भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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अथ द्वितीयसृष्टिप्रकरणम् १७
रसो रसनेन्द्रियं शैत्यं स्नेहश्च गुरुता तथा। सर्वद्रवसमूहश्च शुक्रं वारिगुणाः स्मृताः ।।२५।।
जल के गुण— रस (मधुरादि ६ रस), रसनेन्द्रिय (जिह्वाग्रवर्ती), शीतलता, स्नेह (चिकनाहट), गुरुता (भारीपन),
सम्पूर्ण द्रव (बहनेवाले) पदार्थों का समूह और शुक्र ये सब गुण जल के कहे गये हैं ।।२५।।
अथ वसुन्धरागुणानाह-
गन्धो घ्राणेन्द्रियं चापि काठिन्यं गौरवं तथा। वसुन्धरा गुणा एते गदिता गुणवेदिभिः ।।२६।।
पृथ्वी के गुण— गन्ध, घ्राणेन्द्रिय (नासिका के अग्रभाग में रहनेवाला इन्द्रिय), कठिनता और गुरुत्व ये सब गुण
के विचार करनेवाले पण्डितों ने पृथ्वी के गुण कहे हैं ।।२६।।
शब्दः स्पर्शश्च रूपञ्च रसो गन्धश्च तत्क्रमात्। तन्मात्राणां विशेषाः स्युः स्थूलभावमुपागताः ।।२७।।
शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध ये पाँच तत्क्रम से अर्थात् शब्दतन्मात्रादिक्रम से तन्मात्राओं ही के स्थूलभाव को
प्राप्त हुये विशेष हैं, अर्थात् शब्दतन्मात्रादि ही स्थूलभावको प्राप्त होकर शब्द, स्पर्शादिरूप में परिणत हो जाते हैं ।।२७।।
तत्क्रमात् = शब्दतन्मात्रादिक्रमात्। अनुभवयोग्यैः सुखदुःखमोहरूपैर्धर्मैर्विशेष्यन्तइति विशेषाः। अत्र
कर्मणि घञ्प्रत्ययः। तन्मात्राणि त्वविशेषाणि यतस्तान्यनुभवयोग्यैः सुखादिभिर्विशेष्टं न शक्यन्ते सूक्ष्मत्वात् ।।२७।।
‘तत्क्रमात्’ इस पद से ‘शब्दतन्मात्रादि क्रम से’ यह अर्थ समझना चाहिये। विशेष अर्थात् अनुभव के योग्य सुख,
दुःख, मोहरूप धर्मों के द्वारा जिसका विशेष किया जाय उसे विशेष कहते हैं। यहाँ पर कर्म में घञ् प्रत्यय हुआ है।
शब्दादि तन्मात्र जो हैं वे तो अविशेष हैं, क्योंकि अत्यन्त सूक्ष्म होने से अनुभव के योग्य सुखादिकों के द्वारा उनका विशेष
नहीं किया जा सकता, स्थूलभाव को प्राप्त होने पर तो शब्द, स्पर्शादि रूप से उन तन्मात्रों का अनुभव योग्य सुखादिकों
के द्वारा विशेष किया जा सकता है ।।२७।।
अथाष्टानां प्रकृतीनां मध्ये तावत् प्रथमां प्रकृतिमाह-
प्रकृतेः कारणायोगान्मता प्रकृतिरेव सा। महत्तत्वादयः सप्त शक्तेर्विकृतयः स्मृताः ।।२८।।
आठ प्रकार की प्रकृति में पहली प्रकृति— प्रकृति अर्थात् अव्यक्त के सम्बन्ध में कारण का योग न होने से
अर्थात् अव्यक्त (प्रकृति) का कोई कारण नहीं है अतः वही यथार्थ रूपसे प्रकृति इस नाम से कही जाती है और महत्तत्त्वादि
७ तो शक्ति अर्थात् प्रकृति की विकृति अर्थात् कार्य कहे जाते हैं ।।
❖ प्रकृतिरेव=कारणमेव¹, न तु कस्यचित् कार्यमित्यर्थः²। शक्तेः प्रकृतेर्विकृतयः=कार्याणि ।।
प्रकृति ही है अर्थात् सबों का कारण ही है, न कि किसी का है और महत्तत्त्वादि (महान्, अहङ्कार और पाँच तन्मात्र)
सात शक्ति अर्थात् प्रकृति के विकृति अर्थात् कार्य हैं ।।२८।।
अथ सप्त प्रकृतीराह-
इन्द्रियाणां च भूतानां कारणत्वान्महर्षिभिः। महत्तत्वादयः सप्त प्रोक्ताः प्रकृतयोऽपि च ।।२९।।
सप्त प्रकृतियाँ— महत्तत्वादिक ७ जो प्रकृति के कार्य हैं, वे इन्द्रियों और पाँच महाभूतों के कारण हैं। अतः
महर्षियों ने इन्हें भी प्रकृति ही कहा है ।।२९।।
१. क्वचित् ‘कारणमिति पाठान्तरं तदसमीचीनम्।
२. अस्मात् परं— ‘कार्याणि; इन्द्रियाणां सर्वभूतानां कारणत्वान्महर्षिभिर्महत्तत्वादयः सप्त महानहङ्कारः पञ्च तन्मात्राणी’त्यधिकः
पाठो लभ्यते किन्तु स भ्रान्तिमूलक एवेति नादरणीयः।
५ भाव.I
१८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे
(१कार्याणि, इन्द्रियाणां सर्वभूतानां कारणत्वान्महर्षिभिर्महत्तत्वादयः सप्त महानहङ्कारः पञ्चतन्मात्राणीति
प्रकृतयोऽपि प्रोक्ताः) । [२तथा सति प्रकृतिर्महानहङ्कारः पञ्च तन्मात्रा चेत्यष्टौ प्रकृतयः] ।।२९।।
जब कि इन्द्रियों का और पञ्च महाभूतों का कारण होने से प्रकृति के कार्यरूप महान्, अहङ्कार, पाँच तन्मात्र इस
प्रकार से महत्तत्त्वादि सात की महर्षियों ने प्रकृति के मध्य में गणना की है तो वैसा होने से प्रकृति, महान्, अहङ्कार और
पाँच तन्मात्र इस तरह से ये आठ प्रकृतियाँ हुईं ॥२९॥
अथ षोडश विकारानाह-
दशेन्द्रियाणि चित्तञ्च महाभूतानि पञ्च च । एतानि सृष्टिं जानद्भिर्विकाराः षोडश स्मृताः ।।३०।।
सोलह विकार—सृष्टि के अर्थात् सृष्टि किस क्रम से होती है, इस विषय के जाननेवाले पण्डितों ने दश इन्द्रिय,
चित्त और पाँच महाभूत ये ही १६ विकार के नाम से कहे हैं अर्थात् ये विकार कहलाते हैं ॥३०॥
विकाराः=कार्याणि ।।३०।।
विकार का अर्थ है कार्य ॥३०॥
अथ चतुर्विंशतितत्त्वान्युपसंहारञ्जीवात्मनः स्थानमाह-
एवं चतुर्विंशतिभिस्तत्त्वैः सिद्धे वपुर्गृहे । जीवात्मा नियतेर्निघ्नो वसति स्वान्तदूतवान् ।।३१।।
जीवात्मा के निवासस्थान—इस प्रकार चौबीस तत्त्वों से अर्थात् ८ प्रकृति और १६ विकारों से बने हुये शरीररूपी
गृह में शुभ तथा अशुभ कर्मों के अधीन होता हुआ, मनरूपी दूत से युक्त होकर जीवात्मा निवास करता है ॥३१॥
❖ अत्र शब्दादीनां वियदादिमहाभूतगुणानां धर्मिभ्योऽभिन्नतया पृथक्त्वं निरस्योक्तानां तत्त्वानामुपसंहारमाह-
चतुर्विंशतिभिरिति । तानि च प्रकृतयोऽष्टौ विकाराः षोडशेति । महत्तत्वादीनि³ प्रकृत्यादीनां भावाः, नियतेः=
शुभाशुभकर्मणः, निघ्नः=आयत्त:, स्वान्तदूतवान्=मनोदूतयुक्तः ।।३१।।
यहाँ आकाशादि पाँच महाभूतों के गुण को शब्दादि (शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध) हैं, इन्हीं को 'धर्म' से
धर्म अभिन्न होता है, इस नियम से पाँच महाभूतों से पृथक्ता का खण्डन करते हुए अर्थात् जो लोग शब्दादिकों को महाभूतों
से पृथक् मानते थे, उनके मत का खण्डन करते हुये और कहे हुए तत्त्वों का उपसंहार करते हुए 'चतुर्विंशतिभिस्तत्त्वैः'
(२४ तत्त्वों से) ऐसा कहा। वे चौबीस तत्त्व ८ प्रकृति और १६ विकार ये हैं। महत्तत्त्वादि सब प्रकृति आदि के भाव
अर्थात् कार्य हैं। यहाँ पर 'नियति' इस पद से 'शुभाशुभ कर्म' यह अर्थ समझना, निघ्नः=अर्थात् अधीन, स्वान्तदूतवान्=मनोरूपी
दूत से युक्त ॥३१॥
अथ जीवात्मा शारीरीत्युच्यत इत्याह-
स देही कथ्यते पापपुण्यदुःखसुखादिभिः । व्याप्तो बद्धश्च मनसा कृत्रिमैः कर्मबन्धनैः ।।३२।।
जीवात्मा और शरीरी—वही जीवात्मा पाप-पुण्य और दुःख-सुख से व्याप्त तथा मन के द्वारा कृत्रिम कर्म के
बन्धनों से बँधा हुआ शरीरी कहलाता है ॥३२॥
❖ सः=जीवात्मा ।।३२।।
'सः' पद का अर्थ 'वह जीवात्मा' है ॥३२॥
१. अयं कोष्ठस्थः पाठष्टीकाकृत्सम्मत इत्यत्र विभावनीयम् ।
२. अयं कोष्ठस्थः पाठः क्वाचित्कः ।
३. 'महत्तत्त्वानी'ति पाठ सर्वत्रोपलभ्यते किन्तु चिन्त्यः ।
अथ द्वितीयसृष्टिप्रकरणम् ९९
तस्य देहिनः शरीरजीवात्मनोः संयोगकारकेण मनसा संयोगे ये ये गुणा उत्पद्यन्ते तानाह-
इच्छाद्वेषसुखासुखानि¹ विषयज्ञानं प्रयत्नो मनः सङ्कल्पश्च विचारणा स्मृतिरथो बुद्धिः कलाविज्ञता ।
प्राणस्योपरि यापनं गुदवशाद्वायोरधः प्रेरणं नेत्रोन्मेषनिमेषकृत्यकरणोत्साहाश्च जीवे गुणाः ।।३३।।
जीव विषयक गुण—इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, विषयों का ज्ञान, प्रयत्न, मनःसङ्कल्प, विचारणा, स्मृति, बुद्धि,
कलाओं की अभिज्ञता, प्राण का ऊपर की ओर ले जाना, गुदा के मार्ग से वायु का नीचे की ओर ले जाना, नेत्रों का
उन्मेष और निमेष तथा कार्य करने में उत्साह, ये सब जीवविषयक गुण हैं ।।३३।।
इच्छा=सुखहेतुरभिलाषः । द्वेषो=दुःखहेतुर्मनोऽप्रवृत्तिः² । सुखं=प्रीतिः³ । असुखम्=अप्रीतिः । विषयज्ञानं=
शब्दादिज्ञानम् । प्रयत्नः=कार्ये तात्पर्यम् । मनः=संशयात्मकं, तस्य कर्मसङ्कल्पः । विचारणा=ऊहापोहाभ्यां
वस्तुविमर्शः । स्मृतिः=पूर्वानुभूतस्यार्थस्य स्मरणम् । बुद्धिः=निश्चयात्मिका । कलाविज्ञता=शिल्पशास्त्रादिबोधः ।
