भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
'सख्यरस में प्रेम के व्यवहार [ २६७
से दृष्टिगोचर हैं। भाव यह है कि इन भक्तों के महाभाग्य की कोई तुलना
नहीं है। गोपवालों का श्रीकृष्ण से जो सख्य सम्बन्ध है वह विशिष्ट
प्रकार की दिव्य भावानुभूति है और प्रायः माधुर्य प्रेमभाव जैसा है।
गोपबालकों और श्रीकृष्ण में होने वाले प्रेम व्यवहार का वर्णन बहुत
कठिन है। श्रील रूप गोस्वामी जैसे विरक्त भक्तों ने श्रीकृष्ण और उनके
गोपबाल सखाओं के अनिर्वचनीय भावों पर विस्मय व्यक्त किया है।
श्रीकृष्ण और उनके अन्तरंग सखाओं द्वारा परस्पर आस्वादित यह
विशेष प्रकार का प्रेमभाव आगे वात्सल्यप्रेम में विकसित होता है और
उससे आगे माधुर्यप्रेम का रूप धारण कर लेता है, जो श्रीकृष्ण और उनके
भक्तों में होने वाला सर्वोच्च रस है।
अध्याय ४३
वत्सलभक्तिरस
जब प्रेम का भाव बढ़कर वात्सल्य सम्बन्ध में विकसित हो जाता है
और स्थायित्व को प्राप्त हो जाता है तब उस सम्बन्ध को वात्सल्यरस कहते
हैं। भक्ति के वात्सल्यरस का प्रकाश श्रीकृष्ण और उनके पिता-माता
आदि गुरुजनों के परस्पर व्यवहार में पाया जाता है।
विद्वानों ने श्रीकृष्ण के गुरुजनों में उनके लिए पाए जाने वाले
वात्सल्य प्रेम के उद्दीपनों का वर्णन किया है। वे कहते हैं—"जिनकी देह
नवीन कुवलय माला के समान श्याम एवं कोमल है, कमलनयन
केशराशि रूप भ्रमर पंक्ति से घिरे हुए हैं, ऐसे पुत्र कृष्ण को वृन्दावन में
घूमते देखकर नन्द महाराज की गृहिणी यशोदा मैय्या के स्तनों से दुग्ध की
धारा बह चली, जिससे उनका सारा शरीर भीग गया।" श्रीकृष्ण के लिए
वात्सल्यप्रेम का उद्दीपन करने वाले कुछ विशिष्ट उद्दीपक हैं—उनकी
श्यामल देह, उनका सर्वमंगलमयचिह्नों से युक्त स्वरूप, उनकी मृदुता, उनके
मधुर वचन, उनकी सरलता, उनकी लज्जा, निरन्तर गुरुजनों के सम्मान
करने की भावना, एवं उदारता—ये सब गुण वात्सल्यरस के उद्दीपन माने
जाते हैं।
श्रीमद्भागवत (१०.८.४५) में शुकदेव गोस्वामी का कथन है कि
जिन्हें सम्पूर्ण वेदों में सर्वोच्च देव, उपनिषदों में निर्विशेष ब्रह्म, दर्शन में
परम पुरुष माना गया है; योगी जिन्हें परमात्मा जानते हैं और भक्त
भगवान् स्वीकार करते हैं, उन्हीं श्रीकृष्ण को यशोदा मैय्या अपना पुत्र
मानती हैं। एक बार यशोदा मैय्या ने अपनी एक सखी से कहा,
“व्रजराज नन्द महाराज मेरे साथ भगवान् विष्णु की आराधना करते हैं।
इसी के फलस्वरूप कृष्ण पूतना और अन्य राक्षसों के चंगुल से बच गया।
अर्जुन को तेज आंधी ने गिरा दिया है और यद्यपि समझा जाता है कि
कृष्ण ने बलरामजी के साथ मिलकर गोवर्धन पर्वत को धारण किया,
वत्सलभक्तिरस [ २६६
मैं समझती हूँ कि वास्तव में नन्द महाराज ने ही पर्वत को उठाया था। नहीं
तो, नन्हे से बालक के लिये ऐसे बड़े पर्वत को उठाना कहाँ सम्भव था।"
यह भी वात्सल्यरस का उदाहरण है। इस वात्सल्यरस का उद्भव भक्त
के प्रेम में इस विश्वास के कारण होता है कि वह श्रीकृष्ण का पूज्य है और
यदि वह कृष्ण का लालन-पालन नहीं करेगा तो श्रीकृष्ण जीवित नहीं रह
सकेंगे। अतएव एक भक्त ने श्रीकृष्ण के माता-पिता से प्रार्थना की है—
“मैं श्रीकृष्ण के गुरुजनों को प्रणाम करता हूँ। वे द्रवितचित्त महानु-
भाव निरन्तर श्रीकृष्ण की सेवा और लालन-पालन को आतुर रहते हैं।
जगत् के पिता के लिए ऐसे कृपाभाव को रखने वाले इन महाभागवतों को
सादर प्रणाम है।"
एक ब्राह्मण अपनी प्रार्थना में कहता है—“जो वेद उपनिषदों
को पढ़ते हैं वे ऐसा किया करें और जो बन्धन के भय से मुक्त होने
के लिये महाभारत को भजते हैं, वे भी भजते रहें। परन्तु जहाँ तक
मेरा सम्बन्ध है, मैं तो केवल महाराज नन्द का भजन करता हूँ जिसके
आँगन में साक्षात् परब्रह्म श्रीकृष्ण बालरूप में क्रीड़ामग्न हैं।” श्रीकृष्ण में
वात्सल्य स्नेह रखने वाले गुरुजनों के नाम इस प्रकार हैं—व्रजेश्वरी यशोदा
मैय्या, व्रजेन्द्र नन्दमहाराज, बलराम की मैय्या रोहिणी, वे सब वृद्धा
गोपियाँ जिनके पुत्रों को ब्रह्माजी ने हर लिया था, वसुदेव-गृहिणी देवकी,
वसुदेव की अन्य पन्द्रह स्त्रियाँ, अर्जुन की माता कुन्ती, श्रीकृष्ण के पिता
वसुदेव, श्रीकृष्ण के गुरु सान्दीपनी मुनि—ये सब श्रीकृष्ण के गुरुजन उनमें
वात्सल्य प्रेम रखते हैं। इनमें जिनका नाम पहले है वे अगलों से से श्रेष्ठ
माने जाते हैं। इस प्रकार यशोदामैय्या और नन्दमहाराज का स्थान
गुरुजनों में सर्वोच्च है।
श्रीमद्भागवत (१०.६.३) में शुकदेव गोस्वामी महाराज परीक्षित से
यशोदा मैय्या के रूप और सौन्दर्य का वर्णन करते हैं। वे कहते हैं—"हे
राजन् ! यशोदा मैय्या ने कमर में रेशमी वस्त्र बाँधा हुआ था, पुत्र के लिये
स्नेहवश उनके स्तनों से दुग्धधारा निर्भरित हो रही थी। नवनीत निकालने
के लिये जब वे रस्सी को पकड़कर दुग्ध का मन्थन करतीं तो उनके हाथ
के कंगन और कानों के कुण्डल हिलकर बजने लगते और केशराशि में
सुशोभित पुष्प गिरने लगते। अतिश्रम के कारण उनका मुखमण्डल श्वेत
कणों से भर जाता।"
एक अन्य भक्त ने अपनी प्रार्थना में यशोदा मैय्या का चित्रण किया
है—"डोरी से जिनके घुंघराले बालों का जूड़ा बन्धा हुआ है, जिनकी माँग
३०० ] bhakti-rasāmṛta-sindhu
सिन्दूर से भरी हुई शोभा पा रही है, और जिनके अंग सम्पूर्ण अलंकारों का
