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भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

३६६
'तुला' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
तुलालग्नः द्वादशभावः शुक्र बारहवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर
स्थित नीच के 'शुक्र' के प्रभाव से जातक को खर्च के बारे
में कठिनाइयाँ उठानी पड़ती हैं तथा बाहरी सम्बन्धों से
भी कष्ट होता है। आयु, पुरातत्त्व तथा शारीरिक क्षेत्र
में भी कुछ कमी रहती है।
सातवीं उच्च-दृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रु
पक्ष पर विशेष प्रभाव रहता है तथा झगड़े-झंझटों में
हिम्मत तथा चतुराई से सफलता मिलती है।
'तुला' लग्न में 'शनि'
'तुला' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
'तुलालग्नः प्रथमभावः शनि पहले भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित
शनि के प्रभाव से जातक स्थूल शरीर का तथा प्रभाव
शाली होता है। उसे माता, भूमि, भवन, सन्तान तथा
विद्या का सुख भी उत्तम रहता है। तीसरी शत्रुदृष्टि
से तीसरे भाव को देखने से भाई-बहिनों से कुछ
वैमनस्य रहता है तथा पराक्रम भी कठिनाई से ही
बढ़ पाता है।
सातवीं नीच-दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से
स्त्री से कुछ मतभेद रहता है तथा व्यवसाय के क्षेत्र में कठिनाइयां आती हैं। दसवीं
शत्रुदृष्टि से दशमभाव को देखने से पिता के सुख में कमी रहती है, परन्तु व्यवसाय
तथा राज्य के क्षेत्र में सफलता मिलती है।
'तुला' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
तुलालग्न : द्वितीयभाव : शनि दूसरे भाव में 'शत्रु' 'मंगल' की राशि पर
स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक को धन-संचय में
कुछ कठिनाइयाँ आती हैं तथा कुटुम्बियों से कुछ मत-
भेद रहता है। सन्तान के पक्ष में कमी तथा विद्या-बुद्धि
के पक्ष में लाभ होता है।
तीसरी दृष्टि से स्वराशि में चतुर्थभाव को
देखने से माता, भूमि तथा भवन का यथेष्ट सुख प्राप्त
होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से अष्टमभाव को देखने से
आयु एवं पुरातत्त्व का लाभ होता है।
दसवीं शत्रुदृष्टि से एकादशभाव को देखने से कुछ कठिनाइयों के साथ आम-
दनी अच्छी रहती है।

३६७
'तुला' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
तुलालग्न : तृतीयभाव : शनि तीसरे भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित
'शनि' के प्रभाव से जातक के पराक्रम में विशेष वृद्धि
होती है, परन्तु भाई-बहिनों से कुछ मतभेद रहता है।
माता द्वारा भी शक्ति मिलती है।
तीसरी दृष्टि से स्वराशि में पंचमभाव को
देखने से विद्या तथा सन्तान की यथेष्ट शक्ति प्राप्त
होती है, परन्तु सन्तान से कुछ मतभेद भी रहता है।
सातवीं मित्रदृष्टि से नवमभाव को देखने से
धर्म तथा भाग्य की वृद्धि होती है। दसवीं मित्रदृष्टि से
द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरीस्थानों से लाभ मिलता है।
'तुला' लग्न की कुण्डली से 'चतुर्थभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
तुलालग्न : चतुर्थभाव : शनि चौथे भाव में स्वक्षेत्री शनि के प्रभाव से जातक
को माता, भूमि एवं भवन का श्रेष्ठ सुख मिलता है।
सन्तान तथा विद्या के क्षेत्र में भी सफलता मिलती है।
तीसरी शत्रु-दृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रु-पक्ष
पर विशेष प्रभाव रहता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से दशम
भाव को देखने से पिता से मतभेद रहते हुए भी सुख
मिलता है तथा राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में भी
सफलता मिलती है।
दसवीं उच्च-दृष्टि से प्रथमभाव को देखने से
शारीरिक सौन्दर्य एवं स्वास्थ्य में वृद्धि होती है। ऐसा व्यक्ति सुखी, यशस्वी, मानी
तथा प्रभावशाली होता है।
'तुला' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
तुलालग्न : पंचमभाव : शनि पाँचवें भाव में स्वराशि-स्थित 'शनि' के प्रभाव
से जातक को सन्तान, विद्या तथा बुद्धि के क्षेत्र में
सफलता मिलती है। माता, भूमि तथा भवन का
सुख भी मिलता है। तीसरी नीचदृष्टि से सप्तमभाव
को देखने से स्त्रीसे मतभेद रहता है तथा दैनिक
व्यवसाय में कठिनाइयाँ आती हैं।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से एकादशभाव को देखने
से आमदनी के क्षेत्र में कठिनाइयों के बाद सफलता
मिलती है। दसवीं शत्रुदृष्टि से द्वितीय भाव को देखने
से धन-संचय में भी कठिनाइयाँ आती हैं तथा कुटुम्ब से मतभेद बना रहता है।

