भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
शंका
श्रीकृष्ण से सारे गोपबालकों, गोवत्सों और गोधन को चुरा कर
ब्रह्माजी जाना चाहते थे। परन्तु सहसा उन्हें अपने चौर्यकर्म के विषय में
शंका हो आई और वे संशय-विस्फारित आठों नेत्रों से चारों ओर देखने
लगे। यह चौर्य से उत्पन्न शंका व्यभिचारीभाव है।
इसी भाँति श्रीकृष्ण की प्रीति के लिए अक्रूर ने स्यमंतकमणि को
चुराया तो अवश्य, पर बाद में उसे इसका पश्चात्ताप हुआ।
ब्रजधाम पर मूसलधार वर्षा कराते हुए देवराज इन्द्र से जब कहा
गया कि वह श्रीकृष्ण के चरणकमलों की शरण में जाय तो शंका से उसका
मुख बड़ा म्लान हो गया।
त्रास
बिजली, उग्र पशु, घोर शब्द आदि से हृदय में उत्पन्न क्षोभ त्रास
कहलाता है। उसमें पास की वस्तु का आश्रय लेना, रोमांच, कम्प, स्तम्भ
तथा भ्रम आदि लक्षण प्रकट होते हैं।
पद्यावली में कहा है, "हे सखि ! मुझे श्रीकृष्ण का विरह उतना
कष्ट नहीं दे रहा है जितना असुरेन्द्र कंस के मथुरामंडल में असुरों के साथ
उनका निवास त्रासित कर रहा है।"
वृषभासुर को वृन्दावन में आया देखकर त्रास के कारण काँपती हुई
गोपिकायें तमाल के वृक्ष को कृष्ण समझकर उसके आलिंगन से निश्चिन्त
हो गईं।" यह घोर पशुओं से होने वाले त्रास और प्रेमसहित श्रीकृष्ण का
स्मरण करते हुए किसी आश्रय को खोजने का उदाहरण है। वृन्दावन में
भेड़ियों का भयंकर शब्द सुनने पर माता यशोदा इस त्रास से श्रीकृष्ण को
अपनी आँखों के सामने से हटने नहीं देती थी कि कहीं उनपर हमला न
कर दें। यह कृष्णप्रेम में भयंकर शब्द से त्रास का उदाहरण है। ऐसा
त्रास भय से भिन्न है। भय में पूर्वापर का विचार रहता है, जबकि
प्रेम में होने वाले इस प्रकार के त्रास में विचार की गुंजाइश ही नहीं है।
आवेग
आवेग की उत्पत्ति प्रिय से, अप्रिय (के दर्शन) से तथा अग्नि, वायु,
वर्षा, उत्पात, हाथी और शत्रु के कारण होती है। प्रिय के दर्शन से उत्पन्न
आवेग में वाणी की चपलता और मधुरता आदि होते हैं। अप्रिय के दर्शन
से हुए आवेग में चिल्लाना और रोना होता है। अग्नि को देखकर उत्पन्न