सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 217, कुल 380 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 217

१६० ] भक्तिरसामृतसिन्धु
हैं। उन्होंने सखियों को कुछ इस प्रकार मुग्ध कर लिया है कि वे पाषाणवत्
जड़ हो गयी हैं, जबकि उस प्रेम से पत्थर द्रवीभूत हो चले हैं।
हरेकृष्ण कीर्तन करते-करते नारदजी ऐसे चिल्लाने लगे कि
नृसिंहदेव को प्रकट हुआ समझकर दानवदल भयवश तुरन्त सब दिशाओं
में भाग खड़े हुए।
देह मोड़ना
उल्लेख है कि कभी-कभी जब वीणाधारी नारदजी तीव्र भावावेश
में श्रीकृष्ण का स्मरण करते हैं तो उनका शरीर कुछ इतने वेग से मोड़
खाता है कि यज्ञोपवीत खण्डित हो जाता है।
चिल्लाना
एक गोपी ने श्रीकृष्ण से कहा, "हे व्रजराजकुमार ! तुम्हारी मुरली-
ध्वनि को सुनकर व्याकुल हुई सुन्दरी राधा रुद्ध कण्ठ से कुररी के समान
चिल्ला रही है।"
हुंकार करना
श्रीकृष्ण की वंशीध्वनि को सुनकर चकित हुए शंकरजी आकाश में
हुंकारने लगे जिससे दानवों का विनाश हो गया और भक्तों के हृदय में
आनन्दसिन्धु उमड़ आया।
जंभाई लेना
चन्द्रोदय होने पर कुमुद प्रस्फुटित होते हैं। इसी प्रकार जब श्रीकृष्ण
राधारानी के सामने आते हैं तो राधा का मुखरूप कमल जंभाई के रूप में
विकास को प्राप्त होता है।
दीर्घ श्वास लेना
एक श्लोक में उल्लेख है, "ललिता उस चातकी जैसी है जो केवल
मेघजल को ग्रहण करती है।" यहाँ श्रीकृष्ण को श्याम मेघ की उपमा दी
गई है और ललिता को उस चातकी के समान बताया है जो केवल कृष्ण-
मेघ के संग के लिए उत्कण्ठित है। अलंकार में आगे कहा है, "झंझावात
से मेघ के तिरोहित हो जाने के समान वह अपने दीर्घ विश्वास के कारण
श्रीकृष्ण को खो बैठी, जो उसके फिर सचेत होने तक अदृश्य हो गए।"