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भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

तिनकूं देखूं नयन निहारा। जिनके तेज श्याम मुखम्हारा ॥
पहिरे रहूं कवच तनमाहीं। ताकूँ आँच लगत है नाहीं ॥
नारद यह सुन निहचै कीजे। यही बात हिरदै धर लीजे ॥
धरमराय अरु नारद मुनी। दोनों की हम चित दे सुनी ॥
स्वरग नरक को सबही गाथा। तुमसों कही खोल ये बाता ॥
देखी नासकेत 'नहीं राखी। नैन निहारी सगरी भाखी ॥३१॥
इति श्रीनासकेतोपाख्याने यमनारदसंवादोनामषोडशोऽध्यायः॥ १६ ॥
नासकेत उवाच ॥ दोहा ॥
और बात इक जगत में, है परसिद्ध लहूं।
देखी अपने नैनही, सोभी सुनो कहूं ॥ १ ॥
जो पापी जीवों किये, पिछले करम अघाय।
जनम पाय जा जगत में, सोई भुगतैं आयें ॥ २ ॥
चौपाई ॥
हत गऊवां पातक कियो भारी। बिषदे मनुष मारहू डारी ॥
अपने गुरुके घरके माहीं। देखें खोटी दिष्टबुराई ॥
सो निषिद्ध काया धर आवैं। ह्वाँ चंडाल जोनही पावैं ॥
मारै राह झूठ बहु बोलें। सो रोगी हो जग में डोलैं ॥
जो सोना जगमाहिं चुरावैं। जनम पाय कुष्ठी होजावैं ॥
जो मदिरा पी भये मतवाले। जिनके दांत हुये नखकारे ॥
ब्राह्मण पुस्तक पढ़न बिचारा। पावै जनम नागही कारा ॥
और जिन पाप जानकर कीन्हा। वाहू जनम सर्पकालीन्हा ॥३॥
दोहा ॥
जो कन्या कूं हनत है, कै बाहिर कै गेह।
जनम पायहैं जगत में, होय गधे की देह ॥ ४ ॥

६४२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चौपाई ॥
विष्पर भिष्टल मांस अहारी । देत दान जिनकूँ ग्रहचारी ॥
दोनों गीदड़ को तन पावैं । नासकेत यह खोल दिखावैं ॥
जो नर परतिरिया कूँ ताकै । पावै जनम सुवर को आकै ॥
जो नारी पर पुरुष लुभानी । सो वे 'सुरी होती जानी ॥
अरु जो दान करत कोई रोकै । पीठ लदै वहं घोड़ा होकै ॥
झूठा कर ब्राह्मणकूँ देवै । सोतो जनम बाज का लेवै ॥
जो कोई धरी धरोहर नाटै । अरु पक्षी के पर जो काटै ॥
सो बिष्ठाके कीड़े जानों । उनको पापी अधिक पिछानों ॥
काहूं के जो बसन चुरावैं । सो वे नर धोबी हो आवैं ॥
और जिन मोती रतन चुराया । अपना खाविंद मार गँवाया ॥
सो होवें पत्थर के कीड़ा । निहचै पावैं किरम शरीरा ॥५॥
दोहा ॥
सब बिध देवे जोग हो, नहीं देत वै दान ।
मनै करै जो और दे, बागल हो जग आन ॥ ६ ॥
चौपाई ॥
जो कुदिष्ट आँखन सूं देखै । अंधे काने होत बसेखै ॥
झूठा बाद विवाद बढ़ावै । सो कछुवे की काया पावै ॥
जो कोई परका दरब चुरावै । सोतो जन्म इह्व हो आवै ॥
इह्व देह तज बन्दर होवै । जनम अकारथ निहचै खोव ॥
जो कोई बेटी होती मारै । सो घिरघिट की काया धारै ॥
जो काहू का सूत मुसावै । होय न्हारू बहु दुख पावै ॥
गुली कपूर कपास चुरावै । सो मकड़ी की देही पावै ॥
जो काहू की चौरै पनहीं । जनमलेत चकचूंधर तनहीं ॥७॥

नासकेतलीलावर्णन । · ६४३
दोहा ॥
जिन काहू के फल चुरा, मानी नाहीं संक ।
ते नर हाथी होयकर, सिरमें खावैं अंक ॥ ८ ॥
गुरू ब्राह्मण का लिया, जानें अंस चुराय ।
काला होवै सरपही, मारूदेश में जाय ॥ ६ ॥
चौपाई ॥
विप्र साध पैरों जिन मारै । जनमत पिंगल भये विचारै ॥
जो ब्राह्मण कूँ मदिरा प्यावै । कूकर जौन सोई हो आवै ॥
जो काहू का अन्न चुरावै । होवे बहिरा सुना न जावै ॥
काहू से कीन्ही दुष्टाई । वे तो मृग होवैं बन जाई ॥
आप गुरू हो गुरू न कीन्हा । सो बिलाव होता हम चीन्हा ॥
वृक्ष काट जो फूल चुरावैं । जौन पपीहा की वे पावैं ॥
नितप्रत क्रोध नहीं · हरषावैं । सो वे जौन न्योल हो धावैं ॥
जो काहू की निन्दा करैं । जौन कोकिला की वे धरैं ॥१०॥
दोहा ॥