३६८
'तुला' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
तुलालग्न : षष्ठभाव : शनि उसे भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित
'शनि' के प्रभाव से जातक को बुद्धि-बल द्वारा शत्रु-पक्ष
में सफलता मिलती है। माता, भूमि तथा भवन के सुख
एवं विद्या तथा सन्तान के क्षेत्र में सफलता भी कुछ
कठिनाइयों के बाद प्राप्त होती है। तीसरी मित्र-दृष्टि
से अष्टमभाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व की
शक्ति में वृद्धि होती है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से द्वादश भाव को देखने से
खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी सम्बन्धों से लाभ
होता है। दसवीं शत्रुदृष्टि से तृतीयभाव को देखने से भाई-बहिनों से कुछ वैमनस्य
रहता है, परन्तु पुरुषार्थ की वृद्धि होती है।
'तुला' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
तुलालग्न : सप्तमभाव : शनि सातवें भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर
स्थित नीच के शनि के प्रभाव से जातक को स्त्री,
गृहस्थी तथा व्यवसाय के पक्ष में कुछ कठिनाई और
अशान्ति का सामना करना पड़ता है। विद्या तथा
सन्तान का पक्ष भी कमजोर रहता है। तीसरी मित्र-
दृष्टि से नवमभाव को देखने से भाग्य तथा धर्म की
वृद्धि होती है।
सातवीं उच्च दृष्टि से प्रथम भाव को देखने
से जातक के शरीर का कद लम्बा होता है तथा उसे
शारीरिक सुख भी मिलता है। दसवीं दृष्टि से स्वराशि में चतुर्थभाव को देखने से
माता, भूमि तथा भवन का सुख कठिन परिश्रम द्वारा प्राप्त होता है।
'तुला' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
तुलालग्न : अष्टमभाव : शनि आठवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर
स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक को आयु तथा
पुरातत्त्व का अच्छा लाभ होता है। माता, भूमि,
भवन, सन्तान तथा विद्या के पक्ष में कमी आती है।
तीसरी शत्रुदृष्टि से दशमभाव को देखने से
पिता, राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी कठिनाइयों
का सामना करना पड़ता है।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने
से धन-संचय में कमी रहती है तथा कौटुम्बिक सुख
में भी व्यवधान पड़ता है। दसवीं दृष्टि से स्वराशि में पंचमभाव को देखने विद्यासे
एवं सन्तान का सामान्य साथ होता है।

