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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

अध्याय २५
श्रीकृष्णभक्त
जो निरन्तर कृष्णभावनाभावित रहता है, वह कृष्णभक्त कहलाता
है। श्रील रूप गोस्वामी कहते हैं कि श्रीकृष्ण के सम्पूर्ण पूर्ववर्णित दिव्य गुण
कृष्णभक्त में भी पाये जाते हैं। कृष्णभक्तों की दो कोटियाँ हैं—जो दिव्य
धाम में प्रवेश के लिए भक्ति के साधक हैं और दूसरे जो भक्ति की संसिद्धि
को प्राप्त हो चुके हैं।
जिसके अन्तर में भलीभाँति श्रीकृष्ण के लिए रति का उदय हो गया
है और जो प्राकृत अंतरालों (विघ्नों) से मुक्त तो नहीं हुआ है परन्तु
भगवद्धाम में प्रवेश के योग्य है, उसे साधक कहते हैं। साधक वह है जो
कृष्णभावनाभावित भक्ति का सेवन करता है। इस कोटि के भक्त का
विवरण श्रीमद्भागवत (११.२.४६) में है। वहाँ उल्लेख है कि जिसका
भगवान् में अनन्य श्रद्धा-प्रेम है, जो कृष्णभक्तों से मैत्री करता है, अज्ञानियों
को भक्ति में लगा कर उन पर कृपा करता है तथा अभक्तों की ओर
उपेक्षा का भाव रखता है, वह भक्तियोग के सेवन की अवस्था में है।
जब भगवान् के लीला-चरित को सुनने से अश्रुधारा बहने लगे तो
समझना चाहिए कि उस जल-वर्षण से संसाराग्नि शान्त हो जायगी।
जिसका शरीर पुलकित और रोमांचित हो उठता है, वह संसिद्धि के निकट
है। बिल्वमंगल ठाकुर आदि भक्तियोग के साधक हैं।
जब कोई भक्त भक्तियोग के साधक से कभी भी परिश्रम का
अनुभव नहीं करता और सदा कृष्णभावनाभावित क्रियाओं के परायण
रहता हुआ श्रीकृष्ण से अपने सम्बन्ध में निरन्तर रसास्वादन करता है,
तब वह सिद्ध कहलाता है। इस सिद्धि-प्राप्ति के दो प्रकार हैं—एक भक्ति
के साधन द्वारा और दूसरे भक्ति के पूरे विधि-विधान का आचरण किए
बिना ही अहैतुकी भगवत्कृपा से सिद्ध हो जाना। साधनसिद्ध भक्त के
सम्बन्ध में श्रीमद्भागवत (३.१५.२५) में यह वाक्य है, "भवरोग के मिथ्या
अहंकार से मुक्त पुरुष अथवा उत्तम योगी वैकुण्ठ धाम में प्रवेश का

श्रीकृष्णभक्त [ १७७
अधिकारी हो जाता है। वह योगी वैधीभक्ति का निरन्तर आचरण करने
से परमानन्द को प्राप्त होता है और फलस्वरूप भगवान् की विशेष कृपा
का पात्र होता है। यमराज उस भक्त के पास भी फटकने में डरता है।"
इससे हम उत्तम भक्ति की शक्ति का अनुमान लगा सकते हैं, विशेषतः
जब भक्त-गोष्ठी में भगवान् की लीलाओं की चर्चा होती है। परस्पर
भगवत्-यश की चर्चा करने से वे भक्त भाव से द्रवित हो जाते हैं और बहुत
से सात्त्विक विकार भी उनके शरीर पर प्रकट हो उठते हैं। भक्ति के पथ
पर उन्नति के अभिलाषी को इन भक्तों के चरणचिह्नों का अनुसरण करना
चाहिए।
प्रह्लाद महाराज ने कहा है कि उत्तम भक्तों को प्रणाम किए बिना
कोई भी भक्ति की संसिद्धि को प्राप्त नहीं हो सकता। मारकण्डेय ऋषि
आदि विद्वान् साधनभक्ति के द्वारा ही संसिद्धि को प्राप्त हुए।
कृपासिद्धि का उदाहरण श्रीमद्भागवत में यज्ञपत्नियों के उपाख्यान
में है। भगवान् श्रीकृष्ण की कृपा से अपनी पत्नियों को भगवत्प्रेम में
विभोर हुआ देखकर ब्राह्मण कहने लगे, "कैसा आश्चर्य है कि यज्ञोपवीत
आदि कोई भी संस्कार हुए बिना, गुरुकुल में निवास किये बिना, ब्रह्मचर्य,
तप, त्याग, मीमांसा, शौच अथवा शुभ कर्मों का आचरण किए बिना ही इन
स्त्रियों को श्रीकृष्णकृपा से महायोगियों के लिए भी दुर्लभ दृढ़ भक्ति प्राप्त
हुई है, जबकि संस्कार आदि से युक्त होने पर भी हममें उसका अभाव है।"
नारदजी भी शुकदेव गोस्वामी को इसी प्रकार सम्बोधित करते हैं,
"हे शुकदेव ! तुमने कभी गुरु के पास विद्याध्ययन नहीं किया, फिर भी
दिव्य ज्ञान को प्राप्त हो गये हो। तुमने कभी कठोर तप नहीं किया, तथापि
कैसा आश्चर्य है कि तुमने भगवत्प्रेम की परमावस्था को पा लिया है।"
शुकदेव गोस्वामी और यज्ञपत्नियां कृपासिद्ध भक्तों के प्रतीक हैं।
नित्यसिद्ध
श्रीकृष्ण के समान सत्, चित्, आनन्द आदि गुणों को प्राप्त तथा
अपनी प्रेमसेवा से श्रीकृष्ण का आकर्षण करने वाले भक्त नित्यसिद्ध हैं।
जीव दो प्रकार के होते हैं—नित्यसिद्ध और नित्यबद्ध। भेद यह है कि
नित्यसिद्ध विस्मृत में बिना निरन्तर कृष्णभावनावभावित रहते हैं, जबकि
नित्यबद्ध श्रीकृष्ण से अपने सम्बन्ध को भुला बैठते हैं।
'पद्मपुराण' में वर्णित भगवान् और सत्यभामा देवी के संवाद में
नित्यसिद्धों का विवरण है। भगवान् कहते हैं, "हे देवी ! मैं इस धराधाम

