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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

३. पश्चिम विभाग: मुख्य भक्ति रस (शान्त, प्रीति, सख्य, वात्सल्य, मधुर)

१८४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
तारुण्य इतना मधुर हो चला है कि मानो परमोच्च कलाविलास हो ।
सुन्दर मयूरों के समान नाचते हुए उनके नेत्रों ने कुशल नर्तकों की शोभा
का भी अपहरण कर लिया है। अतः श्रीकृष्ण की माधुरी सर्वथा अनुपम
है।" इसीलिए विद्वान् इस समय उनके शरीरवय को नवयौवन कहते
हैं। इस अवस्था में गोपियों के साथ रास आदि लीलाओं का अतिशय
प्राधान्य रहता है।
प्रेमविलास की ये क्रीड़ाएँ हैं- दूतीस्तुति क्रिया, अनुनय (प्रणय),
कलह, प्रेमी के पास जाना, निकट बैठना, विच्छेद और सन्धि । इन छः
प्रेमविलासों के साम्राज्य का विस्तार करके राजा के रूप में श्रीकृष्ण उसका
संचालन करते हैं। कहीं वे युवतियों से कलह करते हैं, कहीं तोते के नख
चुभाते हैं, कभी गोपी-मिलन को जाते हैं तो कभी गोपों के माध्यम से
गोपियों की शरण में जाने के लिए सन्धि करते हैं ।
गोपियों का एक वृन्द श्रीकृष्ण को सम्बोधित करते हुए कहने लगा,
“हे कृष्ण ! तुम्हारा यह कैशोर गुरु बनकर आज सुन्दर युवतियों को सखियों
के द्वारा सुनकर दूतियों के समय अनुनय करने की, रात्रि में पतियों को
धोखा देकर तुमसे निकुंजों में मिलने की, गुरुजनों की बात न सुनने की,
वंशीध्वनि को सुनने के लिए कान लगाए रखने की और प्रेम के सभी रहस्यों
की शिक्षा दे रहा है।"
यद्यपि श्रीकृष्ण ने पांच वर्ष की आयु में भी ऐसे नवयौवन की शक्ति
का प्रकाश किया है, परन्तु योग्य वय से रहित होने के कारण विद्वान्
उसका वर्णन नहीं करते। श्रीकृष्ण के सम्पूर्ण अंग सर्वथा निर्दोष एवं
सुगढ़ थे, यही उनके सौन्दर्य का कारण है। श्रीकृष्ण में प्राप्त अंगों के इस
यथायोग्य सन्निवेश का वर्णन इन शब्दों में है, "हे कंसारि श्रीकृष्ण !
बड़ी बड़ी आँखों वाला तुम्हारा मुख, मरकतमणि के सदृश उन्नत वक्षस्थल,
स्तम्भ जैसे भुजदण्ड तथा क्षीण कटि आदि किस मृगनयनी के चित्त का
हरण नहीं करेंगे?" श्रीकृष्ण के श्रीअंग पर विराजित विभूषणों से श्रीकृष्ण
की शोभा नहीं बढ़ती, बल्कि श्रीकृष्ण की माधुरी से विभूषण ही विभूषित
हो जाते हैं ।
जो कोमल स्पर्श को भी सहन कर सके, उसे मृदु कहते हैं । श्रीकृष्ण
के सभी अंग इतने अतिशय सुकुमार थे कि नवजात पत्ते के स्पर्श से भी
उनका वर्ण बदल जाता । इस कैशोर में श्रीकृष्ण की सम्पूर्ण चेष्टाएँ,
वृन्दावन में रासोत्सव और दुष्टदलन के लिए ही होती थीं। वृन्दावन में
श्रीकृष्ण का गोपियों के साथ क्रीड़ा करते समय कंस उनके वध के हेतु

