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सर्वकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

पृष्ठ 389, कुल 638 में से

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पृष्ठ 389

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'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली से 'पंचमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : पंचमभाव : बुध पाँचवें भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर
स्थित नीच के 'बुध' के प्रभाव से जातक को
विद्या, बुद्धि एवं सन्तान-पक्ष में कष्ट का सामना
करना पड़ता है, परन्तु स्वविवेक-शक्ति से लाभ
भी होता है। आयु के क्षेत्र में कुछ परेशानी
आती है। पुरातत्त्व का स्वल्प लाभ होता है।
सातवीं उच्च-दृष्टि से स्वराशि में
एकादश भाव को देखने से आमदनी बहुत अच्छी
रहती है तथा जीवन सुख से बीतता है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : षष्ठभाव : बुध छठे भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर
स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक शत्रुपक्ष पर विजय
पाता है। कुछ कठिनाइयों के साथ आमदनी
बढ़ती है। आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ भी
होता है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से द्वादशभाव को देखने
से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों के
संबंध से लाभ भी मिलता है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : सप्तमभाव : बुध
सातवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि
पर स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक की स्त्री
तथा दैनिक व्यवसाय के क्षेत्र में सफलता
मिलती है तथा आयु एवं पुरातत्त्व का भी लाभ
होता है।
सातवीं मित्रदृष्टि से प्रथमभाव को देखने
से शारीरिक बल एवं प्रभाव की प्राप्ति होती है
तथा दैनिक जीवन शान-शौकत से व्यतीत
होता है।