प्राणस्य=हृदयस्थितस्य वायोरुपरि यापनम्=मुखादिप्रतिनयनम् । गुदवशाद्वायोरधःप्रेरणम्=अपानस्याधःप्रेरणम् ।
नेत्रोन्मेषनिमेषौ=नेत्रयोरुन्मीलननिमीलने । कृत्य-करणोत्साहः=कार्यारम्भे सामर्थ्येनोत्साहः । जीवे=मनोयुक्तस्य
जीवात्मनः । अमी=इच्छादयो गुणाः ।।३३।।
इति श्रीमिश्रलटकनतनय श्रीमन्मिश्र भावविरचिते भावप्रकाशे सृष्टिप्रकरणं समाप्तम् ।।
❖❖❖
इच्छा=सुखमूलक अभिलाष, द्वेष=दुःखमूलक मन की अप्रवृत्ति, सुख=प्रीति, असुख=अप्रीति, विषयज्ञान=शब्द,
स्पर्श, रूप, रस तथा गन्ध विषयक ज्ञान, प्रयत्न=कार्यविषयक तत्परता, मन=यह वस्तु है या नहीं इस प्रकार का संशय
(सन्देह) करनेवाला, उसका सङ्कल्प=संशयात्मक मन का कर्म अर्थात् मन के द्वारा सङ्कल्प करना, विचारणा=ऊहापोह
(तर्क-वितर्क के द्वारा वस्तुविषयक विचार), स्मृति=पूर्व में अनुभूत अर्थ का स्मरण, बुद्धि=निश्चयात्मिका (यह वही वस्तु
है दूसरा नहीं), कलाविज्ञता=शिल्प-शास्त्रादि का बोध, प्राणका अर्थात् हृदयस्थित वायु का ऊपर (मुखादि की) ओर ले
जाना, गुदा के मार्ग से वायु का नीचे की ओर ले जाना अर्थात् अपान वायु का नीचे की ओर लेजाना, नेत्रों का उन्मेष
और निमेष अर्थात् नेत्रों का खोलना और मूँदना, कार्य करने में उत्साह अर्थात् कार्य के आरम्भ करने में सामर्थ्य के अनुरूप
उत्साह, जीव विषयक अर्थात् मन से युक्त जीवात्मा के ये इच्छा आदि गुण हैं ।।३३।।
इति श्रीभिषग्रत्नब्रह्मशङ्करशर्मसाहित्यशास्त्रिणा विरचितायां 'विद्योतिनी'
भाषाटीकायां द्वितीयसृष्टिप्रकरणम् समाप्तम् ।।२।।
❖❖❖
१. 'दुःखसुखानि'ति पाठान्तरम् ।
२. 'मनःप्रवृत्ति'रिति. पाठान्तरम् ।
३. 'अदुःखमि'ति पाठान्तरम् ।
अथ तृतीयगर्भप्रकरणम्
चिकित्सायां शरीरी ह्याधिकृतः स शरीरी यथोत्पद्यते तद्बोधयितुं गर्भोत्पत्तिक्रममाह ।
गर्भोत्पत्तिभूमिस्तु रजस्वला स्त्री, ततो रजस्वलास्वरूपमाह-
द्वादशाद्वत्सरादूर्ध्वमापञ्चाशत्समाः स्त्रियः। मासि मासि भगद्वारा प्रकृत्यैवार्त्तवं स्रवेत् ।। १ ।।
रजस्वला स्त्री के स्वरूप—बारह वर्ष की अवस्था से लेकर पचास वर्ष की अवस्था तक की स्त्रियों के भग
(योनि) के मार्ग से प्रत्येक महीने में स्वभावतः आर्त्तव (रज) निकलता रहता है ।। १ ।।
अथ गर्भग्रहणयोग्यं समयमाह-
आर्त्तवस्रावदिवसाद्दूतुः षोडश रात्रयः। गर्भग्रहणयोग्यस्तु स एव समयः स्मृतः ।।२।।
गर्भ ग्रहण के योग्य समय—जिस दिन से रज निकलने लगता है, उस दिन से लेकर सोलहवीं रात्रि पर्यन्त समय
को ऋतुकाल कहते हैं। यही सोलह रात्रि व्यापी ऋतुकाल गर्भ धारण करने के योग्य समय है ।।२।।
❖ सर्वासामेव चतुर्वर्णस्त्रीणां सर्ववादिसम्मतः पूर्वोक्तः समयः । ग्रन्थान्तरे तु विशेषः । तद्यथा-
स्नानदिवसाद्दूर्ध्वं द्वादशरात्रावधि ब्राह्मण्याः, दशरात्रावधि क्षत्रियायाः, अष्टरात्रावधि वैश्यायाः, षड्रात्रावधि
शूद्राया गर्भधारणे शक्तिः ।। २ ।।
चारो वर्णों की सभी स्त्रियों के गर्भधारण करने के सम्बन्ध में पूर्वोक्त समय सभी विद्वानों के सम्मत है किन्तु दूसरे
ग्रन्थों में इससे कुछ विशेष लिखा है, कि—जिस दिन रजस्वला स्त्री स्नान करके शुद्ध होती है, उस दिन से लेकर बारह
रात्रि तक ब्राह्मणी, दस रात्रि तक क्षत्रिया, आठ रात्रि तक वैश्य और छः रात्रि तक शूद्रा स्त्री की गर्भधारण करने में शक्ति
(सामर्थ्य) रहती है ।।२।।
अथ रजस्वलाया नियमानाह-
आर्त्तवस्रवदिवसादहिंसा ब्रह्मचारिणी । शयीत दर्भशय्यायां पश्येदपि पतिं न च ।।३।।
करे शरावे पर्णे वा हविष्यं त्र्यहमाहरेत् । अश्रुपातं नखच्छेदमभ्यङ्गमनुलेपनम् ।।४।।
नेत्रयोरञ्जनं स्नानं दिवास्वापं प्रधावनम् । अत्युच्चशब्दश्रवणं हसनं बहुभाषणम् ।।
आयासं भूमिखननं प्रवातःञ्च विवर्जयेत् ।। ५ ।।
रजस्वला स्त्रियों के नियम—रजस्वला स्त्री जिस दिन रजोधर्म हो जाय उस दिन से तीन दिन तक किसी जीव
की हिंसा न करे, ब्रह्मचर्य से रहे, कुश की बनी हुई चटाई पर सोवे और पति का दर्शन न करे तथा आँसू का गिराना
(रोना), नखों का काटना या कटाना, तेल लगाना, चन्दनादिका लेप करना, आँखों में अंजन लगाना, स्नान करना, दिन
में सोना, दौड़ना, अत्यन्त ऊँचे शब्दों का सुनना, हँसना, बहुत बोलना, परिश्रम करना, जमीन का खोदना, जहाँ पर अधिक
वायु हो वहाँ पर बैठना, ये सब छोड़ देवे ।। ३-५ ।।
एतस्या नियमाकरणे दोषानाह-
अज्ञानाद्वा प्रमादाद्वा लोभाद्वा दैवतश्च वा ।। ६ ।।
सा चेत् कुर्यान्निषिद्धानि गर्भो दोषांस्तदाऽऽप्नुयात् । एतस्या रोदनाद्गर्भो भवेद्विकृतलोचनः ।।७।।
नखच्छेदेन कुनखी कुष्ठी त्वभ्यङ्गता भवेत् । अनुलेपात्तथा स्नानाद् दुःख्शीलोऽञ्जनाद्दृक् ।।८।।
स्वापशीलो दिवास्वापाच्चञ्चलः स्यात् प्रधावनात् । अत्युच्चशब्दश्रवणाद्वधिरःखलु जायते ।।९।।
तालुदन्तौष्ठजिह्वासु श्यावो हसनतो भवेत् । प्रलापी भूरिकथनादुन्मत्तस्तु परिश्रमात् ।।
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अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् २१
स्खलते भूमिखननादुन्मत्तो बातसेवनात् ।।१०।।
रजस्वला स्त्री के नियम नहीं पालन करने पर दोष—यदि रजस्वला स्त्री अज्ञान के वश या असावधानता
के वश या लोभ के वश अथवा दैव के वश होकर पूर्वोक्त अश्रुपातादि निषिद्ध कार्यों को करे तो उसका गर्भ दोषों को
प्राप्त करता है, जैसे—रोने से विकृति नेत्रवाला, नखों के काटने से खराब नखोंवाला, तेल लगाने से कोढ़ी शरीर वाला,
चन्दनादि का लेप तथा स्नान करने से सदा दुःखित रहनेवाला, अञ्जन लगाने से अन्धा, दिन में सोने से अधिक सोनेवाला,
दौड़ने से चञ्चल स्वभाव वाला, अत्यन्त ऊँचे शब्द के सुनने से बहिरा, हँसने से तालु, दाँत, ओष्ठ और जिह्वा श्याव
(कृष्णमिश्रित पीत वर्ण) वाला, अधिक बोलने से बकवाद करनेवाला, परिश्रम करने से पगला, भूमि खोदने से चलते-
चलते लड़खड़ा कर गिर पड़नेवाला और जहाँ पर अधिक वायु हो वहाँ पर बैठने से गर्भस्थ शिशु पागल होता है ।।६-
१०।।
अथ रजस्वलाकृत्यम्-
पूर्व पश्येदृतुस्नाता यादृशं नरमङ्गना । तादृशं जनयेत् पुत्रं ततः पश्येत्पतिं पश्येत्पतिं प्रियम् ।।११।।
स्नानोत्तर रजस्वला स्त्री का कर्त्तव्य—रजस्वला स्त्री ऋतुस्नान करके प्रथम जिस तरह के पुरुष को देखती
है, उसी तरह के पुत्र को उत्पन्न करती है। अतः ऋतुस्नान करने के बाद सर्वप्रथम पति का अथवा जो अपना प्रिय हो
उसका दर्शन करें ।।११।।
❖ प्रियमिति । भर्त्तर्यनासन्ने पुत्रादिकमपि पश्येत् ।।११।।
‘प्रिय’ शब्द का तात्पर्य यह है कि यदि पति पास में न हो तो अपने प्रिय पुत्रादि का ही दर्शन करे ।।११।।
चतुर्थादिदिवसेऽपि रजोनिवृत्तौ स्त्री पत्या सङ्गच्छेन्न तु रजेऽनुवृत्तौ । यत आह
प्रवहत्सलिले क्षिप्तं द्रव्यं गच्छत्यधो यथा । तथा वहति रक्ते तु क्षिप्तं वीर्यमधो व्रजेत् ।।१२।।
चौथा पाँचवाँ आदि दिन होने पर यदि रजःस्राव बन्द हो गया हो तभी स्त्री पति के साथ सङ्ग करे, रजःस्राव हो
रहा हो तो सङ्ग न करे। क्योंकि 'बहते हुये जल में फेंका हुआ द्रव्य जिस भाँति नीचे की तरफ बह कर चला जाता है,
उसी भाँति रजःस्राव होते हुये में गिराया हुआ पुरुष का वीर्य बह कर नीचे की ओर चला जाता है अर्थात् गर्भाशय में
नहीं ठहरने पाता, किन्तु रजःस्राव के साथ बाहर निकल जाता है ।।१२।।
अथ भर्तृकृत्यम् । तत्र गर्भाधाने निषिद्धं विहितं च कालं तयोः फलञ्चाह-
आयुः क्षयभयाद्भर्त्ता प्रथमे दिवसे स्त्रियम् ।।१३।।
द्वितीयेऽपि दिने रत्यै त्यजेदृतुमतीं तथा । तत्र यश्चाहितो गर्भो जायमानो न जीवति ।।
आहितो यस्तृतीयेऽह्नि स्वल्पायुर्विकलाङ्गकः ।।१४।।
रजस्वला स्त्री के साथ सम्भोग करने का निषेध—पति 'आयु का नाश होगा' इस भय से रजोधर्म का प्रथम,
द्वितीय तथा तृतीय दिन भी ऋतुमती स्त्री के साथ सङ्ग करना छोड़ देवे क्योंकि प्रथम और द्वितीय दिन में ऋतुमती स्त्री