तिरस्कार कर रहे हैं, जो नेत्रों से निरन्तर श्रीकृष्ण को निहारा करती हैं
और इस प्रकार जिनके नेत्र निरन्तर, अश्रुपूर्ण रहते हैं, नीलकमल के समान
कान्तिवाली, नाना वर्ण के परिधान से विभूषिता, यशोदा मैय्या की हम
शरण लेते हैं। उनकी कृपा-कटाक्ष हम पर पड़े जिससे हम माया के बन्धन
से बचकर सुगमता से भक्तिपथ पर अग्रसर हो सकें।"
श्रीकृष्ण के लिये यशोदा मैय्या के स्नेह का वर्णन इस प्रकार है—
प्रातःकाल उठकर यशोदा मैय्या सबसे पहले श्रीकृष्ण को स्तनपान करातीं,
फिर उनकी रक्षा के लिये नाना मन्त्रों का उच्चारण करतीं, उनके ललाट
को अच्छी प्रकार से विभूषित करतीं और उनकी भुजा में मन्त्रौषधि
बाँधती हैं। इस सबसे स्पष्ट है कि वे श्रीकृष्ण के लिये वात्सल्यरस की
साक्षात् मूर्ति हैं।"
नन्द महाराज का रूप इस प्रकार है—"उनके सिर के बाल कुछ
काले हैं और कुछ श्वेत हैं। वे बरगद के पत्ते के समान हरित वस्त्र धारण
किए रहते हैं। उनका पेट बढ़ा हुआ है और शरीर का वर्ण ठीक पूर्ण चन्द्र
जैसा है। वे सुन्दर दाढ़ी-मूँछ से युक्त हैं।" बाल्यकाल में एक दिन श्रीकृष्ण
घर के प्रांगण में पिता की उंगली पकड़े-पकड़े चल रहे थे। स्थिरतापूर्वक
न चल सकने के कारण वे गिरे जा रहे थे। जिस समय नन्द महाराज अपने
दिव्य पुत्र को इस प्रकार संरक्षण दे रहे थे तभी एकाएक उनके नेत्रों में
आँसू आ निकले और वे हर्षातिरेक से विह्वल हो गए। उन नन्द महाराज
के चरणकमलों में हमारा सादर प्रणाम।
कौमार की आयु, वेशभूषा, चेष्टा, बालक की चपलता, मधुर
वचन, मुस्कराना, और लीला आदि को विद्वानों ने वात्सल्यरस का
उद्दीपन बतलाया है। कौमार अवस्था आद्य, मध्य, और शेष—इस
भेद से तीन प्रकार की मानी गई है। कौमार अवस्था के प्रारम्भ में
कमर और जंघाओं की स्थूलता, नेत्रों के किनारों की श्वेतिमा, नन्हें-
नन्हें दाँतों का निकलना, अत्यन्त मृदु तथा कोमलता आदि होते हैं।
उस समय उनका वर्णन इस प्रकार है, "जिनका मुख तीन-चार दांतों
से शोभायमान है, जिनकी जंघायें खूब मोटी-मोटी हैं और जिनका
शरीर बहुत छोटा है, ऐसे श्रीकृष्ण अपनी शैशव क्रीड़ा से नन्द महाराज
और यशोदा मैय्या के आनन्द का वर्धन कर रहे हैं। वे कभी-कभी
बार-बार अपने नन्हें-नन्हें चरणों से चलने का प्रयास करते, कभी रोते,
कभी हँसते और कभी अंगूठा चूसते हुए भूमि पर चित पड़ जाते।" ये
सब बालकृष्ण की विविध लीलाएँ हैं, क्रीड़ाएँ हैं। जब श्रीकृष्ण भूमि पर
चित पड़े हुए कभी अपने चरण के अंगूठे को चूसने लगने, कभी हँसते;
कभी रोते तो उनकी इस प्रकार की लीला को देखकर यशोदा मैय्या उन्हें
तनिक भी मना करने की चेष्टा नहीं करतीं । वरन् वे तो बड़ी
उत्सुकता से देखते हुए अपने पुत्र की शैशव लीला का आनन्द लिया करती
थीं । श्रीकृष्ण की कौमार अवस्था के प्रारम्भ में उनके गले में सोने के हार
में बघनखा पहनाया गया था, ललाट पर गोरु चन्दन का तिलक था, नेत्रों
में काजल और कमर में सुनहरी रेशमी डोरी थी । यह कौमार के प्रारम्भ
में श्रीकृष्ण की वेशभूषा का वर्णन है ।
वक्षःस्थल पर बघनखा धारण किए, नवीन तमाल वृक्ष के समान
वर्ण से युक्त,गोरोचन तिलक से शोभायमान, हाथ में सुन्दर रेशमी डोरी
बाँधे हुए और कमर में रेशमी वस्त्रों से सुसज्जित भगवान् श्रीकृष्ण के इस
सुन्दर रूप को देखकर नन्द महाराज कभी तृप्त नहीं होते थे ।
मध्य कौमार अवस्था में श्रीकृष्ण के बालों का अगला भाग
नेत्रों के चारों ओर बिखर जाता । कभी वे कमर के नीचे वस्त्र धारण
करते तो कभी एकदम नंगे रहते । कभी वे एक-एक पग बढ़ाकर आगे
चलने का प्रयास करते और कभी टूटी भाषा में बड़ा मधुर बोलते । ये
सब उनकी मध्य कौमार अवस्था के कुछ लक्षण हैं। उस समय यशोदा
मैय्या ने उनके जिस रूप को देखा उसका वर्णन इस प्रकार है, "उनके
बिखरे बाल भौंहों को छू रहे थे और नेत्र भी बड़े चंचल हो चले
थे । वे अपने भाव को ठीक-ठीक व्यक्त नहीं कर पा रहे थे । फिर भी
जब वे बोलते तो उनकी वाणी बड़ी मधुर और श्रुतिप्रिय होती । जब
यशोदा मैय्या ने उनके नन्हें-नन्हें कानों और नन्हें शरीर की ओर देखा
और पाया कि वे अपने नन्हें-नन्हें चरणों से जल्दी-जल्दी भागने का प्रयास
कर रहे हैं, तो वे मानो अमृत के सिन्धु में निमग्न हो गईं । इस अवस्था
में श्रीकृष्ण के आभूषण हैं—नाक के अगले भाग पर धारण किया हुआ
मोती, हाथ में मक्खन और कमर आदि में बँधी किंकिणी । जब यशोदा
मैय्या ने अपने बालक को कमर में बँधी किंकिणी का शिञ्जन करते हुए,
नाक में सुन्दर मोती धारण किए हुए, हाथ में मक्खन लिए हुए और
मुस्कराते हुए चलने का प्रयास करते हुए देखा तो वे अपने नन्हें से बालक
की इस मुद्रा पर मुग्ध रह गई ।
जिस समय. श्रीकृष्ण अपने कौमार की शेष अवस्था में थे, उस
समय उनकी कमर पतली हो गई, वक्षःस्थल चौड़ा हो गया और
३०२] भक्तिरसामृतसिन्धु
सिर घुंघराली अलकावली से सुशोभित हो गया जो काक पक्षा जैसे
प्रतीत हो रहे थे । श्रीकृष्ण के इस अद्भुत स्वरूप को देखकर यशोदा मैय्या
कभी चकित हुए बिना नहीं रहती थीं । कौमार के अन्त में श्रीकृष्ण हाथ
में नन्हीं सी लाठी धारण करने लगे । उनके वस्त्र कुछ लम्बे हो गए और
कमर में गाँठ लगा ली । कमर को लगाई लंगोटी सर्प-फन को लज्जित कर
रही थी । इस वेषभूषा में वे घर के निकट ही बछड़ों की देखभाल करते
और कभी-कभी अपने ही समवयस्क गोपबालकों के साथ खेलते । उनके