१७८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
पर ब्रह्मा और इन्द्र की प्रार्थना से अवतीर्ण हुआ हूँ। सारे यदुवंशी मेरे
नित्य पार्षद हैं। हे भामिनि ! वे मेरे से कभी वियुक्त नहीं होते; मेरे ये
अंश मेरे ही समान शक्तिशाली हैं। वे दिव्य गुणों से युक्त हैं, इसलिए मुझे
अतिशय प्रिय हैं और मैं भी उनका प्रियतम हूँ।" जो कोई भी पार्षदों
सहित भगवान् श्रीकृष्ण की नर लीला को सुनकर हर्षित होता है, वह
अवश्य नित्यसिद्ध है।
श्रीमद्भागवत (१०.१४.३२) में कहा है, “अहो ! नन्द, गोप आदि
वृन्दावनवासियों के सौभाग्य का क्या कहना, साक्षात् परम ब्रह्म उनके मित्र
जो ठहरे।"
इसी प्रकार श्रीमद्भागवत (१०.२६.१०) में जब श्रीकृष्ण ने गोवर्धन
उठा लिया तो उनके आश्रित गोप विस्मय से चकित होकर नन्द महाराज
से पूछने लगे, “हे गोपेन्द्र ! क्या कारण हैं कि हमारा श्रीकृष्ण में प्रगाढ़
अनुराग है और वे भी हमसे प्रेम करते हैं ? क्या इसका अर्थ यह नहीं कि
वे सबके अन्तर्यामी परमात्मा हैं ?"
सम्पूर्ण वृन्दावनवासी गोप और द्वारकावासी यादव श्रीकृष्ण के नित्य-
सिद्ध भक्त हैं। जब श्रीभगवान् अपनी कृपा से इस पृथ्वी पर अवतरित होते हैं
तो लीला में सहायता करने के लिए उनके भक्त भी साथ आते हैं। ये साधारण
बद्धजीव नहीं हैं, वरन् भगवान् के नित्यसिद्ध शाश्वत् पार्षद हैं। जब
श्रीकृष्ण का अवतार होता है तो वे नर लीला करते हैं, उसी प्रकार
यदुवंशी और व्रजवासी भी साधारण मनुष्यों के समान क्रीड़ा करते हैं।
परन्तु इससे उन्हें साधारण नहीं समझना चाहिए; वे भगवान के समान ही
मुक्त हैं।
'पद्मपुराण' के उत्तरखण्ड में उल्लेख है, “जैसे भगवान् राम संकर्षण
के अंश* लक्ष्मण और प्रद्युम्न के अंश भरत के साथ अवतरित होते हैं, उसी
प्रकार भगवान् के दिव्य लीलारस में सम्मिलित होने के लिए व्रज के गोप
और द्वारका के यदुवंशी भी श्रीकृष्ण के साथ प्रकट होते हैं। जब भगवान्
अपने दिव्यधाम को वापस लौटते हैं तो पार्षद भी यथा स्थान लौट जाते
हैं। अतएव इन नित्यसिद्ध वैष्णवों का जन्म कर्मबन्धन के अनुसार नहीं
हुआ करता।"
भगवद्गीता में जैसा भगवान् ने स्वयं कहा है, उनका जन्म और

  • नाना अवतारों और अंशों का विस्तृत विवरण लेखक के 'श्रीचैतन्य
    महाप्रभु का शिक्षामृत' नामक ग्रन्थ में देखें।

श्रीकृष्णभक्त [ १७६
कर्म पूर्ण रूप से लोकोत्तर (दिव्य) है। इसी प्रकार भगवद्भक्तों के जन्म-
कर्म भी दिव्य होते हैं। जैसे अपने को श्रीकृष्ण से एक समझना अपराध
है, वैसे ही नन्द-यशोदा आदि पार्षदों से अपना अभेद मानना भी अपराध
है। हमें स्मरण रखना चाहिए कि ये नित्यसिद्ध लोकोत्तर जीव हैं, जो
कभी बद्ध नहीं होते।
शास्त्र में उल्लेख है कि कंसारि श्रीकृष्ण में चौसठ दिव्य गुण हैं और
श्रीकृष्ण के पार्षद नित्यसिद्धों में भी पहले पचपन गुण निश्चित रूप से
रहते हैं। ये भक्त भगवान् से शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य तथा माधुर्य इन
पाँच भिन्न-भिन्न रसों में सम्बन्ध रखते हैं। श्रीकृष्ण से ये सम्बन्ध नित्य
हैं, इसलिए नित्यसिद्ध भक्त को वैधीभक्ति के अनुष्ठान से संसिद्धि के
लिए साधन नहीं करना पड़ता। वे नित्य श्रीकृष्ण की सेवा करने के
योग्य हैं।

अध्याय २६
प्रेम के उद्दीपन
जो श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम को उद्दीप्त करते हैं वे उद्दीपन विभाव
कहलाते हैं, जैसे भगवान् श्रीकृष्ण के दिव्य गुण, असाधारण चेष्टा, शृंगार,
मुस्कराहट, श्रीअंग की सौरभ, वस्त्र, माला; वंशी, शृंग, वेत्र, नूपुर, शंख,
चरणचिह्न, वृन्दावन आदि लीलास्थल, उनकी प्रिया तुलसी, कृष्णभक्त,
तथा उनकी स्मृति के दिवस। कृष्ण-स्मरण का एक दिन एकादशी है। उस
दिन सारे भक्त उपवास रखकर अहोरात्र भगवान् की कीर्ति का गान
करते हैं।
श्रीकृष्ण के दिव्य गुण, असाधारण चेष्टा और मधुर मुस्कान
श्रीकृष्ण के दिव्य गुणों की तीन कोटियाँ हैं—कायिक, वाचिक और
मानसिक।
श्रीकृष्ण की वय, उनका दिव्य श्रीअंग, सौंदर्य तथा मृदुता उनके
कायिक गुण हैं। श्रीकृष्ण और उनके शरीर में भेद नहीं है, इसलिए उनके
कायिक गुण साक्षात् उन्हीं के स्वरूप हैं। ये भक्तों के प्रेम का उद्दीपन
करते हैं, इसीलिए उन्हें उस प्रेम का अलग से कारण बताया गया है।
श्रीकृष्ण के गुणों से आकृष्ट होना स्वयं श्रीकृष्ण से ही आकृष्ट होना है,
क्योंकि यथार्थ में श्रीकृष्ण और उनके गुणों में कुछ भी भेद नहीं है। श्रीकृष्ण
का नाम भी कृष्ण है, यश भी कृष्ण और परिकर भी कृष्ण है। श्रीकृष्ण
के प्रेम को उद्दीप्त करने वाली उनसे सम्बन्धित प्रत्येक वस्तु कृष्ण है।
परन्तु हमारी जानकारी के लिए इनका अलग विचार किया गया है।
श्रीकृष्ण अखिलरसामृतमूर्ति (आलम्बन) हैं; अतः कृष्णप्रेम के
उद्दीपन भिन्न प्रतीत होते हुए भी वास्तव में श्रीकृष्ण से भिन्न नहीं हैं।
कृष्ण के नाम, यश, गुण आदि कृष्णप्रेम के आलम्बन और उद्दीपन
दोनों हैं।
श्रीकृष्ण की वय कौमार, पौगण्ड और कैशोर—इस प्रकार तीन