के साथ सङ्ग करने से आयु का क्षय होता है तथा जो गर्भ स्थित होता है, वह उत्पन्न होने पर जीता नहीं है और तीसरे
दिन में जो गर्भ स्थित होता है, वह थोड़ी आयुवाला और विकलाङ्ग (न्यूनाधिक अङ्गोंवाला) होता है ।।१३-१४।।
अतश्चतुर्थी षष्ठी स्यादष्टमी दशमी तथा । द्वादशी वाऽपि या रात्रिस्तस्यान्तां विधिना भजेत् ।।
ऋतुमती के साथ सम्भोग करने का प्रशस्त दिन—चौथी, छठीं, आठवीं, दशवीं या बारहवीं जो रात्रि हो,
उसमें विधि से ऋतुमती स्त्री के साथ सङ्ग करे ।।१५।।
२२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे
विधिना=गर्भाधानोक्तविधिना ।।१५।।
'विधिना' पदसे 'गर्भाधान के विषय में कही हुई विधि से' यह अर्थ समझना चाहिये ॥१५॥
तन्त्रान्तरे-
अत्रोत्तरोत्तरं विद्यादायुरारोग्यमेव च। प्रजासौभाग्यमैश्वर्यं बलञ्चाभिगमात् फलम् ।।१६।।
उपर्युक्त रात्रियों में स्त्रीगमन करने से उत्तरोत्तर आयु, आरोग्य, प्रजा (सन्तान) का सौभाग्य, ऐश्वर्य और बल की
प्राप्ति होती है। अर्थात्-चौथी रात्रि में स्त्रीगमन करने से आयु, छवीं रात्रि में आरोग्य, आठवीं रात्रि में प्रजा का सौभाग्य,
दसवीं रात्रि में ऐश्वर्य और बारहवीं रात्रि में बल का लाभ होता है ॥१६॥
अथ सर्वासां स्त्रीणां योनिमध्ये नाडीत्रयमस्तीत्याह-
मनोभवागारमुखेऽबलानां तिस्रो भवन्ति प्रमदाजनानाम् ।
समीरणा चन्द्रमुखी च गौरी विशेषमासामुपवर्णयामि ।।१७।।
स्त्रियों की योनि की नाड़ियाँ—अबला जो स्त्रियाँ है उनके भगद्वार में समीरणा, चान्दमसी और गौरी नाम की
तीन नाड़ियाँ होती हैं। उन सबों की जो विशेषता है उसका वर्णन निम्नलिखित है ॥
अथ तासां विशेषमाह-
प्रधानभूता मदनातपत्रे समीरणा नाम विशेषनाडी ।
तस्या मुखे यत् पतितं तु वीर्यं तन्निष्फलं स्यादिति चन्द्रमौलिः ।।१८।।
या चापरा चान्द्रमसी च नाडी कन्दर्पगेहे भवति प्रधाना।
सा सुन्दरी योषितमेव सूते साध्या भवेदल्परतोत्सवेषु ।।१९।।
गौरीति नाडी यदुपस्थगर्भे प्रधानभूता भवति स्वभावात् ।
पुत्रं प्रसूते बहुधाऽङ्गना सा कष्टोपभोग्या सुरतोपविष्टा ।।२०।।
स्त्रीयोनि के नाड़ियों की विशेषता—मदनातपत्र (योनिद्वार) में प्रधानरूप से समीरणा नाम की जो एक विशेष
प्रकार की नाड़ी है, उसके मुख में जो वीर्य पड़ जाता है, उससे गर्भ स्थित नहीं होता और कन्दर्पगृह (भग) के मध्य
में जो प्रधानरूप से चान्द्रमसी नाम की दूसरी नाड़ी होती है, उस नाड़ी के मुख में वीर्य गिरने पर वह सुन्दरी कन्या ही
उत्पन्न करती है तथा वह स्त्री थोड़ी ही रतिक्रिया करने से साध्य हो जाती है और जिस स्त्री के भग के मध्य में गौरी
नाम की प्रधानरूप से जो नाड़ी रहती है उसके मुख में यदि वीर्य गिरे तो स्वभावतः वह स्त्री पुत्र ही उत्पन्न करती है तथा
रतिक्रिया में प्रायः करके कष्ट से साध्य होती है (जल्दी उसका स्खलन नहीं होता ऐसा चन्द्रमौलि आचार्य का मत
है) ॥१८-२०॥
अथ युग्मायुग्मरात्रीणां फलमाह-
युग्मासु पुत्रा जायन्ते स्त्रियोऽयुग्मासु रात्रिषु ।।२१।।
सम तथा विषम रात्रियों में स्त्रीगमन करने का फल—युग्म अर्थात् चौथी, छठीं, आठवीं, दसवीं, बारहवीं
और सोलहवीं रात्रियों में ऋतुमती स्त्रियों के साथ सङ्ग करने से पुत्र उत्पन्न होते हैं और अयुग्म अर्थात् पाँचवीं, सातवीं,
नौवीं, इ्यारहवीं, तेरहवीं, पन्द्रहवीं, रात्रियों में स्त्रीगमन करने से पुत्रियाँ उत्पन्न होती हैं ॥२१॥
तत्र दम्पत्योः सम्भोगे यादृक्पुमान्युक्तस्तादृगुच्यते-
स्नातश्चन्दनलिप्ताङ्गः सुगन्धिसुमनोऽञ्चितः । भुक्तवृष्यः सुवसनः सुवेशः समलङ्कृतः ।।२२।।
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अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् २३
ताम्बूलवदनस्तस्यामनुरक्तोऽधिकस्मरः । पुत्रार्थी पुरुषो नारीमुपेयाच्छयने शुभे ।।२३।।
पुरुष के लिये स्त्री सम्भोग का विधान—स्त्री के साथ सम्भोग करने के दिन पुत्रप्राप्ति की इच्छा रखनेवाला
पुरुष स्नान करके, शरीर में चन्दन का लेप करके, सुगन्धित फूलों की माला आदि पहन कर अथवा इत्र लगा कर, वीर्य
को पैदा करनेवाले दुग्ध, घृतादि द्रव्य का भोजन करके, सुन्दर वस्त्र पहन कर, सुन्दर वेश बना कर तथा अच्छी तरह
से अलंकृत होकर, मुख में पान का बीड़ा रक्खे हुये अधिक कामान्वित तथा स्त्री में अनुरक्त होकर उत्तम शय्या पर स्त्री
के पास जावे ।।२२-२३।।
तत्रायोग्यं पुरुषमाह-
अत्याशितोऽधृतिः क्षुद्वान् सव्यथाङ्गः पिपासितः । बालो वृद्धोऽन्यवेगार्त्तस्त्यजेद्रोगी च मैथुनम् ।।२४।।
स्त्री सम्भोग में अयोग्य पुरुष—जो अत्यन्त भोजन किये हो, भूखा और धैर्य से रहित हो तथा जिसके अङ्गों
में दर्द हो रहा हो और जो प्यासा हो, बालक अथवा वृद्ध काम के वेग के अतिरिक्त अन्य मलमूत्रादिके वेग से व्याकुल
तथा रोगी हो, वह पुरुष स्त्रीगमन करना छोड़ देवे ।।२४।।
तत्र स्त्री यादृशी योग्या तादृश्युच्यते-
पुरुषस्य गुणैर्युक्ता विहिता न्यूनभोजना । नारी ऋतुमती पुंसा सङ्गच्छेस्तु सुतार्थिनी ।। २५ ।।
स्त्री के लिये पुरुष सम्भोग का विधान—सम्भोग करने के समय पुरुष के लिये जो-जो उचित गुण कह आये
हैं उन-उन गुणों से युक्त होकर स्वल्प भोजन किये हुई, पुत्रप्राप्ति की इच्छा रखनेवाली ऋतुमती स्त्री पुरुष के साथ सङ्ग
करे ।।२५।।
तत्रायोग्यां स्त्रियमाह-
रजस्वला व्याधिमती विशेषाद्योनिरोगिणी । वयोऽधिका च निष्कामा मलिना गर्भिणी तथा एतासां
सङ्गमात्पुंसां वैगुण्यानि भवन्ति हि ।।२६।।
सम्भोग के अयोग्य—रजस्वला, रोगिणी पुरुष की अवस्था से अधिक अवस्थावाली, कामचेष्टा से रहित, मैली-
कुचैली तथा गर्भिणी स्त्रियों के साथ सङ्ग करने से अनेक वैगुण्य (खराबियाँ) उत्पन्न होते हैं ।।२६।।
❖ तत्र रजस्वला दिनत्रयं यावत्तौ निषिद्धा, यत उक्तम्-
❖ 'प्रथमेऽहनि चाण्डाली द्वितीये ब्रह्मघातिनी । तृतीये रजकी पुंसां यथा वर्ज्या तथाङ्गना' ।।
रजस्वला स्त्री के साथ सम्भोग निषेध—रजोधर्म होने के दिन से लेकर तीन दिन तक रजस्वला स्त्री के साथ
सङ्ग करना निषिद्ध है । क्योंकि शास्त्र में कहा है कि—'रजस्वला स्त्री प्रथम दिन चाण्डाली, दूसरे दिन ब्रह्मघातिनी, तीसरे
दिन धोबिन की भाँति अस्पृश्य रहती हैं' ।।१।।
व्याधिमती च वर्ज्या । तत्र स्त्रीणां व्याधयः प्रदरादयस्तद्युक्ता निषिद्धा तत्रापि विशेषा-द्योनिरोगिणी ।।२६।।
'व्याधिमती च वर्ज्या' यहाँ 'व्याधिमती' कां—प्रदरादि व्याधियुक्त अर्थ है । उसमें भी विशेष करके योनिसम्बन्धी
रोगवाली स्त्री अवश्य निषिद्ध है ।।२६।।
गर्भावतरणक्रममाह-
कामान्मिथुनसंयोगे शुद्धशोणितशुक्रजः । गर्भः सञ्जायते नार्याः स जातो बाल उच्यते ।। २७ ।।
गर्भस्थिति का क्रम—काम के वश से स्त्री और पुरुष का परस्पर संयोग होने पर शुद्ध रज और वीर्य से उत्पन्न
होकर स्त्री को गर्भ होता है, वही गर्भ उदर से बाहर निकलने पर बाल (शिशु) कहलाता है ।।२७।।
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२४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे
❖ गर्भः शुद्धः, अशुद्धस्तु गर्भोऽशुद्धशुक्रशोणितयोरपि दम्पत्योर्भवति यत आह-
'दम्पत्योःकुष्ठबाहुल्याद् दुष्टशोणितशुक्रयोः । यदपत्यन्तयोर्जातं ज्ञेयं तदपि कुष्ठितम्' इति ।।
'गर्भ' से 'शुद्ध गर्भ' अर्थ समझना चाहिये, क्योंकि जिन स्त्री-पुरुषों के रज और वीर्य वातादि दोषों से दुष्ट होते
हैं। उनका जो गर्भ होता है, वह अशुद्ध कहलाता है जैसा कि कहा है—'अधिक कुष्ठ (कोढ़) होने से निज स्त्री और
पुरुषों का रज और शुक्र दुष्ट हो गया है, उन लोगों की जो सन्तान होती है वह भी कुष्ठित अर्थात् कुष्ठयुक्त (कोढ़ी)
होती है ॥२॥
❖ कुष्ठं सञ्जातं यस्य तत् कुष्ठितम् । अत्र तारकादित्वादितच्प्रत्ययः ।। २ ।।
जिसे कुष्ठ उत्पन्न हुआ हो वह 'कुष्ठित' कहलाता है यहाँ कुष्ठ शब्द से 'तारकादिभ्य इतच्' इस सूत्र से इतच्