पास एक पतली सी वंशी और एक शृंग भी था । एवं कभी-कभी वे पेड़ों
के पत्तों से बनी वंशी भी बजाते थे । ये सब श्रीकृष्ण के अन्तिम कौमार
के लक्षण हैं ।
जब श्रीकृष्ण कुछ बड़े हो गए तो बछड़ों को चराते-चराते प्रायः
वन के निकट चले जाते । घर लौटते में जब उन्हें थोड़ा सा भी विलम्ब
हो जाता तो नन्द महाराज तुरन्त चन्द्रशालिका पर चढ़कर उनका मार्ग
जोहने लगते । चन्द्रशालिका से वे तब तक नहीं उतरते जब तक यशोदा
मैय्या को यह संकेत न दे पाते कि अपने नन्हें गोपसखाओं और बछड़ों से
घिरे हुए श्रीकृष्ण लौट रहे हैं । पुत्र के सिर पर लगे मोरपंख की ओर
संकेत कर-कर के नन्द महाराज अपनी प्रिय गृहिणी को सूचित करते कि
बालक किस प्रकार उसके नेत्रों को आनन्दित कर रहा है ।
यशोदा मैय्या तब महाराज से इस प्रकार कहतीं, "देखिए मेरे
पुत्र को ! जिसके नेत्र श्वेतिमा से युक्त हैं, जिसने अपने सिर पर पगड़ी
धारण कर रखी है, और जिसके शरीर पर दुपट्टा और चरणों में बँधे
नूपुर मधुर शिञ्जन कर रहे हैं । वह निकट आ रहा है, अपने सुरभि बछड़ों
के साथ । देखो-देखो कैसे वह वृन्दावन की पावन भूमि में विहार कर
रहा है ।"
इसी प्रकार नन्द महाराज अपनी गृहिणी से कहते हैं, "हे यशोदे !
अपने पुत्र कृष्ण को तो देखो । उसके देह की श्यामल कान्ति, रक्तारुण
नयन, चौड़ा वक्षःस्थल और सुन्दर स्वर्ण हार कैसा अद्भुत लग रहा है और
कैसे मेरे दिव्य आह्लाद को अधिकाधिक बढ़ा रहा है ।"
जब नन्द महाराज के प्रियपुत्र श्रीकृष्ण किशोर में प्रवेश
करते हैं तो उनका सौन्दर्य बहुत बढ़ जाता है; परन्तु फिर भी उनके माता-
पिता उन्हें पौगण्ड अवस्था में समझते हैं, यद्यपि उनकी अवस्था दस और
पन्द्रह के बीच की होती है । इसके विपरीत जब श्रीकृष्ण पौगण्ड अवस्था
में रहते हैं तो उनके कुछ सेवक उन्हें कैशोर आयु में समझ लेते हैं । शैशव
वत्सलभक्तिरस | ३०३
काल की चपल लीलाओं में श्रीकृष्ण प्रायः दूध-दही के मटकों पात्रों को
फोड डालते हैं, दही को आंगन में बिखेर देते हैं और मक्खन की चोरी
करते हैं। कभी-कभी वे मथनी को भी तोड़ डालते हैं और कभी मक्खन
को अग्नि मे स्वाहा कर देते हैं। इस प्रकार वे मैय्या यशोदा के
दिव्य आनन्द को नित्य बढ़ाया करते हैं। इस सन्दर्भ में यशोदा मैय्या ने
एक बार अपनी दासी मुखरा से कहा था—"सशंक दृष्टि से चारों ओर
देखता हुआ बार-बार धीरे-धीरे लता से निकल कर आगे पग रखता हुआ
यह कृष्ण चला आ रहा है। अरि देख तो ! लगता है यह सीधे माखन
चुराकर आया है। चुपचाप खडी रह, इसे पता न चले कि हमने देख
लिया है। मैं इसकी चतुर भ्रू-भंगिमा, डरी हुई आँखों और सुन्दर मुख को
देखना चाहती हूँ।"
श्रीकृष्ण के चुपके-चुपके माखन चुराने की लीला में यशोदा मैय्या
को उनका सिर सूंघने, कभी कभी अपने हाथ से शरीर पर हाथ फेरने,
आर्शीवाद देने, आज्ञा देने, लालन-पालन करने और चोरी न करने का उपदेश
आदि देने का आस्वादन मिलता था। ये सब लीलाएँ वात्सल्यरस में होती
हैं। यह विशेष रूप से दर्शनीय है कि चोरी करने की बालकोचित प्रवृत्ति
भगवान में भी रहती है। अतएव यह प्रवृत्ति अस्वाभाविक नहीं है। परन्तु
प्राकृत जगत् के वितरीत, अप्राकृत सम्बन्धरस में इस प्रकार चोरी करने
में कोई दोष नहीं है।
श्रीमद्भागवत (१०.१३.३३) में शुकदेव गोस्वामी राजा परीक्षित से
कहते हैं, "हे राजन् ! जैसे ही वृद्धा गोपियों ने पुत्रों को आते देखा, उनमें
अनिर्वचनीय वात्सल्य उमड़ पड़ा और वे सब स्नेह से परिप्लावित हो गईं।
पहले वे अपने पुत्रों को माखन चोरी करने के लिए दण्डित करने का
विचारकर रही थीं, परन्तु जैसे ही पुत्र नेत्रों के सामने आये कि वे अपने
सारे क्रोध को भूल बैठीं और वात्सल्य से अभिभूत हो गईं। अपने पुत्रों
का आलिंगन करते हुए वे उनके सिर को सूंघने लगीं। इस प्रकार करते
हुए पुत्रप्रेम में वे प्रायः पागल हो गईं। अपनी शैशव क्रीड़ा में ये सब
गोपबालक श्रीकृष्ण के साथ माखन चोरो किया करते थे, परन्तु श्रीकृष्ण
पर क्रुद्ध होने के स्थान पर यशोदा मैय्या जब भी उन्हें देखतीं तो स्तनों से
निकली दुग्धधारा से भीग जातीं। श्रीकृष्ण के लिए अपने स्नेह के अतिरेक-
वश वे बारम्बार उनके सिर को सूंघने लगतीं।
चुम्बन, आलिंगन, नाम लेकर पुकारना और कभी-कभी चोरी करने
के लिए उलाहना देना, ये सब गोपबालकों की माताओं की सामान्य
: ३०४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
क्रियाएँ हैं। ये सब वात्सल्यरस के सात्त्विक भाव हैं जिनमें आठ प्रकार
के लक्षण पूर्ण रूप से प्रकट रहते हैं। श्रीमद्भागवत (१०.१३.२२) में शुक-
देव गोस्वामी राजा परीक्षित से कह रहे हैं, “गोपबालकों की माताएँ
श्रीभगवान् की योगमाया शक्ति से मोहित थीं। इसलिये जैसे ही वे अपने
बालकों की वंशीध्वनि सुनतीं, वैसे ही उठ कर खड़ी हो जातीं और मन
ही मन अपने पुत्रों का आलिंगन करने लगतीं, जो साक्षात् श्रीकृष्ण की
अन्तरंगा शक्ति द्वारा रचे गये थे। उन्हें अपने से उत्पन्न जानकर वे
उन्हें अपनी भुजाओं में लेकर आलिंगन करने लगतीं और उनकी देह को
अपने हृदय पर रख कर सहलातीं। ऐसी अवस्था में उत्पन्न भाव अमृत से
भी अधिक मधुर होते और माताओं के स्तनों से बहते दूध को उनके
बालक तुरन्त पी जाते।”
श्रील रूप गोस्वामी द्वारा संकलित 'ललितमाधव' में श्रीकृष्ण का इन
