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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

१६४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
आकाश में आश्रित प्राण मूर्च्छा उत्पन्न करता है। जब प्राण स्वयं अपने में
स्थिर होता है तो तीव्रता के भेद से क्रमशः कम्प, स्वरभेद और रोमांच को
जन्म देता है।
ये सात्त्विक भाव कभी बाह्य रूप से प्रकट होते हैं तो कभी अन्तर
में ही रहते हैं। शुद्धभक्त इन सब भावों का हृदय में निरन्तर अनुभव
करता है; परन्तु बहिर्मुख मनुष्यों के सामने उन्हें प्रायः बाहर प्रकट नहीं
होने देता ।
स्तम्भ
स्तम्भ की उत्पत्ति हर्ष, भय, आश्चर्य, शोक तथा क्रोध से होती
है। वाणी का अभाव, निश्चलता, शून्यता तथा परम विरह का भाव इसके
लक्षण हैं।
श्रीकृष्ण की लीलाओं का वर्णन करते हुए उद्धवजी विदुर से कहने
लगे, “एक दिन श्रीकृष्ण ने मालिन का श्रृंगार किया और उद्यान में प्रवेश
कर गोपियों को हास-परिहास से आनन्दित किया। गोपियाँ स्तब्ध हो
उठीं। फिर श्रीकृष्ण को जाते हुए गोपियाँ इस भाव से देख रही थीं मानो
उनके चित्त और नेत्र श्रीकृष्ण का अनुगमन कर रहे हों।” इन लक्षणों से
यद्यपि गोपियाँ तृप्त नहीं हुई थीं, वे प्रेम से स्तब्ध हो गई । यह हर्ष-जनित
स्तम्भता का दृष्टान्त है।
भय के कारण स्तम्भ का उदाहरण इस प्रकार है। जब श्रीकृष्ण
कंस के यज्ञमण्डप में पर्वत के समान मल्लों से घिरे हुए थे तो माता देवकी
स्तम्भित हो गई, उनके दोनों नेत्र आकुल हो उठे।”
ब्रह्मा को आश्चर्य से स्तम्भ हुआ था। श्रीमद्भागवत (१०.१३.५६)
के अनुसार अपने द्वारा चुराए गो-गोपबालकों को पुनः श्रीकृष्ण के पास
देखकर जब ब्रह्मा ने जाना कि ये गोपकुमार और कोई नहीं, साक्षात्
भगवान् है तो आश्चर्यवश उनकी सारी इन्द्रियाँ स्तम्भित हो गई। वे
स्वर्णमयी चतुर्भुज मूर्ति के समान खड़े के खड़े रह गए। श्रीकृष्ण को
अपने वाम कर से गोवर्धन पर्वत को धारण किए देखकर व्रजवासी भी
स्तब्ध हुए थे।
जिस समय श्रीकृष्ण ने बकासुर के उदर में प्रवेश किया, उस समय
सारे देवता शोक से स्तब्ध रह गए थे। क्रोध के कारण कुछ ऐसा ही अर्जुन
के साथ भी हुआ, अब उसने देखा कि अश्वत्थामा श्रीकृष्ण पर ब्रह्मास्त्र
चलाने जा रहा है।

सात्त्विक भाव [ १६५
स्वेद
हर्ष से उत्पन्न स्वेद का उदाहरण श्रीमद्भागवत में है। एक गोपी
अपनी सखी राधारानी से कहती है, "हे राधे ! धूप की निन्दा करके अपनी
चतुराई क्यों दिखा रही हो। श्रीकृष्ण को देखकर काम-पीड़ित होकर
पसीने-पसीने हो रही हो, यह तो मैं जान ही गई हूँ।"
श्रीकृष्ण के सेवक रक्तक में भय से स्वेदस्राव हुआ था। एक दिन
श्रीकृष्ण ने राधारानी के पति अभिमन्यु का वेष धारण किया। अभिमन्यु
को श्रीकृष्ण से राधा का प्रणय रुचिकर न था। इसलिए रक्तक ने श्रीकृष्ण
को उस रूप में देखा तो वह भी प्रेम से उन्हें अभिमन्यु समझ बैठा; अतः
उन्हें फटकारने लगा। फिर जैसे ही उनसे पहचाना कि यह तो अभिमन्यु
के वेष में श्रीकृष्ण ही हैं, तो पसीने-पसीने हो गया। यह स्वेद भयजन्य था।
क्रोध के कारण स्वेद की उत्पत्ति विष्णुवाहन गरुड में हुई है। जिस
समय इन्द्र वृन्दावन पर मूसलाधार वर्षा कर रहा था, गरुड़जी इस दृश्य
को मेघों के ऊपर से देख रहे थे और क्रोध के कारण उनके शरीर से स्वेद
बहने लगा।
रोमांच
श्रीकृष्ण के मुख में त्रिलोकी को देखकर माता यशोदा को रोमांच हो
आया। उन्होंने श्रीकृष्ण से मुख खोलने को कहा था यह देखने के लिए कि
उन्होंने मृद-भक्षण किया है या नहीं। परन्तु जब श्रीकृष्ण ने मुख खोला तो
उन्हें सम्पूर्ण पृथ्वी के साथ अन्य लोक भी कृष्ण के मुख में दृष्टिगोचर हुए।
इससे वे रोमांचित हो गईं।
हर्ष से होने वाले रोमांच का वर्णन गोपियों के रासविलास के
सम्बन्ध में श्रीमद्भागवत (१०.३०.१०) में है। इस रास में श्रीकृष्ण
अकस्मात् अन्तर्हित हो गये और गोपियों सहित राधारानी उन्हें ढूँढने
लगीं। वे पृथ्वी से बोलीं, "हे धरा ! तुमने कितना तप किया होगा जो
तुम्हें श्रीकृष्ण के चरणकमलों का निरन्तर स्पर्श प्राप्त रहता है। अवश्य
ही आनन्द से पुलकित होकर इस वनस्पतिरूप रोमांच से शोभित हो रही
हो। तुममें प्रेम के ये लक्षण प्रथम कब विकसित हुए ? तुम्हारा यह आनन्द
महोत्सव वामनावतार के स्पर्श से प्रारम्भ हुआ है अथवा भगवान् वराह ने
जब तुम्हारा उद्धार किया था, तब से ?"
श्रीकृष्ण कभी-कभी गोपबालकों के साथ बनावटी युद्ध का आयोजन
किया करते थे। ऐसे समय जब वे अपना श्रृंग बजाते तो विरोधी पक्ष के

