी सफलता मिलती है।
ऐसा व्यक्ति कुछ रूखे स्वभाव का भी
होता है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : द्वादशभाव : बुध बारहवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि
पर स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक का खर्च
अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों के संबंध से
लाभ भी होता है। आयु तथा पुरातत्त्व की शक्ति
भी बढ़ती है।
सातवीं मित्रदृष्टि से षष्ठ भाव को देखने
से शत्रु-पक्ष में विवेक-बुद्धि एवं विनम्रता से काम
निकालता है। ऐसे व्यक्ति का जीवन भ्रमणशील
होता है तथा चित्त में कुछ अशान्ति भी बनी
रहती है।
'वृश्चिक' लग्न में 'गुरु'
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : प्रथमभाव : गुरु पहले भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर
स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक की शारीरिक
शक्ति तथा प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। पांचवीं दृष्टि
से स्वराशि में पंचम भाव को देखने से विद्या, बुद्धि
एवं सन्तान के क्षेत्र में श्रेष्ठ सफलता मिलती है।
सातवीं शत्रुदृष्टि से सप्तमभाव को देखने
से स्त्री से कुछ मतभेद रहता है तथा दैनिक
व्यवसाय में पहले सामान्य कठिनाइयां आती हैं,
किन्तु बाद में लाभ भी होता है। स्त्री से भी सुख
मिलता है।
नवीं उच्चदृष्टि से नवम भाव को देखने से धर्म तथा भाग्य की विशेष उन्नति
होती है। ऐसा व्यक्ति सुखी तथा भाग्यशाली होता है।
वृश्चिक लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
श्चिक लग्न : द्वितीयभाव : बुध दूसरे भाव में स्वराशि में स्थित 'गुरु' के
प्रभाव से जातक को धन तथा कुटुम्ब का उत्तम
सुख प्राप्त होता है। सन्तान-पक्ष में कुछ कमी रहती
है। पांचवीं मित्रदृष्टि से षष्ठभाव को देखने
से शत्रु-पक्ष में बुद्धिमानी से सफलता मिलती है।
सातवीं मित्रदृष्टि से अष्टमभाव को देखने
से आयु तथा पुरातत्त्व की शक्ति में वृद्धि होती
है। नवीं मित्रदृष्टि से दशमभाव को देखने से
राज्य, पिता एवं व्यवसाय के द्वारा सुख, सम्मान
व तथा यश की प्राप्ति होती है। ऐसा व्यक्ति बड़ा बुद्धिमान तथा धनी होता है।
वृश्चिक लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
श्चिक लग्न : तृतीयभाव : गुरु तीसरे भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर
स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक को भाई-बहिन के
सुख में बाधा आती है तथा पराक्रम में भी कमी
रहती है। विद्या, धन तथा कुटुम्ब का सुख भी
कम रहता है। पांचवीं शत्रुदृष्टि से सप्तमभाव
को देखने से स्त्री से कुछ वैमनस्य रहता है तथा
व्यवसाय में कठिनाई से सफलता मिलती है।
सातवीं उच्च दृष्टि से नवमभाव को
देखने से भाग्य तथा धर्म की उन्नति होती है।
वीं मित्रदृष्टि से एकादशभाव को देखने से आमदनी में खूब वृद्धि होती है। ऐसा
क्ति सुखी तथा धनी होता है।
वृश्चिक लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
श्चिक लग्न : चतुर्थभाव : गुरु चौथे भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर
स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक का माता के
साथ कुछ वैमनस्य रहता है तथा भूमि एवं भवन
का सुख प्राप्त होता है। विद्या तथा सन्तान-पक्ष
में भी कुछ कठिनाइयों के साथ सफलता मिलती
है। पांचवीं मित्रदृष्टि से अष्टमभाव को देखने से
आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है।
सातवीं मित्रदृष्टि से दशमभाव को देखने
से पिता, राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में लाभ,
व, सहयोग तथा सम्मान मिलता है। नवीं शत्रुदृष्टि से द्वादशभाव को देखने से
व्ये की अधिकता रहती है तथा बाहरी सम्बन्धों से सामान्य लाभ होता है।
४०२
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : पंचमभाव : गुरु पाँचवें भाव में स्वराशि-स्थित 'गुरु' के
प्रभाव से जातक विद्या, बुद्धि एवं सन्तान के क्षेत्र
में विशेष सफलता प्राप्त करता है। धन तथा
कुटुम्ब का सुख भी उसे मिलता है। पाँचवीं मित्र
तथा उच्चदृष्टि से नवमभाव को देखने से धर्म
तथा भाग्य की विशेष उन्नति होती है।
सातवीं मित्रदृष्टि से एकादशभाव को
देखने से आमदनी खूब रहती है। नवीं मित्रदृष्टि
से प्रथमभाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य, शक्ति,
सम्मान, प्रतिष्ठा तथा यश की वृद्धि होती है। ऐसा व्यक्ति बड़ा ऐश्वर्यशाली होता है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : षष्ठभाव : गुरु छठे भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर
स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष में बुद्धि-
बल से सफलता पाता है तथा धन एवं कुटुम्ब के
कारण झगड़ों में फंसता है। विद्या तथा सन्तान
पक्ष कमजोर रहता है। पाँचवीं मित्रदृष्टि से
दशमभाव को देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय
के द्वारा लाभ, सुख, सम्मान आदि की प्राप्ति
होती है।
सातवीं शत्रुदृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी
स्थानों से लाभ होता है। नवीं दृष्टि से स्वराशि में द्वितीयभाव को देखने से धन
तथा कुटुम्ब की वृद्धि होती है। कुटुम्ब से कुछ वैमनस्य भी रहता है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : सप्तमभाव : गुरु सातवें भाव में शत्रु 'शुक्र' की राशि पर
स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक की सामान्य
मतभेदों के बावजूद स्त्री का श्रेष्ठ सुख प्राप्त होता
है तथा व्यवसाय में सफलता मिलती है। पाँचवीं