प्रेम के उद्दीपन [ १८५

अपने साथियों को भेजता और श्रीकृष्ण उन्हें मारकर अपना पराक्रम
प्रकट करते।
श्रीकृष्ण का परिधान एवं माला
सामान्यतः श्रीकृष्ण के विग्रह पर चार प्रकार के परिधान रहते हैं--
कुर्ता, धोती, पगड़ी और दुपट्टा। वृन्दावन में वे सदा रक्तवर्ण दुपट्टा,
पीतवर्ण कुर्ता और सिर पर केसर रंग की पगड़ी धारण करते हैं। नाना
प्रकार की धोती उनकी मधुर मुस्कान से मिल कर सखाओं का आनन्द
बढ़ाती थी। श्रीकृष्ण की इस वेषभूषा को भूयिष्ठ (भ्राजमान्) कहा गया
है। जैसे नाना वर्ण के वस्त्र में गजशिशु शोभित होता है, वैसे ही श्रीकृष्ण
के शरीर के अंगों पर वर्ण-वर्ण के वस्त्र भ्राजमान् थे।
श्रीकृष्ण के केशबन्धन, अंगराग के आलेप, माला, तिलक, चित्र,
पान तथा लीलाकमल को 'आकल्प' कहते हैं। श्रीकृष्ण इस सम्पूर्ण आकल्प
से निरन्तर विभूषित हैं। श्रीकृष्ण के केश-विन्यास के भी बहुत भेद हैं;
कभी वे सिर के मध्य भाग में पुष्प धारण करते हैं तो कभी पृष्ठभाग में।
समय-समय पर उनकी केशराशि के भिन्न-भिन्न शृंगार होते हैं। श्रीकृष्ण
के अंग पर आलिप्त अंगराग सामान्यतः शुभ्र (श्वेत) वर्ण का होता है, पर
केसर के संयोग से पीतवर्ण हो जाता है।
श्रीकृष्ण कण्ठ में वैजयन्ती माला धारण करते हैं। वैजयन्ती में कम
से कम पाँच रंग के फूल गुम्फित रहते हैं। यह सदा श्रीकृष्ण के जानुओं
अथवा चरणों का स्पर्श करती रहती है। इसके अतिरिक्त अन्य अनेक
पुष्पमालाएँ भी उनके सिर, कण्ठ, वक्षस्थल आदि पर शोभित रहती हैं।
अंगराग और सवर्ण चन्दन के बने कलापूर्ण चित्र भी श्रीकृष्ण के विग्रह पर
पाए जाते हैं।
एक गोपी सखी से श्रीकृष्ण की रूप माधुरी का गुणगान कर रही
थी। उनका श्यामल वर्ण, पान की अरुणिमा से शतगुणित हुई शोभा, सिर
पर कुंचित केशराशि, शरीर पर कुंकुम के बिन्दु तथा ललाट पर तिलक—
ये सब परम मनोहारी हैं।
किरीट, कुण्डल, हार, चार परिधान, कड़े, अंगूठी, नूपुर तथा
वेणु—ये सब श्रीकृष्ण के नाना अलंकार हैं। अघासुर के अरि श्रीकृष्ण
अपने अनुपम किरीट, हीरे के कुण्डल, मोतियों के हार, कड़े, कसीदे के
वस्त्रों और सुन्दर अंगूठियों को धारण किए हुए हैं।
श्रीकृष्ण को वनमाली भी कहा जाता है, क्योंकि वे नाना पुष्पों से