३६६
'तुला' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
तुला लग्न : नवमभाव : शनि नवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित
'शनि' के प्रभाव से जातक बुद्धि द्वारा भाग्योन्नति
करता है तथा धर्म का पालन भी करता है । विद्या,
सन्तान, भूमि, भवन एवं माता का सुख भी अच्छा
मिलता है । तीसरी शत्रुदृष्टि से एकादशभाव को देखने
से आमदनी के मार्ग में रुकावटें आती हैं ।
सातवीं शत्रुदृष्टि से तृतीय भाव को देखने से
भाई-बहिनों से मतभेद रहता है, परन्तु पराक्रम की
वृद्धि होती है । दसवीं शत्रुदृष्टि से षष्ठभाव को देखने से बुद्धि-बल द्वारा शत्रु-पक्ष पर
विजय प्राप्त होती है ।
'तुला' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'सूर्य' (शनि) का फलादेश
तुला लग्न : दशमभाव : शनि दसवें भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर
स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक को पिता, राज्य एवं
व्यवसाय के क्षेत्र में सफलता मिलती है । वह स्वयं
विद्वान् होता है, परन्तु सन्तान से मतभेद बना रहता है।
तीसरी मित्रदृष्टि से द्वादश भाव को देखने से खर्च अधिक
रहता है तथा बाहरी सम्बन्धों से लाभ होता है ।
सातवीं दृष्टि से स्वराशि के चतुर्थभाव में देखने
से माता, भूमि एवं भवन का सुख भी मिलता है।
दसवीं नीच दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री के सुख में कुछ कमी रहती है तथा
व्यवसाय में भी कठिनाइयाँ आती रहती हैं ।
'तुला' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
तुला लग्न : एकादशभाव : शनि ग्यारहवें भाव में शत्रु 'सूर्य' की राशि
पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक की आमदनी
कुछ कठिनाइयों के साथ खूब होती है । माता,
भूमि तथा भवन आदि का भी यथेष्ट सुख मिलता
है । तीसरी उच्च तथा मित्रदृष्टि से प्रथमभाव
को देखने से शारीरिक शक्ति एवं प्रभाव में वृद्धि
होती है ।
सातवीं दृष्टि से स्वराशि में पंचमभाव को
देखने से विद्या, बुद्धि एवं सन्तान-पक्ष में सफलता
प्राप्त होती है । दसवीं मित्रदृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व की
शक्ति बढ़ती है । ऐसा व्यक्ति मनमोजी, लापरवाह तथा स्वार्थी स्वभाव का होता है।

३७०
'तुला' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
तुला लग्न : द्वादशभाव : शनि
बारहवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर
स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक
रहता है तथा उसे बाहरी संबंधों से लाभ होता है।
माता, भूमि तथा भवन के सुख में कमी रहती है।
तीसरी शत्रुदृष्टि से द्वितीयभाव को देखने
से धन के संचय में कमी आती है तथा कुटुम्ब से
मतभेद रहता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से षष्ठभाव को
देखने से शत्रु-पक्ष पर सामान्य प्रभाव बना रहता है।
दसवीं मित्रदृष्टि से नवमभाव को देखने से
धर्म तथा भाग्य की वृद्धि होती है। ऐसे व्यक्ति की बुद्धि तथा वाणी कुछ भ्रम-युक्त
भी बनी रहती है।
'तुला' लग्न में 'राहु'
'तुला' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
तुला लग्न : प्रथमभाव : राहु
पहले भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर
स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक का शरीर दुर्बल
होता है। वह परेशान भी रहता है। वह अपनी
उन्नति के लिए गुप्त चातुर्य का आश्रय लेता है तथा
कठिन परिश्रम करता है। कभी-कभी उसे बड़ी
कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, परन्तु
अपनी सूझ-बूझ से उन पर विजय भी पा लेता है।
'तुला' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
तुला लग्न : द्वितीयभाव : राहु
दूसरे भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर
स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक को धन के संग्रह
करने में बड़ी कठिनाइयां आती हैं। कभी आकस्मिक
रूप से धन-प्राप्ति होती है तो कभी घोर आर्थिक
संकट भी आते हैं। वह गुप्त युक्तियों का आश्रय
लेकर किसी प्रकार अपना काम चलाता है। उसे
कुटुम्बियों द्वारा भी कष्ट प्राप्त होता है।

३७१
'तुला' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
तुला लग्न : तृतीयभाव : राहु
तीसरे भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर
स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक के पराक्रम में कमी
आती है, परन्तु वह युक्तियों का आश्रय लेकर उसमें
वृद्धि करता है तथा अनुचित मार्ग भी अपनाता है।
उसे भाई-बहिनों से कष्ट मिलता है तथा जीवन में
कभी-कभी अन्य प्रकार के घोर संकटों का सामना
भी करना पड़ता है। चातुर्य, युक्ति और पुरुषार्थ के
बल पर ही वह कठिनाइयों पर विजय प्राप्त कर
पाता है।
'तुला' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
तुला लग्न : चतुर्थभाव : राहु
चौथे भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित
'राहु' के प्रभाव से जातक को माता, भूमि तथा भवन के
सुख में कमी आती है, परन्तु गुप्त युक्तियों, साहस तथा
दृढ़ता के बल पर वह संकटों का सामना करके धन पर
विजय पा लेता है। उसका जीवन बड़ा संघर्षपूर्ण बना
रहता है।
'तुला' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
तुला लग्न : पंचमभाव : राहु
पाँचवें भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर
स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक को सन्तान-पक्ष
से कष्ट मिलता है तथा विद्याध्ययन में भी
कठिनाइयां आती हैं। वह सदैव चिन्तित तथा
परेशान बना रहता है। स्वार्थ-सिद्धि के लिए वह
उचित-अनुचित का विचार नहीं करता तथा गुप्त
युक्तियों से काम लेकर ऊपर से बड़ी दृढ़ता प्रदर्शित
करता है।