प्रेम के उद्दीपन [ २८१

प्रकार की है। उनके आविर्भाव से छठे वर्ष के प्रारम्भ का काल कौमार
कहलाता है, छठे वर्ष के आरम्भ से दसवें वर्ष तक पौगण्ड अवस्था रहती
है तथा दसवें से सोलहवें वर्ष तक कैशोर रहता है। सोलहवें वर्ष के बाद
श्रीकृष्ण यौवन में प्रवेश करते हैं, जिसके बाद श्रीकृष्ण की वय में परिवर्तन
नहीं होता।
श्रीकृष्ण की दिव्य लीलाएँ प्राधान्यतः कौमार, पौगण्ड और कैशोर
अवस्था में सम्पादित होती हैं। नन्द-यशोदा से उनकी वात्सल्यरसमयी
लीला कौमार में हुई; गोपबालकों से सख्यरस का प्रकाश पौगण्ड
अवस्था में हुआ और कैशोर में गोपियों से उनका प्रेमविलास है। श्रीकृष्ण
की वृन्दावनलीला उनके पन्द्रहवें वर्ष तक पूर्ण हो जाती है। आगे की लीला
वे मथुरा और द्वारका में करते हैं।
श्रील रूप गोस्वामी भक्तिरसामृतसिन्धु में अखिल रसों के आश्रय
के रूप में श्रीकृष्ण का विशद वर्णन करते हैं, जिसका सार इस प्रकार है।
श्रीकृष्ण के कैशोर को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता
है—आद्य, मध्य तथा शेष कैशोर। श्रीकृष्ण के कैशोर का आरम्भ होने
पर, अर्थात् ग्यारहवें वर्ष के आदि में उनका श्रीअंग कुछ इतना उज्ज्वल
हो जाता है कि प्रेम के उद्दीपक का काम करता है इसी प्रकार नयनों में
अरुणिमा छा जाती है और शरीर पर रोमावली प्रकट होने लगती है।
श्रीकृष्ण के इस आदि कैशोर का वर्णन करते हुए वृन्दावन में कुन्दलता ने
अपनी सखी से कहा, "हे सखि ! मैंने अभी-अभी श्रीकृष्ण के विग्रह में एक
अपूर्व सुषमा स्फुरित होती देखी है। उनके शरीर की श्यामल‌ता इन्द्र-
नीलमणि की कान्ति का अपहरण कर रही है, नेत्रों में अरुणच्छवि है और
शरीर पर रोमराजी उदित हो रही है। इन लक्षणों के उदय ने उन्हें
असमोध्वं माधुरी प्रदान की है।"
इस सन्दर्भ में श्रीमद्भागवत (१०.२१.५) में शुकदेव गोस्वामी महा-
राज परीक्षित से कहते हैं, “गोपियों का मन श्रीकृष्ण के चिन्तन में तन्मय
हो गया था। वे ध्यान में देखतीं कि श्रीकृष्ण ने नटवर वेष धारण किया
है और भूमि पर अपने चरणचिह्नों को अंकित करते हुए वन में प्रवेश कर
रहे हैं। श्रीकृष्ण सिर पर मोरपिच्छ और कर्णों में कर्णिकार धारण किए
हुए हैं। पीताम्बर और वैजयन्ती माला से विभूषित हैं। इस प्रकार वंशी-
वादन करते हुए श्रीकृष्ण की कीर्ति का गोपबालक गान कर रहे हैं।"
गोपियाँ नित्य इसी ध्यान का अभ्यास करती थीं।
कभी-कभी गोपीजन श्रीकृष्ण के नखाग्रों की कोमलता, भ्रूवों के

१८२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
नर्तन और पान चबाने से रक्तवर्ण हुई दन्तावली का ध्यान करतीं। गोपी
कहती है, “हे सखि ! देखो, अधारि ने कैसा अभिनव सौन्दर्य धारण किया
है। उनकी भ्रुवों में कामदेव के बाण सी चपलता और वक्रता है, नखाग्र
कोमल पत्तों के समान मृदु हैं और दन्तपंक्ति रक्त है, मानो वे क्रुद्ध हों।
यह रूप देखकर कौन स्त्री आकृष्ट होकर इस माधुरी पर सर्वस्व खो
बैठने से भीतशंकित न होगी ?”
श्रीकृष्ण की रूपमाधुरी का वर्णन स्वयं वृन्दावन की अधिष्ठात्री
वृन्दादेवी ने भी किया है। उसने श्रीकृष्ण से कहा, “हे माधव ! तुम्हारी
अभिनव स्मित ने गोपियों के मन को ऐसा मोह लिया है कि वे अपने भावों
को अभिव्यंजित करने में भी समर्थ नहीं रही हैं। वे इतनी मुग्ध हो चुकी
हैं कि किसी से कुछ कह तक नहीं सकतीं। लगता है मानों तुम्हारा दर्शन
कर उन्होंने अपने प्राणों पर जलांजलि दे दी है, अर्थात् जीने की आशा ही
छोड़ दी है।” वैदिक पद्धति के अनुसार मृत प्राणी पर जलांजलि छोड़ी
जाती है। वृन्दा के वाक्य का अभिप्राय है कि श्रीकृष्ण की माधुरी से अति-
शय मुग्ध हुई गोपियाँ अपने मन का भाव अभिव्यक्त करने में समर्थ न रहीं,
इसलिये उन्होंने आत्महत्या का निश्चय कर लिया।
जब श्रीकृष्ण मध्य कैशोर अर्थात् तेरह-चौदह वर्ष की आयु में
पदार्पण करते हैं, तो दोनों जंघाओं, दोनों बाहुओं और वक्षस्थल में कोई
अभूतपूर्व सौन्दर्य आ जाता है और मूर्ति तो बस मधुरिमामयी हो जाती
है। इस वयधर्म में श्रीकृष्ण की जांघें गजतुण्ड को लजाती हैं, वक्षःस्थल
मरकतमणि के कपाट से मित्रता करना चाहता है। भुजदण्ड अर्गला को
तिरस्कृत करते हैं। श्रीकृष्ण की इस अद्भुत रूपमाधुरी का वर्णन भला
कौन कर सकता है ? इन सब में भी श्रीकृष्ण मन्द-मन्द हँसी, चंचल नेत्र
और त्रिभुवनविमोहन गति का सर्वाधिक वैशिष्ट्य हैं। ये इस वय के
विशिष्ट लक्षण जो ठहरे।
इस सम्बन्ध में एक श्लोक में उल्लेख है कि इस अवस्था के प्रवेश
काल में श्रीकृष्ण में ऐसे अपूर्व रूप का विकास हुआ कि उनके चंचल नेत्र
कामदेव के खिलौने बन गए तथा मृदु मुस्कान सद्योप्रस्फुटित कमलदल से
भी अतिशय हो गई। यही नहीं, उनके उन्नत मनोहर संगीत का नाद
कुलवधुओं के पातिव्रत को भंग करने वाला हो गया।
इसी अवस्था में श्रीकृष्ण ने हास-परिहास, रासलीला और गोपियों
के साथ यमुना तट पर स्थित निकुंज में विहार का आस्वादन किया।
इस सम्बन्ध में एक श्लोक इस प्रकार है, “सम्पूर्ण वृन्दावनधाम