प्रत्यय होने पर कुष्ठित शब्द की सिद्धि हुई है ॥२॥
यत्तु—'वातादिदुष्टरेतसः प्रजोत्पादने न समर्थाः' । इति सुश्रुतः । तत्र शुद्धप्रजोत्पादने न समर्था इति बोद्धव्यम् ।
रोगादिनाऽशुद्धास्तु प्रजा वातादिदुष्टशुक्रा अपि जनयन्ति जन्मान्धवधिरपङ्ग्वादि सम्भवात् ॥२७॥
'सुश्रुत' में जो लिखा है कि 'वातादि दोषों से जिनके वीर्य दुष्ट हो गये हैं, वे सन्तान उत्पन्न करने में समर्थ नहीं
होते' वहाँ 'शुद्ध सन्तान उत्पन्न करने में समर्थ नहीं होते' ऐसा समझना चाहिये । रोगादिकों के द्वारा अशुद्ध सन्तान
वातादिक दोषों से दुष्ट शुक्रवाले उत्पन्न करते हैं, जन्म से अन्धे, बहिरे, लूले आदि देखने में आते हैं ॥२७॥
ऋतौ स्त्रीपुंसयोर्योगे मकरध्वजवेगतः ।। २८ ।।
मेढ्रयोन्यभिसङ्घर्षाच्छरीरोष्माऽनिलाहतः । पुंसः सर्वशरीरस्थं रेतो द्रावयतेऽथ तत् ।। २९ ।।
वायुर्मेहनमार्गेण पातयत्यङ्गनाभगे ।
तत् संश्रुत्य व्यात्तमुखं याति गर्भाशयं प्रति । तत्र शुक्रवदायातेनार्त्तवेन युतं भवेत् ।। ३० ।।
काम के वेग के वशीभूत होने से ऋतुकाल में जब स्त्री और पुरुष का संयोग होता है तब लिङ्ग और योनि के
सङ्घर्ष (रगड़) से शरीर की ऊष्मा (गर्मी) वायु से आहत होकर पुरुष के सम्पूर्ण शरीर में स्थित वीर्य को द्रवित (बहने
लायक पतला) कर देती है । उसके बाद वायु उसी द्रवित वीर्य को लिङ्ग के मार्ग से स्त्री की योनि में गिराता है । उसके
बाद वही वीर्य बहकर जिसका मुँह खुला हुआ है ऐसे गर्भाशय में जाता है और गर्भाशय में वीर्य की भाँति आये हुए
रज के साथ मिल जाता है ॥२८-३०॥
गर्भाशयस्य स्वरूपमाह-
शङ्खनाभ्याकृतिर्योनिस्त्र्यावर्त्ता सा च कीर्त्तिता तस्यास्तृतीये त्वावर्त्ते गर्भशय्या प्रतिष्ठिता ।।
गर्भाशय के स्वरूप—योनि को पण्डितों ने शङ्ख की नाभि (मुख के भीतर के भाग) के सदृश तीन आवर्त्तों से
युक्त बतलाया है और उस योनि के तीसरे आवर्त्त में गर्भशय्या (गर्भाशय) है, ऐसा कहा है ॥३१॥
यथा रोहितमत्स्यस्य मुखं भवति रूपतः । तत्संस्थानां तथा रूपां गर्भशय्यां विदुर्बुधाः ।।
जिस प्रकार रोहू मछली का मुख देखने में होता है, गर्भाशय की भी आकृति और रूप उसी भाँति होते हैं ॥३२॥
❖ अयमर्थः-गर्भशय्याया मुखं रोहितमत्स्यस्येव भवति यथा च रोहितमत्स्यस्य स्थितिर्जले भवति तथा
पित्ताशयपक्वाशयमध्ये गर्भशय्यायाः स्थितिर्भवति रूपमपि तस्येव भवति यथा रोहितस्य मुखं स्वल्पमाशयस्तु
महानित्यर्थः ।। ३२ ।।
उपर्युक्त श्लोक का भाव यह है कि—गर्भाशय का मुख रोहित (रोहू) मछली की भाँति होता है जैसे रोहित मछली
अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् २०
की स्थिति जल के मध्य में रहती है गर्भाशय की भी स्थिति उसी भाँति पित्ताशय और पक्वाशय के मध्य में रहती है
और गर्भशय्या का रूप भी रोहित मछली की भाँति होता है अर्थात् जिस भाँति रोहित का मुखभाग बहुत कम चौड़ा होता
है और आशय (मुख के भीतर का भाग) बहुत चौड़ा होता है उसी भाँति गर्भाशय का भी मुखभाग बहुत छोटा और भीतर
का भाग बहुत बड़ा होता है ॥३२॥
अथ गर्भे जीवप्रवेशप्रकारमाह-
शुक्रार्त्तवसमाश्र्लेषो यदैव खलु जायते ।।३३।।
जीवस्तदैव विशति युक्तः शुक्रार्त्तवान्तरः ।
सूर्यांशोः सूर्यमणित उभयस्माद्युताद्यथा । वह्निः सञ्जायते जीवस्तथा शुक्रार्त्तवायुतात् ।।३४।।
गर्भ में जीव के प्रवेश करने का प्रकार—जिस समय शुक्र और आर्त्तव (रज) का संयोग होता है, उस समय
जीव उसी मिले हुए वीर्य और रज के भीतर प्रवेश करता है। सूर्य की किरण और सूर्यकान्तमणि इन दोनों का संयोग
होने से जैसे अग्नि उत्पन्न होती है, उसी तरह शुक्र और रज का संयोग होने से जीव उत्पन्न होता है ।।३३-३४।।
आत्माऽनादिरनन्तश्चाऽव्यक्तो वक्तुं न शक्यते ।।३५।।
चिदानन्दैकरूपोऽयं मनसाऽपि न गम्यते ।
एवम्भूतोऽपि जगतो भाविनी बलवत्तया । अविद्यास्वीकृते कर्मवशो गर्भे विशत्यसौ ।।३६।।
जीवात्मा अनादि, अनन्त तथा अव्यक्त है अतएव इसके विषय में मुख से कुछ कहा नहीं जा सकता और वह
चिदानन्दरूप (चैतन्य आनन्दस्वरूप) एक है अतः मन के लिये भी अगम्य है अर्थात् उसके स्वरूप की कल्पना मन भी
नहीं कर सकता किन्तु जगत् की उत्पत्ति करनेवाली माया बलवती होने से कर्म के वश होकर अविद्या से स्वीकृत (अज्ञान
से स्वीकार किये गये) गर्भ में प्रवेश करता है ।।३५-३६।।
❖ गर्भे=चतुर्विंशतितत्त्वमये ।।३५-३६।।
यहाँ 'गर्भे' पद से 'चौबीस तत्त्वों से बने हुए गर्भ में' यह अर्थ समझना चाहिये ।।३५-३६।।
स एव वेत्ता रसज्ञो द्रष्टा घ्राता स्पृशत्यसौ । श्रोता वक्ता च कर्त्ता च गन्ता रन्तोत्सृजत्यपि ।।३७।।
(गर्भ में जाकर) वही जीवात्मा जाननेवाला, स्वाद ग्रहण करनेवाला, देखनेवाला, गन्ध ग्रहण करनेवाला, स्पर्श
का बोध करनेवाला, सुननेवाला, बोलनेवाला, गमन करनेवाला, रमण करनेवाला तथा मलादि का त्याग करनेवाला होता
है ॥३७॥
अथ गर्भाशयद्वारमुखसंवरणकालमाह-
दिने व्यतीते नियतं सङ्कुचत्यम्बुजं यथा । ऋतौ व्यतीते नार्यास्तु योनिः संव्रियते तथा ।।३८।।
गर्भाशय द्वार बन्द होने के समय—दिन के बीत जाने पर (रात्रि में) कमल जिस भाँति नियतरूप से संकुचित
हो जाया करता है। उसी भाँति ऋतुकाल के बीत जाने पर स्त्रियों की योनि भी सङ्कुचित हो जाया करती हैं ॥३८॥
❖ ऋतौ=रजोदर्शनात् षोडशनिशाऽऽत्मके काले । योनिरत्र धराद्वारम् ।।३८।।
'ऋतु' पद से 'रजोदर्शन होने के दिन से लेकर सोलह रात्रि पर्यन्त जो काल है' उसका बोध करना चाहिये और
'योनि' पद से 'गर्भाशय का द्वार' समझना चाहिये ।।३८।।
अथ यमजसन्तानोत्पत्तौ हेतुमाह-
बीजेऽन्तर्वायुना भिन्ने द्वौ जीवौ कुक्षिमागतौ । यमावित्यभिधीयेते धर्मेतरपुरःसरौ ।।३९।।
२६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे
यमज (युग्म) सन्तान उत्पन्न होने का कारण—गर्भाशय के भीतर वायु के द्वारा जब रज वीर्य दो भागों में विभक्त
हो जाता है तब जो दो जीव गर्भाशय में आते हैं, वे ही धर्मेतर-पुरःसर (धर्माधर्मजन्य) यमज कहलाते हैं ॥३९॥
❖ तौ धर्मेतरपुरःसरौ=धर्मस्तदितरोऽधर्मस्तौ पुरःसरौ ययोः, तेन यमौ धर्माधर्माभ्यां भवत इत्यर्थः ॥३९॥
‘धर्मेतरपुरःसरौ’ इस पद का अर्थ यह है कि धर्म (पुण्यजनक कर्म) और उससे इतर अधर्म, ये दोनों पुरःसर अर्थात्
गर्भ में आने के कारण हैं जिनके, इसका फलितार्थ यह हुआ कि यमज धर्म और अधर्म से उत्पन्न होते हैं ॥३९॥
अथ स्त्रीपुंसनपुंसकसन्तानोत्पत्तौ हेतुमाह-
आधिक्ये रेतसः पुत्रः कन्या स्यादार्त्तवेऽधिके । नपुंसकं तयोः साम्ये यथेच्छा१ पारमेश्वरी ॥४०॥
पुत्र, पुत्री और नपुंसक सन्तान होने के कारण—शुक्र के अधिक होने से पुत्र, रज के अधिक होने से कन्या
और रज तथा वीर्य का भाग बराबर होने से नपुंसक सन्तान उत्पन्न होती है । क्योंकि ऐसी परमेश्वर की इच्छा है ॥४०॥
❖ नन्वेवं सति कथं पुत्रोत्पत्तिः सदैवार्त्तवस्यैव बाहुल्यात् । यत उक्तम्-
‘आर्त्तवं चतुरञ्जलिप्रमाणं शुक्रं प्रसृतिमात्रम्’ इति ।
वाग्भटेऽप्युक्तमात्रेयादिभिः-
‘मज्जा मेदो वासा मूत्रपित्तश्लेष्मशकृन्त्यसृक् । रसो जलं च देहेऽस्मिन् त्वेकैकाञ्जलिवर्द्धितम् ॥३॥
पृथक् च प्रसृतं प्रोक्तमोजोमस्तिष्करेतसाम् । द्वावञ्जली तु दुग्धस्य चत्वारो रजसः स्त्रियः ।।
समधातोरिदं मानं विद्याद् वृद्धिक्षयादृते’ ॥४॥
इस जगह शङ्का यह होती है कि—तब पुत्रोत्पत्ति कैसे होगी ? क्योंकि सदैव वीर्य की अपेक्षा रज का परिमाण
अधिक रहता है । कहा भी है—‘रज का परिमाण चार अञ्जलि और शुक्र का १ प्रसृति (आधी अञ्जलि) है’ । ‘वाग्भट’
में आत्रेयादि महर्षियों ने भी इसी बात को कहा है कि—‘मज्जा, मेद, वसा (चर्बी), मूत्र, पित्त, कफ, पुरीष (मल), रक्त,
रस और जल ये सब द्रव्य मनुष्य की देह में क्रमसे एक की अपेक्षा दूसरे एक-एक अञ्जलि अधिक हैं और ओज मस्तिष्क
