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सर्वकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 70, कुल 1167 में से

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पृष्ठ 70

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अथ द्वितीयसृष्टिप्रकरणम् १७
रसो रसनेन्द्रियं शैत्यं स्नेहश्च गुरुता तथा। सर्वद्रवसमूहश्च शुक्रं वारिगुणाः स्मृताः ।।२५।।
जल के गुण— रस (मधुरादि ६ रस), रसनेन्द्रिय (जिह्वाग्रवर्ती), शीतलता, स्नेह (चिकनाहट), गुरुता (भारीपन),
सम्पूर्ण द्रव (बहनेवाले) पदार्थों का समूह और शुक्र ये सब गुण जल के कहे गये हैं ।।२५।।
अथ वसुन्धरागुणानाह-
गन्धो घ्राणेन्द्रियं चापि काठिन्यं गौरवं तथा। वसुन्धरा गुणा एते गदिता गुणवेदिभिः ।।२६।।
पृथ्‍वी के गुण— गन्ध, घ्राणेन्द्रिय (नासिका के अग्रभाग में रहनेवाला इन्द्रिय), कठिनता और गुरुत्व ये सब गुण
के विचार करनेवाले पण्डितों ने पृथ्‍वी के गुण कहे हैं ।।२६।।
शब्दः स्पर्शश्च रूपञ्च रसो गन्धश्च तत्क्रमात्। तन्मात्राणां विशेषाः स्युः स्थूलभावमुपागताः ।।२७।।
शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध ये पाँच तत्क्रम से अर्थात् शब्दतन्मात्रादिक्रम से तन्मात्राओं ही के स्थूलभाव को
प्राप्त हुये विशेष हैं, अर्थात् शब्दतन्मात्रादि ही स्थूलभावको प्राप्त होकर शब्द, स्पर्शादिरूप में परिणत हो जाते हैं ।।२७।।
तत्क्रमात् = शब्दतन्मात्रादिक्रमात्। अनुभवयोग्यैः सुखदुःखमोहरूपैर्धर्मैर्विशेष्यन्तइति विशेषाः। अत्र
कर्मणि घञ्प्रत्ययः। तन्मात्राणि त्वविशेषाणि यतस्तान्यनुभवयोग्यैः सुखादिभिर्विशेष्टं न शक्यन्ते सूक्ष्मत्वात् ।।२७।।
‘तत्क्रमात्’ इस पद से ‘शब्दतन्मात्रादि क्रम से’ यह अर्थ समझना चाहिये। विशेष अर्थात् अनुभव के योग्य सुख,
दुःख, मोहरूप धर्मों के द्वारा जिसका विशेष किया जाय उसे विशेष कहते हैं। यहाँ पर कर्म में घञ् प्रत्यय हुआ है।
शब्दादि तन्मात्र जो हैं वे तो अविशेष हैं, क्योंकि अत्यन्त सूक्ष्म होने से अनुभव के योग्य सुखादिकों के द्वारा उनका विशेष
नहीं किया जा सकता, स्थूलभाव को प्राप्त होने पर तो शब्द, स्पर्शादि रूप से उन तन्मात्रों का अनुभव योग्य सुखादिकों
के द्वारा विशेष किया जा सकता है ।।२७।।
अथाष्टानां प्रकृतीनां मध्ये तावत् प्रथमां प्रकृतिमाह-
प्रकृतेः कारणायोगान्मता प्रकृतिरेव सा। महत्तत्वादयः सप्त शक्तेर्विकृतयः स्मृताः ।।२८।।
आठ प्रकार की प्रकृति में पहली प्रकृति— प्रकृति अर्थात् अव्यक्त के सम्बन्ध में कारण का योग न होने से
अर्थात् अव्यक्त (प्रकृति) का कोई कारण नहीं है अतः वही यथार्थ रूपसे प्रकृति इस नाम से कही जाती है और महत्तत्त्वादि
७ तो शक्ति अर्थात् प्रकृति की विकृति अर्थात् कार्य कहे जाते हैं ।।
❖ प्रकृतिरेव=कारणमेव¹, न तु कस्यचित् कार्यमित्यर्थः²। शक्तेः प्रकृतेर्विकृतयः=कार्याणि ।।
प्रकृति ही है अर्थात् सबों का कारण ही है, न कि किसी का है और महत्तत्त्वादि (महान्, अहङ्कार और पाँच तन्मात्र)
सात शक्ति अर्थात् प्रकृति के विकृति अर्थात् कार्य हैं ।।२८।।
अथ सप्त प्रकृतीराह-
इन्द्रियाणां च भूतानां कारणत्वान्महर्षिभिः। महत्तत्वादयः सप्त प्रोक्ताः प्रकृतयोऽपि च ।।२९।।
सप्त प्रकृतियाँ— महत्तत्वादिक ७ जो प्रकृति के कार्य हैं, वे इन्द्रियों और पाँच महाभूतों के कारण हैं। अतः
महर्षियों ने इन्हें भी प्रकृति ही कहा है ।।२९।।
१. क्वचित् ‘कारणमिति पाठान्तरं तदसमीचीनम्।
२. अस्मात् परं— ‘कार्याणि; इन्द्रियाणां सर्वभूतानां कारणत्वान्महर्षिभिर्महत्तत्वादयः सप्त महानहङ्कारः पञ्च तन्मात्राणी’त्यधिकः
पाठो लभ्यते किन्तु स भ्रान्तिमूलक एवेति नादरणीयः।
५ भाव.I