६४४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
ज्ञान सीख गुरूसूं फिरजावै । सो शरीर कोढ़ी को पावै ॥ १२॥
दोहा ॥
खोटे कर्मन सूं सबै, चौरासी में जाहिं ।
कहां लों गिनती मैं करूं, समझ देखि मनमाहिं ॥१३॥
इति श्रीनासकेतोपाख्याने कर्मानुसारयोनिप्राप्तिवर्णनं नाम
सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥
नासकेतउवाच ॥ चौपाई ॥
जिन मनुषों शंकर नहिं माना । ब्रह्मा का पूजन नहिं ठाना ॥
विष्णु भक्ति में मन नहिं दीन्हा । गुरुसेवा का नेम न लीन्हा ॥
साधों की सेवा नहिं जानी । तीरथ किये न परब पिछानी ॥
गुरुका कबहूं नाम न लीया । कबहूं पापी होम न कीया ॥
परमेश्वर का जप नहिं साधा । योग जुगत नाहीं आराधा ॥
पांचों इन्द्री बस नहिं कीन्हीं । भली वस्तु काहू नहिं दीन्हीं ॥
कथा कीरतन में नहिं गया । हरि सों बेमुख दुष्टी भया ॥
जिन नर ऐसी चाल बिसारी । सो डूवत है नरक मँझारी ॥१॥
दोहा ॥
जिन पूजे हैं देवता, होम यज्ञ कर दान ।
नासकेत देखी कहै, स्वर्ग लहैं वह जान ॥ २ ॥
चौपाई ॥
धरमराय जब पकड़ बुलावै । पाप पुण्य का न्याव चुकावै ॥
पापी पठवै नरक मँझारी । पुण्यी पठवै स्वर्ग मँझारी ॥
पाप पुण्य क्षीण होजावैं । फिर वह मृत्युलोक में आवैं ॥
पापी देह निषद जो पावैं । पुण्यी मनुष होय हुलसावैं ॥
धनवन्ते उत्तम घर जनमैं । भले भले लक्षण आवैं तिनमें ॥
अरु जो चौरासी सूं कढ़ैं । मनुष देह धर ऊचे चढ़ैं ॥

नासकेतलीलावर्णन । ६४५
खोटे लक्षै तिनके माहीं । चरनदास कहैं निहचै आई ॥
जितके जीव जहाईं जाई । यह मत वेद पुराणन गाई ॥
साध संगत कोई उतरै पारा । और चौरासी जाहिं मँझारा ॥
सुनि ऋषीश्वर रसमें पागै । धन्य धन्य जब कहने लागे ॥
अस्तुति करि मनमें हरपाये । अपने अपने अस्थल आये ॥३॥
दोहा ॥
नासकेत की यह कथा, संस्कृत्त के माहिं ।
चरनदास ने सो करी, उक्ति आपनी नाहिं ॥४॥
पढ़ा लिखा मैं कुछ नहीं, सतगुरु दीन्हों ज्ञान ।
रणजीता यों कहत है, ताही की पहिचान ॥५॥
कथाजु अधिक सुहावनी, सुनकर उपजै चाव ।
दया धरम हिये आबसै, भाजैं सबै कुभाव ॥ ६ ॥
सुनकर जो रहनी रहै, मनमाहीं गहलेह ।
पाप निकट आवै नहीं, जनम नाहिं दुखदेह ॥७॥
कथा सुनै चितवन करै, समझ धरै मन माहिं ।
पवन नरक की नालगै, पातक सबहिं नसाहिं ॥८॥
सुनकर रहनी ना रहै, चलै न याकी चाल ।
चरनदास यों कहत है, ताहि नरक तत्काल ॥६॥
सुनकर मनलावै नहीं, तामें चित नहिं दै ।
जीवत भिष्टलही रहै, मुये नरक का भै ॥१०॥
जनमेजय की साखही, कहूँ सुनों चितलाय ।
कुष्ठ अठारह ही हुते, सुनकर गये नसाय ॥ ११ ॥
नासकेत ऐसी कथा, जैसा धरम जहाज ।
जनमेजय तापर चढ़ा, कुष्ठ गये सब भाज ॥१२॥
खेवटिया जहाँब्यास से, बचन बाहहीवान ।

६४६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जगतसिन्धुसम जानिए, धरम जहाज पिछांत ॥ १३ ॥
यामें जो कोई चढ़ै, सोई उतरै पार ।
रहिजावै अभिमानसूं, सो डूबै मँझधार ॥ १४ ॥
सतगुरु बिन डूब सबी, रामभक्ति नहिं जान ।
सतसंगत आवै नहीं, करके बहु अभिमान ॥ १५ ॥
नासकेत की कथा कूं, कहै सुनै चितलाय ।
पाप तजै अरु पुन्यकरै, बसै स्वर्ग वह जाय ॥ १६ ॥
शुकदेव के परतापसूं, कह्यो नासहीकेत ।
पाप पुण्य के भेदकूं, समझन कारण हेत ॥ १७ ॥
इति श्रीश्यामचरनदासजीकृते नासकेतोपाख्याने शुभाशुभनिर्णय-
वर्णननामाष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥
संपूर्णः ॥

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