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सर्वकोश
भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 224, कुल 380 में से

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पृष्ठ 224

सात्त्विक भाव [ १६७
विवर्णता
कभी-कभी श्रीकृष्ण के व्यवहार से हुए महान् विषाद आदि से देह
का रंग बदल जाता है। अतः गोपियाँ उनसे कहती हैं, "हे कृष्ण ! तुम्हारे
विरह में सारे ब्रजवासी विवर्ण हो गए हैं। इस कारण देवर्षि नारद
को वृन्दावन में श्वेतद्वीप का भ्रम हो रहा है।"
कृष्ण-बलराम को यज्ञशाला में आया देखकर कंस का रंग उड़ गया।
इसी प्रकार इन्द्र भी यह देख कर विवर्ण हो गया था कि कृष्ण गोवर्धन
धारण करके सारे ब्रज की रक्षा कर रहे हैं। यदि विवर्णता अतिशय हर्ष के
कारण होती है तो रक्तिमा देखी जाती है। यह विकार बड़ा दुर्लभ है, अतः
श्रील रूप गोस्वामी ने इसका इतना ही विवरण दिया है।
अश्रु
हर्ष, रोष, विषाद, आदि कारणों से नेत्रों से अश्रु-प्रवाह निकल
पड़ता है। हर्ष से उत्पन्न आंसू ठण्डे और क्रोधजनित आंसू गरम होते हैं।
सभी प्रकार के आँसुओं में नेत्रों में क्षोभ, लालिमा और खुजली के कारण
पोंछना आदि होता है।
द्वारका में भगवान् श्रीकृष्ण की पट्टमहिषी रुक्मिणीजी भाव के
आनन्द में अश्रु वहा रही थीं, परन्तु वे उन्हें अप्रिय लगे क्योंकि श्रीकृष्ण के
दर्शन में बाधा डाल रहे थे। 'हरिवंश' के एक श्लोक में सत्यभामाजी
श्रीकृष्ण पर प्रणयकोप के कारण आँसू बहाने लगीं।
रोषजनित अश्रुपात का एक अन्य उदाहरण यह है। राजसूय यज्ञ में
शिशुपाल को श्रीकृष्ण का तिरस्कार करते देखकर भीमसेन को भयंकर
रोष हुआ। वह शिशुपाल को तुरन्त मार डालना चाहता था; परन्तु
श्रीकृष्ण ने उसे ऐसा करने से रोक दिया। इससे वह क्रोध से तिलमिला
उठा। वर्णन है कि उस समय उसके नेत्र गरम आँसुओं से अभिभूत हो रहे
थे, जैसे सांध्यकालीन चन्द्रमा पर कोई हल्का सा मेघ छा जाय। संध्या का
मेघाच्छादित चन्द्रमा बड़ी शोभा पाता है। इसी प्रकार क्रोधवश अश्रु-
विमोचन करता हुआ भीम भी अतिशय शोभित हुआ।
श्रीमद्भागवत (१०.६०.२३) में रुक्मिणी द्वारा विषादवश अश्रु-
विमोचन करने का सुन्दर उदाहरण हैं। श्रीकृष्ण और रुक्मिणी का वार्ता-
लाप हो रहा था प्रसंगवश रुक्मिणी श्रीकृष्ण के विरह की आशंका से भय-
भीत हो गयीं। रक्तकमल के समान नखों से भूमि कुरेदती हुई रुक्मिणी
के नेत्रों की अंजन अश्रुधारा के साथ कुंकुम से उपलिप्त वक्षःस्थल पर