१८६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
अपना श्रृंगार करते हैं। श्रीकृष्ण का यह श्रृंगार वृन्दावन में ही नहीं था,
वरन् कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में भी दृष्टिगोचर होता था। इन रंग-बिरंगे वस्त्रों
और पुष्पों से उन्हें विभूषित देखकर ऋषिगण स्तुति करने लगे, "भगवान्
श्रीकृष्ण कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि के लिए नहीं, अपितु अपनी उपस्थिति से
सारे भक्तों पर कृपा करने के लिए जा रहे हैं।"
श्रीकृष्ण की बांसुरी
श्रीकृष्ण की बाँसुरी इतनी अद्भुत है कि उसकी ध्वनि ने परमहंसों
के ध्यान को भंग कर दिया। इस प्रकार अपनी कीर्ति का त्रिभुवन में
विस्तार करके श्रीकृष्ण कामदेव को ललकार रहे थे।
श्रीकृष्ण की बाँसुरी के वेणु, मुरली और वंशी—ये तीन भेद हैं।
वेणु बारह अंगुल लम्बी और छः छिद्रों से युक्त होती है। दो हाथ लम्बी,
मुखछिद्र सहित चार अतिरिक्त स्वरछिद्रों वाली मुरली है। इससे अतिशय
मधुर ध्वनि निःसृत होती है। नौ छिद्रों से युक्त और सत्रह अंगुल लम्बी
वंशी है। श्रीकृष्ण यथासमय इन सब बाँसुरियों का वादन करते हैं।
श्रीकृष्ण की एक महानन्दा अथवा सम्मोहिनी नामक बड़ी वंशी भी
है। उससे भी बड़ी हो तो वह आकर्षिणी कहलाती है। आनन्दिनी आकर्षिणी
से भी विशाल है। यह आनन्दिनी वंशी गोपबालकों की अतिशय प्रिया है।
इसका एक नाम वंसुली भी है। ये वंशियाँ मणिमयी, सुवर्णमयी और बांस
की बनी होती हैं। मणिमयी वंशी संमोहिनी कहलाती है और सुवर्णमयी
आकर्षिणी कही जाती हैं।
श्रीकृष्ण का श्रृंग
श्रीकृष्ण घोष करने के लिए श्रृंग का प्रयोग करते थे। सोने से
मण्डित और मध्य में रत्नजड़ित इस वाद्य के बीच में छिद्र रहता है।
इस सन्दर्भ में तारावली नामक गोपी के सम्बन्ध में श्लेष युक्त वाक्य है,
जिसमें कहा गया है कि श्रीकृष्ण की वंशीरूप परम विषधर सर्प से डसी
तारावली ने उपचार के लिए श्रीकृष्ण के करकमलों में स्थित श्रृंग का
नादरूप दुग्ध पी लिया। परन्तु उससे विष का प्रभाव कम होने के बजाय
हजार गुणा बढ़ गया। इस प्रकार श्रृंग की ध्वनि से उसकी बड़ी
दुर्दशा हुई।
श्रीकृष्ण के पद-नूपुरों का आकर्षण
किसी गोपी ने अपनी सखी से कभी कहा, "हे सखि ! श्रीकृष्ण की

प्रेम के उद्दीपन [ १८७

नूपुर-ध्वनि को सुन कर मैं उनके दर्शन के लिए अधीर हो उठी । पर हाय,
सामने गुरुजन खड़े थे, इसलिए बाहर न जा सकी ।"
श्रीकृष्ण का शंख
श्रीकृष्ण के शंख का नाम पांचजन्य है । इसका भगवद्गीता में भी
उल्लेख है । कुरुक्षेत्र युद्ध से पूर्व श्रीकृष्ण ने इसका वादन किया था । कहा
जाता है कि जब श्रीकृष्ण अपना शंख बजाते हैं तो असुरपत्नियों का
गर्भपात हो जाता है और सुरलोक की स्त्रियों के आनन्द-मंगल का वर्धन
होता है । इस प्रकार शंख का स्वर त्रिभुवन को अभिपूरित करता
रहता है ।
श्रीकृष्ण के चरणचिह्न
श्रीमद्भागवत में उल्लेख है कि जब अक्रूर ने, जो श्रीकृष्ण को रथ
पर वृन्दावन से मथुरा ले गये थे, वृन्दावन की भूमि पर श्रीकृष्ण के चरण-
चिह्न अंकित देखे तो उनके हृदय में प्रेम ऐसा उमड़ा कि रोमांच हो
आया, आंखों से प्रेमाश्रु धारा प्रवाहित होने लगी और इसी भावोन्माद में
वे रथ से कूद कर भूमि पर गिर पड़े और कहने लगे—"ओह ! ओह !
कुछ ऐसा ही उद्गार गोपियों ने भी अभिव्यक्त किया था, जब वे
यमुना तट पर जा रही थीं और बालुका में श्रीकृष्ण के चरणचिह्न दृष्टि-
गोचर हुए। जब श्रीकृष्ण वृन्दावन की भूमि पर चलते तो ध्वज, कुलिश,
अंकुश, कमल आदि चरणचिह्न रेणिका में अंकित हो जाते । इन पर दृष्टि
पड़ते ही गोपियां उन्मत्त हो गयीं ।
श्रीकृष्ण के लीला क्षेत्र
एक भक्त कहता है, "ओह ! असमोर्ध्व सौन्दर्य वाली श्रीकृष्ण की
इस लीला-स्थली के दर्शन तो दूर केवल 'मथुरा' नाम भी कान में पड़ते ही
हमारे मन को आनन्द से विह्वल कर देता है ।"
श्रीकृष्णप्रिया तुलसी
भगवान् श्रीकृष्ण को तुलसीदल और मंजरी प्राणप्रिय हैं। तुलसी
भगवान् के चरणकमलों में चढ़ायी जाती है। अतः उनकी शरण में जाने
का अभिलाषी एक भक्त तुलसीदेवी से प्रार्थना करता है कि वह उसका
सन्देश भगवान् के चरणों तक पहुँचा दे ।

