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सर्वकोश
भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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पृष्ठ 206

श्रीकृष्णभक्त [ १७६
कर्म पूर्ण रूप से लोकोत्तर (दिव्य) है। इसी प्रकार भगवद्भक्तों के जन्म-
कर्म भी दिव्य होते हैं। जैसे अपने को श्रीकृष्ण से एक समझना अपराध
है, वैसे ही नन्द-यशोदा आदि पार्षदों से अपना अभेद मानना भी अपराध
है। हमें स्मरण रखना चाहिए कि ये नित्यसिद्ध लोकोत्तर जीव हैं, जो
कभी बद्ध नहीं होते।
शास्त्र में उल्लेख है कि कंसारि श्रीकृष्ण में चौसठ दिव्य गुण हैं और
श्रीकृष्ण के पार्षद नित्यसिद्धों में भी पहले पचपन गुण निश्चित रूप से
रहते हैं। ये भक्त भगवान् से शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य तथा माधुर्य इन
पाँच भिन्न-भिन्न रसों में सम्बन्ध रखते हैं। श्रीकृष्ण से ये सम्बन्ध नित्य
हैं, इसलिए नित्यसिद्ध भक्त को वैधीभक्ति के अनुष्ठान से संसिद्धि के
लिए साधन नहीं करना पड़ता। वे नित्य श्रीकृष्ण की सेवा करने के
योग्य हैं।