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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 232, कुल 380 में से

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पृष्ठ 232

कृष्णप्रेम के व्यभिचारिभाव [ २०५
दिया । इसी अंधता में हे भगवन् ! मैं आपसे स्पर्धा कर रहा था । वास्तव
में तो हे नाथ ! सृष्टि का स्वामी कहलाने पर भी मैं आपका नित्यदास
ही हूँ । अतः कृपया मेरा अपराध क्षमा करें।” ब्रह्मा का यह वाक्य अपराध
जनित दैन्य का उदाहरण है ।
कदाचित् लज्जा के कारण भी दैन्य की अभिव्यक्ति होती है । नदी
में स्नान करती हुई गोपियों के सारे वस्त्रों को जब श्रीकृष्ण ने चुरा लिया
तो वे उनसे ऐसा अन्याय न करने की याचना करने लगीं । उन्होंने कहा,
“हे कृष्ण ! हे व्रजवल्लभ ! हे नन्दनन्दन ! हम जानती हैं तुम हमारे प्रिय
हो, फिर हमें यह दुःख क्यों देते हो ? कृपया हमारे वस्त्र लौटा दो, देखो
हम भीषण शीत में काँप रही हैं।”
ग्लानि
किसी अनुचित कार्य के लिए अपने को दोषी मानना 'ग्लानि' है ।
श्रीमती राधारानी श्रीकृष्ण के लिए दही मन्थन कर रही थीं ।
उनके मणिमय कंकण घूम रहे थे और वे कृष्णनाम का कीर्तन करती
जाती थीं । सहसा उन्हें विचार हुआ, “ओह, कृष्णनाम का गान कर रही
हूँ, कहीं घर वाले न सुन लें।” इस विचार से राधारानी अतिव्यथित हो
उठीं । यह कृष्णप्रेम से होने वाली ग्लानि का उदाहरण है ।
एक दिन मृगनयनी राधा ने श्रीकृष्ण के लिए माला बनाने को फूल
चुनने के हेतु वन में प्रवेश किया । उन्हें भय हुआ कि कहीं कोई उन्हें देख न
ले और श्रम तथा दुर्बलता अनुभव करने लगीं । यह ग्लानि कृष्ण के लिए
श्रम करने से हुई है ।
रससुधाकर में उल्लेख है कि श्रीकृष्ण के साथ रात्रि बिताकर
राधारानी अतिशय थक गयीं, शय्या से उठ तक न सकीं । जब श्रीकृष्ण ने
उन्हें हाथ का सहारा दिया तो उनके साथ रात्रि व्यतीत करने के लिए
राधा के मन में ग्लानि हुई ।
श्रम
अधिक चलने, नृत्य तथा रति से 'श्रम' की उत्पत्ति होती है ।
निद्रा, पसीना, अंगों की निष्क्रियता, जम्भाई तथा दीर्घ श्वास आदि इसके
लक्षण हैं ।
अपना अपराध करके आँगन में भागते हुए कृष्ण का यशोदा मैया
पीछा कर रही थीं । इससे उन्हें अति श्रम हुआ, स्वेदप्रवाह बह चला और
बाल खुल गए । यह अत्यधिक कार्य करने से श्रम का उदाहरण है ।