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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 339, कुल 380 में से

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पृष्ठ 339

३१२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
इसी प्रकार 'दानकेलिकौमुदी' में श्रीकृष्ण की ओर संकेत करते हुए
श्रीमती राधारानी कहती हैं, “नीलकमल सी शोभा वाला यह वन-
विहारी धूर्त त्रिभुवन की सारी युवतियों का आकर्षण कर सकता है।
अपने दिव्य रस का आस्वाद दिलाकर इसने मुझे मदमस्त कर डाला
है। मेरे धैर्य को भंग कर दिया है। अब मैं ठीक हाथी के मद से मदमस्त
हुई हथिनी के समान अनुभव कर रही हूँ।" यह कृष्णप्रेम में हर्ष है।
मधुरभक्तिरस का स्थायिभाव ही देह के सम्भोग का मूल कारण
है। पद्यावली में सम्भोग के इस मूल कारण का वर्णन करते हुए राधा-
रानी अपनी एक सहचरी से कहती हैं, “हे सखि ! यह कौन बालक है
जिसकी निरन्तर थिरकती हुई भ्रू भंगिमा इसके मुख के सौन्दर्य को बढ़ाती
हुई मुझमें माधुर्यरस का संचार कर रही है। कानों में अशोक की कलियों
का कर्णफूल धारण किये हुए पीताम्बर से सुशोभित अपनी वंशी की
ध्वनि से यह मुझे विवश किये दे रहा है।"
श्रीराधाकृष्ण की मधुररति सजातीय अथवा विजातीय किसी भी
प्रकार के भाव से कभी विच्छिन्न नहीं होती। श्रीराधाकृष्ण की मधुररति
के इस निरन्तर अचल स्वभाव का वर्णन इस प्रकार है, “श्रीकृष्ण से थोड़ी
ही दूर यशोदा मैया खड़ी थीं और चारों ओर से वे अपने सखाओं से घिरे
हुए थे। उनके नेत्रों के आगे चन्द्रावली थी और उसी समय उन्हें व्रज के
द्वार पर वृषभासुर खड़ा दिखा। परन्तु फिर भी जब उन्हें लताकुंज में
राधारानी दृष्टिगोचर हुईं तो तत्क्षण उन्हीं के ऊपर विद्युत् के समान
चंचल श्रीकृष्ण के कटाक्ष होने लगे।"
एक अन्य प्रसंग का वर्णन इस प्रकार है, "प्रांगण में एक ओर
शृगालों से घिरी हुई शंखासुर की मृतदेह पड़ी थी और दूसरी ओर बहुत
से विद्वान् और संयमी ब्राह्मण थे। वे सब ग्रीष्म की शीतल मन्द-मन्द वायु
के झकोरों के साथ सुन्दर स्तुतिपाठ कर रहे थे। श्रीकृष्ण के आगे सुधा-
निधि बलदेव खड़े थे। परन्तु इन सब शीतल रूप विरुद्ध परिस्थितियों में
भी राधारानी के लिये श्रीकृष्ण का प्रेमरूपी कमल म्लान नहीं हुआ।
राधारानी के लिये श्रीकृष्ण के इस प्रेम को प्रायः प्रफुल्ल कमल की उपमा
दी जाती है। अन्तर केवल इतना है कि श्रीकृष्ण का प्रेम नित्य नई
सुन्दरता को धारण किये रहता है, सामान्य कमल की तरह मुरझाता नहीं।
मधुरभक्ति सम्भोग और विप्रलम्भ—दो प्रकार की मानी जाती
है। विप्रलम्भ के तीन विभेद हैं—पूर्वराग, मान और प्रवास ।
पहले कभी जिनका मिलन नहीं हुआ है, इस प्रकार के प्रिय और