प्रेम के उद्दीपन [ १८३
श्रीकृष्ण और गोपियों के चरणचिह्नों से अंकित है । कहीं मोरपंख व्याप्त
हो रहे हैं तो कहीं-कहीं कुंजों में सुखद शय्या सजी हुई है और कहीं गोविन्द
और गोपियों के परस्पर नृत्य करने से बालुका इकट्ठी हो गई है।”
बाकी ये कतिपय वे विलास हैं जो वृन्दावन में श्रीकृष्ण द्वारा प्रकटित
लीला में हुए ।
इस अवस्था में श्रीकृष्ण के आकर्षण का वर्णन करते हुए एक गोपी
कहती है, “हे सखि ! देख कैसे अकस्मात् कृष्णमेघ के भीतर माधुर्य प्रवाह-
रूप प्रचण्ड सूर्य का उदय हो रहा है, जो हमारे पतिव्रतधर्म रूपी चन्द्रमा
को मन्द किए दे रहा है । श्रीकृष्ण के लिए हमारा अनुराग इतना अतिशय
प्रबल हो चला है कि हमारे विवेकरूपी कुमुद को सुखाए डाल रहा है।
हम नहीं जानतीं कि हम पतिव्रता रहें या श्रीकृष्ण के लावण्य की शिकार
हो जायें । हे सखि ! लगता है हमारे जीवन की कुछ भी आशा नहीं
रही है ।”
ग्यारहवें वर्ष के प्रारम्भ से पन्द्रहवें वर्ष के अन्त तक के शेष कैशोर
के आने पर निश्चय ही शरीर का सौन्दर्य पहले से उत्कर्ष को प्राप्त होता
है तथा भुजाओं, पैरों और जांघों में त्रिवली की अभिव्यक्ति होती है । उस
समय श्रीकृष्ण का वक्षःस्थल मरकतमणि के विशाल पर्वत की शोभा को
हरता है, भुजाएँ इन्द्रनीलमणि के स्तम्भों से तिरस्कृत करती हैं और कटि
की त्रिवली के सामने यमुना की तरंगें तुच्छ प्रतीत होती हैं तथा जांघें
कदलीदल से भी अतिशय सुगढ़ हो जाती हैं ।” एक गोपी बोली, “इस
सम्पूर्ण अप्रतिम श्रीअंग माधुर्य धारी श्रीकृष्ण का विलक्षण सौन्दर्य है।
इसलिए मैं उन्हीं के स्मरण में निमग्न रहती हूँ, क्योंकि वे सब असुरों को
मारने वाले हैं ।”
इस श्लोक का भाव इस प्रकार है । गोपियाँ श्रीकृष्ण के लिए अपने
आकर्षण की तुलना असुरों के आक्रमण से कर रही हैं । श्रीकृष्ण के प्रति
अपने आकर्षण के उपचार के लिए भी वे श्रीकृष्ण को ही याद करती हैं,
इस आशा से कि वे सब असुरों के हन्ता हैं, इसलिए अवश्य सहायता करेंगे ।
वे द्विविधा में पड़ी हैं, क्योंकि एक ओर तो वे श्रीकृष्ण के माधुर्य से आकृष्ट
है और दूसरी ओर चाहती हैं कि श्रीकृष्ण इस आकर्षण रूपी असुर को
दूर करें ।
इसी शेष कैशोर को नव यौवन कहा गया है । कैशोर के अन्त में
सब गोपियों ने कहा, “श्रीकृष्ण कामदेव के आकर्षण को हराने वाले हैं,
अतः नव वधुओं के धैर्य के सेतु को तोड़ देते हैं। श्रीकृष्ण का श्रीअंग

३. पश्चिम विभाग: मुख्य भक्ति रस (शान्त, प्रीति, सख्य, वात्सल्य, मधुर)

१८४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
तारुण्य इतना मधुर हो चला है कि मानो परमोच्च कलाविलास हो ।
सुन्दर मयूरों के समान नाचते हुए उनके नेत्रों ने कुशल नर्तकों की शोभा
का भी अपहरण कर लिया है। अतः श्रीकृष्ण की माधुरी सर्वथा अनुपम
है।" इसीलिए विद्वान् इस समय उनके शरीरवय को नवयौवन कहते
हैं। इस अवस्था में गोपियों के साथ रास आदि लीलाओं का अतिशय
प्राधान्य रहता है।
प्रेमविलास की ये क्रीड़ाएँ हैं- दूतीस्तुति क्रिया, अनुनय (प्रणय),
कलह, प्रेमी के पास जाना, निकट बैठना, विच्छेद और सन्धि । इन छः
प्रेमविलासों के साम्राज्य का विस्तार करके राजा के रूप में श्रीकृष्ण उसका
संचालन करते हैं। कहीं वे युवतियों से कलह करते हैं, कहीं तोते के नख
चुभाते हैं, कभी गोपी-मिलन को जाते हैं तो कभी गोपों के माध्यम से
गोपियों की शरण में जाने के लिए सन्धि करते हैं ।
गोपियों का एक वृन्द श्रीकृष्ण को सम्बोधित करते हुए कहने लगा,
“हे कृष्ण ! तुम्हारा यह कैशोर गुरु बनकर आज सुन्दर युवतियों को सखियों
के द्वारा सुनकर दूतियों के समय अनुनय करने की, रात्रि में पतियों को
धोखा देकर तुमसे निकुंजों में मिलने की, गुरुजनों की बात न सुनने की,
वंशीध्वनि को सुनने के लिए कान लगाए रखने की और प्रेम के सभी रहस्यों
की शिक्षा दे रहा है।"
यद्यपि श्रीकृष्ण ने पांच वर्ष की आयु में भी ऐसे नवयौवन की शक्ति
का प्रकाश किया है, परन्तु योग्य वय से रहित होने के कारण विद्वान्
उसका वर्णन नहीं करते। श्रीकृष्ण के सम्पूर्ण अंग सर्वथा निर्दोष एवं
सुगढ़ थे, यही उनके सौन्दर्य का कारण है। श्रीकृष्ण में प्राप्त अंगों के इस
यथायोग्य सन्निवेश का वर्णन इन शब्दों में है, "हे कंसारि श्रीकृष्ण !
बड़ी बड़ी आँखों वाला तुम्हारा मुख, मरकतमणि के सदृश उन्नत वक्षस्थल,
स्तम्भ जैसे भुजदण्ड तथा क्षीण कटि आदि किस मृगनयनी के चित्त का
हरण नहीं करेंगे?" श्रीकृष्ण के श्रीअंग पर विराजित विभूषणों से श्रीकृष्ण
की शोभा नहीं बढ़ती, बल्कि श्रीकृष्ण की माधुरी से विभूषण ही विभूषित
हो जाते हैं ।
जो कोमल स्पर्श को भी सहन कर सके, उसे मृदु कहते हैं । श्रीकृष्ण
के सभी अंग इतने अतिशय सुकुमार थे कि नवजात पत्ते के स्पर्श से भी
उनका वर्ण बदल जाता । इस कैशोर में श्रीकृष्ण की सम्पूर्ण चेष्टाएँ,
वृन्दावन में रासोत्सव और दुष्टदलन के लिए ही होती थीं। वृन्दावन में
श्रीकृष्ण का गोपियों के साथ क्रीड़ा करते समय कंस उनके वध के हेतु