३७२
'तुला' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
तुला लग्न : षष्ठभाव : राहु
छठे भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित
'राहु' के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष में कठिनाइयाँ
उठाकर भी विजय प्राप्त करता है ।
ऐसा व्यक्ति बड़ा बहादुर, हिम्मती तथा
गुप्त युक्तियों का ज्ञाता होता है । अपना प्रभाव
स्थापित करने में उसे सफलता मिल जाती है ।
'तुला' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
तुला लग्न : सप्तमभाव : राहु
सातवें भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर
स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक को स्त्री-पक्ष से
संकटों का सामना करना पड़ता है तथा दैनिक
व्यवसाय के क्षेत्र में भी कठिनाइयाँ आती हैं ।
व्यवसाय में भी कभी-कभी बड़े संकट आते
हैं, परन्तु यह अपनी गुप्त युक्ति, धैर्य और साहस
के बल पर उन सभी बाधाओं पर विजय प्राप्त
कर लेता है ।
'तुला' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
तुला लग्न : अष्टमभाव : राहु
आठवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित
'राहु' के प्रभाव से जातक को आयु पर उसे बड़े संकट
आते हैं, परन्तु मृत्यु नहीं होती । पुरातत्त्व की हानि भी
होती है । दैनिक जीवन में भी अनेक संघर्ष, चिन्ता व
परेशानियों का सामना करना पड़ता है ।

३७२
'तुला' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
तुला लग्न : नवमभाव : राहु
नवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित
'राहु' के प्रभाव से जातक गुप्त युक्तियों के बल पर अपने
भाग्य की विशेष उन्नति करता है तथा धर्म का पालन
भी करता है। उसकी भाग्योन्नति में कभी-कभी बाधाएँ
आती हैं, परन्तु वह अपने चातुर्य, धैर्य एवं गुप्त युक्तियों
के बल पर उन सब पर विजय पा लेता है।
'तुला' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
तुला लग्न : दशमभाव : राहु
दसवें भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित
'राहु' के प्रभाव से जातक को पिता के सुख में कमी
रहती है। राज्य के क्षेत्र में कठिनाइयों का सामना करना
पड़ता है तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी संकट आते हैं।
उन्नति के मार्ग में आने वाली सभी बाधाओं को पार
करने के बाद ही उसे सफलता मिलती है।
'तुला' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
तुला लग्न : एकादशभाव : राहु
ग्यारहवें भाव में शत्रु 'सूर्य' की राशि पर
स्थित राहु के प्रभाव से जातक की आमदनी के मार्ग
में कठिनाइयाँ आती हैं, जिन पर वह गुप्त युक्तियों,
चतुराई, धैर्य एवं हिम्मत के बल पर विजय पाता
है तथा उन्नति करता है। कभी-कभी उसे विशेष
संकटों का सामना भी करना पड़ता है।