तथा शुक्र इन सबों का पृथक्-पृथक् एक-एक अञ्जलि प्रमाण है और स्त्रियों के शरीर में दूध २ अञ्जलि और रज ४ अञ्जलि
प्रमाण रहता है, क्षय और वृद्धि से भिन्न समान धातु-वाले का ही यह प्रमाण जानना’ ॥३-४॥
❖ नैवं यतो गर्भाशयस्थमेव शुक्रमार्त्तवं च गर्भोत्पत्तिहेतुः शुक्रं कदाचिदत्यन्तहर्षदशाद्
दुग्धादिशुक्रलद्रव्यसेवनाद् शुक्रबाहुल्याद् गर्भाशये बहु स्रवति कदाचिद्वैमनस्यादिना शुक्राल्पत्वात्स्वल्पमिति,
एवमार्त्तवमपीति न दोषः ।।
सुश्रुतः पुनराह-
‘वैलक्षण्याच्छरीराणामस्थायित्वात्तथैव च । दोषधातुमलानां तु परिमाणं न विद्यते; ॥५॥
इसका उत्तर यह है कि-आपका शङ्का करना अनुचित है क्योंकि-गर्भाशय में ही स्थित जो शुक्र और रज हैं वे
ही गर्भ उत्पन्न होने में कारण हैं न कि समस्त शरीर में स्थित रज और वीर्य । शुक्र कभी अत्यन्त हर्ष होने से अथवा
दूध आदि शुक्र के बढ़ानेवाले द्रव्यों का सेवन करने से अथवा शुक्र की अधिकता होने से गर्भाशय में अधिक परिमाण
में गिर पड़ता है और कभी दुःखित मन होने से अथवा शुक्र की कमी होने से थोड़ा ही गिरता है, इसी तरह से आर्तव
के भी न्यूनाधिक्य होने का कारण समझना । सुश्रुत भी इसी विषय में कहते हैं कि—‘शरीरों की विलक्षणता तथा दोषादिकों
की अस्थिरता होने से दोष, धातु और मल इन पदार्थों के परिमाण की स्थिरता नहीं रहती’ ॥५॥
१. परमेश्वरीति पाठान्तरं प्रामादिकम् ।
अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् २७
❖ वैलक्षण्यात् दीर्घह्रस्वकृशादिभेदेन सादृश्याभावाद् अस्थायित्वात् वयोऽहर्निशर्तुभुक्तेष्वेकमात्रानवस्थानात्
(५) ।।४०।।
यहाँ पर 'वैलक्षण्यात्' से 'दीर्घ (लम्बा) ह्रस्व (छोटा) और कृश (दुबला) आदि भेदों से परस्पर शरीरों का सादृश्य
न होने से' और 'अस्थायित्वात्' से अवस्था, दिन, रात्रि, ऋतु (वसन्तादि) और भोजन इन सबों के आदि, मध्य और अन्त
में दोषादिकों की मात्रा की स्थिरता न होने से' यह अर्थ समझना चाहिये (५) ।।४०।।
एवं तामभिसङ्गम्य पुनर्मासाद् भजेदसौ ।।४१।।
पूर्वोक्त नियमों से ऋतुमती स्त्री का सङ्ग करने के बाद पुनः ऋतुमती होने पर एक मास के बाद उसका सङ्ग
करे ।।४१।।
❖ मासादूर्ध्वमिति शेषः । अर्वाग्गमनेन गर्भद्वारविघटनाद् गर्भच्युतिप्रसङ्गः स्यात्, केचित्तु, पुनः पुष्पदर्शनेन
गर्भलाभनिश्चये मासादूर्ध्व
२८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे
श्लोक में ‘पिण्ड’ पद का अर्थ ‘गोल’ है और ‘मासे द्वितीयेके’ (दूसरे महीने में) इस पद का अन्वय ‘गर्भः
पिण्डाकारो लक्ष्यः’ (गर्भ पिण्डाकार दिखलाई पड़ता है) इस वाक्य के साथ है न कि आगे के श्लोकों के साथ ॥४५॥
दक्षिणाक्षिमहत्त्वं स्यात् प्राक्क्षीरं दक्षिणे स्तने। दक्षिणोरुः सुपुष्टः स्यात्प्रसन्नमुखवर्णता ॥४६॥
पुन्नामधेयद्रव्येषु स्वप्नेष्वपि मनोरथः। आम्रादिफलमाप्नोति स्वप्नेषु कमलादि च ॥४७॥
दहिने नेत्र का बड़ा हो जाना, दहिने स्तन में पहले दूध का उतरना, दक्षिण ऊरु (जंघा) का भलीभाँति पुष्ट होना,
मुख के रंग का प्रसन्न (साफ) होना, स्वप्न में पुरुष संज्ञक द्रव्यों की अभिलाषा होना, स्वप्न में आम्रादि फलों और
कमलादिक पुष्पों की प्राप्ति होना, ये सब लक्षण दूसरे महीने के बाद से प्रकट होते हैं ॥४६-४७॥
अथ कन्यागर्भवत्या लक्षणम्-
कन्या गर्भवती गर्भे पेशी मासि द्वितीयेके। पुत्रगर्भस्य लिङ्गानि विपरीतानि चेक्षते ॥४८॥
कन्यागर्भवती स्त्रियों के लक्षण—जिसके गर्भ में कन्या रहती है, उस गर्भवती स्त्री का गर्भ दूसरे महीने में
पेशी (लंबा) की तरह दिखलाई पड़ता है और पुत्रगर्भ के जो लक्षण हैं उनसे विपरीत लक्षण दिखलाई पड़ते हैं अर्थात्
वायें नेत्र का बड़ा होना, वायें स्तन में पहले दूध उतरना इत्यादि विपरीत लक्षण समझना ॥४८॥
❖ पेशी दीर्घाकृतिः ॥४८॥
श्लोक में ‘पेशी’ का अर्थ है लम्बा आकारवाला ॥४८॥
अथ नपुंसकगर्भवत्या लक्षणमाह-
नपुंसकं यदा गर्भे भवेद् गर्भोऽर्बुदाकृतिः। उन्नते भवतः पार्श्वे पुरस्तादुदरं महत् ॥४९॥
नपुंसक गर्भ के लक्षण—यदि गर्भ में नपुंसक हो तो गर्भिणी का गर्भ आकार में अर्बुद के समान दिखाई पड़ता
है और उदर के दोनों भाग ऊँचे तथा सम्मुख भाग बड़ा दिखाई पड़ता है ॥४९॥
❖ अर्बुदं=वर्त्तुलफलार्द्धतुल्यम् ॥४९॥
‘अर्बुद’ पद से ‘गोलाकार फल के अर्धभाग के तुल्य’ अर्थ समझना चाहिये ॥४९॥
नपुंसकविशेषानाह१-
आसेक्यश्च सुगन्धी च कुम्भीकश्चेर्ष्यकस्तथा। अमी सशुक़ा बोद्धव्या अशुक़ः षण्डसंज्ञकः२ ॥५०॥
नपुंसकों के भेद—आसेक्य, सुगन्धी, कुम्भीक और ईर्ष्यक, ये चार प्रकार के नपुंसक को शुक्र होता है और
षण्ड नामक नपुंसक अशुक़ (शुक्ररहित) होता है ॥५०॥
एतेषां लक्षणान्याह, तत्रादावासेक्यलक्षणमाह-
पित्रोस्तु स्वल्पवीर्यत्वादासेक्यः पुरुषो भवेत्। सशुक़ं प्राश्य लभते ध्वजोन्नतिमसंशयम् ।।
नपुंसकों के लक्षण—माता-पिता का वीर्य कम होने से आसेक्य नामक नपुंसक पुरुष उत्पन्न होता है। जब वह
शुक्र पान करता है तभी निश्चित रूप से उसका लिङ्ग चैतन्य होता है ॥५१॥
❖ पित्रोर्मातापित्रोः स्वल्पवीर्यत्वात् स्वल्पशुक्रार्त्तवत्वाद्, आसेक्यनामा मुखयोनीति नामान्तरम्। स
शुक्रं प्राश्येति स पुरुषोऽन्यपुरुषेण मैथुनं कारयित्वा तस्य शुक्रं प्राश्य मेहनोत्थानं लभत इत्यर्थः ॥५१॥
१. ‘विशेषमाहे’ति पाठान्तरम्। २. ‘षण्ड-खण्डे’ति च पाठान्तरे प्रामादिके।
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अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् २९
श्लोक में 'पित्रोः' पद से 'माता-पिता का' और 'स्वल्पशुक्रार्तवात्' इसे 'रज और वीर्य कम होने से' ऐसा अर्थ
समझना चाहिये। 'आसेक्य' का दूसरा नाम 'मुखयोनि' भी है, अतःआसेक्य नामक नपुंसक अर्थात् मुखयोनि नामक जो
नपुंसक है, वह शुक्र का पान करके अर्थात् अन्य पुरुष से अपने मुख में मैथुन करा कर मुख में स्खलित हुये उस पुरुष
के वीर्य का पान करके अपने लिङ्ग के खड़े होने की शक्ति को प्राप्त करता है ॥५१॥
अथ सौगन्धिकनपुंसकलक्षणमाह-
यः पूतियोनौ जायेत स हि सौगन्धिको भवेत्। स योनिशेफसोर्गन्धमाघ्राय लभते बलम् ॥५२॥
जो दुर्गन्ध युक्त योनि से उत्पन्न होता है, वह सौगन्धिक नामक नपुंसक कहलाता है, और वह योनि तथा लिङ्ग
के गन्ध को सूँघ कर मैथुन करने में सामर्थ्य प्राप्त करता है ॥५२॥
❖ सौगन्धिकः = सौगन्धिकनामा, नासायोनिरिति नामान्तरम्। बलं मैथुने शक्तिम् ॥५२॥
श्लोक में 'सौगन्धिक' का दूसरा नाम नासायोनि भी है। 'बल' पद का अर्थ 'मैथुन करने में शक्ति' समझना
चाहिये ॥५२॥
अथ कुम्भीकनपुंसकलक्षणमाह-
स्वे गुदेऽब्रह्मचर्याद्यः स्त्रीषु पुंवत् प्रवर्त्तते। स कुम्भीक इति ज्ञेयो गुदयोनिस्तु स स्मृतः ॥५३॥
जो पुरुष अन्य पुरुष के द्वारा अपनी गुदा में मैथुन कराने पर मैथुन करने की शक्ति प्राप्त करता है, उसे कुम्भीक
नामक नपुंसक समझना चाहिये। उसका दूसरा नाम 'गुदयोनि' भी प्रसिद्ध है ॥५३॥
❖ अब्रह्मचर्याद् = ब्रह्मचर्यममैथुनम्; अब्रह्मचर्यम् = मैथुनम्, किन्तु स्त्रीवदधोभूतः स्वे गुदे पुरुषान्तरेण
मैथुनं कारयति, तस्मात् ॥५३॥
'अब्रह्मचर्यात्' — मैथुन से रहित, अत एव अब्रह्मचर्य का अर्थ मैथुन होने से इसका अर्थ जो 'अपनी गुदा में मैथुन
कराने से' यह होता है, उसमें 'स्त्री की तरह स्वयं नीचे रह कर ऊपर से दूसरे पुरुष से अपनी गुदा में मैथुन कराने से'
ऐसा अर्थ समझना चाहिये ॥५३॥
अथेर्ष्यकनपुंसकलक्षणमाह-
दृष्ट्वा व्यवायमन्येषां व्यवाये यः प्रवर्त्तते। ईर्ष्यकः स तु विज्ञेयो दृष्टियोनिस्तु स स्मृतः ॥५४॥
दूसरे पुरुष को मैथुन करते हुये देखकर जो मैथुन करने में प्रवृत्त होता है, उसे ईर्ष्यक नामक नपुंसक समझना
चाहिये। इसका दूसरा नाम दृष्टियोनि भी प्रसिद्ध है ॥५४॥
अथ षण्डनपुंसकलक्षणमाह-
यो भार्यायामृतौ मोहादङ्गनेव प्रवर्त्तते, तत्र स्त्रीचेष्टिताकारो जायते¹ षण्डसंज्ञकः ॥५५॥