प्रेम के उद्दीपन [ १८५

अपने साथियों को भेजता और श्रीकृष्ण उन्हें मारकर अपना पराक्रम
प्रकट करते।
श्रीकृष्ण का परिधान एवं माला
सामान्यतः श्रीकृष्ण के विग्रह पर चार प्रकार के परिधान रहते हैं--
कुर्ता, धोती, पगड़ी और दुपट्टा। वृन्दावन में वे सदा रक्तवर्ण दुपट्टा,
पीतवर्ण कुर्ता और सिर पर केसर रंग की पगड़ी धारण करते हैं। नाना
प्रकार की धोती उनकी मधुर मुस्कान से मिल कर सखाओं का आनन्द
बढ़ाती थी। श्रीकृष्ण की इस वेषभूषा को भूयिष्ठ (भ्राजमान्) कहा गया
है। जैसे नाना वर्ण के वस्त्र में गजशिशु शोभित होता है, वैसे ही श्रीकृष्ण
के शरीर के अंगों पर वर्ण-वर्ण के वस्त्र भ्राजमान् थे।
श्रीकृष्ण के केशबन्धन, अंगराग के आलेप, माला, तिलक, चित्र,
पान तथा लीलाकमल को 'आकल्प' कहते हैं। श्रीकृष्ण इस सम्पूर्ण आकल्प
से निरन्तर विभूषित हैं। श्रीकृष्ण के केश-विन्यास के भी बहुत भेद हैं;
कभी वे सिर के मध्य भाग में पुष्प धारण करते हैं तो कभी पृष्ठभाग में।
समय-समय पर उनकी केशराशि के भिन्न-भिन्न शृंगार होते हैं। श्रीकृष्ण
के अंग पर आलिप्त अंगराग सामान्यतः शुभ्र (श्वेत) वर्ण का होता है, पर
केसर के संयोग से पीतवर्ण हो जाता है।
श्रीकृष्ण कण्ठ में वैजयन्ती माला धारण करते हैं। वैजयन्ती में कम
से कम पाँच रंग के फूल गुम्फित रहते हैं। यह सदा श्रीकृष्ण के जानुओं
अथवा चरणों का स्पर्श करती रहती है। इसके अतिरिक्त अन्य अनेक
पुष्पमालाएँ भी उनके सिर, कण्ठ, वक्षस्थल आदि पर शोभित रहती हैं।
अंगराग और सवर्ण चन्दन के बने कलापूर्ण चित्र भी श्रीकृष्ण के विग्रह पर
पाए जाते हैं।
एक गोपी सखी से श्रीकृष्ण की रूप माधुरी का गुणगान कर रही
थी। उनका श्यामल वर्ण, पान की अरुणिमा से शतगुणित हुई शोभा, सिर
पर कुंचित केशराशि, शरीर पर कुंकुम के बिन्दु तथा ललाट पर तिलक—
ये सब परम मनोहारी हैं।
किरीट, कुण्डल, हार, चार परिधान, कड़े, अंगूठी, नूपुर तथा
वेणु—ये सब श्रीकृष्ण के नाना अलंकार हैं। अघासुर के अरि श्रीकृष्ण
अपने अनुपम किरीट, हीरे के कुण्डल, मोतियों के हार, कड़े, कसीदे के
वस्त्रों और सुन्दर अंगूठियों को धारण किए हुए हैं।
श्रीकृष्ण को वनमाली भी कहा जाता है, क्योंकि वे नाना पुष्पों से

१८६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
अपना श्रृंगार करते हैं। श्रीकृष्ण का यह श्रृंगार वृन्दावन में ही नहीं था,
वरन् कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में भी दृष्टिगोचर होता था। इन रंग-बिरंगे वस्त्रों
और पुष्पों से उन्हें विभूषित देखकर ऋषिगण स्तुति करने लगे, "भगवान्
श्रीकृष्ण कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि के लिए नहीं, अपितु अपनी उपस्थिति से
सारे भक्तों पर कृपा करने के लिए जा रहे हैं।"
श्रीकृष्ण की बांसुरी
श्रीकृष्ण की बाँसुरी इतनी अद्भुत है कि उसकी ध्वनि ने परमहंसों
के ध्यान को भंग कर दिया। इस प्रकार अपनी कीर्ति का त्रिभुवन में
विस्तार करके श्रीकृष्ण कामदेव को ललकार रहे थे।
श्रीकृष्ण की बाँसुरी के वेणु, मुरली और वंशी—ये तीन भेद हैं।
वेणु बारह अंगुल लम्बी और छः छिद्रों से युक्त होती है। दो हाथ लम्बी,
मुखछिद्र सहित चार अतिरिक्त स्वरछिद्रों वाली मुरली है। इससे अतिशय
मधुर ध्वनि निःसृत होती है। नौ छिद्रों से युक्त और सत्रह अंगुल लम्बी
वंशी है। श्रीकृष्ण यथासमय इन सब बाँसुरियों का वादन करते हैं।
श्रीकृष्ण की एक महानन्दा अथवा सम्मोहिनी नामक बड़ी वंशी भी
है। उससे भी बड़ी हो तो वह आकर्षिणी कहलाती है। आनन्दिनी आकर्षिणी
से भी विशाल है। यह आनन्दिनी वंशी गोपबालकों की अतिशय प्रिया है।
इसका एक नाम वंसुली भी है। ये वंशियाँ मणिमयी, सुवर्णमयी और बांस
की बनी होती हैं। मणिमयी वंशी संमोहिनी कहलाती है और सुवर्णमयी
आकर्षिणी कही जाती हैं।
श्रीकृष्ण का श्रृंग
श्रीकृष्ण घोष करने के लिए श्रृंग का प्रयोग करते थे। सोने से
मण्डित और मध्य में रत्नजड़ित इस वाद्य के बीच में छिद्र रहता है।
इस सन्दर्भ में तारावली नामक गोपी के सम्बन्ध में श्लेष युक्त वाक्य है,
जिसमें कहा गया है कि श्रीकृष्ण की वंशीरूप परम विषधर सर्प से डसी
तारावली ने उपचार के लिए श्रीकृष्ण के करकमलों में स्थित श्रृंग का
नादरूप दुग्ध पी लिया। परन्तु उससे विष का प्रभाव कम होने के बजाय
हजार गुणा बढ़ गया। इस प्रकार श्रृंग की ध्वनि से उसकी बड़ी
दुर्दशा हुई।
श्रीकृष्ण के पद-नूपुरों का आकर्षण
किसी गोपी ने अपनी सखी से कभी कहा, "हे सखि ! श्रीकृष्ण की