१६६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
श्रीदामा को उत्साहवश रोमांच हो जाता । इसी प्रकार श्रीकृष्ण के
विश्वरूप को देखकर अर्जुन भय से रोमांच को प्राप्त हुआ ।
स्वरभेद
अक्रूर के रथ पर बैठ कर मथुरा जाते हुए श्रीकृष्ण के पथ को
रोकने के लिए यशोदा और सारी गोपियाँ सामने आकर खड़ी हो गई ।
राधारानी की दशा तो विशेष रूप से इतनी दयनीय हो गई थी कि काँपती
हुई वाणी में उन्होंने यशोदा से अक्रूर को रोकने का निवेदन किया ।
ब्रह्मा को आश्चर्यजनित स्वरभेद का अनुभव हुआ । श्रीमद्भागवत
(१०.१३.६४) में उल्लेख है कि श्रीकृष्ण को दण्डवत् प्रणाम करके ब्रह्मा ने
गद्गद् वाणी में उनकी स्तुति की ।
श्रीमद्भागवत (१.२६.३०) में ही गद्गद् वाणी का एक अन्य
उदाहरण है । गोपीजन रात्रि में सब कुछ त्याग कर श्रीकृष्ण के साथ रास
करने आयी थीं, परन्तु श्रीकृष्ण ने उन्हें वापस अपने पतियों और घर को
लौट जाने को कहा । इस पर वे क्रोध के कारण गद्गद् वाणी से श्रीकृष्ण से
प्रतिभाषण करने लगीं ।
हर्ष-जनित स्वरभेद का प्रकाश अक्रूर ने श्रीमद्भागवत (१०.३६.५६-
५७) में किया है, जब उन्होंने सम्पूर्ण वैकुण्ठों को यमुना जल पर आश्रित
देखा । तब उन्हें ज्ञान हुआ कि श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् हैं और वे श्रीकृष्ण
के चरणकमलों में सिर झुकाकर गद्गद वाणी से करबद्ध स्तुति करने लगे ।
भय के कारण भी स्वरभेद होने के उदाहरण है । श्रीकृष्ण के एक सखा ने
उनकी प्रशंसा में कहा, "हे सखे ! तुम्हारी वंशी तुम्हारे ही एक सेवक पात्री
को दी थी और जब मैंने वह वापस माँगी तो उसकी वाणी गद्गद हो गई
और मुख का रंग पीला पड़ गया ।"
कम्प
श्रीकृष्ण को शंखासुर को पकड़ता देखकर राधारानी भयवश काँपने
लगीं । इसी प्रकार का कम्पन सहदेव में उस समय देखा गया जब शिशुपाल
भगवान् श्रीकृष्ण को भीषण अपशब्द कह रहा था ।
पीड़ावश शरीर का कम्प राधाजी में भी प्रकट हुआ । वे काँपते हुए
गोपी से बोलीं, "इस निष्ठुर से हँसी मत कर । इसने सदा हमें दुःख ही
दुःख पहुँचाया है, इसलिए यहाँ आने से इसे मना कर दे ।"

सात्त्विक भाव [ १६७
विवर्णता
कभी-कभी श्रीकृष्ण के व्यवहार से हुए महान् विषाद आदि से देह
का रंग बदल जाता है। अतः गोपियाँ उनसे कहती हैं, "हे कृष्ण ! तुम्हारे
विरह में सारे ब्रजवासी विवर्ण हो गए हैं। इस कारण देवर्षि नारद
को वृन्दावन में श्वेतद्वीप का भ्रम हो रहा है।"
कृष्ण-बलराम को यज्ञशाला में आया देखकर कंस का रंग उड़ गया।
इसी प्रकार इन्द्र भी यह देख कर विवर्ण हो गया था कि कृष्ण गोवर्धन
धारण करके सारे ब्रज की रक्षा कर रहे हैं। यदि विवर्णता अतिशय हर्ष के
कारण होती है तो रक्तिमा देखी जाती है। यह विकार बड़ा दुर्लभ है, अतः
श्रील रूप गोस्वामी ने इसका इतना ही विवरण दिया है।
अश्रु
हर्ष, रोष, विषाद, आदि कारणों से नेत्रों से अश्रु-प्रवाह निकल
पड़ता है। हर्ष से उत्पन्न आंसू ठण्डे और क्रोधजनित आंसू गरम होते हैं।
सभी प्रकार के आँसुओं में नेत्रों में क्षोभ, लालिमा और खुजली के कारण
पोंछना आदि होता है।
द्वारका में भगवान् श्रीकृष्ण की पट्टमहिषी रुक्मिणीजी भाव के
आनन्द में अश्रु वहा रही थीं, परन्तु वे उन्हें अप्रिय लगे क्योंकि श्रीकृष्ण के
दर्शन में बाधा डाल रहे थे। 'हरिवंश' के एक श्लोक में सत्यभामाजी
श्रीकृष्ण पर प्रणयकोप के कारण आँसू बहाने लगीं।
रोषजनित अश्रुपात का एक अन्य उदाहरण यह है। राजसूय यज्ञ में
शिशुपाल को श्रीकृष्ण का तिरस्कार करते देखकर भीमसेन को भयंकर
रोष हुआ। वह शिशुपाल को तुरन्त मार डालना चाहता था; परन्तु
श्रीकृष्ण ने उसे ऐसा करने से रोक दिया। इससे वह क्रोध से तिलमिला
उठा। वर्णन है कि उस समय उसके नेत्र गरम आँसुओं से अभिभूत हो रहे
थे, जैसे सांध्यकालीन चन्द्रमा पर कोई हल्का सा मेघ छा जाय। संध्या का
मेघाच्छादित चन्द्रमा बड़ी शोभा पाता है। इसी प्रकार क्रोधवश अश्रु-
विमोचन करता हुआ भीम भी अतिशय शोभित हुआ।
श्रीमद्भागवत (१०.६०.२३) में रुक्मिणी द्वारा विषादवश अश्रु-
विमोचन करने का सुन्दर उदाहरण हैं। श्रीकृष्ण और रुक्मिणी का वार्ता-
लाप हो रहा था प्रसंगवश रुक्मिणी श्रीकृष्ण के विरह की आशंका से भय-
भीत हो गयीं। रक्तकमल के समान नखों से भूमि कुरेदती हुई रुक्मिणी
के नेत्रों की अंजन अश्रुधारा के साथ कुंकुम से उपलिप्त वक्षःस्थल पर

१६८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
बह चली। इतनी विषाद-मग्न हो गयी कि उसकी वाणी भी गद्गद्
हो चली।
प्रलय
एक साथ दुःख और सुख की अतिशयता के कारण जब यह बोध
नहीं रहता कि क्या करना है, क्या नहीं करना—उस स्थिति को प्रलय
कहते हैं। प्रलय की अवस्था में भक्त पृथ्वी पर गिर पड़ता है और प्रेम के
सम्पूर्ण लक्षण (अनुभाव) प्रकट हो जाते हैं। गोपियाँ श्रीकृष्ण को खोज
रही थीं। तभी अचानक वनलता में से उन्हें स्तब्ध और इन्द्रियज्ञान शून्य
करते हुए वे सामने प्रकट हो गए। इस अवस्था में गोपियाँ सौन्दर्यातिशय
को प्राप्त हो गयीं। यह सुख के कारण प्रलय का एक उदाहरण है।
दुःखजनित प्रलय के भी अनेक उदाहरण हैं। श्रीमद्भागवत
(१०.३६.१५) में शुकदेव गोस्वामी महाराज परीक्षित को कहते हैं, “हे
राजन् ! श्रीकृष्ण के विरह में गोपियाँ श्रीकृष्ण के चिन्तन में ऐसी तन्मय
हो गयीं कि उनकी इन्द्रियों के सब व्यापार रुक गए और वे शरीर की
सुध-बुध से बिल्कुल रहित हो गयीं मानो सम्पूर्ण भवबन्धन से मुक्त हो
गयी हों।
सात्त्विक के न्यूनाधिक तारतम्य
शरीर के विविध सात्त्विक भावों में स्तम्भन का विशेष स्थान है।
स्तम्भन के न्यूनाधिक्य के अनुसार प्राण और शरीर के विक्षोम में भी
तारतम्य होता है। इसीलिए अन्य सात्त्विक भावों में भी न्यूनाधिक्य है।
ये सात्त्विक भाव शनैः-शनैः विकसित होते हैं और क्रमशः धूमायित,
ज्वलित, दीप्त तथा उद्दीप्त कहलाते हैं। ये भाव बहुत काल तक रहते
हैं और शरोर के अनेक अंगों में व्याप्त रहते हैं। अश्रुपात और स्वरभेद के
विपरीत स्तम्भन सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त होता है। अश्रुपात और स्वरभेद
तो केवल एकांगी भाव हैं।
अश्रुओं में दो विशेषताएँ हैं—आँखों को अवदात और सुजा देना
तथा आंखों के तारों को विलक्षण कर देना। स्वरभेद से गला रुक जाना,
कुण्ठा और अत्यन्त व्याकुलता होती है। इन सात्त्विक भावों के लक्षण
एकदेशीय हैं, इसलिए उनके साथ अन्य अंग-विकार भी होते हैं। उदाहर-
णार्थ, स्वरभेद के कारण गला रुक जाने पर घुर-घुर ध्वनि होती है। ऐसी
ध्वनियाँ वाणी को कुण्ठित कर देती हैं और परम व्याकुलता के साथ

