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सर्वकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 71, कुल 1167 में से

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पृष्ठ 71

१८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे
(१कार्याणि, इन्द्रियाणां सर्वभूतानां कारणत्वान्महर्षिभिर्महत्तत्वादयः सप्त महानहङ्कारः पञ्चतन्मात्राणीति
प्रकृतयोऽपि प्रोक्ताः) । [२तथा सति प्रकृतिर्महानहङ्कारः पञ्च तन्मात्रा चेत्यष्टौ प्रकृतयः] ।।२९।।
जब कि इन्द्रियों का और पञ्च महाभूतों का कारण होने से प्रकृति के कार्यरूप महान्, अहङ्कार, पाँच तन्मात्र इस
प्रकार से महत्तत्त्वादि सात की महर्षियों ने प्रकृति के मध्य में गणना की है तो वैसा होने से प्रकृति, महान्, अहङ्कार और
पाँच तन्मात्र इस तरह से ये आठ प्रकृतियाँ हुईं ॥२९॥
अथ षोडश विकारानाह-
दशेन्द्रियाणि चित्तञ्च महाभूतानि पञ्च च । एतानि सृष्टिं जानद्भिर्विकाराः षोडश स्मृताः ।।३०।।
सोलह विकार—सृष्टि के अर्थात् सृष्टि किस क्रम से होती है, इस विषय के जाननेवाले पण्डितों ने दश इन्द्रिय,
चित्त और पाँच महाभूत ये ही १६ विकार के नाम से कहे हैं अर्थात् ये विकार कहलाते हैं ॥३०॥
विकाराः=कार्याणि ।।३०।।
विकार का अर्थ है कार्य ॥३०॥
अथ चतुर्विंशतितत्त्वान्युपसंहारञ्जीवात्मनः स्थानमाह-
एवं चतुर्विंशतिभिस्तत्त्वैः सिद्धे वपुर्गृहे । जीवात्मा नियतेर्निघ्नो वसति स्वान्तदूतवान् ।।३१।।
जीवात्मा के निवासस्थान—इस प्रकार चौबीस तत्त्वों से अर्थात् ८ प्रकृति और १६ विकारों से बने हुये शरीररूपी
गृह में शुभ तथा अशुभ कर्मों के अधीन होता हुआ, मनरूपी दूत से युक्त होकर जीवात्मा निवास करता है ॥३१॥
❖ अत्र शब्दादीनां वियदादिमहाभूतगुणानां धर्मिभ्योऽभिन्नतया पृथक्त्वं निरस्योक्तानां तत्त्वानामुपसंहारमाह-
चतुर्विंशतिभिरिति । तानि च प्रकृतयोऽष्टौ विकाराः षोडशेति । महत्तत्वादीनि³ प्रकृत्यादीनां भावाः, नियतेः=
शुभाशुभकर्मणः, निघ्नः=आयत्त:, स्वान्तदूतवान्=मनोदूतयुक्तः ।।३१।।
यहाँ आकाशादि पाँच महाभूतों के गुण को शब्दादि (शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध) हैं, इन्हीं को 'धर्म' से
धर्म अभिन्न होता है, इस नियम से पाँच महाभूतों से पृथक्ता का खण्डन करते हुए अर्थात् जो लोग शब्दादिकों को महाभूतों
से पृथक् मानते थे, उनके मत का खण्डन करते हुये और कहे हुए तत्त्वों का उपसंहार करते हुए 'चतुर्विंशतिभिस्तत्त्वैः'
(२४ तत्त्वों से) ऐसा कहा। वे चौबीस तत्त्व ८ प्रकृति और १६ विकार ये हैं। महत्तत्त्वादि सब प्रकृति आदि के भाव
अर्थात् कार्य हैं। यहाँ पर 'नियति' इस पद से 'शुभाशुभ कर्म' यह अर्थ समझना, निघ्नः=अर्थात् अधीन, स्वान्तदूतवान्=मनोरूपी
दूत से युक्त ॥३१॥
अथ जीवात्मा शारीरीत्युच्यत इत्याह-
स देही कथ्यते पापपुण्यदुःखसुखादिभिः । व्याप्तो बद्धश्च मनसा कृत्रिमैः कर्मबन्धनैः ।।३२।।
जीवात्मा और शरीरी—वही जीवात्मा पाप-पुण्य और दुःख-सुख से व्याप्त तथा मन के द्वारा कृत्रिम कर्म के
बन्धनों से बँधा हुआ शरीरी कहलाता है ॥३२॥
❖ सः=जीवात्मा ।।३२।।
'सः' पद का अर्थ 'वह जीवात्मा' है ॥३२॥
१. अयं कोष्ठस्थः पाठष्टीकाकृत्सम्मत इत्यत्र विभावनीयम् ।
२. अयं कोष्ठस्थः पाठः क्वाचित्कः ।
३. 'महत्तत्त्वानी'ति पाठ सर्वत्रोपलभ्यते किन्तु चिन्त्यः ।