प्रेम के उद्दीपन [ १८७

नूपुर-ध्वनि को सुन कर मैं उनके दर्शन के लिए अधीर हो उठी । पर हाय,
सामने गुरुजन खड़े थे, इसलिए बाहर न जा सकी ।"
श्रीकृष्ण का शंख
श्रीकृष्ण के शंख का नाम पांचजन्य है । इसका भगवद्गीता में भी
उल्लेख है । कुरुक्षेत्र युद्ध से पूर्व श्रीकृष्ण ने इसका वादन किया था । कहा
जाता है कि जब श्रीकृष्ण अपना शंख बजाते हैं तो असुरपत्नियों का
गर्भपात हो जाता है और सुरलोक की स्त्रियों के आनन्द-मंगल का वर्धन
होता है । इस प्रकार शंख का स्वर त्रिभुवन को अभिपूरित करता
रहता है ।
श्रीकृष्ण के चरणचिह्न
श्रीमद्भागवत में उल्लेख है कि जब अक्रूर ने, जो श्रीकृष्ण को रथ
पर वृन्दावन से मथुरा ले गये थे, वृन्दावन की भूमि पर श्रीकृष्ण के चरण-
चिह्न अंकित देखे तो उनके हृदय में प्रेम ऐसा उमड़ा कि रोमांच हो
आया, आंखों से प्रेमाश्रु धारा प्रवाहित होने लगी और इसी भावोन्माद में
वे रथ से कूद कर भूमि पर गिर पड़े और कहने लगे—"ओह ! ओह !
कुछ ऐसा ही उद्गार गोपियों ने भी अभिव्यक्त किया था, जब वे
यमुना तट पर जा रही थीं और बालुका में श्रीकृष्ण के चरणचिह्न दृष्टि-
गोचर हुए। जब श्रीकृष्ण वृन्दावन की भूमि पर चलते तो ध्वज, कुलिश,
अंकुश, कमल आदि चरणचिह्न रेणिका में अंकित हो जाते । इन पर दृष्टि
पड़ते ही गोपियां उन्मत्त हो गयीं ।
श्रीकृष्ण के लीला क्षेत्र
एक भक्त कहता है, "ओह ! असमोर्ध्व सौन्दर्य वाली श्रीकृष्ण की
इस लीला-स्थली के दर्शन तो दूर केवल 'मथुरा' नाम भी कान में पड़ते ही
हमारे मन को आनन्द से विह्वल कर देता है ।"
श्रीकृष्णप्रिया तुलसी
भगवान् श्रीकृष्ण को तुलसीदल और मंजरी प्राणप्रिय हैं। तुलसी
भगवान् के चरणकमलों में चढ़ायी जाती है। अतः उनकी शरण में जाने
का अभिलाषी एक भक्त तुलसीदेवी से प्रार्थना करता है कि वह उसका
सन्देश भगवान् के चरणों तक पहुँचा दे ।

१८८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
श्रीकृष्णभक्त
कभी-कभी किसी भगवद्भक्त को देखकर मन आनन्द से अभिभूत
हो जाता है। जब ध्रुव महाराज ने नारायण के दो पार्षदों को अपने
निकट आते देखा तो वे श्रद्धाभाव से तुरन्त अगवानी के लिए उठे और
हाथ जोड़े उनके आगे खड़े रहे; परन्तु प्रेम-विह्वलता के कारण कुछ स्तुति
नहीं कर सके ।
एक गोपी सुबल से कहती हैं, "हे सुबल ! मैं जानती हूँ कि कृष्ण
तुम्हारे सखा हैं और तुम सदा उनके साथ हास-परिहास का आनन्द लेते
हो। उस दिन मैंने देखा तुम दोनों एक दूसरे के कन्धे पर हाथ रखे हुए
साथ खड़े हो और मुस्करा रहे हो। दूर से ही इस दृश्य को देखकर तुरंत
मेरे नेत्र भर आए ।"
श्रीकृष्ण-स्मरण के विशेष दिन
श्रीकृष्ण की विविध लीलाओं से सम्बन्धित महोत्सवों के अनेक
विवरण हैं। इनमें प्रधान है जन्माष्टमी-श्रीकृष्ण की आविर्भाव तिथि।
यह दिवस भक्त के लिए परम ऐश्वर्यमय होता है। कभी-कभी तो अन्य
मतावलम्बी भी इस मंगलमय दिन का लाभ उठा कर जन्माष्टमी महोत्सव
मनाते हैं। एकादशी आदि अन्य कृष्णवासों पर भी कृष्णप्रेम उद्दीप्त
होता है।

अध्याय २७
प्रेम के लक्षण (अनुभाव)
भक्त के शरीर में प्रकट होकर कृष्णप्रेम को अभिव्यक्त करने वाले
लक्षण अनुभाव कहलाते हैं। अनुभाव ये हैं—नाचना, लोटना, गाना,
चिल्लाना, देह मोड़ना, हुंकार करना, जंभाई लेना, दीर्घ श्वास लेना, लोक
की चिन्ता न करना, लार टपकना, अट्टहास करना, चक्कर आना, हिचकी
आना। जब प्रेम में अद्भुत अतिशयता आ जाती है तो इन शारीरिक
लक्षणों के प्रकट होने से दिव्य आनन्द की अनुभूति होती है।
इन अनुभावों के दो भाग हैं—शीत और क्षेपण। जम्भाई लेना आदि
शीत है तथा नाचना आदि क्षेपण हैं।
नाचना
गोपियों के साथ रासलीला करते हुए भगवान् श्रीकृष्ण के मुखचन्द्र
को निहार कर शिवजी डिण्डिम डमरू बजाते हुए नाचने लगे और गणेशजी
भी उनके साथ सम्मिलित हो गए।
विलुठन
श्रीमद्भागवत (३.१.३२) में विदुर की उद्धव से जिज्ञासा है, "हे
सखे! अक्रूरजी सुखपूर्वक तो हैं न? वे विद्वान् और निर्मलचित्त होने के
साथ ही भगवान् के भक्त भी हैं। मैंने स्वयं देखा है कि कृष्ण के प्रेम में
अधीर होकर वे श्रीकृष्ण के चरणचिह्नों से अंकित भूमि पर लोट गए थे।"
इसी प्रकार किसी गोपी ने श्रीकृष्ण से कहा कि उनकी अभिनव अनुरागवती
राधारानी उनकी वनमाला की सुगन्ध से मत्त होकर विरहवश कठोर भूमि
पर लोट-लोट कर अपने मृदु शरीर का मर्दन कर रही हैं।
उच्च स्वर से गाना
एक गोपी ने श्रीकृष्ण को बताया कि राधाजी उनका गुणगान कर रही

