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सर्वकोश
भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 332, कुल 380 में से

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पृष्ठ 332

वत्सलभक्तिरस [ ३०५

पर यशोदा मैय्या अपने को बड़ा भाग्यवान समझतीं। वे तुरन्त उन्हें
अपनी गोद में उठा लेतीं और बार-बार आलिंगन करतीं। इस
प्रकार करते-करते उनके नेत्रों से अविरल अश्रुधारा झरने लगतीं। वे
अपने दिव्य आनन्द को अभिव्यक्त न कर पातीं। श्रील रूप गोस्वामी
के "विदग्धमाधव" में उल्लेख है, "हे कृष्ण ! तुम्हारी मैय्या का स्पर्श
तो कर्पूर, पराग, चांदनी खस और चन्दन की शीतलता को भी जीतने
वाला है।"
श्रीकृष्ण के लिये यशोदा मैय्या की वात्सल्य रति निरन्तर स्वभावतः
प्रौढ़ता को प्राप्त होती जाती है। कभी अतिशय स्नेह और कभी
प्रबल राग के रूप में शोभायमान होती है। वात्सल्यरति का उदाहरण
श्रीमद्भागवत में (१०.६.४३) है। शुकदेव गोस्वामी महाराज परीक्षित
से कहते हैं, "हे राजन् ! जब महाभाग नन्द महाराज मथुरा से लौटे तो वे
अपने पुत्र का सिर सूंघने लगे और इस प्रकार वात्सल्यरस के भावसिन्धु
में निमग्न हो गये। इसी प्रकार का वाक्य यशोदा मैय्या के सम्बन्ध में है।
गोचारण से श्रीकृष्ण के लौटने की प्रतीक्षा में वे उनकी वंशीध्वनि को
सुनने के लिये अतिशय आतुर हो रही थीं। विलम्बवश श्रीकृष्ण की वंशी
को सुनने की उनकी उत्कंठा द्विगुणित हो गई और स्तनों से दुग्धधारा प्रवा-
हित होने लगीं। उस अवस्था में वे कभी घर के अन्दर आतीं और कभी
बाहर आ जातीं। वे निरन्तर मार्ग की ओर देख रही थीं कि कहीं गोविन्द
वापस तो नहीं लौट रहे। जब बड़े-बड़े महर्षि अद्भुत लीलापराक्रम के लिये
श्रीकृष्ण का जय-जयकार कर रहे थे तो गोकुलेश्वरी यशोदा मैय्या ने
कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में प्रवेश किया। उनकी साड़ी का अधोभाग स्तनों
से निकली दुग्धधारा से भीगा हुआ था। यशोदा मैय्या का कुरुक्षेत्र में यह
प्रवेश युद्ध के अवसर पर नहीं हुआ था। एक अन्य समय श्रीकृष्ण द्वारका
से सूर्यग्रहण के अवसर पर कुरुक्षेत्र आये थे। इसी समय वृन्दावनवासी भी
उन्हें देखने के लिये वहाँ गये।
जब श्रीकृष्ण तीर्थयात्रा के लिये कुरुक्षेत्र पधारे तो वहाँ एकत्रित
सारे जन कहने लगे कि देवकीनन्दन श्रीकृष्ण पधारे हैं। उस समय स्नेह
मयी जननी देवकी श्रीकृष्ण के मुख पर हाथ फेरने लगीं। और फिर जब
लोगों ने कहा कि वसुदेव पुत्र पधारे हैं तो दोनों नन्द महाराज और
यशोदा मैय्या प्रेम से उल्लसित होकर अपना प्रगाढ़ आनन्द व्यक्त करने
लगे।
अपने पुत्र को कुरुक्षेत्र में देखने जाते हुए यशोदा मैय्या गोकुलेश्वरी