मित्रदृष्टि से एकादशभाव को देखने से आमदनी
खूब रहती है।
सातवीं मित्रदृष्टि से प्रथमभाव को देखने
से शारीरिक सौन्दर्य तथा प्रभाव की प्राप्ति होती
है। नवीं नीचदृष्टि से तृतीयभाव को देखने से
भाई-बहिन के सुख तथा पराक्रम में कुछ कमी का अनुभव होता है।
४०३
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : अष्टमभाव : गुरु आठवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर
स्थित गुरु के प्रभाव से जातक की आयु तथा
पुरातत्त्व का श्रेष्ठ लाभ होता है, परन्तु विद्या,
बुद्धि, सन्तान, धन एवं कुटुम्ब के सुख में कमी
रहती है। पाँचवीं शत्रुदृष्टि से द्वादशभाव को
देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी
स्थानों के सम्बन्ध से कुछ लाभ होता है।
सातवीं दृष्टि से स्वराशि में द्वितीयभाव
की देखने से धन तथा कौटुम्बिक सुख की वृद्धि होती है। नवीं शत्रुदृष्टि से चतुर्थभाव
की देखने से माता, भूमि तथा भवन का सुख कुछ कठिनाइयों के साथ मिलता है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : नवमभाव : गुरु नवें भाव में मित्र 'चन्द्रमा' की राशि पर
स्थित उच्च के 'गुरु' के प्रभाव से जातक के धर्म
तथा भाग्य की वृद्धि होती है। धन तथा कुटुम्ब
[
४०४
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली में 'एकादशभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : एकादशभाव : गुरु ग्यारहवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर
स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक की आमदनी में वृद्धि
होती है। धन तथा कुटुम्ब का सुख भी मिलता है।
पाँचवीं शत्रु तथा नीच दृष्टि से तृतीयभाव में देखने से
भाई-बहिन के सुख तथा पराक्रम में कमी आती है।
सातवीं दृष्टि से स्वराशि में पंचमभाव की
देखने से विद्या, बुद्धि तथा सन्तान-पक्ष की विशेष उन्नति
होती है। नवीं शत्रु-दृष्टि से सप्तमभाव की देखने से
पत्नी के साथ कुछ वैमनस्य रहते हुए भी लाभ होता है
तथा दैनिक व्यवसाय में भी कुछ कठिनाइयों के साथ सफलता मिलती है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली में 'द्वादशभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : द्वादशभाव : गुरु बारहवें भाव में शत्रु 'शुक्र' की राशि पर
स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक होता
है तथा बाहरी सम्बन्ध भी कमजोर रहते हैं। धन, कुटुम्ब,
विद्या तथा सन्तान के क्षेत्र में भी कमी रहती है।
पाँचवीं शत्रु-दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि
एवं भवन के सुख में कमी रहती है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से षष्ठभाव की देखने से शत्रु-
पक्ष में चतुराई से सफलता प्राप्त होती है। नवीं मित्र
दृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व की
अच्छी शक्ति प्राप्त होती है। ऐसी ग्रह-स्थिति वाले जातक का चित्त प्रायः अशान्त
ही बना रहता है।
'वृश्चिक' लग्न में 'शुक्र'
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली में 'प्रथमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : प्रथमभाव : शुक्र पहले भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित
'शुक्र' के प्रभाव से जातक का शरीर कमजोर रहता
है, परन्तु प्रभाव, चातुर्य एवं कार्य-कुशलता में वृद्धि
होती है।
सातवीं दृष्टि से स्वराशि में सप्तमभाव को
देखने से स्त्री का सुख मिलता है तथा दैनिक व्यवसाय
में भी सफलता प्राप्त होती रहती है, परन्तु शुक्र के
व्ययेश होने के कारण इन क्षेत्रों में सामान्य कठिनाइयों
का सामना भी करना पड़ता है।
४०५
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली में 'द्वितीयभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : द्वितीयभाव : शुक्र दूसरे भाव में सामान्य शत्रु 'गुरु' की राशि
पर स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक के धन तथा
कौटुम्बिक सुख में कुछ परेशानी रहती है यद्यपि धन का
लाभ भी होता है।
सातवीं मित्रदृष्टि से अष्टमभाव को देखने से
आयु में वृद्धि होती है, परन्तु पुरातत्त्व का लाभ कम
रहता है। ऐसा व्यक्ति धनी तथा चतुर समझा जाता
है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली में 'तृतीयभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
वृश्चिकलग्न : तृतीयभाव : शुक्र तीसरे भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर
स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक की भाई-बहिन के
सुख तथा पुरुषार्थ में कमी प्राप्त होती है। खर्च अधिक
रहता है तथा बाहरी सम्बन्धों से लाभ भी होता है।
स्त्री-पक्ष में भी कुछ कमी रहती है।
सातवीं शत्रुदृष्टि से नवमभाव को देखने से
भाग्योन्नति में कुछ कमी रहती है तथा धर्म का पालन
भी थोड़ा ही होता है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली में 'चतुर्थभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : चतुर्थभाव : शुक्र चौथे भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर
स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक की माता, भूमि तथा
भवन के सुख में कुछ कमी रहती है। स्त्री-पक्ष भी
कमजोर रहता है। बाहरी सम्बन्धों से सुख प्राप्त होता
है और खर्च आराम से चलता रहता है।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से दशमभाव को देखने से
पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में कुछ कठिनाइयों
के बाद लाभ, सुख, यश एवं सफलता की प्राप्ति होती
रहती है।