भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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नूपुर-ध्वनि को सुन कर मैं उनके दर्शन के लिए अधीर हो उठी । पर हाय,
सामने गुरुजन खड़े थे, इसलिए बाहर न जा सकी ।"
श्रीकृष्ण का शंख
श्रीकृष्ण के शंख का नाम पांचजन्य है । इसका भगवद्गीता में भी
उल्लेख है । कुरुक्षेत्र युद्ध से पूर्व श्रीकृष्ण ने इसका वादन किया था । कहा
जाता है कि जब श्रीकृष्ण अपना शंख बजाते हैं तो असुरपत्नियों का
गर्भपात हो जाता है और सुरलोक की स्त्रियों के आनन्द-मंगल का वर्धन
होता है । इस प्रकार शंख का स्वर त्रिभुवन को अभिपूरित करता
रहता है ।
श्रीकृष्ण के चरणचिह्न
श्रीमद्भागवत में उल्लेख है कि जब अक्रूर ने, जो श्रीकृष्ण को रथ
पर वृन्दावन से मथुरा ले गये थे, वृन्दावन की भूमि पर श्रीकृष्ण के चरण-
चिह्न अंकित देखे तो उनके हृदय में प्रेम ऐसा उमड़ा कि रोमांच हो
आया, आंखों से प्रेमाश्रु धारा प्रवाहित होने लगी और इसी भावोन्माद में
वे रथ से कूद कर भूमि पर गिर पड़े और कहने लगे—"ओह ! ओह !
कुछ ऐसा ही उद्गार गोपियों ने भी अभिव्यक्त किया था, जब वे
यमुना तट पर जा रही थीं और बालुका में श्रीकृष्ण के चरणचिह्न दृष्टि-
गोचर हुए। जब श्रीकृष्ण वृन्दावन की भूमि पर चलते तो ध्वज, कुलिश,
अंकुश, कमल आदि चरणचिह्न रेणिका में अंकित हो जाते । इन पर दृष्टि
पड़ते ही गोपियां उन्मत्त हो गयीं ।
श्रीकृष्ण के लीला क्षेत्र
एक भक्त कहता है, "ओह ! असमोर्ध्व सौन्दर्य वाली श्रीकृष्ण की
इस लीला-स्थली के दर्शन तो दूर केवल 'मथुरा' नाम भी कान में पड़ते ही
हमारे मन को आनन्द से विह्वल कर देता है ।"
श्रीकृष्णप्रिया तुलसी
भगवान् श्रीकृष्ण को तुलसीदल और मंजरी प्राणप्रिय हैं। तुलसी
भगवान् के चरणकमलों में चढ़ायी जाती है। अतः उनकी शरण में जाने
का अभिलाषी एक भक्त तुलसीदेवी से प्रार्थना करता है कि वह उसका
सन्देश भगवान् के चरणों तक पहुँचा दे ।