शब्दों में सम्बोधन किया गया है—“हे कृष्ण ! जब तुम गोचारण में
संलग्न होते हो तो गाय और बछड़ों के खुरों से उठी हुई धूल तुम्हारे सुन्दर
मुख और तिलक को ढक लेती है और तुम बिल्कुल धूली से भर
जाते हो। परन्तु जब घर को लौटते हो तो यशोदा मैय्या के स्तनों से
बहता हुआ दूध इस धूलि के आवरण को धो डालता है। जैसे अभिषेक
में श्रीमूर्ति को स्नान कराया जाता है उसी प्रकार तुम भी इस दूध से शुद्ध
हुए प्रतीत होते हो।” मन्दिरों में प्रथा है कि यदि कोई अशुद्ध कार्य बन
जाए तो श्रीमूर्ति को दुग्ध में स्नान कराया जाता है। श्रीकृष्ण स्वयं
भगवान् हैं। पर वे नित्य यशोदा मैय्या के स्तनों से निस्यन्दित दुग्धधारा में
स्नान करते थे, जिससे धूलि का आवरण उन पर से हट जाता था।
कभी-कभी यशोदा मैय्या भाव में स्तम्भित हो जातीं। जिस समय
श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत धारण कर रखा था उस समय यशोदा मैय्या
को उनका आलिंगन करने में संकोच हुआ और वे स्तम्भित रह गईं।
श्रीकृष्ण को पर्वत उठाकर संकट में पड़े देखकर यशोदा के नेत्रों में आँसू
भर आये। नेत्रों के अश्रुपूरित हो जाने के कारण वे श्रीकृष्ण की ओर
अधिक न देख सकीं और चिन्ता के कारण उनका कंठ रुद्ध हो गया। इस
लिये वे श्रीकृष्ण को क्या करना चाहिये, यह भी नहीं बतला सकीं। यह
प्रेम में स्तम्भित हो जाने का उदाहरण है।
अपने बालक को पूतना आदि राक्षसों के संकट से मुक्त हुआ
जानकर यशोदा मैय्या को प्रेमवश अपार हर्ष होता। श्रीमद्भागवत (१०.
१७.१६) में शुकदेव गोस्वामी कहते हैं कि खोये बालक के फिर से मिल जाने
वत्सलभक्तिरस [ ३०५
पर यशोदा मैय्या अपने को बड़ा भाग्यवान समझतीं। वे तुरन्त उन्हें
अपनी गोद में उठा लेतीं और बार-बार आलिंगन करतीं। इस
प्रकार करते-करते उनके नेत्रों से अविरल अश्रुधारा झरने लगतीं। वे
अपने दिव्य आनन्द को अभिव्यक्त न कर पातीं। श्रील रूप गोस्वामी
के "विदग्धमाधव" में उल्लेख है, "हे कृष्ण ! तुम्हारी मैय्या का स्पर्श
तो कर्पूर, पराग, चांदनी खस और चन्दन की शीतलता को भी जीतने
वाला है।"
श्रीकृष्ण के लिये यशोदा मैय्या की वात्सल्य रति निरन्तर स्वभावतः
प्रौढ़ता को प्राप्त होती जाती है। कभी अतिशय स्नेह और कभी
प्रबल राग के रूप में शोभायमान होती है। वात्सल्यरति का उदाहरण
श्रीमद्भागवत में (१०.६.४३) है। शुकदेव गोस्वामी महाराज परीक्षित
से कहते हैं, "हे राजन् ! जब महाभाग नन्द महाराज मथुरा से लौटे तो वे
अपने पुत्र का सिर सूंघने लगे और इस प्रकार वात्सल्यरस के भावसिन्धु
में निमग्न हो गये। इसी प्रकार का वाक्य यशोदा मैय्या के सम्बन्ध में है।
गोचारण से श्रीकृष्ण के लौटने की प्रतीक्षा में वे उनकी वंशीध्वनि को
सुनने के लिये अतिशय आतुर हो रही थीं। विलम्बवश श्रीकृष्ण की वंशी
को सुनने की उनकी उत्कंठा द्विगुणित हो गई और स्तनों से दुग्धधारा प्रवा-
हित होने लगीं। उस अवस्था में वे कभी घर के अन्दर आतीं और कभी
बाहर आ जातीं। वे निरन्तर मार्ग की ओर देख रही थीं कि कहीं गोविन्द
वापस तो नहीं लौट रहे। जब बड़े-बड़े महर्षि अद्भुत लीलापराक्रम के लिये
श्रीकृष्ण का जय-जयकार कर रहे थे तो गोकुलेश्वरी यशोदा मैय्या ने
कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में प्रवेश किया। उनकी साड़ी का अधोभाग स्तनों
से निकली दुग्धधारा से भीगा हुआ था। यशोदा मैय्या का कुरुक्षेत्र में यह
प्रवेश युद्ध के अवसर पर नहीं हुआ था। एक अन्य समय श्रीकृष्ण द्वारका
से सूर्यग्रहण के अवसर पर कुरुक्षेत्र आये थे। इसी समय वृन्दावनवासी भी
उन्हें देखने के लिये वहाँ गये।
जब श्रीकृष्ण तीर्थयात्रा के लिये कुरुक्षेत्र पधारे तो वहाँ एकत्रित
सारे जन कहने लगे कि देवकीनन्दन श्रीकृष्ण पधारे हैं। उस समय स्नेह
मयी जननी देवकी श्रीकृष्ण के मुख पर हाथ फेरने लगीं। और फिर जब
लोगों ने कहा कि वसुदेव पुत्र पधारे हैं तो दोनों नन्द महाराज और
यशोदा मैय्या प्रेम से उल्लसित होकर अपना प्रगाढ़ आनन्द व्यक्त करने
लगे।
अपने पुत्र को कुरुक्षेत्र में देखने जाते हुए यशोदा मैय्या गोकुलेश्वरी
३०६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
को उनकी एक सखी ने कहा, “हे ब्रजेश्वरी ! तुम्हारे स्तनरूप पर्वतों से
निकलने वाली दुग्धधारा ने गंगा को श्वेतवर्ण कर दिया है और तुम्हारे
नेत्रों से जो अश्रुधारा प्रवाहित हो रही है उस कज्जल मिश्रित जल ने
यमुना का जल काला कर दिया है । तुम इन दोनों नदियों के बीच खड़ी
हो इसलिये अब अपने पुत्र के मुख को देखने के लिये ऐसी क्यों उत्कंठित
हो । इन दोनों नदियों के रूप में तुम्हारा वात्सल्य प्रेम तो पहले ही व्यक्त
हो चुका है ।”
यशोदा मैया की उसी सखी ने श्रीकृष्ण से इस प्रकार कहा,
“हे मुकुन्द ! यदि गोकुलेश्वरी यशोदा मैय्या को तुम्हारे मुखारविन्द का
दर्शन होता रहे तो अग्नि में खड़ा होना भी उन्हें हिमालय जैसा लगेगा ।
दूसरी ओर, यदि उनका निवास अमृत के सिन्धु में हो, किन्तु तुम्हारा
मुखारविन्द न दीख पड़े तो फिर यह अमृत का सिन्धु भी उनके लिए विष
सागर जैसा हो जायेगा ।” श्रीकृष्ण के मुखचन्द्र को निरन्तर निहारने
की ब्रजेश्वरी यशोदा मैय्या की उत्कंठा त्रिभुवन में धन्यातिधन्य है ।
इसी प्रकार कुन्ती देवी अक्रूर से कहती हैं, “हे भय्या अक्रूर !