१६० ] भक्तिरसामृतसिन्धु
हैं। उन्होंने सखियों को कुछ इस प्रकार मुग्ध कर लिया है कि वे पाषाणवत्
जड़ हो गयी हैं, जबकि उस प्रेम से पत्थर द्रवीभूत हो चले हैं।
हरेकृष्ण कीर्तन करते-करते नारदजी ऐसे चिल्लाने लगे कि
नृसिंहदेव को प्रकट हुआ समझकर दानवदल भयवश तुरन्त सब दिशाओं
में भाग खड़े हुए।
देह मोड़ना
उल्लेख है कि कभी-कभी जब वीणाधारी नारदजी तीव्र भावावेश
में श्रीकृष्ण का स्मरण करते हैं तो उनका शरीर कुछ इतने वेग से मोड़
खाता है कि यज्ञोपवीत खण्डित हो जाता है।
चिल्लाना
एक गोपी ने श्रीकृष्ण से कहा, "हे व्रजराजकुमार ! तुम्हारी मुरली-
ध्वनि को सुनकर व्याकुल हुई सुन्दरी राधा रुद्ध कण्ठ से कुररी के समान
चिल्ला रही है।"
हुंकार करना
श्रीकृष्ण की वंशीध्वनि को सुनकर चकित हुए शंकरजी आकाश में
हुंकारने लगे जिससे दानवों का विनाश हो गया और भक्तों के हृदय में
आनन्दसिन्धु उमड़ आया।
जंभाई लेना
चन्द्रोदय होने पर कुमुद प्रस्फुटित होते हैं। इसी प्रकार जब श्रीकृष्ण
राधारानी के सामने आते हैं तो राधा का मुखरूप कमल जंभाई के रूप में
विकास को प्राप्त होता है।
दीर्घ श्वास लेना
एक श्लोक में उल्लेख है, "ललिता उस चातकी जैसी है जो केवल
मेघजल को ग्रहण करती है।" यहाँ श्रीकृष्ण को श्याम मेघ की उपमा दी
गई है और ललिता को उस चातकी के समान बताया है जो केवल कृष्ण-
मेघ के संग के लिए उत्कण्ठित है। अलंकार में आगे कहा है, "झंझावात
से मेघ के तिरोहित हो जाने के समान वह अपने दीर्घ विश्वास के कारण
श्रीकृष्ण को खो बैठी, जो उसके फिर सचेत होने तक अदृश्य हो गए।"

प्रेम के लक्षण (अनुभाव) [ १६१
अन्य लोगों की चिन्ता न करना
मथुरा के याज्ञिक ब्राह्मणों की पत्नियों ने जैसे ही सुना कि श्रीकृष्ण
निकट आए हैं, वे तुरन्त घर छोड़कर वहाँ चल पड़ीं। उन्होंने अपने विद्वान्
पतियों की ओर ध्यान नहीं दिया। पति आपस में कहने लगे, “श्रीकृष्ण
की रति में कैसा अद्भुत आकर्षण है जो ये स्त्रियाँ हमारी आज्ञा के बिना
ही श्रीकृष्ण के पास चली गयीं।” यह श्रीकृष्ण का प्रभाव है। श्रीकृष्ण की
ओर आकृष्ट भाग्यवान् जन्म-मृत्यु के बन्धन से मुक्त हो जाता है, जो उन
यज्ञपत्नियों द्वारा परित्यक्त बन्द घरों जैसा है।
पद्यावली में कोई भक्त कहता है, “हमें संसार के लोगों की चिन्ता
नहीं है। यदि वे हमारी निन्दा करते हैं तो किया करें। हम तो बस
हरेकृष्ण महामन्त्र के कीर्तनरूपी दिव्यरस का पान करेंगे और भूमि पर
लोटते हुए भावोन्मत्त नृत्य करेंगे। हमें परमानन्द सुलभ हो गया है।”
लार टपकाना
कभी-कभी हरेकृष्ण महामन्त्र जपते हुए नारदजी कुछ क्षण के लिए
सर्वथा निश्चेत हो जाते हैं और उनके मुख से लार टपकने लगती है।
उन्मत्त के समान अट्टहास करना
जब कोई भक्त पागल जैसा अट्टहास करता है, तो ऐसा हृदय में
प्रेम के विलक्षण विक्षेप के कारण होता है। अट्टहास हृदय की एक विशिष्ट
अवस्था को प्रकट करता है। इस मनोभाव से भक्त का प्रेम अधरों पर
फूट पड़ता है। लगता है कि हृदय में भक्तिलता खिल उठी है जिस कारण
मुख से अट्टहास रूपी पुष्पों का समुदाय बार-बार बिखर रहा है। चैतन्य
चरितामृत के अनुसार भक्ति वह लता है जो गोलोक वृन्दावन में श्रीकृष्ण
के चरणकमल तक बढ़ती है।
चक्कर आना
गोपी कहती है, “हे सखि मुरलि ! लगता है अधारि तुम्हारे भीतर
फूँक मारने के व्याज से आंधी का प्रवेश करा देते हैं, जो तुम्हारे सिर को
घुमाता है और अब कमलनयना गोपियों की भी वही दशा कर रहा है।”
हिचकी आना
कभी-कभी हिचकी भी कृष्णप्रेम का अनुभाव बन जाती है। इसके

१६२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
प्रमाण में पौर्णमासी राधा की एक सखी से कहती है, "हे पुत्रि ! प्रिय
सखी राधारानी के हिक्कार के लिए औषधि रचने की आवश्यकता नहीं है
और उसके अनिष्ट की आशंका भी व्यर्थ है। हे मृगनयनी ! तुम चिल्लाती
क्यों हो ? इसका कारण अपच नहीं है; यह तो कृष्णप्रेम का ही विकार
है। इसीलिए कृष्णनाम के साथ हिचकी पर हिचकी हो रही है।"
पौर्णमासी का यह वाक्य इस बात का प्रमाण है कि कृष्णप्रेम कभी-कभी
हिक्कार के रूप में भी अभिव्यक्त होता है।
कदाचित् सम्पूर्ण शरीर का कंपित होना या फूल जाना तथा किसी
अंग से रक्त निकलना आदि अनुभाव भी होते हैं। परन्तु ये अतीव दुर्लभ
हैं; इसलिए श्रील रूप गोस्वामी ने इनका अधिक वर्णन नहीं किया है।

अध्याय २८
सात्त्विक भाव
श्रीकृष्ण सम्बन्धी भावों से साक्षात् रूप में अथवा थोड़े व्यवधान
से अभिभूत हुए चित्त को मनीषीजन 'सत्त्व' कहते हैं। ऐसे सात्त्विक
भाव से उत्पन्न होने वाले लक्षण तीन प्रकार के होते हैं—स्निग्ध, दिग्घ
तथा रुक्ष।
स्निग्ध सात्त्विक भाव के मुख्य और गौण दो भेद हैं। राधारानी
कुन्द पुष्पों की माला गूंथ रही थीं। उसी समय श्रीकृष्ण की वंशी बज उठी
और उसे सुनते ही उन्होंने तुरन्त अपना कार्य बन्द कर दिया। यह मुख्य
स्निग्ध सात्त्विक भाव का उदाहरण है। गौण स्निग्ध सात्त्विक भाव का
वर्णन इस प्रकार है, "अपने नेत्ररूप चातक के लिए मेघ के समान श्रीकृष्ण
को मथुरा जाते देखकर यशोदा क्रोधवश लाल-लाल मुख से मथुरानरेश
पर चिल्लाने लगी।"
दिग्ध सात्त्विक भाव के तीन भेद हैं, जिन का एक उदाहरण इस
प्रकार है—"रात्रि में स्वप्न में पूतना को अपने प्रांगण में पड़ा देखकर
यशोदा को कम्प हो आया और वे तुरन्त अपने लाल कृष्ण को खोजने
लगीं।"
जब भाव के लक्षण अभक्त के शरीर पर प्रकट होते हैं तो उन्हें रुक्ष
कहा जाता है। अभक्त वस्तुतः विषयी होते हैं, परन्तु किसी शुद्धभक्त के
संग से उनमें भी कभी भाव के लक्षण अभिव्यक्त हो सकते हैं। भक्ति के
विद्वान् इन्हें रुक्ष सात्त्विक भाव कहते हैं।
सात्त्विक भाव के आठ लक्षण हैं : स्तम्भ, स्वेद, रोमांच, स्वरभेद,
कम्पन, विवर्णता, अश्रुधारा, तथा प्रलय।
श्रील रूप गोस्वामी ने इन भावों का वैज्ञानिक विवरण दिया है।
जब प्राण पृथ्वी में स्थिर हो जाता है तो स्तम्भ को उत्पन्न करता है, जल
के संसर्ग में आने पर अश्रु, अग्नि के संग में स्वेद और वैवर्ण्य को तथा

