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सर्वकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 81, कुल 1167 में से

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पृष्ठ 81

२८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे
श्लोक में ‘पिण्ड’ पद का अर्थ ‘गोल’ है और ‘मासे द्वितीयेके’ (दूसरे महीने में) इस पद का अन्वय ‘गर्भः
पिण्डाकारो लक्ष्यः’ (गर्भ पिण्डाकार दिखलाई पड़ता है) इस वाक्य के साथ है न कि आगे के श्लोकों के साथ ॥४५॥
दक्षिणाक्षिमहत्त्वं स्यात् प्राक्क्षीरं दक्षिणे स्तने। दक्षिणोरुः सुपुष्टः स्यात्प्रसन्नमुखवर्णता ॥४६॥
पुन्नामधेयद्रव्येषु स्वप्नेष्वपि मनोरथः। आम्रादिफलमाप्नोति स्वप्नेषु कमलादि च ॥४७॥
दहिने नेत्र का बड़ा हो जाना, दहिने स्तन में पहले दूध का उतरना, दक्षिण ऊरु (जंघा) का भलीभाँति पुष्ट होना,
मुख के रंग का प्रसन्न (साफ) होना, स्वप्न में पुरुष संज्ञक द्रव्यों की अभिलाषा होना, स्वप्न में आम्रादि फलों और
कमलादिक पुष्पों की प्राप्ति होना, ये सब लक्षण दूसरे महीने के बाद से प्रकट होते हैं ॥४६-४७॥
अथ कन्यागर्भवत्या लक्षणम्-
कन्या गर्भवती गर्भे पेशी मासि द्वितीयेके। पुत्रगर्भस्य लिङ्गानि विपरीतानि चेक्षते ॥४८॥
कन्यागर्भवती स्त्रियों के लक्षण—जिसके गर्भ में कन्या रहती है, उस गर्भवती स्त्री का गर्भ दूसरे महीने में
पेशी (लंबा) की तरह दिखलाई पड़ता है और पुत्रगर्भ के जो लक्षण हैं उनसे विपरीत लक्षण दिखलाई पड़ते हैं अर्थात्
वायें नेत्र का बड़ा होना, वायें स्तन में पहले दूध उतरना इत्यादि विपरीत लक्षण समझना ॥४८॥
❖ पेशी दीर्घाकृतिः ॥४८॥
श्लोक में ‘पेशी’ का अर्थ है लम्बा आकारवाला ॥४८॥
अथ नपुंसकगर्भवत्या लक्षणमाह-
नपुंसकं यदा गर्भे भवेद् गर्भोऽर्बुदाकृतिः। उन्नते भवतः पार्श्वे पुरस्तादुदरं महत् ॥४९॥
नपुंसक गर्भ के लक्षण—यदि गर्भ में नपुंसक हो तो गर्भिणी का गर्भ आकार में अर्बुद के समान दिखाई पड़ता
है और उदर के दोनों भाग ऊँचे तथा सम्मुख भाग बड़ा दिखाई पड़ता है ॥४९॥
❖ अर्बुदं=वर्त्तुलफलार्द्धतुल्यम् ॥४९॥
‘अर्बुद’ पद से ‘गोलाकार फल के अर्धभाग के तुल्य’ अर्थ समझना चाहिये ॥४९॥
नपुंसकविशेषानाह१-
आसेक्यश्च सुगन्धी च कुम्भीकश्चेर्ष्यकस्तथा। अमी सशुक़ा बोद्धव्या अशुक़ः षण्डसंज्ञकः२ ॥५०॥
नपुंसकों के भेद—आसेक्य, सुगन्धी, कुम्भीक और ईर्ष्यक, ये चार प्रकार के नपुंसक को शुक्र होता है और
षण्ड नामक नपुंसक अशुक़ (शुक्ररहित) होता है ॥५०॥
एतेषां लक्षणान्याह, तत्रादावासेक्यलक्षणमाह-
पित्रोस्तु स्वल्पवीर्यत्वादासेक्यः पुरुषो भवेत्। सशुक़ं प्राश्य लभते ध्वजोन्नतिमसंशयम् ।।
नपुंसकों के लक्षण—माता-पिता का वीर्य कम होने से आसेक्य नामक नपुंसक पुरुष उत्पन्न होता है। जब वह
शुक्र पान करता है तभी निश्चित रूप से उसका लिङ्ग चैतन्य होता है ॥५१॥
❖ पित्रोर्मातापित्रोः स्वल्पवीर्यत्वात् स्वल्पशुक्रार्त्तवत्वाद्, आसेक्यनामा मुखयोनीति नामान्तरम्। स
शुक्रं प्राश्येति स पुरुषोऽन्यपुरुषेण मैथुनं कारयित्वा तस्य शुक्रं प्राश्य मेहनोत्थानं लभत इत्यर्थः ॥५१॥
१. ‘विशेषमाहे’ति पाठान्तरम्। २. ‘षण्ड-खण्डे’ति च पाठान्तरे प्रामादिके।
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