जो मोह (मूर्खता) वश हो कर ऋतुकाल में स्त्री की भाँति मैथुन करने में प्रवृत्त होता है अर्थात् स्वयं स्त्री की भाँति
नीचे रह कर और स्त्री को अपने ऊपर उठाकर स्त्री से मैथुन कराता है और उस समय जो गर्भ होता है, उससे स्त्री की
तरह चेष्टा और आकारवाला षण्ढ नामक नपुंसक उत्पन्न होता है ॥५५॥
❖ स्त्रीचेष्टिताकारः स्त्र्याकारश्मश्रुरहितः। स्त्रीचेष्टितः समेहनोऽपि पुरुषशक्तिरहितः ॥५५॥
'स्त्रीचेष्टिताकारः' = स्त्री की तरह दाढ़ी और मूँछ से रहित। 'स्त्रीचेष्टितः' = 'स्त्री की तरह चेष्टावाला' अर्थात् लिङ्ग
होने पर भी पुरुष की जो मैथुन करने की शक्ति है, उससे रहित ॥५५॥
१. 'षण्ड=खण्डे'ति पाठान्तरे अशुद्धे।
३० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे
अथ नरचेष्टितायाः कन्याया उत्पत्तौ हेतुमाह-
ऋतौ ऋतौ पुरुषवत् प्रवर्त्तेताङ्गना यदि। तत्र कन्या यदि भवेत् सा भवेन्नरचेष्टिता ॥५६॥
पुरुष चेष्टावाली कन्या उत्पन्न होने के कारण—प्रत्येक ऋतुकाल में यदि स्त्री पुरुष की तरह (पुरुष के ऊपर
चढ़कर) मैथुन करने के लिये प्रवृत्त हो और उससे यदि कन्या उत्पन्न हो तो वह पुरुषों की भाँति चेष्टा करनेवाली होती
है ॥५६॥
❖ पुरुषवत् स्त्रियमारुह्य सा तस्या योनौ स्वयोनिघर्षणं करोति ।।५६।।
'पुरुष की भाँति चेष्टा करनेवाली' होती है अर्थात् (युवती होने पर) 'पुरुष की भाँति स्त्री के ऊपर चढ़ कर स्त्री
की योनि में अपनी योनि को रगड़नेवाली होती है' ऐसा समझना चाहिये ।।
अपरा अपि गर्भप्रकृतीराह-
यदा नार्यावुपैयातां वृष्यन्त्यौ कथञ्चन। मुञ्चन्त्यौ शुक्रमन्योन्यमनस्थिस्तत्र जायते ।।५७।।
अनस्थि सन्तानोत्पत्ति के लक्षण—यदि दो स्त्रियाँ काम से उन्मत्त हो करके परस्पर योनि रगड़ने के द्वारा शुक्र
(रज) का त्याग करें, तो उससे अनस्थि सन्तान उत्पन्न होती है ॥५७॥
❖ अनस्थिः-अत्रेषदर्थेनञ् तेनाल्पकोमलास्थिरित्यर्थः ।।५७।।
'अनस्थि' पद में ईषदर्थ में नञ् होने से इसका 'थोड़ी और कोमल हड्डियोंवाली' अर्थ होता है ॥५७॥
ऋतुस्नाता तु या नारी स्वप्ने मैथुनमाचरेत्। आर्तवं वायुरादाय कुक्षौ गर्भं करोति हि ॥५८॥
मासि मासि प्रवर्द्धेत स गर्भो. गर्भलक्षणः। कललं जायते तस्य वर्जितं पैतृकैर्गुणैः ॥५९॥
ऋतुस्नाता (रजोधर्म होने के बाद स्नान किये हुई) स्त्री यदि स्वप्न में मैथुन करे अर्थात् स्वप्न में देखे कि पुरुष
उसके साथ मैथुन कर रहा है और वह भी उसमें प्रवृत्त हो रही है तो उस समय वायु उसके रज को गर्भाशय में पहुँचा
कर गर्भ उत्पन्न कर देता है और वही गर्भ, गर्भ के लक्षणों से युक्त होकर महीने-महीने बढ़ा करता है, उसके बाद पैतृक
गुणों से रहित वह गर्भ कललरूप (कीचड़ रूप) में उत्पन्न होता है ॥५८-५९॥
❖ गर्भलक्षणः=प्रकृतगर्भलक्षणः। पैतृकैर्गुणैः=केशश्मश्रुलोमनखदन्तशिरास्नायुधमनीरेतः-
प्रभृतिभिः ।।५८-५९।।
'गर्भलक्षणः' का अर्थ है वस्तुतः गर्भ के लक्षणों से युक्त और 'पैतृकैर्गुणैः' का अर्थ—केश, दाढ़ी, मूँछ, रोम,
नख, दाँत, शिरा, स्नायु, धमनी और शुक्र आदि से (वर्जितं=वर्जित) ॥५८-५९॥
सर्पवृश्चिककूष्माण्डाकृतयो१ विकृताश्च ये। गर्भास्ते योषितस्ताश्च ज्ञेयाः पापकृतो भृशम् ।।६०।।
गर्भो वातप्रकोपेण दोहदे चापमानिते२। भवेत् कुब्जः कुणिः पङ्गुर्मूको भिन्निन एव च ।।६१।।
जिन स्त्रियों को साँप, बिच्छू और कूष्माण्ड के आकार के तथा विकृत (कुष्ठादि विकारों से युक्त) जो गर्भ उत्पन्न
होते हैं उन गर्भो को तथा उन स्त्रियों को अत्यन्त पापात्मा समझना चाहिये । गर्भिणी के दोहद को अपमानित करने पर
अर्थात् गर्भिणी को अभिलषित वस्तु न देने पर वायु के कोप से गर्भ कुब्जा, कुणि (जिसका हाथ टेढ़ा-मेढ़ा हो गया हो),
पङ्गु (लुञ्ज पैरोंवाला), गूँगा और मिनमिना अर्थात् मिनमिना कर बोलनेवाला उत्पन्न होता है ॥६०-६१॥
१. 'कुष्माण्डे'ति पाठान्तरमसङ्गतम्। २. 'चावमानिते' इति पाठान्तरम्।
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अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ३१
पुत्राणामाहाराचारचेष्टाभेदस्य हेतुमाह-
आहाराचारचेष्टाभिर्यादृशीभिः समन्वितौ । स्त्रीपुंसौ समुपेयातां तथोः पुत्रोऽपि तादृशः ।।६२।।
सन्तानों में चेष्टादि भेद के कारण-जिस तरह के आहार, आचार और चेष्टा से युक्त होकर स्त्री और पुरुष
ऋतुकाल में मैथुन करते हैं, उन दोनों के पुत्र भी उत्पन्न होने पर उसी तरह के आहार, आचार और चेष्टा से युक्त होते
हैं ॥६२॥
समुपेयातां संयोगं गच्छेताम् ।।६२।।
'समुपेयाताम्' अर्थात् 'मैथुन के लिये परस्पर संयुक्त होते हैं' ।।६२।।
अथ गर्भलक्षणमाह-
गर्भाशयगतं शुक्रमार्त्तवं जीवसंज्ञकः । प्रकृतिः सविकारा च तत्सर्वं गर्भसंज्ञकम् ।।६३।।
कालेन वर्द्धितो गर्भो यद्यङ्गोपाङ्गसंयुतः । भवेत्तदा स मुनिभिः शरीरीति निगद्यते ।।६४।।
गर्भ के लक्षण-गर्भाशयगत शुक्र, रज, जीव और सोलह विकारों से युक्त प्रकृति ये सब गर्भसंज्ञक हैं अर्थात्
इन्हीं को गर्भ कहते हैं। काल पाकर बढ़ा हुआ गर्भ जब अङ्ग और उपाङ्गों से युक्त हो जाता है, तब उसे मुनि लोग 'शरीरी'
कहते हैं ।।६३-६४।।
अङ्गोपाङ्गसंयुतः=व्यक्ताङ्गोपाङ्ग ।।६३-६४।।
'अङ्गोपाङ्गसंयुतः' अर्थात् 'जब अङ्ग और उपाङ्ग व्यक्त हो जाते हैं ।।६३-६४।।
तस्य त्वङ्गान्यनुपाङ्गानि ज्ञात्वा सुश्रुतशास्त्रतः । मस्तकादभिधीयन्ते शिष्याः ! शृणुत यत्नतः ।।६५।।
आद्यमङ्गं शिरः प्रोक्तं तदुपाङ्गानि कुन्तलाः । तस्यान्तर्मस्तुलुङ्गं च ललाटं भ्रूयुगन्तथा ।।६६।।
नेत्रद्वयं तयोरन्तर्वर्त्तन्ते द्वे कनीनिके । दृष्टिद्वयं कृष्णगोलौ श्वेतभागौ च वर्त्मनी ।।६७।।
पच्माण्यपाङ्गौ शङ्खौ च कर्णौ तच्छष्कुलीद्वयम् । पालिद्वयं कपोलौ च नासिका च प्रकीर्त्तिता ।।६८।।
ओष्ठाधरौ च सृक्किण्यौ मुखं तालु हनुद्वयम् । दन्ताश्च दन्तवेष्टश्च रसना चिबुकङ्गलः ।।६९।।
द्वितीयमङ्गं ग्रीवा तु यया मूर्द्धा विधार्यते । तृतीयं बाहुयुगलं तदुपाङ्गान्न्यथ ब्रुवे ।।७०।।
तत्रोपरि मतौ स्कन्धौ प्रगण्डौ भवतस्त्वधः । कफोणियुग्मं तदधः प्रकोष्ठयुगलन्तथा ।।७१।।
मणिबन्धौ तले हस्तौ तयोरङ्ङ्गुलयो दश। नखाश्च दश ते स्थाप्या दश च्छेद्याः प्रकीर्त्तिताः ।।७२।।
हे शिष्यो ! मैं उस शरीरी के अङ्ग और उपाङ्गों को 'सुश्रुत' शास्त्र से जान कर मस्तक से आरम्भ करके कहता
हूँ ! तुम लोग उसे यत्नपूर्वक सुनो-पहिला अङ्ग शिर कहा है और उसके उपाङ्ग केश, मस्तक के अन्दर रहनेवाला
मस्तुलुङ्ग (घृत की तरह एक प्रकार का पदार्थ), ललाट, दो भौंहें, दो नेत्र, दोनों नेत्रों के अन्दर रहनेवाली दो कनीनिकायें
(पुतलियाँ), दो दृष्टिमण्डल (निगाह-जिससे दिखाई पड़ता है), दो कृष्ण वर्ण के मण्डल, दो श्वेत भाग, दो पलकें,
दो पक्ष्म (नेत्रलोम), दो अपाङ्ग (नेत्रों के प्रान्तभाग), दो शङ्ख (मस्तक की हड्डी-कान के पास की कनपटी), दो कान,
दो कान की शष्कुलि (कान के छिद्रप्रदेश), दो पाली (पत्ते की भाँति कान के नीचे का भाग), दो कपोल (गाल), नाक,
ओष्ठ और अधर (नीचे का ओष्ठ), दो सृक्किणी (ओष्ठों के दोनों प्रान्तभाग), मुख, तालु, दो हनु (दोनों कपोलों के नीचे
तरफ के दोनों भाग), दाँत, जबड़ा, (मसूड़ा), जिह्वा, चिबुक (ठोढ़ी) और गला ये सब हैं। दूसरा अङ्ग ग्रीवा (गर्दन) है,
जिसके आधार पर शिर स्थित है। तीसरा अङ्ग दोनों बाँहें हैं। अब उसके उपाङ्गों को कहते हैं-उसमें दोनों बाहुओं के ऊपर
दो कन्धे और दोनों कन्धों के नीचे दो प्रगण्ड (बाजू) दोनों बाजुओं के नीचे दो कफोणि (केहुनी), उनके नीचे दो प्रकोष्ठ,
उनके नीचे दो मणिबन्ध (कलाई), उसके नीचे दो हथेली और दो हाथ, दोनों हाथों की दस अङ्गुलियाँ, दस नख तथा
उन नखों के ऊपर के दस स्थाप्य (नहीं काटने योग्य) और नीचे के नखों के दस अग्रभाग छेद्य (काटने योग्य) कहे हुए
