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सर्वकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 88

अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ३५
❖ दोषा इत्यत्र 'दुष वैकृत्ये' इति दुषधातोर्दुष्यन्त्येभिरिति वाक्येन 'अकर्त्तरि च कारके संज्ञायामि'त्यनेन
सूत्रेण करणेऽर्थे घञ्प्रत्ययः ।।१००।।
"दोषाः' इस पद में 'दुष-वैकृत्ये' अर्थात् वैकृत्यार्थक दुष धातु से 'दुष्यन्त्येभिरिति वाक्येन' अर्थात् 'रस, रक्त आदि
धातु और मल जिससे दूषित हों, उसे दोष कहते हैं' ऐसा अर्थ करने से 'अकर्त्तरि च कारके संज्ञायाम्' इस सूत्र से करण
अर्थ में घञ्प्रत्यय हुआ है ।।१००।।
ते धातवोऽपि विद्वद्भिर्गदिता देहधारणात् ।।१०१।।
वे ही वातादि देह को धारण करते हैं, इससे उनकी धातु संज्ञा भी है ।।१०१।।
यत आह सुश्रुतः-
❖ 'विसर्गादानविक्षेपैःसोमसूर्यानिला यथा । धारयन्ति जगद्देहंकफपित्तानिलास्तथा (७) इति' ।
चन्द्र, सूर्य और वायु जिस प्रकार विसर्ग (अमृत बरसाना), आदान (रसादिकों का ग्रहण करना) और विक्षेप के
द्वारा जगत् को धारण करते हैं, उसी प्रकार से कफ, पित्त और वायु भी देह को धारण करते हैं (७) ।।१०१।।
❖ अत्र यथासङ्घ्येनान्वयो बोद्धव्यः । विसर्गादानं वातस्यैव । विक्षेपः शीतोष्णादीनां विविधप्रकारेण
प्रेरणम् (७) ।।१०१।।
यहाँ पर विसर्ग, आदान और विक्षेप इन तीनों का कफ, पित्त और वायु इन तीनों के साथ तथा चन्द्रादिक तीनों
के साथ क्रम से अन्वय समझना चाहिये । विसर्ग और आदान ये दो क्रियायें यद्यपि क्रमानुसार कफ और पित्त की हैं तथापि
ये वायु के द्वारा ही होती हैं ऐसा समझना चाहिये । अतएव विक्षेप का अर्थ शीत और उष्णादिकों का अनेक प्रकार से
प्रेरणा करना है अर्थात् जो शीत और उष्णादि हैं सो क्रम से कफ और वित्तजन्य होते हैं, किन्तु इनका अनेक प्रकार से
प्रेरणा करना वायु का ही काम है, अतः स्वतन्त्र विक्षेपणक्रिया वायु की ही हुई (७) ।।१०१।।
मलाश्च ते रसादीनां मलिनीकरणान्मताः ।।
ये ही वातादि तीन दोष रसरक्तादिकों को मलिन कर देते हैं । अतएव 'मल' इस नाम से समझे जाते हैं ।।
तत्र वायोः स्वरूपमाह-
दोषधातुमलादीनां नेता शीघ्रः समीरणः । रजोगुणमयः सूक्ष्मो रूक्षः शीतो लघुश्चलः ।।१०२।।
त्रिदोषों में वायु के स्वरूप-वायु, दोष (कफ, पित्त), धातु (रसरक्तादि) और मलादि पदार्थों का नेता, शीघ्रकारी,
रजोगुण से युक्त, सूक्ष्म, रूक्ष (रूखा), शीतल, हल्का और चञ्चल है ।।
❖ नेता=स्थानान्तरं प्रापयिता । शीघ्रः=आशुकारी ।।१०२।।
'नेता' का अर्थ है एक स्थान से दूसरे स्थान में पहुँचानेवाला और 'शीघ्रः' का अर्थ है 'शीघ्रता करने वाला' ।।१०२।।
अन्यच्च-उत्साहोच्छ्वासनिःश्वासचेष्टावेगप्रवर्त्तनैः ।।१०३।।
गम्यग् गत्या च धातूनामिन्द्रियाणाञ्च पाटवैः । अनुगृह्णात्यविकृतो हृदयेन्द्रियचित्तधृक् ।।१०४।।
रजोगुणमयः सूक्ष्मः शीतो रूक्षो लघुश्चलः । खरो मृदुर्योंगवाही संयोगादुभयार्थकृत् ।।१०५।।
दाहकृत् तेजसा युक्तः१ शीतकृत्सोमसंश्रयात् । विभागकरणाद्वायुः प्रधानं दोषसंग्रहे ।।१०६।।
पक्वाशयकटीसक्थिश्रोत्रास्थिस्पर्शनेन्द्रियम् । स्थानं वातस्य तत्रापि पक्वाधानं विशेषतः ।।१०७।।
अधिकृत (शुद्ध) वायु उत्साह, उच्छ्वास (श्वास का लेना), निःश्वास (श्वास का छोड़ना), चेष्टा, मलमूत्रादिक का