मेरा भतीजा मुकुन्द लम्बे समय तक हमसे अलग रहा है । क्या तुम उसे
यह सन्देश कह दोगे कि शत्रुओं के बीच पड़ी तुम्हारी कुन्ती बुआ जानना
चाहती है कि क्या वह दुबारा तुम्हारा मुखारविन्द देख सकेगी ?”
श्रीमद्भागवत (१०.४६.२८) में इस प्रकार का उल्लेख है । उद्धव
से वृन्दावन में श्रीकृष्ण की द्वारकालीला का वर्णन सुनकर यशोदा मैय्या
स्तनों से दूध बहाती हुई, नेत्रों से अश्रु विमोचन करने लगीं । श्रीकृष्ण के
लिये यशोदा मैय्या के वात्सल्य प्रेम की पराकाष्ठा का एक उदाहरण तब
प्रकट हुआ जब श्रीकृष्ण कंस की राजधानी मथुरा को चले गये । श्रीकृष्ण
के विरह में, श्रीकृष्ण के नन्हे-नन्हे खिलौनों को देखकर यशोदा मैय्या उच्च
स्वर से चिल्लाती हुई भूमि पर अचेतन गिर पड़ीं । भूमि पर लोटने से
उनकी देह नाना प्रकार से घायल हो गई और वे पुकारने लगीं—हा पुत्र,
हा पुत्र !” इस पर भी उन्हें सन्तोष न हुआ और वे दोनों हाथों से जोर
से छाती पीटने लगीं । यशोदा मैय्या की इस क्रिया को दक्ष भक्तों ने
विरहप्रेम की संज्ञा दी है । कभी-कभी बहुत से अन्य लक्षण भी होते हैं ।
जैसे—चिन्ता, शोक, निर्वेद, स्तम्भ, दैन्य, चापल्य, उन्मादन तथा मोह
आदि ।
जहाँ तक यशोदा मैय्या की चिन्ता का सम्बन्ध है, जब श्रीकृष्ण घर
वत्सलभक्तिरस [ ३०७
से बाहर गोचारण भूमि में थे तो एक भक्त ने यशोदा मैय्या से कहा,
"हे मैय्या ! मैं देख रहा हूँ कि तुम चिन्ता से भरी होने के कारण गति-
शून्य हो गई हो। तुम्हारे नेत्र भी अलक्षित से लग रहे हैं और तुम्हारी
श्वास में ऐसी उष्णता अनुभव होती है जिससे तुम्हारे स्तनों का दूध
उबलने लगा है। हे ब्रजेश्वरी ! इन लक्षणों से स्पष्ट प्रतीत होता है कि तुम
पुत्रविरह के दुःख से आक्रान्त हो रही हो।"
जिस समय अक्रूर वृन्दावन में श्रीकृष्ण की द्वारका लीलाओं का विव-
रण सुना रहे थे तो यशोदा मैय्या ने अपने कानों में सुना कि उनकी अनेक
रानियाँ हैं और वे निरन्तर उनके साथ गृहस्थ के कार्यों में लगे रहते हैं।
यह सुनने पर यशोदा मैय्या को बड़ा विषाद हो आया। वे सोचने लगीं
कि यह उनका कैसा दुर्भाग्य है कि पुत्र के कैशोर की समाप्ति होते ही
उन्होंने उसका विवाह नहीं कर दिया। अपनी इस भूल के कारण वे पुत्र
और पुत्रवधु को अपने महल में प्रवेश भी न करा पाईं। वे कह पड़ी, "हे
अक्रूर ! कृष्ण को मथुरा ले जाकर तुमने मेरे सिर पर वज्रपात कर
डाला है।" यह कृष्णविरह में यशोदा मैय्या में उदित विषाद का
लक्षण है।
इसी प्रकार निर्वेद का अनुभव करते हुए मैय्या सोचती, "मेरे पास
लाखों गायें हैं, फिर भी इनके दूध से श्रीकृष्ण की तृप्ति नहीं होती। अतएव
इस दूध को धिक्कार है। मुझे भी धिक्कार है, क्योंकि लौकिक सम्पदा से
समृद्ध होने पर भी अब मैं अपने पुत्र का उसी प्रकार सिर नहीं सूँघ सकती,
और न अपने स्तनों का दुग्धपान करा सकती हूँ, जैसा उसके वृन्दावन में
रहते समय कराती थी।"
श्रीकृष्ण के एक सखा ने उनका सम्बोधन किया, 'हे कमलनयन !
