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सर्वकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 76

अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् २३
ताम्बूलवदनस्तस्यामनुरक्तोऽधिकस्मरः । पुत्रार्थी पुरुषो नारीमुपेयाच्छयने शुभे ।।२३।।
पुरुष के लिये स्त्री सम्भोग का विधान—स्त्री के साथ सम्भोग करने के दिन पुत्रप्राप्ति की इच्छा रखनेवाला
पुरुष स्नान करके, शरीर में चन्दन का लेप करके, सुगन्धित फूलों की माला आदि पहन कर अथवा इत्र लगा कर, वीर्य
को पैदा करनेवाले दुग्ध, घृतादि द्रव्य का भोजन करके, सुन्दर वस्त्र पहन कर, सुन्दर वेश बना कर तथा अच्छी तरह
से अलंकृत होकर, मुख में पान का बीड़ा रक्खे हुये अधिक कामान्वित तथा स्त्री में अनुरक्त होकर उत्तम शय्या पर स्त्री
के पास जावे ।।२२-२३।।
तत्रायोग्यं पुरुषमाह-
अत्याशितोऽधृतिः क्षुद्वान् सव्यथाङ्गः पिपासितः । बालो वृद्धोऽन्यवेगार्त्तस्त्यजेद्रोगी च मैथुनम् ।।२४।।
स्त्री सम्भोग में अयोग्य पुरुष—जो अत्यन्त भोजन किये हो, भूखा और धैर्य से रहित हो तथा जिसके अङ्गों
में दर्द हो रहा हो और जो प्यासा हो, बालक अथवा वृद्ध काम के वेग के अतिरिक्त अन्य मलमूत्रादिके वेग से व्याकुल
तथा रोगी हो, वह पुरुष स्त्रीगमन करना छोड़ देवे ।।२४।।
तत्र स्त्री यादृशी योग्या तादृश्युच्यते-
पुरुषस्य गुणैर्युक्ता विहिता न्यूनभोजना । नारी ऋतुमती पुंसा सङ्गच्छेस्तु सुतार्थिनी ।। २५ ।।
स्त्री के लिये पुरुष सम्भोग का विधान—सम्भोग करने के समय पुरुष के लिये जो-जो उचित गुण कह आये
हैं उन-उन गुणों से युक्त होकर स्वल्प भोजन किये हुई, पुत्रप्राप्ति की इच्छा रखनेवाली ऋतुमती स्त्री पुरुष के साथ सङ्ग
करे ।।२५।।
तत्रायोग्यां स्त्रियमाह-
रजस्वला व्याधिमती विशेषाद्योनिरोगिणी । वयोऽधिका च निष्कामा मलिना गर्भिणी तथा एतासां
सङ्गमात्पुंसां वैगुण्यानि भवन्ति हि ।।२६।।
सम्भोग के अयोग्य—रजस्वला, रोगिणी पुरुष की अवस्था से अधिक अवस्थावाली, कामचेष्टा से रहित, मैली-
कुचैली तथा गर्भिणी स्त्रियों के साथ सङ्ग करने से अनेक वैगुण्य (खराबियाँ) उत्पन्न होते हैं ।।२६।।
❖ तत्र रजस्वला दिनत्रयं यावत्तौ निषिद्धा, यत उक्तम्-
❖ 'प्रथमेऽहनि चाण्डाली द्वितीये ब्रह्मघातिनी । तृतीये रजकी पुंसां यथा वर्ज्या तथाङ्गना' ।।
रजस्वला स्त्री के साथ सम्भोग निषेध—रजोधर्म होने के दिन से लेकर तीन दिन तक रजस्वला स्त्री के साथ
सङ्ग करना निषिद्ध है । क्योंकि शास्त्र में कहा है कि—'रजस्वला स्त्री प्रथम दिन चाण्डाली, दूसरे दिन ब्रह्मघातिनी, तीसरे
दिन धोबिन की भाँति अस्पृश्य रहती हैं' ।।१।।
व्याधिमती च वर्ज्या । तत्र स्त्रीणां व्याधयः प्रदरादयस्तद्युक्ता निषिद्धा तत्रापि विशेषा-द्योनिरोगिणी ।।२६।।
'व्याधिमती च वर्ज्या' यहाँ 'व्याधिमती' कां—प्रदरादि व्याधियुक्त अर्थ है । उसमें भी विशेष करके योनिसम्बन्धी
रोगवाली स्त्री अवश्य निषिद्ध है ।।२६।।
गर्भावतरणक्रममाह-
कामान्मिथुनसंयोगे शुद्धशोणितशुक्रजः । गर्भः सञ्जायते नार्याः स जातो बाल उच्यते ।। २७ ।।
गर्भस्थिति का क्रम—काम के वश से स्त्री और पुरुष का परस्पर संयोग होने पर शुद्ध रज और वीर्य से उत्पन्न
होकर स्त्री को गर्भ होता है, वही गर्भ उदर से बाहर निकलने पर बाल (शिशु) कहलाता है ।।२७।।
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