सात्त्विक भाव [ १६६
नाना प्रकार से अभिव्यक्त होती हैं। ये सब लक्षण रुक्ष सात्त्विक भाव धूमा-
यित अवस्था के हैं।
कभी-कभी श्रीकृष्ण के महोत्सवों अथवा भक्त-समाज में नृत्य-उन्माद
होता है। ये भाव 'ज्वलित' कहलाते हैं।
श्रीकृष्ण में दृढ़ रति रूपी मूलभूत आधार के अभाव में उपरोक्त
कोई भी लक्षण प्रकट नहीं हो सकता। ये सात्त्विक जब तनिक से ही व्यक्त
होते हैं और छिपाए जा सकते हैं, तब धूमायित अवस्था के सात्त्विक भाव
माने जाते हैं। नन्द महाराज के प्रासाद में वैदिक कर्म कहते हुए पुरोहित
गर्ग मुनि में ये लक्षण हुए थे। जब उन्होंने सुना कि बालक कृष्ण ने अघासुर
को मार डाला तो उनके नेत्र अश्रुओं से आर्द्र प्रतीत हुए, कण्ठ में कम्प
होने लगा तथा सम्पूर्ण शरीर पसीने से तर हो गया। इस अवस्था में गर्ग
मुनि का सुन्दर मुखमण्डल बड़ा शोभित हुआ।
जब दो या तीन या अधिक सात्त्विक भाव स्पष्ट रूप में प्रकट हो
कर कठिनाई से छिपने के योग्य हो जाते हैं तब उन्हें ज्वलित कहा जाता
है। उदाहरण के लिए, श्रीकृष्ण के सखा ने उनसे कहा, "हे सखे ! वन में
बज रही तुम्हारी वंशी के कानों में प्रविष्ट होते ही हाथ सर्वथा निश्चेष्ट
हो गये हैं और नेत्र अश्रुधारा से अभिभूत हो रहे हैं। अब वे तुम्हारे मोर-
पंख को भी नहीं पहचान पाते। जांघें स्तम्भित हो गई हैं, जिससे पग भर
चलना भी सम्भव नहीं रहा है। इसलिए हे मित्र ! तुम्हारी वंशीध्वनि
निश्चय ही अद्भुत है।"
इसी प्रकार का भाव एक गोपी दूसरी पर प्रकट करती है, "हे
सखि ! वंशी की ध्वनि को सुनकर मैंने उसके प्रभाव को रोकने की पूरी
चेष्टा की। परन्तु शरीर के कम्प को नहीं रोक सकी, जिससे परिजनों ने
मेरे मन के कृष्णप्रेम को भाँप ही लिया।"
चार-पाँच सात्त्विक-भाव एक साथ प्रौढ़ रूप में उदित हो कर
छिपाने के बिलकुल अयोग्य हो जाते हैं तो विद्वान् उन्हें 'दीप्त' कहते
हैं। श्रीकृष्ण को सामने खड़ा देखकर नारदजी कुछ ऐसे कम्प से आक्रान्त
हुए कि देर तक.वीणा भी नहीं बजा सके। गद्गद् वाणी के कारण उनमें
श्रीकृष्ण का स्तवन करने का सामर्थ्य न रही और आँखें अश्रुओं से परिपूर्ण
हो गयीं। इस प्रकार वे सर्वथा अवश हो गए।
जब कुछ ऐसे ही भाव राधारानी में प्रस्फुटित हुए तो सखी उन्हें
उपालम्भ देने लगीं, "हे सखि ! नेत्र में अश्रुधारा के लिए पुष्पों की सुगन्ध
को क्यों व्यर्थ दोष देती हो ? शरीर पर रोमांच के लिए क्यों वायु पर

२०० ] भक्तिरसामृतसिन्धु
कोप करती हो। जांघों के स्तम्भन के लिए वन-विहार से द्वेष क्यों करती
हो। तुम्हारा स्वरभेद बता रहा है कि इसका कारण तो कुछ और ही
है—कृष्ण के लिए तुम्हारा प्रेम ही इसमें हेतु है।"
श्रील रूप गोस्वामी कहते हैं कि पाँच-छः अथवा सारे ही सात्त्विक
भाव एक साथ प्रकट होकर परम उत्कर्ष को प्राप्त होने पर 'उद्दीप्त'
कहलाते हैं। श्रीकृष्ण के एक सखा ने उनसे कहा, "हे पीताम्बर ! तुम्हारे
विरह में सारे वृन्दावनवासी स्वेदयुक्त हो रहे है, नाना ध्वनियों से विलाप
करते हैं; उनके शरीरों में कम्प, रोमांच और स्तम्भन हो चला है, नेत्र
अश्रुधारा से अभिभूत हैं। अत्यन्त व्याकुल हैं।"
प्रेम का एक चरम लक्षण 'महाभाव' है। इस महाभाव की अनुभूति
केवले राधारानी के लिए ही सम्भव है। पाँच सौ वर्ष पूर्व श्रीचैतन्य
महाप्रभु राधाप्रेम का आस्वादन करने प्रकट हुए। उनमें भी महाभाव
का पूर्ण प्रकाश था। श्रील रूप गोस्वामी का कथन है कि जब प्रेम के
लक्षण सुदीप्त हो जाते हैं, तो वह अवस्था महाभाव कहलाती है।
श्रील रूप गोस्वामी आगे चार प्रकार के सात्त्विकाभास का विवेचन
करते हैं।
कभी-कभी निर्विशेषवादी भी, जो यथार्थ में भक्ति से रहित हैं, प्रेम
के इन भावों को प्रकट कर सकते हैं; परन्तु ये यथार्थ में भाव नहीं हैं,
वरन् आभासमात्र हैं। उदाहरण के लिए, निर्विशेषवादियों की पावन नगरी
वाराणसी में कदाचित् ऐसा संन्यासी दृष्टिगोचर हो सकता है जो भगवान्
की महिमा का श्रवण कर अश्रुविमोचन कर रहा हो। निर्विशेषवादी कभी-
कभी हरे कृष्ण महामन्त्र का कीर्तन और नृत्य भी करते हैं, पर उनका
लक्ष्य भगवान् की सेवा करना नहीं है। वे यह सब भगवान् एक होकर
उनके अस्तित्व में लीन होने के लिए ही करते हैं। अतः श्रील रूप गोस्वामी
का कथन है कि निर्विशेषवादी के शरीर में कीर्तन से हुए विकार भाव के
यथार्थ लक्षण नहीं हैं; वरन् आभासमात्र हैं, जैसे चमकदार शीशे में से सूर्य
किसी अंधेरे कक्ष में प्रतिभासित होता है। परन्तु हरेकृष्ण जप इतना
अतिशय प्रभावशाली और दिव्य है कि कालान्तर में निर्विशेषवादियों के
हृदय को भी द्रवित कर देगा। रूप गोस्वामी निष्कर्ष करते हैं कि निर्विशेष-
वादियों में प्रकट विकार सात्त्विक भावों के आभासमात्र हैं, यथार्थ वस्तु
नहीं हैं।
कदाचित् देखने में आता है कि भक्ति और भगवत्-कीर्ति के लेश-
मात्र ज्ञान से रहित तार्किक भी जब भगवान् का गुणगान सुनने बैठता है तो