गोकुल में रहते समय तुम निरन्तर हाथ में छड़ी धारण किये रहते थे। वह
छड़ी अब यशोदा मैय्या के घर में खाली पड़ी है। अब जब भी वे उसे
देखती हैं तो उस छड़ी के समान ही जड़ रह जाती हैं। यह श्रीकृष्ण के
विरह में होने वाली जड़ता का उदाहरण है। श्रीकृष्ण के विरह में यशोदा
मैय्या इतनी दीन हो गईं कि अश्रुपूरित नेत्रों से भगवान् ब्रह्मा से याचना
करने लगीं- "हे विधाता ! क्या तू इतनी भी कृपा नहीं करेगा कि मेरे
पुत्र को एक बार फिर मेरे पास, चाहे क्षण भर के लिये ही, ले आये जिससे
उसके मुखचन्द्र को निहार सकूँ। कभी-कभी चापल्य में पागल स्त्री के समान
यशोदा जी नन्द महाराज पर आरोप लगातीं- 'अरे निर्लज्ज ! तू इस
महल में क्या कर रहा है ? लोग न जाने क्यों तुझे ब्रज का राजा कहते
३०८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
हैं। कितना आश्चर्य है कि पुत्रविरह में यह कठोर पिता पर्वत के समान
वृन्दावन में बना हुआ है ।
कभी-कभी श्रीकृष्ण के सखा उन्हें यशोदा मैय्या के उन्माद का इन
शब्दों में वर्णन सुनाते, “उन्मादवश यशोदा मैय्या कदम्ब के वृक्षों से पूछने
लगतीं, “हे कदम्बों ! तुम्हीं बताओ, मेरा पुत्र कहाँ गया ?'' इसी प्रकार वे
पक्षी और भ्रमरों से भी पूछतीं कि कहीं कृष्ण उनके आगे से तो नहीं गये
अथवा क्या वे उनके बारे में कुछ जानते हैं। इस प्रकार हे कृष्ण ! तुम्हारे
विषय में हर किसी से पूछते हुए यशोदा मैय्या वृन्दावन में भटक रही हैं।
यह श्रीकृष्ण के विरह में उन्माद का उदाहरण है ।
जब यशोदा मैय्या ने नन्द महाराज को पाषाण हृदय बतलाया तो
वे बोले, 'हे प्रिय ! तुम इतनी उत्तेजित क्यों हो रही हो । जरा ध्यान से
तो देखो ! देखो तुम्हारा पुत्र कृष्ण तुम्हारे सामने ही खड़ा है। इस प्रकार
पागलों के समान मत बनो । कृपया मेरे घर को शान्त बनाये रखो ।"
श्रीकृष्ण को उनके सखाओं ने सूचित किया कि उनके विरह में नन्द महा-
राज भी इस प्रकार मोहित हो गये हैं।
कंस की यज्ञशाल में उपस्थित वसुदेव की सारी स्त्रियों ने जब
श्रीकृष्ण के सुन्दर रूप को देखा तो तुरन्त वात्सल्य प्रेमवश उनके स्तनों
से दुग्ध की धारा प्रवाहित होने लगी और उनकी साड़ियों के अधोभाग
भीग गये । यह श्रीकृष्ण के योग से होने वाले प्रेमभाव का लक्षण है ।
श्रीमद्भागवत (१.११.२६) में उल्लेख है कि जब कुरुक्षेत्र के युद्ध का
अन्त होने पर श्रीकृष्ण ने द्वारका में प्रवेश किया तो उनकी दृष्टि सबसे
पहले अपनी सब माताओं पर गई और उन्होंने तुरन्त उनके सादर चरणों
में प्रणाम किया । माताओं ने भी श्रीकृष्ण को तत्क्षण अपने अंक में उठा लिया
और वात्सल्य स्नेहवश उनके स्तनों से दूध बह चला । इस प्रकार अश्रुधारा
के जल से मिश्रित उनके स्तनों का दुग्ध श्रीकृष्ण को प्रथम अर्पण हुआ ।
यह महाविरह के बाद तुष्टि का उदाहरण है।
'ललितमाधव' में एक अन्य वाक्य है—अहो ! कैसा आश्चर्य है
कि नन्दगेहिनी यशोदा जी ने अपने वात्सल्यरस में अपने नेत्रजल और
स्तन के दुग्ध के मिश्रण से पुत्र कृष्ण का स्नान कराया । 'विदग्धमाधव'
में एक भक्त श्रीकृष्ण का सम्बोधन करते हुए कहता है, हे मुकुन्द ! तुम्हारे
कमल की सुगन्ध से परिपूर्ण मुख की चन्द्रिका से आकृष्ट हुई यशोदा
मैय्या प्रेम से अभिभूत हो गईं और तुरन्त उनके बड़े-बड़े स्तनों से दुग्ध
वत्सलभक्तिरस [ ३०६
झरने लगा।" इस प्रकार यशोदा मैय्या के स्तनों से श्रीकृष्ण के लिये
निरन्तर दुग्ध की धारा बरसती रहती थी।
ये सब श्रीकृष्ण के लिये उनकी माता, पिता, एवं अन्य गुरुजनों
द्वारा अभिव्यक्त कतिपय वात्सल्य के भाव हैं। इनकी अभिव्यक्ति कृष्ण में
पुत्रभाव करने पर होती है। श्रीकृष्ण के लिये निरन्तर वत्सलता का भाव
वात्सल्यरस का स्थायिभाव है।
श्रीरूप गोस्वामी का यहाँ उल्लेख है कि कतिपय विद्वानों के अनुसार
अब तक वर्णित तीन प्रकार के दिव्य रस, अर्थात् दास्य, सख्य और वात्सल्य
कभी-कभी परस्पर मिल जाते हैं। उदाहरण के लिये, बलराम का सख्य
भाव दास्य और वात्सल्य स्नेह से मिश्रित है। इसी प्रकार श्रीकृष्ण के
लिये युधिष्ठिर की रति में वात्सल्य, स्नेह और दास्य का मिश्रण है। इसी
प्रकार श्रीकृष्ण के पितामह उग्रसेन में दास्य और वात्सल्य दोनों पाये
जाते हैं। वृन्दावन की सारी वृद्धा गोपियों का भाव वात्सल्य, दास्य और
सख्य का मिश्रण है। माद्री के पुत्रों अर्थात् नकुल, सहदेव और महर्षि नारद
का स्नेह भी सख्य और दास्य का मिश्रण है। भगवान् शिव, गरुड़, और
उद्धव के भाव में दास्य और सख्य, दोनों पाये जाते हैं।
अध्याय ४४
मधुरभक्तिरस
मधुररति में श्रीकृष्ण के प्रति शुद्धभक्त के आकर्षण को भक्ति का
मधुऱरस कहा जाता है। यद्यपि ऐसा मधुरभाव बिल्कुल भी प्राकृत नहीं
होता, फिर भी इस दिव्य प्रेम और प्राकृत काम-क्रीड़ाओं में समानता सी
लगती है। अतएव जो केवल लौकिक काम-क्रीड़ाओं में रुचि रखते हैं वे
इस दिव्य प्रेम को नहीं समझ सकते । दिव्य भक्तिरस का यह विनिमय
उन्हें बड़ा रहस्यमय प्रतीत होता है। यही कारण है कि श्रील रूपगोस्वामी
मधुरभक्तिरस का अत्यन्त संक्षिप्त वर्णन करते हैं।
मधुरभक्तिरस के आलम्बन हैं श्रीकृष्ण, राधारानी और उनकी नित्य
सहचारी श्रीकृष्ण की प्रियाएँ। श्रीकृष्ण असमोर्ध्व हैं। उनके समान