१६४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
आकाश में आश्रित प्राण मूर्च्छा उत्पन्न करता है। जब प्राण स्वयं अपने में
स्थिर होता है तो तीव्रता के भेद से क्रमशः कम्प, स्वरभेद और रोमांच को
जन्म देता है।
ये सात्त्विक भाव कभी बाह्य रूप से प्रकट होते हैं तो कभी अन्तर
में ही रहते हैं। शुद्धभक्त इन सब भावों का हृदय में निरन्तर अनुभव
करता है; परन्तु बहिर्मुख मनुष्यों के सामने उन्हें प्रायः बाहर प्रकट नहीं
होने देता ।
स्तम्भ
स्तम्भ की उत्पत्ति हर्ष, भय, आश्चर्य, शोक तथा क्रोध से होती
है। वाणी का अभाव, निश्चलता, शून्यता तथा परम विरह का भाव इसके
लक्षण हैं।
श्रीकृष्ण की लीलाओं का वर्णन करते हुए उद्धवजी विदुर से कहने
लगे, “एक दिन श्रीकृष्ण ने मालिन का श्रृंगार किया और उद्यान में प्रवेश
कर गोपियों को हास-परिहास से आनन्दित किया। गोपियाँ स्तब्ध हो
उठीं। फिर श्रीकृष्ण को जाते हुए गोपियाँ इस भाव से देख रही थीं मानो
उनके चित्त और नेत्र श्रीकृष्ण का अनुगमन कर रहे हों।” इन लक्षणों से
यद्यपि गोपियाँ तृप्त नहीं हुई थीं, वे प्रेम से स्तब्ध हो गई । यह हर्ष-जनित
स्तम्भता का दृष्टान्त है।
भय के कारण स्तम्भ का उदाहरण इस प्रकार है। जब श्रीकृष्ण
कंस के यज्ञमण्डप में पर्वत के समान मल्लों से घिरे हुए थे तो माता देवकी
स्तम्भित हो गई, उनके दोनों नेत्र आकुल हो उठे।”
ब्रह्मा को आश्चर्य से स्तम्भ हुआ था। श्रीमद्भागवत (१०.१३.५६)
के अनुसार अपने द्वारा चुराए गो-गोपबालकों को पुनः श्रीकृष्ण के पास
देखकर जब ब्रह्मा ने जाना कि ये गोपकुमार और कोई नहीं, साक्षात्
भगवान् है तो आश्चर्यवश उनकी सारी इन्द्रियाँ स्तम्भित हो गई। वे
स्वर्णमयी चतुर्भुज मूर्ति के समान खड़े के खड़े रह गए। श्रीकृष्ण को
अपने वाम कर से गोवर्धन पर्वत को धारण किए देखकर व्रजवासी भी
स्तब्ध हुए थे।
जिस समय श्रीकृष्ण ने बकासुर के उदर में प्रवेश किया, उस समय
सारे देवता शोक से स्तब्ध रह गए थे। क्रोध के कारण कुछ ऐसा ही अर्जुन
के साथ भी हुआ, अब उसने देखा कि अश्वत्थामा श्रीकृष्ण पर ब्रह्मास्त्र
चलाने जा रहा है।

सात्त्विक भाव [ १६५
स्वेद
हर्ष से उत्पन्न स्वेद का उदाहरण श्रीमद्भागवत में है। एक गोपी
अपनी सखी राधारानी से कहती है, "हे राधे ! धूप की निन्दा करके अपनी
चतुराई क्यों दिखा रही हो। श्रीकृष्ण को देखकर काम-पीड़ित होकर
पसीने-पसीने हो रही हो, यह तो मैं जान ही गई हूँ।"
श्रीकृष्ण के सेवक रक्तक में भय से स्वेदस्राव हुआ था। एक दिन
श्रीकृष्ण ने राधारानी के पति अभिमन्यु का वेष धारण किया। अभिमन्यु
को श्रीकृष्ण से राधा का प्रणय रुचिकर न था। इसलिए रक्तक ने श्रीकृष्ण
को उस रूप में देखा तो वह भी प्रेम से उन्हें अभिमन्यु समझ बैठा; अतः
उन्हें फटकारने लगा। फिर जैसे ही उनसे पहचाना कि यह तो अभिमन्यु
के वेष में श्रीकृष्ण ही हैं, तो पसीने-पसीने हो गया। यह स्वेद भयजन्य था।
क्रोध के कारण स्वेद की उत्पत्ति विष्णुवाहन गरुड में हुई है। जिस
समय इन्द्र वृन्दावन पर मूसलाधार वर्षा कर रहा था, गरुड़जी इस दृश्य
को मेघों के ऊपर से देख रहे थे और क्रोध के कारण उनके शरीर से स्वेद
बहने लगा।
रोमांच
श्रीकृष्ण के मुख में त्रिलोकी को देखकर माता यशोदा को रोमांच हो
आया। उन्होंने श्रीकृष्ण से मुख खोलने को कहा था यह देखने के लिए कि
उन्होंने मृद-भक्षण किया है या नहीं। परन्तु जब श्रीकृष्ण ने मुख खोला तो
उन्हें सम्पूर्ण पृथ्वी के साथ अन्य लोक भी कृष्ण के मुख में दृष्टिगोचर हुए।
इससे वे रोमांचित हो गईं।
हर्ष से होने वाले रोमांच का वर्णन गोपियों के रासविलास के
सम्बन्ध में श्रीमद्भागवत (१०.३०.१०) में है। इस रास में श्रीकृष्ण
अकस्मात् अन्तर्हित हो गये और गोपियों सहित राधारानी उन्हें ढूँढने
लगीं। वे पृथ्वी से बोलीं, "हे धरा ! तुमने कितना तप किया होगा जो
तुम्हें श्रीकृष्ण के चरणकमलों का निरन्तर स्पर्श प्राप्त रहता है। अवश्य
ही आनन्द से पुलकित होकर इस वनस्पतिरूप रोमांच से शोभित हो रही
हो। तुममें प्रेम के ये लक्षण प्रथम कब विकसित हुए ? तुम्हारा यह आनन्द
महोत्सव वामनावतार के स्पर्श से प्रारम्भ हुआ है अथवा भगवान् वराह ने
जब तुम्हारा उद्धार किया था, तब से ?"
श्रीकृष्ण कभी-कभी गोपबालकों के साथ बनावटी युद्ध का आयोजन
किया करते थे। ऐसे समय जब वे अपना श्रृंग बजाते तो विरोधी पक्ष के