हृदय से द्रवीभूत होकर अश्रु बहाता पाया जाता है। इस सम्बन्ध में एक
भक्त भगवान् से कहता है, "हे मुकुन्द ! आप के लीलामृत की महिमा के
सम्बन्ध में मैं क्या कह सकता हूँ, जिसका श्रवण कर अभक्त भी प्रभावित
हो जाते हैं, उनके नेत्रों से अश्रु निर्भर प्रवाहित होने लगता है और शरीर
रोमांचित हो जाता है।" ऐसे अभक्त वास्तव में द्रवित नहीं होते; वे भीतर
से कठोर हैं। फिर भी भगवान् के गुणगान की कैसी अपार महिमा है कि
अभक्त तक रो पड़ते हैं।"
जो कृष्णरस से प्रायः सर्वथा विहीन है और जिसने किसी विधि-
नियम का पालन नहीं किया है, ऐसा अभक्त भी कभी-कभी अभ्यास के
द्वारा भक्तमण्डली में अश्रु आदि सात्त्विक भावों का दम्भ करता है।
परन्तु ये अश्रु आदि यथार्थ प्रेम के लक्षण बिलकुल नहीं हैं। यह सब तो
केवल अभ्यास के द्वारा किया जाता है। यद्यपि सात्त्विकाभासों के वर्णन से
कोई लाभ नहीं है, श्रील रूप गोस्वामी ने कुछ ऐसे उदाहरण दिए हैं,
जहाँ यथार्थ भक्ति तो नहीं है, पर ये प्रकट होते हैं।

अध्याय २६
कृष्णप्रेम के व्यभिचारिभाव
प्रेमातिशय को अभिव्यक्ति प्रदान करने वाले कतिपय शारीरिक
लक्षण हैं। ये संख्या में ३३ हैं : निर्वेद, विषाद, दैन्य, ग्लानि, श्रम, मद,
गर्व, शंका, त्रास, आवेग, उन्माद, विस्मृति, व्याधि, मोह, मृत्यु, आलस्य,
जड़ता, लज्जा (व्रीड़ा), गोपन, स्मृति, वितर्क, चिन्ता, मति, धृति, हर्ष,
उत्सुकता, उग्रता, अमर्ष, निद्रा, स्वप्न, बोध, चपलता और असूया ।
निर्वेद
जब किसी को बलात् कोई निषिद्ध विधि से कार्य करना पड़ता है
अथवा इच्छा होने पर भी वाँछनीय विधि से कार्य नहीं कर पाता तो उसे
ग्लानि होती है और वह अपने को अपमानित अनुभव करता है। ऐसे में
निर्वेद का भाव उसे अभिभूत कर लेता है । निर्वेद में चिन्ता, अश्रु,
विवर्णता, दैन्य तथा दीर्घ उच्छ्वास आदि लक्षण प्रकट होते हैं।
जब नन्द महाराज को लगा कि कालिया नाग को दण्ड देते-देते
श्रीकृष्ण यमुना के विषाक्त जल में डूब गए हैं तो वे यशोदा देवी से कहने
लगे, "हे देवी ! श्रीकृष्ण गहरे जल में चले गए हैं और इसलिए अब इन
पापमय शरीरों को धारण करने से क्या लाभ ! अपने पापों का प्रायश्चित
करने के लिए आओ हम विषममय कालीदह में भस्म हो जाएँ ।" यह महती
विपत्ति से भक्त को होने वाले निर्वेद का उदाहरण है।
श्रीकृष्ण के वृन्दावन से चले जाने पर उनके अंतरंग सखा सुबल ने
भी वहाँ न रहने का निश्चय किया । जाते-जाते सुबल सोच रहा था कि
कृष्ण के बिना वृन्दावन में कुछ भी आनन्द शेष नहीं रहा है। जैसे नीरस
पुष्प को भ्रमर त्याग जाते हैं, वैसे ही वृन्दावन को दिव्य रसानन्द से हीन
जानकर सुबल उसे त्याग कर चला गया ।
'दानकेलिकौमुदी' में श्रीमती राधारानी अपनी सखी से कहती हैं,
"हे सखि ! श्रीकृष्ण की कीर्ति न सुन पाने से तो अच्छा हो यदि मैं बहरी

कृष्णप्रेम के व्यभिचारिभाव [ २०३
हो जाऊँ । माधव के दर्शन के बिना इन नेत्रों का अन्धा हो जाना ही उचित
है।" यह कृष्णविरह जनित निर्वेद का उदाहरण है।
हरिवंश में सत्यभामाजी श्रीकृष्ण से कहती हैं, "हे कृष्ण ! जब
से मैंने नारद को तुम्हारे सामने रुक्मिणी का गुणगान करते सुना है, तब
से सोचती हूँ कि मेरे विषय में बोलना तो व्यर्थ ही है।" यह ईर्ष्या से उत्पन्न
निर्वेद है। रुक्मिणी और सत्यभामा दोनों श्रीकृष्ण की पत्नियाँ थीं, इसलिए
यह स्वाभाविक ही है कि उनमें परस्पर स्त्रियों के योग्य ईर्ष्याभाव हो।
कारणतः रुक्मिणी की कीर्ति सुनकर सत्यभामा ईर्ष्यावश निर्वेद को
प्राप्त हुई।
श्रीमद्भागवत (१०.४७.२६) का वाक्य है, "हे कृष्ण ! राज्यलक्ष्मी
से मदमत्त, स्त्री, पुत्र और कोष में ही आसक्त तथा देह को आत्मा समझने
वाले मुझ अविवेकी का सारा समय कभी न समाप्त होने वाली चिन्ता
में ही व्यर्थ नष्ट हो गया।" यह विवेक से उत्पन्न निर्वेद का दृष्टान्त है।
भरतमुनि के अनुसार यह निर्वेद अमंगल है। परन्तु अन्यान्य विद्वानों
ने इसे शान्तरस की श्रेणी में और प्रेम का स्थायिभाव भी माना है।
विषाद
जीवन के इष्ट लक्ष्य की प्राप्ति में असफलता, कार्य की असिद्धि,
विपत्ति और अपने को अपराधी समझने से होने वाला अनुताप विषाद
कहलाता है।
इन उपायों और सहायकों की खोज, चिन्ता, रोना, विलाप, दीर्घ-
श्वास, विवर्णता, मुख का सूखना आदि लक्षण विषाद की अवस्था में अभि-
व्यक्त होते हैं।
श्रीकृष्ण का एक वृद्ध भक्त प्रार्थना करता है, "हे अघासुर के हन्ता
कृष्ण ! वृद्धावस्था के कारण मेरा शरीर विवश हो गया है। वाणी क्षीण
हुई और मन निर्बल हो गया तथा स्मरण-शक्ति जाती रही है। हे नाथ !
आपका मुख क्या है, चन्द्रमा है। परन्तु दुर्भाग्यवश आपकी शीतल चन्द्रिका
के लिए रुचि न होने से मैं कृष्णभावना का विकास नहीं कर सका।" यह
वाक्य इष्ट-अप्राप्ति जनित विषाद का उदाहरण है।
एक भक्त का उद्गार है, "आज स्वप्न में मैंने उद्यान से नाना
पुष्पों का चयन करके श्रीकृष्ण के लिए सुन्दर माला रची; पर हाय ! उसे
श्रीकृष्ण के गले में पहनाने से पूर्व ही मेरी निद्रा भंग हो गई।" इसमें
कार्य-असिद्धि का विषाद है।

