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सर्वकोश
भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 240, कुल 380 में से

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पृष्ठ 240

अध्याय ३०
कृष्णप्रेम के अन्यान्य भाव
मोह
'हंसदूत' में यह वाक्य है, "एक दिन जब कृष्ण से विरह की व्यथा
अधिक बढ़ गयी तो श्रीमती राधारानी अपनी कुछ सखियों के साथ यमुना
किनारे गयीं। वहाँ उन्होंने वह चिर-परिचित कुटि देखी जिसमें श्रीकृष्ण के
साथ वे नाना प्रकार से दिव्य रसास्वादन कर चुकी थीं। उस सब की
दिव्य स्मृति से वे तत्काल मोह से अभिभूत हो गयीं। यह मोह अतिशय
प्रौढ़ रूप में प्रकट हुआ।" यह विरह से उत्पन्न मोह है।
इसी प्रकार भय से हुए मोह के भी उदाहरण हैं। ये लक्षण कुरुक्षेत्र
के युद्धप्रांगण में श्रीकृष्ण का विराट् रूप देखने पर अर्जुन में प्रकट हुए
थे। उसे ऐसा मोह हुआ कि हाथ से गाण्डीव के स्खलन को भी न जान
पाया।"
मृत्यु
एक समय कंस का भेजा हुआ बकासुर वृन्दावन में आया और
श्रीकृष्ण तथा गोपबालकों को निगलने के लिए बगले के रूप में मुख खोल
कर बैठ गया। श्रीकृष्ण को बकासुर के मुख में प्रवेश करता देखकर
बलराम तथा अन्य सभी गोपबालक निष्प्राण और अचेतन प्रायः हो गए।
किसी भयानक दृश्य अथवा आकस्मिक घटना से मोहित होने पर भी भक्त-
जन श्रीकृष्ण को कभी नहीं भूलते। महान् से महान् विपत्ति में भी वे
श्रीकृष्ण का स्मरण कर सकते हैं। अतः कृष्णभावना का यह अनुपम लाभ
है कि मृत्यु-काल में भी, जब देह की सम्पूर्ण इन्द्रियाँ विकल और अस्त-
व्यस्त हो जाती हैं, भक्त अपनी अन्तर्चेतना में श्रीकृष्ण का चिन्तन कर
सकता है और इससे भवसागर में गिरने से बच जाता है। इस प्रकार
कृष्णभावना भक्त को तत्काल प्राकृत-जगत् से वैकुण्ठ-जगत् में पहुँचा
देती है।