भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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झरने लगा।" इस प्रकार यशोदा मैय्या के स्तनों से श्रीकृष्ण के लिये
निरन्तर दुग्ध की धारा बरसती रहती थी।
ये सब श्रीकृष्ण के लिये उनकी माता, पिता, एवं अन्य गुरुजनों
द्वारा अभिव्यक्त कतिपय वात्सल्य के भाव हैं। इनकी अभिव्यक्ति कृष्ण में
पुत्रभाव करने पर होती है। श्रीकृष्ण के लिये निरन्तर वत्सलता का भाव
वात्सल्यरस का स्थायिभाव है।
श्रीरूप गोस्वामी का यहाँ उल्लेख है कि कतिपय विद्वानों के अनुसार
अब तक वर्णित तीन प्रकार के दिव्य रस, अर्थात् दास्य, सख्य और वात्सल्य
कभी-कभी परस्पर मिल जाते हैं। उदाहरण के लिये, बलराम का सख्य
भाव दास्य और वात्सल्य स्नेह से मिश्रित है। इसी प्रकार श्रीकृष्ण के
लिये युधिष्ठिर की रति में वात्सल्य, स्नेह और दास्य का मिश्रण है। इसी
प्रकार श्रीकृष्ण के पितामह उग्रसेन में दास्य और वात्सल्य दोनों पाये
जाते हैं। वृन्दावन की सारी वृद्धा गोपियों का भाव वात्सल्य, दास्य और
सख्य का मिश्रण है। माद्री के पुत्रों अर्थात् नकुल, सहदेव और महर्षि नारद
का स्नेह भी सख्य और दास्य का मिश्रण है। भगवान् शिव, गरुड़, और
उद्धव के भाव में दास्य और सख्य, दोनों पाये जाते हैं।