३७४
'तुला' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
तुलालग्न : द्वादशभाव : राहु
बारहवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर
स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता
है तथा कभी-कभी बड़े संकटों का शिकार भी बनना
पड़ता है। उसे बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में कुछ लाभ
भी मिल जाता है। ऐसा व्यक्ति बड़ा विवेकी, कूट-
नीतिज्ञ, परिश्रमी, धैर्यवान् तथा हिम्मती होता है।
'तुला' लग्न में 'केतु'
'तुला' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
तुलालग्न : प्रथमभाव : केतु
पहले भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित
'केतु' के प्रभाव से जातक को कभी-कभी विशेष शारीरिक
संकटों का सामना करना पड़ता है, परन्तु वह अपने
गुप्त चातुर्य तथा साहस के बल पर उन पर विजय पाता
है और भीतर से गुप्त कमजोरी रहते हुए भी ऊपर से
बड़ा हिम्मती दिखाई देता है।
'तुला' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
तुलालग्न : द्वितीयभाव : केतु
दूसरे भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित
'केतु' के प्रभाव से जातक को धन-प्राप्ति एवं धन-
संचय के मार्ग में बड़े संकट आते हैं। वह गुप्त युक्तियों
के बल पर ही धनोपार्जन करता है, परन्तु हमेशा चिंतित
तथा परेशान ही बना रहता है। उसे अपने कुटुम्बियों
द्वारा भी कष्ट मिलता है। फिर भी वह बड़ा हिम्मती
तथा धैर्य वाला होता है।

३७५
'तुला' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
तुलालग्न : तृतीयभाव : केतु
तीसरे भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित
उच्च के 'केतु' के प्रभाव से जातक के पराक्रम में
अत्यधिक वृद्धि होती है तथा भाई-बहिनों का सुख भी
खूब मिलता है। कभी-कभी भाई-बहिनों के कारण उसे
कष्ट भी उठाना पड़ता है।
ऐसा व्यक्ति बड़ा हिम्मती, परिश्रमी तथा धैर्य-
वान् होता है।
'तुला' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
तुलालग्न : चतुर्थभाव : केतु
चौथे भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित
'केतु' के प्रभाव से जातक की माता, भूमि तथा भवन
के सुख में कमी रहती है। घरेलू झगड़े भी बहुत रहते
हैं, फिर भी वह अपने धैर्य, साहस तथा गुप्त युक्तियों
के बल से कठिनाइयों पर विजय पाने का प्रयत्न करता
है और कुछ सफलता भी पा लेता है।
'तुला' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
तुलालग्न : पंचमभाव : केतु
पाँचवें भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित
'केतु' के प्रभाव से जातक की संतान-पक्ष से कष्ट मिलता
है तथा विद्या-बुद्धि के क्षेत्र में भी कठिनाइयां आती हैं।
ऐसा व्यक्ति अनेक कठिनाइयों के बाद विद्या,
बुद्धि तथा सन्तान के क्षेत्र में थोड़ी-बहुत सफलता पाता
है, फिर भी उसके संकट बने ही रहते हैं।

३७६
'तुला' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
तुला लग्न : षष्ठभाव : केतु
छठे भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित 'केतु'
के प्रभाव से जातक झगड़े-झंझट, रोग तथा शत्रु-पक्ष में
बड़ी हिम्मत, बहादुरी तथा धैर्य से काम लेकर सफलता
प्राप्त करता है और कभी डरता या घबराता नहीं है।
उसे अपने उद्देश्य में सफलता भी मिलती है। ऐसे व्यक्ति
का ननसाल-पक्ष प्रायः कमजोर रहता है।
'तुला' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
तुला लग्न : सप्तमभाव : केतु
सातवें भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर
स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक को स्त्री-पक्ष से विशेष
कष्ट मिलता है तथा दैनिक आमदनी में भी बड़ी
कठिनाइयाँ आती हैं। वह स्त्री तथा व्यवसाय-पक्ष में
सफलता पाने के लिए धैर्य, हिम्मत, पराक्रम तथा गुप्त
युक्तियों का सहारा लेता है और थोड़ी-बहुत सफलता
भी प्राप्त करता है।
'तुला' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
तुला लग्न : अष्टमभाव : केतु
आठवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर
स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक की आयु पर
अनेक बार संकट आते हैं तथा उसे पुरातत्त्व की
भी हानि उठानी पड़ती है। पेट में कुछ विकार
भी रहता है।
ऐसा व्यक्ति सदैव चिन्तातुर रहता है तथा
अपने साहस, धैर्य एवं गुप्त युक्तियों के बल पर
कुछ सफलता भी प्राप्त कर लेता है।