२०४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
जब नन्द महाराज ने देखा कि कृष्ण कंस की यज्ञशाला में फँस गए
हैं तो वे बोल पड़े, "अहो ! मेरा दुर्भाग्य तो देखो । मैंने कृष्ण को घर में
ही बन्द क्यों नहीं रखा ? इसे यहाँ मथुरा क्यों लाया, क्योंकि अब यह
हाथी रूप राहू इस कृष्णरूप चन्द्रमा को ग्रसना चाहता है।" यह विपत्ति
के कारण विषाद करना है ।
श्रीमद्भागवत (१०.१४.६) में ब्रह्मा का वाक्य है, "हे नाथ ! आप
अनन्त आदिपुरुष एवं मायापति सर्वव्यापक परमात्मा हैं । तनिक मेरा
अपराध तो देखिये । अपनी तुच्छ शक्ति से मदमत्त हुआ मैं आपका अति-
क्रमण करना चाहता था । जैसे अग्निकण अग्नि की कुछ भी हानि नहीं कर
सकता, वैसे ही मेरी मोहनशक्ति आपकी परामाया को रोकने में तनिक
भी सफल नहीं हो सकती । इसलिए मैं अपने को तुच्छ एवं निरर्थक
समझता हूँ ।" यह अपराध करके उत्पन्न विषाद है ।
दैन्य
दुःख, त्रास, अपराध आदि के कारण होने वाला दीनता का भाव दैन्य
कहलाता है। इस अवस्था में चाटुकारिता, मन्दता, मलिनता, चिन्ता तथा
जड़ता आदि होती हैं ।
श्रीमद्भागवत (१०.५१.५७) में राजा मुचुकुन्द कहते हैं, "हे नाथ !
पूर्वपापों के कारण मैं निरन्तर पापों से पीड़ित रहता हूँ । वासना मुझे
निरन्तर सताती है । फिर भो मेरी इन्द्रियाँ विषयों से तृप्त नहीं होतीं ।
जिस किसी प्रकार आपकी कृपा से अब मैं शान्त हो गया हूँ, क्योंकि मैंने
आपके उन चरणकमलों की शरण ग्रहण कर ली है, जो सदा शोक, भय
और मृत्यु से मुक्त हैं। हे शरणदाता ! हे परमेश्वर ! हे परमात्मा ! कृपया
मुझ दीन की रक्षा करें ।" मुचुकुन्द का यह वाक्य भवरोग के दुःख से
उत्पन्न दैन्य का उदाहरण है ।
जब अश्वत्थामा ने उत्तरा पर ब्रह्मास्त्र चलाया तो वह अपने
गर्भस्थ बालक की रक्षा के लिए आर्त्तभाव से श्रीकृष्ण की शरण में गयी
और प्रार्थना करने लगी, "हे नाथ ! मुझे अपनी चिन्ता नहीं है, परन्तु
इस ब्रह्मास्त्र से कृपया मेरे गर्भ की रक्षा करें ।" यह त्रास से उत्पन्न
दैन्य है ।
श्रीमद्भागवत (१०.१४.१०) में ब्रह्माजी कहते हैं, "हे अच्युत ! रजो-
गुण से उत्पन्न मैं अपने को इस प्राकृत-जगत् का रचयिता समझ कर
गर्वित रहा हूँ । मेरे मिथ्या अहंकाररूप घोर अंधकार ने मुझे अन्धा बना

कृष्णप्रेम के व्यभिचारिभाव [ २०५
दिया । इसी अंधता में हे भगवन् ! मैं आपसे स्पर्धा कर रहा था । वास्तव
में तो हे नाथ ! सृष्टि का स्वामी कहलाने पर भी मैं आपका नित्यदास
ही हूँ । अतः कृपया मेरा अपराध क्षमा करें।” ब्रह्मा का यह वाक्य अपराध
जनित दैन्य का उदाहरण है ।
कदाचित् लज्जा के कारण भी दैन्य की अभिव्यक्ति होती है । नदी
में स्नान करती हुई गोपियों के सारे वस्त्रों को जब श्रीकृष्ण ने चुरा लिया
तो वे उनसे ऐसा अन्याय न करने की याचना करने लगीं । उन्होंने कहा,
“हे कृष्ण ! हे व्रजवल्लभ ! हे नन्दनन्दन ! हम जानती हैं तुम हमारे प्रिय
हो, फिर हमें यह दुःख क्यों देते हो ? कृपया हमारे वस्त्र लौटा दो, देखो
हम भीषण शीत में काँप रही हैं।”
ग्लानि
किसी अनुचित कार्य के लिए अपने को दोषी मानना 'ग्लानि' है ।
श्रीमती राधारानी श्रीकृष्ण के लिए दही मन्थन कर रही थीं ।
उनके मणिमय कंकण घूम रहे थे और वे कृष्णनाम का कीर्तन करती
जाती थीं । सहसा उन्हें विचार हुआ, “ओह, कृष्णनाम का गान कर रही
हूँ, कहीं घर वाले न सुन लें।” इस विचार से राधारानी अतिव्यथित हो
उठीं । यह कृष्णप्रेम से होने वाली ग्लानि का उदाहरण है ।
एक दिन मृगनयनी राधा ने श्रीकृष्ण के लिए माला बनाने को फूल
चुनने के हेतु वन में प्रवेश किया । उन्हें भय हुआ कि कहीं कोई उन्हें देख न
ले और श्रम तथा दुर्बलता अनुभव करने लगीं । यह ग्लानि कृष्ण के लिए
श्रम करने से हुई है ।
रससुधाकर में उल्लेख है कि श्रीकृष्ण के साथ रात्रि बिताकर
राधारानी अतिशय थक गयीं, शय्या से उठ तक न सकीं । जब श्रीकृष्ण ने
उन्हें हाथ का सहारा दिया तो उनके साथ रात्रि व्यतीत करने के लिए
राधा के मन में ग्लानि हुई ।
श्रम
अधिक चलने, नृत्य तथा रति से 'श्रम' की उत्पत्ति होती है ।
निद्रा, पसीना, अंगों की निष्क्रियता, जम्भाई तथा दीर्घ श्वास आदि इसके
लक्षण हैं ।
अपना अपराध करके आँगन में भागते हुए कृष्ण का यशोदा मैया
पीछा कर रही थीं । इससे उन्हें अति श्रम हुआ, स्वेदप्रवाह बह चला और
बाल खुल गए । यह अत्यधिक कार्य करने से श्रम का उदाहरण है ।

२०६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
महोत्सवों में बलराम सहित श्रीकृष्ण के ग्वाल-सखा साथ-साथ
नाचा करते थे। ऐसे अवसरों पर उनके गलों में शोभित मालायें हिल्लोलित
होतीं और वे पसीने से तर हो जाते। भावमय नृत्य से उनका सारा शरीर
ही आर्द्र हो जाता। यह श्रम नृत्यजनित है।
श्रीमद्भागवत (१०.३३.२०) में उल्लेख है कि नृत्य, आलिंगन तथा
चुम्बन के द्वारा श्रीकृष्ण के साथ प्रेमविलास का आस्वादन करने के
उपरान्त गोपियाँ अति श्रमित हो जातीं। ऐसे में अपनी अहैतुकी दया
से प्रेरित होकर श्रीकृष्ण उनके मुखों को अपने करकमल से पोंछते थे। यह
रति से उत्पन्न श्रम का दृष्टान्त है।
मद
जब कोई मद्यपान से अथवा मदन-विकार के अतिरेक से मदमत्त
हो जाता है तो गति, अंगों और स्वर में स्खलन, आँखों का सूजना तथा
शरीर पर लालिमा आदि लक्षण प्रकट होते हैं। 'ललितमाधव' में उल्लेख
है कि अत्यधिक मधुपान से मत्त भगवान् बलराम कहने लगे, "हे राजारूप
चींटियो! तुम डर कर बिलों में क्यों छिप गए हो? अरे शची के खिलौने
(इन्द्र)! तू हँसता क्यों है? अब मैं सम्पूर्ण जगत् का नाश करूँगा। फिर
भी श्रीकृष्ण मुझ पर क्रोध नहीं करेंगे।" फिर वे श्रीकृष्ण से कहते हैं, "हे
कृष्ण! क्या कारण है कि सम्पूर्ण पृथ्वी भ्रमित हो रही है तथा चन्द्रमा
नीचे लटक रहा है। ये सब यादव मुझ पर हँसते क्यों हैं? कृपया कदम्ब
मधु से बनी मेरी मदिरा शीघ्र लाओ।" श्रील रूप गोस्वामी की प्रार्थना
है कि इस प्रकार मदमत्त के समान बोलते हुए भगवान् बलराम हम सब
का कल्याण करें।
इस मत्त दशा में बलरामजी को श्रम हुआ और वे विश्राम के लिए
पड़ गए। सामान्यतः उत्तम पुरुष मद से सो जाता है, मध्यम पुरुष
हँसता-गाता है और अनिष्ठ अपशब्द बोलता है अथवा कभी-कभी रोता भी
है। आयु और मनोभाव के भेद से यह मद नाना प्रकार से अभिव्यक्त
होता है। उपयोगी न होने से श्रील रूप गोस्वामी इस विषय का अधिक
विवेचन नहीं करते।
काम विकार के आधिक्य से उत्पन्न मद का उदाहरण श्रीकृष्ण के
दर्शन से राधारानी में प्रकट हुआ। कभी वे इधर-उधर चलती हैं, कभी
हँसती हैं, कभी मुख छिपा लेती हैं, कभी प्रजल्प करती हैं, तो कभी अपनी
सखियों को प्रणाम करती हैं। राधारानी में इन लक्षणों का अवलोकन कर