कोई नहीं है और न ही कोई उनसे अधिक है। भगवान् श्रीकृष्ण का सौन्दर्य
भी असमोर्ध्व है; उसकी कोई तुलना नहीं। मधुररस की क्रीड़ा में सबसे
बढ़कर होने के कारण वे ही सम्पूर्ण मधुररस के आलम्बन माने जाते हैं।
जयदेव गोस्वामी के गीतगोविन्द में एक सखी किसी दूसरी से
कहती हैं—"इस जगत् में श्रीकृष्ण सब आनन्द के रसराज हैं। उनकी देह
कमल के समान अति कोमल है और गोपियों के साथ उनका आवास-
व्यवहार किसी युवती के लिये किशोर के आकर्षण जैसा है।" यही दिव्य
मधुररस का आलम्बन है। गोपियों के चरणचिह्नों की अनुगति करते हुए
एक शुद्धभक्त उनसे प्रार्थना करता है—"आकर्षक अंग वाली गोपांगनाओं
को सादर प्रणाम है, जो अपनी रूपमाधुरी से भगवान् श्रीकृष्ण का सेवन
कर रही हैं।" इन सब गोपांगनाओं में श्रीमती राधारानी सबसे प्रमुख हैं।
श्रीमती राधारानी के रूप का वर्णन इस प्रकार है, "उनके नेत्र
चकोरी की चारुता को भी हरने वाले हैं। जब कोई राधारानी के मुख-
मण्डल को देख लेता है तो तुरन्त चन्द्रमा के सौन्दर्य की निन्दा करने
लगता है। उनके श्रीअंग की दीप्ति स्वर्ण को भी लजाने वाली है। इस
मधुरभक्तिरस [ ३११
प्रकार दिव्य सौन्दर्य से सुशोभित श्रीमती राधारानी को देखो ।'' राधा-
रानी के लिये श्रीकृष्ण के आकर्षण को उन्होंने स्वयं व्यक्त किया है,
“जब मैं श्रीमती राधारानी के सौन्दर्य का आस्वादन करने के लिये कुछ
हास-परिहास करता हूँ तो राधारानी इन हास्य-वचनों को बड़े ध्यान से
सुनती हैं। परन्तु अपने शरीर की अंग वृत्ति और कुछ अन्य कहकर बाहर
ऐसा प्रकट करती हैं कि मानो वे मेरी बात को न सुन रही हों। उनके इस
प्रकार मेरी उपेक्षा कर देने से मुझे अनन्त सुख मिलता है, इससे
उनकी माधुरी इतनी बढ़ जाती है कि मेरा आनन्द शत् गुणा हो जाता
है ।'' इसी प्रकार गीतगोविन्द में कहा है कि जब कंस के शत्रु श्रीकृष्ण
राधारानी का आलिंगन करते हैं तो वे उनके प्रेम में बंध जाते हैं और
अन्य सब गोपियों का संग छोड़ बैठते हैं।
श्रील रूपगोस्वामी की पद्यावली के अनुसार जब गोपियाँ श्रीकृष्ण
की वंशीध्वनि को सुनती हैं तो वे तुरन्त अपने गुरुजनों के रोष, अपकीर्ति
और पतियों के कठोर व्यवहार को भुला देती हैं। वे केवल बाहर जाकर
श्रीकृष्ण का अन्वेषण करने को आतुर हो उठती हैं। जब गोपियाँ श्रीकृष्ण
से मिलती हैं तो परस्पर होने वाले कटाक्ष और स्मितादि अनुभाव कहे
गये हैं।
'ललितमाधव' में रूपगोस्वामी ने वर्णन किया है कि श्रीकृष्ण का
कटाक्ष ठीक यमुना जैसा है, और राधारानी की हँसी चन्द्रिका के समान
है। जब यमुना और चन्द्रिका का संग होता है तो जल अमृत जैसा हो
जाता है, उसे पीने से बड़ी तृप्ति होती है। वह हिम के समान शीतल
और सब संतापों को हरने वाला होता है। इसी प्रकार पद्यावली में राधा
की एक नित्य सहचरी कहती है, “हे चन्द्रमुखी राधे ! तेरा शरीर अत्यन्त
पुलकित हो रहा है; आँखों में आनन्द के आँसू भर आये हैं, वाणी गद्गद
हो रही है और छाती काँप रही है, इससे जान पड़ता है कि कृष्ण की
मुरलीध्वनि की माधुरी ने तेरे चित्त को चंचल बना दिया है, द्रवित
कर दिया है ।''
पद्यावली में ही प्रेम में होने वाले निर्वेद के भावों का वर्णन है,
श्रीमती राधारानी कहने लगीं, “कामदेव ! मेरे ऊपर अपने पंचबाणों को
चलाकर मुझे उत्तेजित न करो। हे वायु ! प्रगाढ़ मकरन्द रस से मेरी देह
को मत भरो। श्रीकृष्ण की प्रेमभंगी से वंचित हो जाने के बाद अब इस देह
को धारण करने का क्या लाभ ? जीव आज इस देह को धारण करना नहीं
चाहता ।'' यह श्रीकृष्ण के प्रेम में उठने वाले निर्वेद भाव का लक्षण है।
३१२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
इसी प्रकार 'दानकेलिकौमुदी' में श्रीकृष्ण की ओर संकेत करते हुए
श्रीमती राधारानी कहती हैं, “नीलकमल सी शोभा वाला यह वन-
विहारी धूर्त त्रिभुवन की सारी युवतियों का आकर्षण कर सकता है।
अपने दिव्य रस का आस्वाद दिलाकर इसने मुझे मदमस्त कर डाला
है। मेरे धैर्य को भंग कर दिया है। अब मैं ठीक हाथी के मद से मदमस्त
हुई हथिनी के समान अनुभव कर रही हूँ।" यह कृष्णप्रेम में हर्ष है।
मधुरभक्तिरस का स्थायिभाव ही देह के सम्भोग का मूल कारण
है। पद्यावली में सम्भोग के इस मूल कारण का वर्णन करते हुए राधा-
रानी अपनी एक सहचरी से कहती हैं, “हे सखि ! यह कौन बालक है
जिसकी निरन्तर थिरकती हुई भ्रू भंगिमा इसके मुख के सौन्दर्य को बढ़ाती
हुई मुझमें माधुर्यरस का संचार कर रही है। कानों में अशोक की कलियों
का कर्णफूल धारण किये हुए पीताम्बर से सुशोभित अपनी वंशी की
ध्वनि से यह मुझे विवश किये दे रहा है।"
श्रीराधाकृष्ण की मधुररति सजातीय अथवा विजातीय किसी भी
प्रकार के भाव से कभी विच्छिन्न नहीं होती। श्रीराधाकृष्ण की मधुररति
के इस निरन्तर अचल स्वभाव का वर्णन इस प्रकार है, “श्रीकृष्ण से थोड़ी
ही दूर यशोदा मैया खड़ी थीं और चारों ओर से वे अपने सखाओं से घिरे
हुए थे। उनके नेत्रों के आगे चन्द्रावली थी और उसी समय उन्हें व्रज के
द्वार पर वृषभासुर खड़ा दिखा। परन्तु फिर भी जब उन्हें लताकुंज में
राधारानी दृष्टिगोचर हुईं तो तत्क्षण उन्हीं के ऊपर विद्युत् के समान
चंचल श्रीकृष्ण के कटाक्ष होने लगे।"
एक अन्य प्रसंग का वर्णन इस प्रकार है, "प्रांगण में एक ओर