३७७
'तुला' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
तुला लग्न : नवमभाव : केतु नवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित
'केतु' के प्रभाव से जातक की भाग्योन्नति में अनेक
बाधाएँ आती हैं तथा कभी-कभी घोर संकटों का
सामना भी करना पड़ता है।
ईश्वर तथा धर्म के विषय में भी उनकी श्रद्धा
कम होती है। वह धर्म के विरुद्ध चलने में भी
नहीं चूकता तथा स्वार्थ-सिद्धि के लिए अनुचित
साधनों का प्रयोग कर अपयश भी पाता है।
८७४
'तुला' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
तुला लग्न : दशमभाव : केतु
दसवें भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित
'केतु' के प्रभाव से जातक को अपने पिता द्वारा कष्ट
प्राप्त होता है तथा राज्य-पक्ष से भी परेशानी होती है।
व्यवसाय में उसे विघ्न-बाधाओं का सामना करना पड़ता
है। उसे अपने जीवन में प्रायः अनेक उतार-चढ़ाव देखने
पड़ते हैं।
८७५
'तुला' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
तुला लग्न : एकादशभाव : केतु
ग्यारहवें भाव में शत्रु 'सूर्य' की राशि पर स्थित
'केतु' के प्रभाव से जातक को आमदनी के क्षेत्र में
कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है परन्तु वह अपने
धैर्य, परिश्रम तथा गुप्त युक्तियों के बल पर उन्हें दूर
करके सफलता प्राप्त करता है। कभी-कभी उसे लाभ के
बजाय बहुत घाटा भी उठाना पड़ता है। अनेक संकटों
को पार करने के बाद ही उसे सफलता मिलती है।
'तुला' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
तुला लग्न : द्वादशभाव : केतु
बारहवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित
'केतु' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है तथा
बाहरी स्थानों के संबंध से उसे लाभ भी प्राप्त होता है।
ऐसा व्यक्ति अपना खर्च चलाने के लिए विवेक-बुद्धि से
काम लेता तथा कठिन परिश्रम करता है, फिर भी उसे
कभी-कभी बड़ी कठिनाइयों का शिकार बनना पड़ता है
तथा अन्त में सफलता भी प्राप्त हो जाती है।
८७७

३७८
'वृश्चिक लग्न'
['वृश्चिक' लग्न की कुण्डलियों के विभिन्न भावों में स्थित
विभिन्न ग्रहों के फलादेश का पृथक्-पृथक् वर्णन]
'वृश्चिक' लग्न का फलादेश
'वृश्चिक' लग्न में जन्म लेने वाला जातक ठिगने तथा स्थूल शरीर का होता
है। उसकी आँखें गोल तथा छाती चौड़ी होती है। ऐसा व्यक्ति क्रोधी, पाखण्डी,
मिथ्यावादी, तमोगुणी, कपटी, कड़वे स्वभाव का, पर-निन्दक, दयाहीन, भिक्षा-वृत्ति
करने वाला, भाइयों से द्वेष रखने वाला, शत्रु-नाशक तथा सेवा-कर्म करने वाला होता
है। परन्तु इसके साथ ही यह शास्त्रज्ञ, विद्या के आधिक्य से युक्त, गुणी, शूरवीर,
अत्यन्त विचारशील तथा ज्योतिषी भी होता है। दूसरों के मन की बात जान लेने
में वह बड़ा निपुण होता है।

३७६
'वृश्चिक' लग्न में जन्म लेने वाला जातक अपनी प्रारंभिक अवस्था में दुःखी
रहता है तथा मध्यमावस्था में सुख भोगता है । २० से २४ वर्ष की आयु के बीच
उसका भाग्योदय होता है ।
वृश्चिक लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
विभिन्न ग्रहों का स्थायी फलादेश आगे दी गई उदाहरण-कुण्डली संख्या ८७६ के
९८६ के बीच देखना चाहिए ।
गोचर-कुण्डली के ग्रहों का फलादेश किन उदाहरण-कुण्डलियों में देखें—इसे
आगे लिखे अनुसार समझ लेना चाहिए ।
'वृश्चिक' लग्न में 'सूर्य' का फलादेश
१. 'वृश्चिक' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'सूर्य' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ८७६ से ८६० के बीच देखना
चाहिए ।
२. 'वृश्चिक' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'सूर्य'
का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस महीने में 'सूर्य'—
(क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ८७६
(ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ८८०
(ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ८८१
(घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ८८२
(ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ८८३
(च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ८८४
(छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ८८५
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ८८६
(झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ८८७
(ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ८८८
(ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ८८९
(ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ८६०