कृष्णप्रेम के व्यभिचारिभाव [ २०७
गोपियां परस्पर कहने लगीं, "देखो सामने कृष्ण को देख राधारानी मद से
अन्धी हो गई हैं।" यह प्रेमजनित मद है।
गर्व
गर्व नाम भाव की अभिव्यक्ति अत्यन्त सौभाग्य, अनिन्द्य सौन्दर्य,
उत्तम निवास, अथवा इष्ट-प्राप्ति के कारण होती है। जो दूसरों की
अवहेलना करता है, वह भी गर्वित माना जाता है।
बिल्वमंगल ठाकुर कहते हैं, "हे प्रियतम कृष्ण ! तुम जो मुझे निर्बल
जान कर बलात् हाथ छुड़ाकर जा रहे हो, इसमें तुम्हारी क्या महिमा है।
मैं तो तुम्हारी वीरता तब जानूँ जब तुम मेरे हृदय से निकल जाओ।"
यह कृष्णप्रेम में गर्व का भाव है।
जब राधारानी रासमण्डल को त्याग कर चली गयीं और श्रीकृष्ण
उन्हें मनाने गए तो राधा की एक सखी श्रीकृष्ण से बोली, "हे कृष्ण !
तुमने हमारी राधारानी की अतिशय सेवा की है और अब उन्हें खोजने
अन्य सब गोपियों को त्याग चले हो। कहो, उनसे कैसा व्यवहार चाहते
हो?" यह रूपयौवन से उत्पन्न गर्व है।
कभी राधारानी अपने अन्तर में गर्व करके कहतीं, "गोपबालक
भले ही श्रीकृष्ण के लिए सुगन्धित पुष्पों की मालाएं बनाया करें; परन्तु
जब मैं अपनी माला उन्हें पहनाती हूँ तो विस्मित होकर वे उसे तुरन्त
हृदय पर धारण करते हैं।"
इसी भाँति श्रीमद्भागवत (१०.२.२३) में ब्रह्माजी कहते हैं, "हे
मधुसूदन ! आपके सौहार्द के अनुभवी शुद्धभक्त मार्गभ्रष्ट नहीं होते।
आपके द्वारा रक्षित होने से वे सदा शत्रुओं के सिर पर निश्चिन्त विचरते
हैं।" अर्थात् भगवान् के चरणकमलों में पूर्ण रूप से शरणागत पुरुष सदा
अपने सारे शत्रुओं को जीतने का गर्व करता है।
मथुरा के एक दरजी ने श्रीकृष्ण से कहा, "हे वृन्दावननाथ ! अपने
पर आपकी अहैतुकी कृपा का मुझे ऐसा गर्व है कि महर्षियों द्वारा ध्यान
में अभिलाषित वैकुण्ठनाथ के अनुग्रह की भी मुझे अपेक्षा नहीं है।" भाव
यह है कि यद्यपि योगी-मुनि वैकुण्ठवासी भगवान् विष्णु का ध्यान लगाते
हैं, कृष्णभक्त को ऐसा गर्व रहता है कि वह इस ध्यान को अधिक महत्त्व
नहीं देता। गर्व का यह भाव जीवन के परम लक्ष्य श्रीकृष्ण की प्राप्ति हो
जाने से होता है।

२०८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
शंका
श्रीकृष्ण से सारे गोपबालकों, गोवत्सों और गोधन को चुरा कर
ब्रह्माजी जाना चाहते थे। परन्तु सहसा उन्हें अपने चौर्यकर्म के विषय में
शंका हो आई और वे संशय-विस्फारित आठों नेत्रों से चारों ओर देखने
लगे। यह चौर्य से उत्पन्न शंका व्यभिचारीभाव है।
इसी भाँति श्रीकृष्ण की प्रीति के लिए अक्रूर ने स्यमंतकमणि को
चुराया तो अवश्य, पर बाद में उसे इसका पश्चात्ताप हुआ।
ब्रजधाम पर मूसलधार वर्षा कराते हुए देवराज इन्द्र से जब कहा
गया कि वह श्रीकृष्ण के चरणकमलों की शरण में जाय तो शंका से उसका
मुख बड़ा म्लान हो गया।
त्रास
बिजली, उग्र पशु, घोर शब्द आदि से हृदय में उत्पन्न क्षोभ त्रास
कहलाता है। उसमें पास की वस्तु का आश्रय लेना, रोमांच, कम्प, स्तम्भ
तथा भ्रम आदि लक्षण प्रकट होते हैं।
पद्यावली में कहा है, "हे सखि ! मुझे श्रीकृष्ण का विरह उतना
कष्ट नहीं दे रहा है जितना असुरेन्द्र कंस के मथुरामंडल में असुरों के साथ
उनका निवास त्रासित कर रहा है।"
वृषभासुर को वृन्दावन में आया देखकर त्रास के कारण काँपती हुई
गोपिकायें तमाल के वृक्ष को कृष्ण समझकर उसके आलिंगन से निश्चिन्त
हो गईं।" यह घोर पशुओं से होने वाले त्रास और प्रेमसहित श्रीकृष्ण का
स्मरण करते हुए किसी आश्रय को खोजने का उदाहरण है। वृन्दावन में
भेड़ियों का भयंकर शब्द सुनने पर माता यशोदा इस त्रास से श्रीकृष्ण को
अपनी आँखों के सामने से हटने नहीं देती थी कि कहीं उनपर हमला न
कर दें। यह कृष्णप्रेम में भयंकर शब्द से त्रास का उदाहरण है। ऐसा
त्रास भय से भिन्न है। भय में पूर्वापर का विचार रहता है, जबकि
प्रेम में होने वाले इस प्रकार के त्रास में विचार की गुंजाइश ही नहीं है।
आवेग
आवेग की उत्पत्ति प्रिय से, अप्रिय (के दर्शन) से तथा अग्नि, वायु,
वर्षा, उत्पात, हाथी और शत्रु के कारण होती है। प्रिय के दर्शन से उत्पन्न
आवेग में वाणी की चपलता और मधुरता आदि होते हैं। अप्रिय के दर्शन
से हुए आवेग में चिल्लाना और रोना होता है। अग्नि को देखकर उत्पन्न

