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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 329, कुल 380 में से

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पृष्ठ 329

३०२] भक्तिरसामृतसिन्धु
सिर घुंघराली अलकावली से सुशोभित हो गया जो काक पक्षा जैसे
प्रतीत हो रहे थे । श्रीकृष्ण के इस अद्भुत स्वरूप को देखकर यशोदा मैय्या
कभी चकित हुए बिना नहीं रहती थीं । कौमार के अन्त में श्रीकृष्ण हाथ
में नन्हीं सी लाठी धारण करने लगे । उनके वस्त्र कुछ लम्बे हो गए और
कमर में गाँठ लगा ली । कमर को लगाई लंगोटी सर्प-फन को लज्जित कर
रही थी । इस वेषभूषा में वे घर के निकट ही बछड़ों की देखभाल करते
और कभी-कभी अपने ही समवयस्क गोपबालकों के साथ खेलते । उनके
पास एक पतली सी वंशी और एक शृंग भी था । एवं कभी-कभी वे पेड़ों
के पत्तों से बनी वंशी भी बजाते थे । ये सब श्रीकृष्ण के अन्तिम कौमार
के लक्षण हैं ।
जब श्रीकृष्ण कुछ बड़े हो गए तो बछड़ों को चराते-चराते प्रायः
वन के निकट चले जाते । घर लौटते में जब उन्हें थोड़ा सा भी विलम्ब
हो जाता तो नन्द महाराज तुरन्त चन्द्रशालिका पर चढ़कर उनका मार्ग
जोहने लगते । चन्द्रशालिका से वे तब तक नहीं उतरते जब तक यशोदा
मैय्या को यह संकेत न दे पाते कि अपने नन्हें गोपसखाओं और बछड़ों से
घिरे हुए श्रीकृष्ण लौट रहे हैं । पुत्र के सिर पर लगे मोरपंख की ओर
संकेत कर-कर के नन्द महाराज अपनी प्रिय गृहिणी को सूचित करते कि
बालक किस प्रकार उसके नेत्रों को आनन्दित कर रहा है ।
यशोदा मैय्या तब महाराज से इस प्रकार कहतीं, "देखिए मेरे
पुत्र को ! जिसके नेत्र श्वेतिमा से युक्त हैं, जिसने अपने सिर पर पगड़ी
धारण कर रखी है, और जिसके शरीर पर दुपट्टा और चरणों में बँधे
नूपुर मधुर शिञ्जन कर रहे हैं । वह निकट आ रहा है, अपने सुरभि बछड़ों
के साथ । देखो-देखो कैसे वह वृन्दावन की पावन भूमि में विहार कर
रहा है ।"
इसी प्रकार नन्द महाराज अपनी गृहिणी से कहते हैं, "हे यशोदे !
अपने पुत्र कृष्ण को तो देखो । उसके देह की श्यामल कान्ति, रक्तारुण
नयन, चौड़ा वक्षःस्थल और सुन्दर स्वर्ण हार कैसा अद्भुत लग रहा है और
कैसे मेरे दिव्य आह्लाद को अधिकाधिक बढ़ा रहा है ।"
जब नन्द महाराज के प्रियपुत्र श्रीकृष्ण किशोर में प्रवेश
करते हैं तो उनका सौन्दर्य बहुत बढ़ जाता है; परन्तु फिर भी उनके माता-
पिता उन्हें पौगण्ड अवस्था में समझते हैं, यद्यपि उनकी अवस्था दस और
पन्द्रह के बीच की होती है । इसके विपरीत जब श्रीकृष्ण पौगण्ड अवस्था
में रहते हैं तो उनके कुछ सेवक उन्हें कैशोर आयु में समझ लेते हैं । शैशव