३८०
'वृश्चिक' लग्न में 'चन्द्रमा' का फलादेश
१. 'वृश्चिक' लग्न वालों की अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'चन्द्रमा' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ८९१ से ९०२ के बीच देखना
चाहिए।
२. 'वृश्चिक' लग्न वालों को गोचरकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'चन्द्रमा' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस दिन 'चन्द्रमा'—
(क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ८९१
(ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ८९२
(ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ८९३
(घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ८९४
(ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ८९५
(च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ८९६
(छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ८९७
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ८९८
(झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ८९९
(ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ९००
(ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ९०१
(ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ९०२
'वृश्चिक' लग्न में 'मंगल' का फलादेश
१. 'वृश्चिक' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
मंगल का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ९०३ से ९१४ के बीच देखना
चाहिए।
२. 'वृश्चिक' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
मंगल का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस महीने में 'मंगल'—
(क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ९०३
(ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ९०४
(ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ९०५
(घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ९०६
(ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ९०७
(च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ९०८
(छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ९०९

३८१
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ६१०
(झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ६११
(ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ६१२
(ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ६१३
(ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ६१४
'वृश्चिक' लग्न में 'बुध' का फलादेश
१. 'वृश्चिक' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'बुध' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ६१५ से ६२६ के बीच देखना
चाहिए।
२. 'वृश्चिक' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'बुध'
का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस महीने में 'बुध'—
(क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ६१५
(ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ६१६
(ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ६१७
(घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ६१८
(ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ६१९
(च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ६२०
(छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ६२१
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ६२२
(झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ६२३
(ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ६२४
(ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ६२५
(ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ६२६
'वृश्चिक' लग्न में 'गुरु' का फलादेश
१. 'वृश्चिक' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'गुरु' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ६२७ से ६३८ के बीच देखना
चाहिए।
२. 'वृश्चिक' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'गुरु'
का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस वर्ष में 'गुरु'—
(क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ६२७
(ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ६२८

३८२
(ग) ‘मिथुन’ राशि पर हो तो संख्या ६२६
(घ) ‘कर्क’ राशि पर हो तो संख्या ६३०
(ङ) ‘सिंह’ राशि पर हो तो संख्या ६३१
(च) ‘कन्या’ राशि पर हो तो संख्या ६३२
(छ) ‘तुला’ राशि पर हो तो संख्या ६३३
(ज) ‘वृश्चिक’ राशि पर हो तो संख्या ६३४
(झ) ‘धनु’ राशि पर हो तो संख्या ६३५
(ञ) ‘मकर’ राशि पर हो तो संख्या ६३६
(ट) ‘कुम्भ’ राशि पर हो तो संख्या ६३७
(ठ) ‘मीन’ राशि पर हो तो संख्या ६३८
‘वृश्चिक’ लग्न में ‘शुक्र’ का फलादेश
१. ‘वृश्चिक’ लग्न वालों की अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
‘शुक्र’ का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ६३९ से ६५० के बीच देखना
चाहिए।
२. ‘वृश्चिक’ लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित ‘शुक्र’
का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस महीने में ‘शुक्र’—
(क) ‘मेष’ राशि पर हो तो संख्या ६३९
(ख) ‘वृष’ राशि पर हो तो संख्या ६४०
(ग) ‘मिथुन’ राशि पर हो तो संख्या ६४१
(घ) ‘कर्क’ राशि पर हो तो संख्या ६४२
(ङ) ‘सिंह’ राशि पर हो तो संख्या ६४३
(च) ‘कन्या’ राशि पर हो तो संख्या ६४४
(छ) ‘तुला’ राशि पर हो तो संख्या ६४५
(ज) ‘वृश्चिक’ राशि पर हो तो संख्या ६४६
(झ) ‘धनु’ राशि पर हो तो संख्या ६४७
(ञ) ‘मकर’ राशि पर हो तो संख्या ६४८
(ट) ‘कुम्भ’ राशि पर हो तो संख्या ६४९
(ठ) ‘मीन’ राशि पर हो तो संख्या ६५०
‘वृश्चिक’ लग्न में ‘शनि’ का फलादेश
१. ‘वृश्चिक’ लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
‘शनि’ का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ६५१ से ६६२ के बीच देखना
चाहिए।