कृष्णप्रेम के व्यभिचारिभाव [ २०६

आवेग में अस्त-व्यस्त गति, कम्प, आँखों का मुंद जाना, अश्रु आदि होते
हैं। वायु के कारण आवेग में द्रुतगति से धावन और आँखों को पोंछना
आदि लक्षण प्रकट रहते हैं। वर्षाजनित आवेग में छाता लेना और शरीर
का संकुचन आदि होता है। आकस्मिक उत्पात के आवेग में मुख की
विवर्णता, आश्चर्य और कम्प आदि दिखाई देते हैं। हाथी को देखने से
हुए आवेग में भागना, त्रास तथा भागते-भागते मुड़-मुड़कर पीछे देखना है।
शत्रु को सामने देखने के आवेग में वह किसी घातक अस्त्र को खोजता है और
पलायन का प्रयत्न करता है।
पुत्र कृष्ण को वृन्दावन से आता हुआ देखकर भाव-विह्वला यशोदा
के स्तनों से दूध झरने लगता और शरीर में रोमांच हो आया। यह प्रिय
के दर्शन से उत्पन्न आवेग है।
श्रीमद्भागवत (१०.२३.१८) में शुकदेव गोस्वामी महाराज परीक्षित
को सूचित करते हैं, “हे राजन् ! यज्ञपत्नियों का श्रीकृष्ण के गुणगान में
सहज अनुराग था और वे नित्य उनके दर्शन के लिए उत्कण्ठित रहती थीं।
इसलिए जब उन्होंने सुना कि श्रीकृष्ण आए हैं तो उन्हें देखने को अति
आतुर होकर घर से चल पड़ीं।" यह प्रिय के श्रवण से उत्पन्न आवेग है।
पूतना राक्षसी को कृष्ण के हाथों मारा हुआ देखकर यशोदा मैय्या
आश्चर्यचकित होकर भाव विह्वलतावश, "यह क्या है? यह क्या है ?"
इस प्रकार चिल्लाने लगी। जब उसने देखा कि कृष्ण मृत राक्षसी के
वक्षःस्थल पर खेल रहे हैं तो यशोदा भ्रमित होकर चक्कर काटने लगी।
यह अप्रिय दर्शन जनित आवेग का उदाहरण है।
कृष्ण द्वारा यमलार्जुन को गिराने के शब्द को सुनकर यशोदा दौड़ी
आई। वृक्षों के बीच श्रीकृष्ण को आया देखकर उसकी आँखें ऊपर चढ़
गयीं और वह अपने कर्तव्य का भी निश्चय न कर सकी। यह अप्रिय श्रवण
से उत्पन्न आवेग का दृष्टान्त है।
वृन्दावन में आग लगी देखकर सब गोप एकत्र होकर श्रीकृष्ण से
रक्षा की याचना करने लगे। यह अग्नि से उत्पन्न आवेग है।
एक बार तृणावर्त नामक असुर बड़े-बड़े वृक्षों के साथ श्रीकृष्ण को
उड़ा ले गया था। पुत्र को न देखकर यशोदा मैया व्याकुल होकर घूमने
लगी। यह वात जनित आवेग है।
श्रीमद्भागवत (१०.२५.११) में इन्द्र के वृन्दावन पर मूसलाधार
वर्षा करने का वर्णन है। वात और शीत से अत्यन्त त्रस्त होकर समस्त

२१० ] भक्तिरसामृतसिन्धु
गायैं और गोप आदि श्रीकृष्ण के चरणकमलों की शरण में एकत्र हो गये ।
यह वर्षा से उत्पन्न आवेग है ।
श्रीकृष्ण के वृन्दावनवास के काल में वहाँ अनेक बार ओले बरसे ।
वृद्धजन उनसे कहते, “हे कृष्ण ! इस समय तुमसे बड़े भी त्रस्त हो रहे हैं।
फिर तुम तो नन्हें से बालक ही हो, इसलिए बाहर बिलकुल मत निकलना ”
यह ओले गिरने से आवेग का उदाहरण है ।
यमुना के विषाक्त जल में कृष्ण को कालिया-दमन करते देख
यशोदाजी भावविह्वल दशा में कहने लगीं—“देखो-देखो ! पृथ्‍वी हिल रही
है और आकाश में उल्काएँ घूम रही हैं। मेरा नन्हा सा पुत्र विषमय
यमुनाजल में प्रवेश कर गया है, ऐसे में मैं क्या करूँ ?” यह उत्पातजनित
आवेग है ।
कंस के यज्ञ में जब विशाल हाथी ने श्रीकृष्ण पर आक्रमण किया
तो वहाँ उपस्थित सब स्त्रियाँ कहने लगीं, “हे कृष्ण ! इस स्थान से तुरन्त
दूर हट जाओ । हट जाओ । क्या तुम नहीं देखते कि विशाल हाथी तुम पर
चढ़ा आ रहा है ? तुम्हारी मृदुता को देखकर हमारा चित्त व्यथित हो
रहा है ।” इस पर श्रीकृष्ण ने यशोदा मैया से कहा, “हे जननि ! वेग से
आते हुए धूलि से इन कमलनयनी स्त्रियों को अन्धा करने वाले इन हाथियों
और घोड़ों से क्यों घबराती हो । मेरे सामने केशी दैत्य ही क्यों न आ जाय,
ये बाहु विजय के लिए पर्याप्त हैं। इसलिए घबराओ नहीं ।”
‘ललितमाधव’ में एक सखी यशोदा मैया से कहती, “पर्वत के समान
विशाल और बलशाली शंखचूड़ असुर ने जब तुम्हारे मदन जैसे मनोहर
शिशु पर आक्रमण किया तो इसकी सहायता करने वाला वृन्दावन में कोई
नहीं था। फिर भी आश्चर्य का विषय है कि कृष्ण ने उस दैत्य को मार डाला ।
अवश्य ही तुम्हारे किसी पूर्व पुण्यफल के कारण ही पुत्र का इस प्रकार
विपत्ति से उद्धार हुआ है ।”
‘ललितमाधव’ में ही कृष्ण द्वारा विवाह-मण्डल से रुक्मिणी के
हरण का वर्णन है। उस समय सभी उपस्थित राजा आपस में कहने लगे,
“हमारे पास हाथी, रथ, घोड़े, अस्त्र, शस्त्र, बाण, धनुष आदि सभी कुछ
हैं, फिर हम इस कृष्ण से क्यों डरें ? आओ सब मिलकर इस पर
आक्रमण करें । देखें, यह कामी गोपबालक राजकुमारी का अपहरण कैसे
करता है ।” यह शत्रु-दर्शन से उत्पन्न आवेग का उदाहरण है ।
श्रील रूप गोस्वामी उपरोक्त उदाहरणों से सिद्ध करना चाहते हैं

