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सर्वकोश
भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 230, कुल 380 में से

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पृष्ठ 230

कृष्णप्रेम के व्यभिचारिभाव [ २०३
हो जाऊँ । माधव के दर्शन के बिना इन नेत्रों का अन्धा हो जाना ही उचित
है।" यह कृष्णविरह जनित निर्वेद का उदाहरण है।
हरिवंश में सत्यभामाजी श्रीकृष्ण से कहती हैं, "हे कृष्ण ! जब
से मैंने नारद को तुम्हारे सामने रुक्मिणी का गुणगान करते सुना है, तब
से सोचती हूँ कि मेरे विषय में बोलना तो व्यर्थ ही है।" यह ईर्ष्या से उत्पन्न
निर्वेद है। रुक्मिणी और सत्यभामा दोनों श्रीकृष्ण की पत्नियाँ थीं, इसलिए
यह स्वाभाविक ही है कि उनमें परस्पर स्त्रियों के योग्य ईर्ष्याभाव हो।
कारणतः रुक्मिणी की कीर्ति सुनकर सत्यभामा ईर्ष्यावश निर्वेद को
प्राप्त हुई।
श्रीमद्भागवत (१०.४७.२६) का वाक्य है, "हे कृष्ण ! राज्यलक्ष्मी
से मदमत्त, स्त्री, पुत्र और कोष में ही आसक्त तथा देह को आत्मा समझने
वाले मुझ अविवेकी का सारा समय कभी न समाप्त होने वाली चिन्ता
में ही व्यर्थ नष्ट हो गया।" यह विवेक से उत्पन्न निर्वेद का दृष्टान्त है।
भरतमुनि के अनुसार यह निर्वेद अमंगल है। परन्तु अन्यान्य विद्वानों
ने इसे शान्तरस की श्रेणी में और प्रेम का स्थायिभाव भी माना है।
विषाद
जीवन के इष्ट लक्ष्य की प्राप्ति में असफलता, कार्य की असिद्धि,
विपत्ति और अपने को अपराधी समझने से होने वाला अनुताप विषाद
कहलाता है।
इन उपायों और सहायकों की खोज, चिन्ता, रोना, विलाप, दीर्घ-
श्वास, विवर्णता, मुख का सूखना आदि लक्षण विषाद की अवस्था में अभि-
व्यक्त होते हैं।
श्रीकृष्ण का एक वृद्ध भक्त प्रार्थना करता है, "हे अघासुर के हन्ता
कृष्ण ! वृद्धावस्था के कारण मेरा शरीर विवश हो गया है। वाणी क्षीण
हुई और मन निर्बल हो गया तथा स्मरण-शक्ति जाती रही है। हे नाथ !
आपका मुख क्या है, चन्द्रमा है। परन्तु दुर्भाग्यवश आपकी शीतल चन्द्रिका
के लिए रुचि न होने से मैं कृष्णभावना का विकास नहीं कर सका।" यह
वाक्य इष्ट-अप्राप्ति जनित विषाद का उदाहरण है।
एक भक्त का उद्गार है, "आज स्वप्न में मैंने उद्यान से नाना
पुष्पों का चयन करके श्रीकृष्ण के लिए सुन्दर माला रची; पर हाय ! उसे
श्रीकृष्ण के गले में पहनाने से पूर्व ही मेरी निद्रा भंग हो गई।" इसमें
कार्य-असिद्धि का विषाद है।