३८३
२. 'वृश्चिक' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'शनि'
का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस वर्ष में 'शनि'—
(क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ६५१
(ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ६५२
(ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ६५३
(घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ६५४
(ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ६५५
(च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ६५६
(छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ६५७
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ६५८
(झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ६५९
(ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ६६०
(ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ६६१
(ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ६६२
'वृश्चिक' लग्न में 'राहु' का फलादेश
१. 'वृश्चिक' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'राहु' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ६६३ से ६७४ के बीच देखना
चाहिए।
२. 'वृश्चिक' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'राहु'
का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस वर्ष में 'राहु'—
(क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ६६३
(ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ६६४
(ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ६६५
(घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ६६६
(ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ६६७
(च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ६६८
(छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ६६९
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ६७०
(झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ६७१
(ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ६७२
(ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ६७३
(ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ६७४

३८४
'वृश्चिक' लग्न में 'केतु' का फलादेश
१- 'वृश्चिक' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'केतु' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ६७५ से ६८६ के बीच देखना
चाहिए।
२. वृश्चिक' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'केतु'
का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस वर्ष में 'केतु'—
(क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ६७५
(ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ६७६
(ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ६७७
(घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ६७८
(ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ६७६
(च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ६८०
(छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ६८१
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ६८२
(झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ६८३
(ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ६८४
(ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ६८५
(ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ६८६
'वृश्चिक' लग्न में 'सूर्य'
वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : प्रथमभाव : सूर्य शरीर-स्थान में अपने मित्र मंगल की वृश्चिक
राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक सौन्दर्य से
युक्त, हृष्ट-पुष्ट, आत्माभिमानी, क्रोधी, प्रभावशाली
और दबंग होता है। पिता, राज्य तथा व्यवसाय-पक्ष
से जातक को सुख, सहयोग और सम्मान प्राप्त होता
है। वह सुन्दर वस्त्रों तथा आभूषणों का शौकीन और
यशस्वी होता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से शुक्र की राशि
में सप्तमभाव को देखने से स्त्री से वैमनस्य रहता है
तथा दैनिक व्यवसाय में कुछ कठिनाइयां आती हैं।

(कुण्डली विवरण: लग्न (प्रथम भाव) — वृश्चिक राशि (८), सूर्य; द्वितीय भाव — धनु (९); तृतीय भाव — मकर (१०); चतुर्थ भाव — कुम्भ (११); पञ्चम भाव — मीन (१२); षष्ठ भाव — मेष (१); सप्तम भाव — वृष (२); अष्टम भाव — मिथुन (३); नवम भाव — कर्क (४); दशम भाव — सिंह (५); एकादश भाव — कन्या (६); द्वादश भाव — तुला (७))

३८५
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
वृश्चिकलग्न : द्वितीयभाव : सूर्य दूसरे भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर
स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक को पितृपक्ष से धन
की प्राप्ति होती है तथा कौटुम्बिक सुख भी मिलता
है। राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी लाभ होता
है, परन्तु पिता के सुख में कुछ कमी रहती है।
सातवीं मित्रदृष्टि से अष्टमभाव को देखने
से आयु तथा पुरातत्त्व की शक्ति भी प्राप्त होती
है। ऐसा व्यक्ति का दैनिक जीवन सुखी तथा प्रभाव-
पूर्ण बना रहता है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
वृश्चिकलग्न : तृतीयभाव : सूर्य
तीसरे भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर
स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक के पराक्रम में वृद्धि
होती है, परन्तु भाई-बहिन के सुख में कुछ कमी
रहती है। पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में
भी सफलताएँ प्राप्त होती हैं।
सातवीं मित्रदृष्टि से नवम भाव को देखने
से धर्म तथा भाग्य की वृद्धि होती है। ऐसा व्यक्ति
तेजस्वी तथा पुरुषार्थी होता है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
वृश्चिकलग्न : चतुर्थभाव : सूर्य चौथे भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर
स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक का अपनी माता
के साथ मतभेद रहता है तथा भूमि-भवन के सुख में
कुछ कमी आती है। घरेलू सुख में भी कुछ त्रुटियाँ
बनी रहती हैं।
सातवीं दृष्टि से स्वराशि में दशम भाव को
देखने से राज्य, पिता तथा व्यवसाय के क्षेत्र में
सहयोग सम्मान, लाभ तथा सफलता की प्राप्ति
होती है। ऐसा व्यक्ति स्वयं उन्नति करता है।