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सर्वकोश
भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 326, कुल 380 में से

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पृष्ठ 326

वत्सलभक्तिरस [ २६६

मैं समझती हूँ कि वास्तव में नन्द महाराज ने ही पर्वत को उठाया था। नहीं
तो, नन्हे से बालक के लिये ऐसे बड़े पर्वत को उठाना कहाँ सम्भव था।"
यह भी वात्सल्यरस का उदाहरण है। इस वात्सल्यरस का उद्भव भक्त
के प्रेम में इस विश्वास के कारण होता है कि वह श्रीकृष्ण का पूज्य है और
यदि वह कृष्ण का लालन-पालन नहीं करेगा तो श्रीकृष्ण जीवित नहीं रह
सकेंगे। अतएव एक भक्त ने श्रीकृष्ण के माता-पिता से प्रार्थना की है—
“मैं श्रीकृष्ण के गुरुजनों को प्रणाम करता हूँ। वे द्रवितचित्त महानु-
भाव निरन्तर श्रीकृष्ण की सेवा और लालन-पालन को आतुर रहते हैं।
जगत् के पिता के लिए ऐसे कृपाभाव को रखने वाले इन महाभागवतों को
सादर प्रणाम है।"
एक ब्राह्मण अपनी प्रार्थना में कहता है—“जो वेद उपनिषदों
को पढ़ते हैं वे ऐसा किया करें और जो बन्धन के भय से मुक्त होने
के लिये महाभारत को भजते हैं, वे भी भजते रहें। परन्तु जहाँ तक
मेरा सम्बन्ध है, मैं तो केवल महाराज नन्द का भजन करता हूँ जिसके
आँगन में साक्षात् परब्रह्म श्रीकृष्ण बालरूप में क्रीड़ामग्न हैं।” श्रीकृष्ण में
वात्सल्य स्नेह रखने वाले गुरुजनों के नाम इस प्रकार हैं—व्रजेश्वरी यशोदा
मैय्या, व्रजेन्द्र नन्दमहाराज, बलराम की मैय्या रोहिणी, वे सब वृद्धा
गोपियाँ जिनके पुत्रों को ब्रह्माजी ने हर लिया था, वसुदेव-गृहिणी देवकी,
वसुदेव की अन्य पन्द्रह स्त्रियाँ, अर्जुन की माता कुन्ती, श्रीकृष्ण के पिता
वसुदेव, श्रीकृष्ण के गुरु सान्दीपनी मुनि—ये सब श्रीकृष्ण के गुरुजन उनमें
वात्सल्य प्रेम रखते हैं। इनमें जिनका नाम पहले है वे अगलों से से श्रेष्ठ
माने जाते हैं। इस प्रकार यशोदामैय्या और नन्दमहाराज का स्थान
गुरुजनों में सर्वोच्च है।
श्रीमद्भागवत (१०.६.३) में शुकदेव गोस्वामी महाराज परीक्षित से
यशोदा मैय्या के रूप और सौन्दर्य का वर्णन करते हैं। वे कहते हैं—"हे
राजन् ! यशोदा मैय्या ने कमर में रेशमी वस्त्र बाँधा हुआ था, पुत्र के लिये
स्नेहवश उनके स्तनों से दुग्धधारा निर्भरित हो रही थी। नवनीत निकालने
के लिये जब वे रस्सी को पकड़कर दुग्ध का मन्थन करतीं तो उनके हाथ
के कंगन और कानों के कुण्डल हिलकर बजने लगते और केशराशि में
सुशोभित पुष्प गिरने लगते। अतिश्रम के कारण उनका मुखमण्डल श्वेत
कणों से भर जाता।"
एक अन्य भक्त ने अपनी प्रार्थना में यशोदा मैय्या का चित्रण किया
है—"डोरी से जिनके घुंघराले बालों का जूड़ा बन्धा हुआ है, जिनकी माँग