हैं। ये सब दोनों बाहुओं के उपाङ्ग हैं ॥६५-७२॥
३२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे
चतुर्थमङ्गं वक्षस्तु तदुपाङ्गान्न्यथ ब्रुवे । स्तनौ पुंसस्तथा नार्या विशेष उभयोरयम् ।।७३।।
यौवनागमने नार्याः पीवरौ भवतः स्तनौ । गर्भवत्याः प्रसूतायास्तावेव क्षीरपूरितौ ।।७४।।
चौथा अङ्ग वक्षःस्थल (छाती) है, अब उसके उपाङ्गों को कहते हैं—दो स्तन, स्त्री और पुरुष के जो दो स्तन हैं,
उसमें विशेषता यह है कि युवावस्था आने पर स्त्री के दोनों स्तन मोटे हो जाते हैं और गर्भवती तथा प्रसूता स्त्री के वे
ही दोनों स्तन दूध से भर जाते हैं और पुरुष के दोनों स्तन सदा एक ही अवस्था में बने रहते हैं ।।७३-७४।।
अथ हृदयस्य स्वरूपमाह-
हृदयं पुण्डरीकेण सदृशं स्यादधोमुखम् । जाग्रतस्तद्विकसति स्वपतस्तु निमीलति ।।७५।।
आशयस्तत्तु जीवस्य चेतनास्थानमुत्तमम् । अतस्तस्मिंस्तमोव्याप्ते प्राणिनः प्रस्वपन्ति हि ।।७६।।
हृदय के स्वरूप—हृदय कमल के सदृश होता है, किन्तु कमल की भाँति ऊर्ध्वमुख न होकर वह अधोमुखवाला
होता है । प्राणी जब जागता रहता है तब वह विकसित (खिला) और जब सोता रहता है तब सङ्कुचित रहता है, वह
हृदय जीव का आशय (रहने का स्थान) तथा सबसे बढ़कर प्रधान चेतना का स्थान है । अतएव जब वह (हृदय) तमोगुण
से व्याप्त हो जाता है, तब प्राणिमात्र सो जाते हैं ।।७५-७६।।
❖ चेतनास्थानमुत्तममिति । अयमभिप्रायः-
'चेतनानामधिष्ठानं मनो देहश्च सेन्द्रियः । ^१केशलोमनखाग्रान्नमलद्रवगुणैर्विना' ।।६।।
'उत्तम चेतना का स्थान है' इसके कहने का अभिप्राय यह है कि—'केश, लोम, नखों के अग्रभाग, अन्न का मल,
द्रव पदार्थ मूत्रादिक और शब्दादि गुण, इन सब पदार्थों को छोड़कर इन्द्रियों के सहित सम्पूर्ण देह तथा मन चेतना का
स्थान है' ।।६।।
इत्युक्तवता चरकेण सकलं शरीरं चेनास्थानमुक्तं तदपेक्षया हृदयं विशेषतश्चेतनास्थानमिति
।।७५-७६।।
यद्यपि इस प्रकार कहते हुये चरक भगवान् ने सम्पूर्ण शरीर को चेतना का स्थान बतलाया है, तथापि और अङ्गों
की अपेक्षा हृदय विशेषरूप से चेतना का स्थान है ऐसा समझना चाहिये ।।७५-७६।।
कक्षयोर्वक्षसः सन्धी जत्रुणी समुदाहृते । कक्षे उभे समाख्याते तयोः स्यातां च वङ्क्षणौ ।।७७।।
दो जत्रु अर्थात् दोनों कक्षा (काँख) छाती के दो सन्धि और दोनों काँखों के दो वङ्क्षण (बाहुओं की सन्धि) अर्थात्
बगल, ये सब वक्षःस्थल के उपाङ्ग हैं ।।७७।।
उदरं पञ्चममङ्गं षष्ठं पार्श्वद्वयं मतम् । सपृष्ठवंशं पृष्ठं तु समस्तं सप्तमं स्मृतम् ।।७८।।
उपाङ्गानि च कथ्यन्ते तानि जानीहि यत्नतः । शोणिताज्जायते प्लीहा वामतो हृदयादधः ।।७९।।
रक्तवाहिशिराणां स मूलं ख्यातो महर्षिभिः । हृदयाद्वामतोऽधश्च फुप्फुसो रक्तफेनजः ।।८०।।
अधो दक्षिणतश्चापि हृदयाद्यकृतः स्थितिः । तत्तु रञ्जकपित्तस्य स्थानं शोणितजं मतम् ।।८१।।
पाँचवाँ अङ्ग (पेट), छठा अङ्ग दोनों पार्श्व (पँसुली) और सातवाँ अङ्ग पृष्ठवंश (मेरुदण्ड) के सहित समस्त पीठ
है । अब उसके जिन उपाङ्गों को कहता हूँ, उन्हें यत्नपूर्वक समझो—हृदय के नीचे वामभाग में प्लीहा है, जो रक्त से
उत्पन्न होती है और जिसे महर्षियों ने रक्तवाहिनी (जिसमें रक्त बहता है) शिराओं का मूल कहा है । हृदय के वाम भाग
१. 'केशलोमनखाग्रं च मलं द्रव्यगुणै'रिति पाठान्तरमसङ्गतम् ।
अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ३३
में नीचे की ओर फुफ्फुस है, जो रक्त के फेन (झाग) से उत्पन्न होता है। हृदय के दक्षिण भाग में नीचे की ओर यकृत्
है, जिसे मुनियों ने रञ्जक पित्त का स्थान और रक्त से उत्पन्न हुआ माना है ॥७८-८१॥
अधस्तु दक्षिणे भागे हृदयात् क्लोम तिष्ठति। जलवाहिशिरामूलं तृष्णाऽऽच्छादानकृन्मतम् ।।८२।।
हृदय के दक्षिण भाग में क्लोम रहता है, जिसे मुनियों ने जलवाहिनी शिराओं का मूल तथा तृष्णा (प्यास) का
आच्छादन करनेवाला माना है ॥८२॥
❖ क्लोम=तिलकम्, एतत्तु वातरक्तजम्। अत्र वृद्धवाग्भटोऽप्याह-‘रक्तादनिलसंयुक्तात्
कालीयकसमुद्भवः' (६) इति ।।८२।।
'क्लोम' का नाम तिलक भी है और यह क्लोम वात युक्त रक्त से उत्पन्न होता है। इस विषय में 'वृद्ध वाग्भट'
भी कहते हैं कि 'वायु युक्त रक्त से क्लोम अर्थात् कालीयक की उत्पत्ति होती है' (६) ।।८२।।
मेदःशोणितयोः साराद् १वृक्कयोर्युगलं भवेत्। तौ तु पुष्टिकरी प्रोक्तौ जठरस्थस्य भेदसः ।।८३।।
अर्द्धव्यामेन हीनानि योषितोऽन्त्राणि निर्दिशेत् ।।८४।।
उक्ताः सार्द्धास्त्रयो व्यामाः पुंसामन्त्राणि सूरिभिः ।
उन्दुकश्च कटी चापि त्रिकं बस्तिश्च वङ्क्षणौ । कण्डराणां प्ररोहः २स्यान्मेढ्रोऽध्वा वीर्यमूत्रयोः ।।८५।।
स एव गर्भस्याधानं कुर्याद्गर्भाशये स्त्रियाः ३ । शङ्खनाभ्याकृतिर्योनिस्त्र्यावर्त्ता सा च कीर्त्तिता ।।८६।।
तस्यास्तृतीये त्वावर्त्ते गर्भशय्या प्रतिष्ठिता । वृषणौ भवतः सारात्कफासृङ्मांसमेदसाम् ४ ।।८७।।
वीर्यवाहिशिराधारौ तौ मतौ पौरुषावहौ । गुदस्य मानं सर्वस्य सार्द्धं स्याच्चतुरङ्गुलम् ।।८८।।
तत्र स्युर्वलयस्तिस्रः शङ्खावर्त्तनिभास्तु ताः । प्रवाहिणी भवेत्पूर्वा सार्द्धाङ्गुलमिता ५ मता ।।८९।।
उत्सर्जनी तु तदधः सा सार्द्धाङ्गुलसम्मता । तस्याधः संवरणी ६ स्यादेकाङ्गुलसमा मता ।।९०।।
अर्द्धाङ्गुलप्रमाणं तु बुधैर्गुदमुखं मतम् । मलोत्सर्गस्य मार्गोऽयं पायुदहे विनिर्मितः ।।९१।।
पुंसः प्रोथौ स्मृतौ यौ तु त
३४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे
माना है। अतएव यह जिसको नहीं होता अथवा रोगाक्रान्त होता है तो वह मैथुन करने में समर्थ नहीं हो सकता। सम्पूर्ण
गुदा का मान ४ अङ्गुल है, उसमें शङ्ख के आवर्त्त की भाँति तीन बली हैं, उसमें पहिली बली प्रवाहिणी नाम की है और
उसका मान डेढ़ अङ्गुल का माना गया है। उसके नीचे उत्सर्जनी नाम की दूसरी बली है और उसका मान भी डेढ़ अङ्गुल
है, फिर उसके नीचे संवरणी नाम की तीसरी बली है, जिसका मान एक अङ्गुल है और आधे अङ्गुल प्रमाण पण्डितों
ने गुदा का मुख माना है। यही गुदामुख पायु कहलाता है। विधाता ने देह के बीच में इसी को अन्न के मल निकलने
का मार्ग बनाया है। पुरुषों के जो दो प्रोथ (कूले) होते हैं, वे ही दोनों स्त्रियों के नितम्ब कहलाते हैं और उन दोनों (प्रोथ
या नितम्बों) के दो कुकुन्दर अर्थात् नितम्बों के ऊपर के दो गड्ढे होते हैं, ये सब उदर के उपाङ्ग हैं। आठवाँ अङ्ग दोनों
सक्थि अर्थात् दोनों पैर हैं। अब मैं इनके उपाङ्गों को कहता हूँ-दो जानु, दो पिंडली, दो जंघा, दो घुण्टिका (घुटने), दो
एड़ी दो पैर के तलुये, दो चरण और दस पैर की अङ्गुलियाँ एवं उनके दस नख ये सब उपाङ्ग हैं ॥८३-९३॥
अथेदं शरीरमपरेणापि येन येन समवायिकारणेनोत्पद्यते तानि सर्वाण्याह-
अथ दोषाः प्रवक्ष्यन्ते धातवस्तदनन्तरम् ॥९४॥
अहारादेर्गतिस्तस्य परिणामश्च वक्ष्यते। आर्तवं चाथ धातूनां मलास्तदुपधातवः ॥९५॥
आशयाश्च कलाश्चापि मर्मांण्यथ च सन्धयः। शिराश्च स्नायवश्चापि धमन्यः कण्डरास्तथा ॥९६॥
रन्ध्राणि भूरि स्रोतांसि जालैः कूर्च्चाश्च रज्जवः। सेवन्यश्चाथ सङ्घाताः सीमन्ताश्च तथा त्वचः ॥९७॥
लोमानि लोमकूपाश्च देह एतन्मयो मतः।
शरीरोत्पत्ति में अन्यान्य समवायिकारण-अब प्रथम दोषों का वर्णन करेंगे, तदनन्तर धातुओं का, उसके बाद
आहार आदि की गति और उसका परिणाम तथा आर्तव और धातुओं के मल तथा उपधातु, आशय, कला, मर्म, सन्धि,
शिरा, स्नायु, धमनी, कण्डरा, रन्ध्र, स्रोत, जाल, कूर्च, रज्जु, सेवनी, सङ्घात, सीमन्त, त्वचा, लोम और लोमकूप,
इन सबों का वर्णन करेंगे, क्योंकि इन्हीं सबों से शरीर बना हुआ है ॥९४-९७॥
तत्र दोषस्वरूपमाह वाग्भटः-
वायुः पित्तं कफश्चेति त्रयो दोषाः समासतः ॥९८॥
विकृताविकृता देहं घ्नन्ति ते१ वर्द्धयन्ति च। ते व्यापिनोऽपि हृन्नाभ्योरधो मध्योर्ध्वसंश्रयाः।
वयोऽहोरात्रिभुक्तानामन्तमध्यादिगाः क्रमात् ॥९९॥