कृष्णप्रेम के व्यभिचारिभाव [ २११
कि श्रीकृष्ण के सम्बन्ध में निर्विशेषता का कोई प्रश्न नहीं है। श्रीकृष्ण के
नाना सम्बन्धों में सभी प्रकार की सविशेष क्रियाएँ होती हैं।
उन्माद
श्री बिल्वमंगल ठाकुर स्वरचित ग्रन्थ में प्रार्थना करते हैं, "श्रीमती
राधारानी सम्पूर्ण जगत् को पवित्र करें क्योंकि उन्होंने श्रीकृष्ण के चरणों
में पूर्ण आत्मसमर्पण कर दिया है। कृष्ण प्रेम में वे कभी पागल के समान
खाली पात्र में दही मन्थन का प्रयास करती हैं। यह दृश्य देखकर श्रीकृष्ण
ऐसे मुग्ध हुए कि गाय के स्थान पर साँड को दोहने लगे।" राधाकृष्ण
के प्रेम विषयक ये उन्माद के कुछ उदाहरण हैं। श्रीमद्भागवत में वर्णन
है कि श्रीकृष्ण के कालीदह में प्रवेश करने से यशोदा मैया को उन्माद हो
गया। विष की औषधि खोजने के स्थान पर वे वृक्षों से बोलने लगीं, मानों
वे मान्त्रिक हों। वृक्षों को हाथ जोड़ प्रणाम करते हुए बोलीं, "कृपया उस
ओषधि का पता बताइए जिससे कृष्ण विषमय जल के प्रभाव से बच
जायें।" यह आपदा के कारण उत्पन्न उन्माद है।
भक्त में प्रेम के उन्माद का वर्णन श्रीमद्भागवत (१०.३०.४) के उस
प्रसंग में है जब गोपियाँ वृन्दावन के निकुंजों में श्रीकृष्ण का अन्वेषण कर
रही थीं। एक वन से दूसरे वन में उन्हें खोजती हुई गोपिकाएँ उच्च स्वर
से उनकी कीर्ति का गान करती जाती थीं। उन्हें पता था कि श्रीकृष्ण
एकदेशीय नहीं हैं, वरन् विभु हैं। वे आकाश में हैं, वे जल में हैं, वे वायु
में हैं, वे प्राणीमात्र के हृदय में परमात्मा हैं। अतः नाना प्रकार के पेड़-
पौधों से वे उनका पता पूछने लगीं। भक्तों में होने वाला यह विरहजनित
उन्माद है।
इस उन्माद का अन्तर्भाव यद्यपि व्याधि के अन्तर्गत हो जाता है,
तथापि विप्रलम्भ आदि में उसमें विशिष्ट चमत्कार की उद्भावना होती
है। महाभाव का उदय होने पर मोहन को प्राप्त हो जाने पर यह उन्माद
विकसित होकर दिव्योन्माद बन जाता है।
अपस्मार
जब श्रीकृष्ण वृन्दावन में नहीं थे और मथुरा में रह रहे थे तो राधा-
रानी ने सन्देश प्रेषित किया कि मैया व्रजरानी को उनका ऐसा तीव्र विरह
सता रहा है कि समुद्र के समान मुख से फेन निकलता है। कभी-कभी
सागर की तरंगों के सदृश भुजा उत्तेजित करती हैं, विरहवश भूमि पर

२१२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
लोटती हैं, उच्च स्वर से चिल्लाती हैं और फिर शान्त समुद्र जैसे मूर्च्छित
हो जाती हैं। कृष्ण से विरह के ये लक्षण अपस्मार कहलाते हैं। प्रेम के
इन भावों का उदय होने पर भक्त को अपनी तनिक भी सुध-बुध नहीं
रहती ।
श्रीकृष्ण को एक यह सन्देश भी भेजा गया कि उनके द्वारा कंस के
मारे जाने से कंस का एक असुर मित्र घोर दशा को प्राप्त हो गया है।
उसके मुख से फेन निकलता है और भुजाओं को घुमाता हुआ वह भूमि
पर लोट रहा है। यह भयानकाभास श्रीकृष्ण से सम्बन्धित भयानकरस
में जन्म लेता है। भयानकरस कृष्ण विषयक रसों में एक गौण रस है।
प्रथम पाँच रस (शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य और माधुर्य) मुख्य माने गए
हैं; अन्य सातों रस (भयानक, वीभत्स, रौद्र, करुण, हास्य, अद्भुत तथा
वीर) गौण हैं। जिस किसी रूप में उस दैत्य का कृष्ण से कोई सम्बन्ध
अवश्य रहा होगा, क्योंकि श्रीकृष्ण ने कंस को मार डाला—यह सुनते ही
उसमें उपरोक्त भाव प्रकट हो गए। श्रील रूप गोस्वामी का कथन है कि
इस प्रकार के लक्षण (आभास) में भी विशेष चमत्कार होता है ।
व्याधि
वृन्दावन से दूर मथुरा में रहते हुए श्रीकृष्ण को कुछ मित्रों ने सूचित
किया, “हे कृष्ण ! तुम्हारे असह्य विरह में व्रजवासी व्याधि से पीड़ित
प्रतीत होते हैं। उनके शरीर ज्वरित हो गए हैं और वे भलीभाँति चल भी
नहीं सकते । भूमि पर पड़े-पड़े केवल दीर्घ श्वास लेते रहते हैं।”
श्रीमद्भागवत (१०.१२.४४) में भगवान् अनन्त के सम्बन्ध में
महाराज परीक्षित की जिज्ञासा को सुनकर शुकदेव गोस्वामी में शिथिलता
के लक्षण प्रकट होने लगे। फिर भी उन्होंने उनको रोक दिया और मन्द
स्वर से परीक्षित का समाधान किया। यह शिथिलता दिव्य आनन्द
के कारण उत्पन्न होने वाली ज्वर की अवस्था है ।
श्रीमद्भागवत में ही वर्णन है कि अपनी शैशवकालीन लीलाओं में
अनेक वर्ष बाद जब व्रजांगनाओं और श्रीकृष्ण का कुरुक्षेत्र में मिलन हुआ
तो सारी गोपिकाएँ स्तब्ध हो गईं। उनका श्वास, पलकों का गिरना आदि
सम्पूर्ण व्यापार रुद्ध हो गए और वे कृष्ण के समाने पुतली सी खड़ी रह
गयीं । यह हर्षातिशय से उत्पन्न व्याधि है ।

अध्याय ३०
कृष्णप्रेम के अन्यान्य भाव
मोह
'हंसदूत' में यह वाक्य है, "एक दिन जब कृष्ण से विरह की व्यथा
अधिक बढ़ गयी तो श्रीमती राधारानी अपनी कुछ सखियों के साथ यमुना
किनारे गयीं। वहाँ उन्होंने वह चिर-परिचित कुटि देखी जिसमें श्रीकृष्ण के
साथ वे नाना प्रकार से दिव्य रसास्वादन कर चुकी थीं। उस सब की
दिव्य स्मृति से वे तत्काल मोह से अभिभूत हो गयीं। यह मोह अतिशय
प्रौढ़ रूप में प्रकट हुआ।" यह विरह से उत्पन्न मोह है।
इसी प्रकार भय से हुए मोह के भी उदाहरण हैं। ये लक्षण कुरुक्षेत्र
के युद्धप्रांगण में श्रीकृष्ण का विराट् रूप देखने पर अर्जुन में प्रकट हुए
थे। उसे ऐसा मोह हुआ कि हाथ से गाण्डीव के स्खलन को भी न जान
पाया।"
मृत्यु
एक समय कंस का भेजा हुआ बकासुर वृन्दावन में आया और
श्रीकृष्ण तथा गोपबालकों को निगलने के लिए बगले के रूप में मुख खोल
कर बैठ गया। श्रीकृष्ण को बकासुर के मुख में प्रवेश करता देखकर
बलराम तथा अन्य सभी गोपबालक निष्प्राण और अचेतन प्रायः हो गए।
किसी भयानक दृश्य अथवा आकस्मिक घटना से मोहित होने पर भी भक्त-
जन श्रीकृष्ण को कभी नहीं भूलते। महान् से महान् विपत्ति में भी वे
श्रीकृष्ण का स्मरण कर सकते हैं। अतः कृष्णभावना का यह अनुपम लाभ
है कि मृत्यु-काल में भी, जब देह की सम्पूर्ण इन्द्रियाँ विकल और अस्त-
व्यस्त हो जाती हैं, भक्त अपनी अन्तर्चेतना में श्रीकृष्ण का चिन्तन कर
सकता है और इससे भवसागर में गिरने से बच जाता है। इस प्रकार
कृष्णभावना भक्त को तत्काल प्राकृत-जगत् से वैकुण्ठ-जगत् में पहुँचा
देती है।