शृगालों से घिरी हुई शंखासुर की मृतदेह पड़ी थी और दूसरी ओर बहुत
से विद्वान् और संयमी ब्राह्मण थे। वे सब ग्रीष्म की शीतल मन्द-मन्द वायु
के झकोरों के साथ सुन्दर स्तुतिपाठ कर रहे थे। श्रीकृष्ण के आगे सुधा-
निधि बलदेव खड़े थे। परन्तु इन सब शीतल रूप विरुद्ध परिस्थितियों में
भी राधारानी के लिये श्रीकृष्ण का प्रेमरूपी कमल म्लान नहीं हुआ।
राधारानी के लिये श्रीकृष्ण के इस प्रेम को प्रायः प्रफुल्ल कमल की उपमा
दी जाती है। अन्तर केवल इतना है कि श्रीकृष्ण का प्रेम नित्य नई
सुन्दरता को धारण किये रहता है, सामान्य कमल की तरह मुरझाता नहीं।
मधुरभक्ति सम्भोग और विप्रलम्भ—दो प्रकार की मानी जाती
है। विप्रलम्भ के तीन विभेद हैं—पूर्वराग, मान और प्रवास ।
पहले कभी जिनका मिलन नहीं हुआ है, इस प्रकार के प्रिय और
मधुरभक्तिरस [ ३१३
प्रिया में होने वाले भाव को पूर्वराग कहते हैं। पद्यावली में राधारानी
अपनी सखी से कहती हैं, “हे सखि ! यमुना तट पर जाते हुए अकस्मात्
मेरी दृष्टि के आगे नवचन्दन वर्ण श्यामल बालक आ गया। उसने मेरी
ओर ऐसे देखा जिसका मैं वर्णन नहीं कर सकती। परन्तु इसके बाद अब
मेरा मन घर के काम-काज में बिल्कुल नहीं लगता।” यह श्रीकृष्ण के लिये
पूर्वराग का उदाहरण है। श्रीमद्भागवत (१०.५३.२) में श्रीकृष्ण ने
रुक्मिणीदेवी के पास से आये ब्राह्मण दूत से कहा है, “हे ब्राह्मण ! रुक्मिणी
के समान मैं भी रात भर सो नहीं पाता। मेरा मन निरन्तर उसी में लगा
रहता है। मैं जानता हूँ कि उसका भाई रुक्मी मेरे विरुद्ध है और उसी के
कहने-सुनने से रुक्मिणी से मेरे विवाह को रोक दिया गया है।” यह भी
पूर्वराग का लक्षण है।
मान के सम्बन्ध में गीतगोविन्द में निम्नलिखित प्रसंग हैं, “जब
श्रीमती राधारानी ने देखा कि श्रीकृष्ण अन्य अनेक गोपियों के संग का
आनन्द ले रहे हैं तो अपने उत्कर्ष के नष्ट हो जाने के कारण उन्हें कुछ
ईर्ष्या हो आई। इसलिये वे वहाँ से हटकर भ्रमरों से गुंजायमान लता
मंडप में जा बैठीं और वहाँ लताओं में छिपकर एक सखी से अपनी
मनोव्यथा को कहने लगीं।” यह मान का उदाहरण है।
प्रवास का दृष्टान्त पद्यावली में इस प्रकार है—“हथेली के ऊपर
सिर को रखकर निरन्तर आँसू बहाते हुए जिसका मुख भीग रहा है, उस
कमलनयनी राधा को कृष्ण के मथुरा चले जाने के दिन से लेकर आज तक
क्षणभर को भी निद्रा नहीं आई।” मुख के भीग जाने पर निद्रा का लोप हो
जाता है; अतएव श्रीकृष्ण के विरह में निरन्तर रोते रहने से राधारानी
के लिये सोने का प्रश्न ही नहीं बनता। 'प्रह्लादसंहिता' में उद्धव कहते हैं,
“कामदेव के बाणों से पीड़ित होकर भगवान् गोविन्द रात-दिन तुम
गोपियों का ही चिन्तन करते हुए न खाते-पीते हैं और न सो पाते हैं।”
जब प्रेमी और प्रियतम मिलकर प्रत्यक्ष संग में एक-दूसरे का आनन्द
लेते हैं तो उसे सम्भोग कहा जाता है। पद्यावली में उल्लेख है, “श्रीकृष्ण ने
श्रीमती राधारानी का ऐसी विदग्धता से आलिंगन किया, मानो वे मदन
महोत्सव मना रहे हों।”
इस प्रकार श्रील रूपगोस्वामी अपने 'भक्तिरसामृतसिन्धु' के दक्षिण
विभाग की पाँचवी लहरी को समाप्त करते हैं। उनका सनातनस्वरूप
भगवान् गोपाल को सादर प्रणाम है।
इति भक्तिरसामृतसिन्धौ मुख्य भक्तिरस निरुपणनामा पश्चिमो विभागः ॥
इति भक्तिवेदान्त भाष्ये पश्चिमो विभागः ॥३॥
अथ उत्तर विभागः
गौणभक्तिरस
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अध्याय ४५
हास्यभक्तिरस
'भक्तिरसामृतसिन्धु' के चौथे विभाग में श्रील रूपगोस्वामी ने
हास्य, अद्भुत, वीर, करुण, भयानक तथा बीभत्स—इन सात गौण भक्तिरसों
का विवरण दिया है। इन भक्तिरसों का वर्णन करते हुए उन्होंने विविध
भावों की परस्पर मैत्री-वैर की स्थिति और रसाभासों का भी वर्णन
किया है। जब एक प्रकार का भक्तिरस विरुद्ध विधि से किसी दूसरे रस
से मिल जाये तो ऐसी स्थिति को रसाभास कहते हैं।
दक्ष विद्वान् कहते हैं कि हास्यरस प्रायः युवकों में अथवा वृद्धों और
शिशुओं के समूहों में पाया जाता है। कभी-कभी अत्यन्त गम्भीर स्वभाव
वालों में भी यह दृष्टिगोचर होता है। एक बार एक वृद्ध व्यापारी यशोदा
मैया के द्वार पर पहुँचा तो श्रीकृष्ण ने यशोदा मैया से कहा, "मैया !
मैं इस सड़ी हुई आकृति वाले भयंकर बूढ़े के पास नहीं जाना चाहता।
यदि मैं इसके पास जाऊँ तो यह मुझे अपनी पिटारी में बन्द करके तुमसे
दूर ले जायगा।" इस प्रकार आश्चर्यमय कृष्ण अपनी माता की ओर देखने
लगे जबकि द्वार पर खड़ा हुआ वह पथिक रोकने पर भी अपनी हँसी को
नहीं दबा सका, अर्थात् हँस ही पड़ा। इस दृष्टान्त में स्वयं श्रीकृष्ण
हास्यरस के आलम्बन हैं।
श्रीकृष्ण के एक सखा ने उन्हें सूचित किया, "श्रीकृष्ण मुख खोलो,
मैं तुम्हें दही-बूरा खिलाता हूँ।" श्रीकृष्ण ने तुरन्त अपना मुख खोल
दिया; परन्तु दही-बूरा के स्थान पर मित्र ने उनके मुख में एक फूल डाल
दिया। जब श्रीकृष्ण ने उसे चखा तो अपने मुख को सिकोड़ कर
मोड़ लिया यह देखकर वहाँ खड़े उनके सखा बड़े उच्च स्वर से
हँसने लगे।
एक बार घर आये ज्योतिषी से नन्द महाराज ने पूछा, "हे महर्षि !
कृपया मेरे बालक का हाथ देखिये। मुझे बताइये कि यह कितने वर्ष
तक जीवित रहेगा और क्या हजारों गायों का स्वामी बन पायेगा।" यह