शरीरस्थ दोषों का स्वरूप-वायु, पित्त और कफ संक्षेप से यही तीन दोष कहे गये हैं और ये विकृत (दुष्ट)
होने से देह का नाश तथा अविकृत (शुद्ध) होने से शरीर को बढ़ाते हैं। यद्यपि ये सब दोष शरीर में व्याप्त होकर रहने
वाले हैं तथापि हृदय और नाभि के नीचे, मध्य तथा ऊपर भाग में विशेषरूप से रहते हैं। वायु, पित्त और कफ ये अवस्था,
दिन, रात्रि और भोजन इन सबों के अन्त, मध्य और आदि में क्रम से विशेष रूप से बलवान् रहते हैं अर्थात् वृद्धावस्था
में वायु, युवावस्था में पित्त, बाल्यावस्था में कफ, दिन तथा रात्रि के अन्त में वायु, मध्य में पित्त, आरम्भ में कफ, भोजन
के अन्त में (पचजाने पर) वायु, मध्य (पचने के समय) पित्त आरम्भ (भोजन कर चुकने के बाद) कफ की वृद्धि होती
है ॥९८-९९॥
दोषशब्दस्य निरुक्तिमाह-
धातवश्च मलाश्चापि दुष्यन्त्येभिर्यतस्ततः। वातपित्तकफा एते त्रयो दोषा इति स्मृताः ॥१००॥
दोष शब्द की निरुक्ति-वात, पित्त और कफ ये ही तीनों धातुओं तथा सम्पूर्ण मल पदार्थों को दूषित कर देते
हैं, इसी से ये वातादिक तीनों दोष कहलाते हैं ॥१००॥
१. 'सम्' इति पाठान्तरम्।
अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ३५
❖ दोषा इत्यत्र 'दुष वैकृत्ये' इति दुषधातोर्दुष्यन्त्येभिरिति वाक्येन 'अकर्त्तरि च कारके संज्ञायामि'त्यनेन
सूत्रेण करणेऽर्थे घञ्प्रत्ययः ।।१००।।
"दोषाः' इस पद में 'दुष-वैकृत्ये' अर्थात् वैकृत्यार्थक दुष धातु से 'दुष्यन्त्येभिरिति वाक्येन' अर्थात् 'रस, रक्त आदि
धातु और मल जिससे दूषित हों, उसे दोष कहते हैं' ऐसा अर्थ करने से 'अकर्त्तरि च कारके संज्ञायाम्' इस सूत्र से करण
अर्थ में घञ्प्रत्यय हुआ है ।।१००।।
ते धातवोऽपि विद्वद्भिर्गदिता देहधारणात् ।।१०१।।
वे ही वातादि देह को धारण करते हैं, इससे उनकी धातु संज्ञा भी है ।।१०१।।
यत आह सुश्रुतः-
❖ 'विसर्गादानविक्षेपैःसोमसूर्यानिला यथा । धारयन्ति जगद्देहंकफपित्तानिलास्तथा (७) इति' ।
चन्द्र, सूर्य और वायु जिस प्रकार विसर्ग (अमृत बरसाना), आदान (रसादिकों का ग्रहण करना) और विक्षेप के
द्वारा जगत् को धारण करते हैं, उसी प्रकार से कफ, पित्त और वायु भी देह को धारण करते हैं (७) ।।१०१।।
❖ अत्र यथासङ्घ्येनान्वयो बोद्धव्यः । विसर्गादानं वातस्यैव । विक्षेपः शीतोष्णादीनां विविधप्रकारेण
प्रेरणम् (७) ।।१०१।।
यहाँ पर विसर्ग, आदान और विक्षेप इन तीनों का कफ, पित्त और वायु इन तीनों के साथ तथा चन्द्रादिक तीनों
के साथ क्रम से अन्वय समझना चाहिये । विसर्ग और आदान ये दो क्रियायें यद्यपि क्रमानुसार कफ और पित्त की हैं तथापि
ये वायु के द्वारा ही होती हैं ऐसा समझना चाहिये । अतएव विक्षेप का अर्थ शीत और उष्णादिकों का अनेक प्रकार से
प्रेरणा करना है अर्थात् जो शीत और उष्णादि हैं सो क्रम से कफ और वित्तजन्य होते हैं, किन्तु इनका अनेक प्रकार से
प्रेरणा करना वायु का ही काम है, अतः स्वतन्त्र विक्षेपणक्रिया वायु की ही हुई (७) ।।१०१।।
मलाश्च ते रसादीनां मलिनीकरणान्मताः ।।
ये ही वातादि तीन दोष रसरक्तादिकों को मलिन कर देते हैं । अतएव 'मल' इस नाम से समझे जाते हैं ।।
तत्र वायोः स्वरूपमाह-
दोषधातुमलादीनां नेता शीघ्रः समीरणः । रजोगुणमयः सूक्ष्मो रूक्षः शीतो लघुश्चलः ।।१०२।।
त्रिदोषों में वायु के स्वरूप-वायु, दोष (कफ, पित्त), धातु (रसरक्तादि) और मलादि पदार्थों का नेता, शीघ्रकारी,
रजोगुण से युक्त, सूक्ष्म, रूक्ष (रूखा), शीतल, हल्का और चञ्चल है ।।
❖ नेता=स्थानान्तरं प्रापयिता । शीघ्रः=आशुकारी ।।१०२।।
'नेता' का अर्थ है एक स्थान से दूसरे स्थान में पहुँचानेवाला और 'शीघ्रः' का अर्थ है 'शीघ्रता करने वाला' ।।१०२।।
अन्यच्च-उत्साहोच्छ्वासनिःश्वासचेष्टावेगप्रवर्त्तनैः ।।१०३।।
गम्यग् गत्या च धातूनामिन्द्रियाणाञ्च पाटवैः । अनुगृह्णात्यविकृतो हृदयेन्द्रियचित्तधृक् ।।१०४।।
रजोगुणमयः सूक्ष्मः शीतो रूक्षो लघुश्चलः । खरो मृदुर्योंगवाही संयोगादुभयार्थकृत् ।।१०५।।
दाहकृत् तेजसा युक्तः१ शीतकृत्सोमसंश्रयात् । विभागकरणाद्वायुः प्रधानं दोषसंग्रहे ।।१०६।।
पक्वाशयकटीसक्थिश्रोत्रास्थिस्पर्शनेन्द्रियम् । स्थानं वातस्य तत्रापि पक्वाधानं विशेषतः ।।१०७।।
अधिकृत (शुद्ध) वायु उत्साह, उच्छ्वास (श्वास का लेना), निःश्वास (श्वास का छोड़ना), चेष्टा, मलमूत्रादिक का
३६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे
वेग होना तथा उसका प्रवर्तन (त्याग करना), धातुओं की गति अच्छी रखना, इन्द्रियों को अपने-अपने विषयों के ग्रहण
करने में सामर्थ्य देना, इन सब कार्यों से हृदय, इन्द्रिय और चित्त को धारण करता हुआ अनुग्रह (देह की रक्षा) किया
करता है और वायु रजोगुण से युक्त, सूक्ष्म से सूक्ष्म स्रोतों में गमन करने वाला, शीतल, रूक्ष, लघु, चलनशील, खर,
मृदु (नरम) योगवाही, संयोग विशेष होने से दोनों अर्थों का करनेवाला है अर्थात् तेज सम्बन्धी पदार्थों से युक्त होकर दाह
करनेवाला हो जाता है और सोमसम्बन्धी पदार्थों से युक्त होकर शीत करनेवाला हो जाता है, शरीर के सभी पदार्थों को
परस्पर विभाग (अलग-अलग) करने से दोषों का जहाँ संग्रह किया गया है, वहाँ पर वायु ही प्रधान माना गया है
और पक्वाशय, कटि, सक्थि (जानु की ऊपरी भाग), श्रोत्र (कान), अस्थि (हड्डी) और स्पर्शननेन्द्रिय (त्वक्) ये
सब वायु के स्थान हैं, इनमें विशेष करके पक्वाशय ही वायु का स्थान है। उसकी अपेक्षा और सब स्थान गौण
हैं ॥१०३-१०७॥
एको वायुः पित्तवन्नामस्थानकर्मभेदैः पञ्चविधस्तेषां नामान्याह-
उदानस्तदनुप्राणः समानोऽपान एव च । व्यानश्चैतानि नामानि वायोः स्थानप्रभेदतः ॥१०८॥
५ प्रकार के वायुओं के नाम—उदान, प्राण, समान, अपान और व्यान ये ५ नाम वायु के स्थानों के भेद से
हुये हैं ॥१०८॥
अथोदानादीनां स्थानान्याह-
कण्ठे हृदि तथाऽधस्तात्कोष्ठवह्नेर्मलाशये । सकलेऽपि शरीरेऽसौ क्रमेण पवनो वसेत् ॥१०९॥
उदानादि वायुओं के स्थान—उदान वायु कंठ में, प्राण वायु हृदय में, समान वायु नाभिप्रदेश में, अपान वायु
मलाशय में तथा व्यान वायु सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त होकर रहता है ॥१०९॥
अथ तेषां कर्माण्याह-
उदानो नाम यत्तूर्ध्वमुपैति पवनोत्तमः । तेन भाषितगीतादिप्रवृत्तिः कुपितस्तु सः ॥११०॥
ऊर्ध्वजत्रुगतान् रोगान्विदधाति विशेषः । यो वायुः प्राणनामाऽसौ मुखं गच्छति देहधृक् ॥१११॥
सोऽन्नं प्रवेशयत्यन्तः प्राणांश्चाप्यवलम्बते । प्रायशः कुरुते दुष्टो हिक्काश्वासादिकान् गदान् ॥११२॥
उदानादि वायुओं के कर्म—कण्ठ देश में स्थित उदानसंज्ञक वायु जब कण्ठ से ऊपर होता है तब उससे प्राणी
बोलने और गाने में प्रवृत्त होता है, और वही वायु जब कुपित होता है तब स्कंध और कक्षा की सन्धि में होने वाले रोगों
को उत्पन्न करता है। देह का धारण करनेवाला हृदय में स्थित प्राथमिक वायु जब मुख की ओर जाता है तब भोजन के
समय अन्न को पेट के अन्दर प्रवेश कराता है तथा प्राणों को अवलम्बन देता है और वही वायु जब कुपित होता है तब
हिचकी, दमा आदि रोगों को पैदा करता है ॥११०-११२॥
आमपक्वाशयचरः समानो वह्निसङ्गतः । सोऽन्नं पचति तज्जांश्च विशेषान्विनक्ति हि ॥११३॥
आमाशय और पक्वाशय में रहनेवाला समान नामक वायु जठराग्नि से युक्त होकर अन्न को पचाता है तथा अन्न
से उत्पन्न हुए विशेष पदार्थों को अलग करता है ॥१३॥
❖ तज्जानित्यादि । अन्नगतान् रसमलमूत्रादीन् पृथक्करोतीत्यर्थः ॥११३॥
'तज्जान्' इत्यादि का अर्थ यह है कि अन्न से उत्पन्न हुए रस, मल और मूत्र आदि को पृथक् करता है ॥११३॥
स दुष्टो वह्निमान्द्यातिसारगुल्मान् करोति हि । पक्वाशयालयोऽपानः काले कर्षति चाप्ययम् ॥११४॥
समीरणः शकृन्मूत्रशुक्रगर्भार्त्तवान्यधः । क्रुद्धस्तु कुरुते रोगान् घोरान्वस्तिगुदाश्रयान् ॥११५॥