१८८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
श्रीकृष्णभक्त
कभी-कभी किसी भगवद्भक्त को देखकर मन आनन्द से अभिभूत
हो जाता है। जब ध्रुव महाराज ने नारायण के दो पार्षदों को अपने
निकट आते देखा तो वे श्रद्धाभाव से तुरन्त अगवानी के लिए उठे और
हाथ जोड़े उनके आगे खड़े रहे; परन्तु प्रेम-विह्वलता के कारण कुछ स्तुति
नहीं कर सके ।
एक गोपी सुबल से कहती हैं, "हे सुबल ! मैं जानती हूँ कि कृष्ण
तुम्हारे सखा हैं और तुम सदा उनके साथ हास-परिहास का आनन्द लेते
हो। उस दिन मैंने देखा तुम दोनों एक दूसरे के कन्धे पर हाथ रखे हुए
साथ खड़े हो और मुस्करा रहे हो। दूर से ही इस दृश्य को देखकर तुरंत
मेरे नेत्र भर आए ।"
श्रीकृष्ण-स्मरण के विशेष दिन
श्रीकृष्ण की विविध लीलाओं से सम्बन्धित महोत्सवों के अनेक
विवरण हैं। इनमें प्रधान है जन्माष्टमी-श्रीकृष्ण की आविर्भाव तिथि।
यह दिवस भक्त के लिए परम ऐश्वर्यमय होता है। कभी-कभी तो अन्य
मतावलम्बी भी इस मंगलमय दिन का लाभ उठा कर जन्माष्टमी महोत्सव
मनाते हैं। एकादशी आदि अन्य कृष्णवासों पर भी कृष्णप्रेम उद्दीप्त
होता है।

अध्याय २७
प्रेम के लक्षण (अनुभाव)
भक्त के शरीर में प्रकट होकर कृष्णप्रेम को अभिव्यक्त करने वाले
लक्षण अनुभाव कहलाते हैं। अनुभाव ये हैं—नाचना, लोटना, गाना,
चिल्लाना, देह मोड़ना, हुंकार करना, जंभाई लेना, दीर्घ श्वास लेना, लोक
की चिन्ता न करना, लार टपकना, अट्टहास करना, चक्कर आना, हिचकी
आना। जब प्रेम में अद्भुत अतिशयता आ जाती है तो इन शारीरिक
लक्षणों के प्रकट होने से दिव्य आनन्द की अनुभूति होती है।
इन अनुभावों के दो भाग हैं—शीत और क्षेपण। जम्भाई लेना आदि
शीत है तथा नाचना आदि क्षेपण हैं।
नाचना
गोपियों के साथ रासलीला करते हुए भगवान् श्रीकृष्ण के मुखचन्द्र
को निहार कर शिवजी डिण्डिम डमरू बजाते हुए नाचने लगे और गणेशजी
भी उनके साथ सम्मिलित हो गए।
विलुठन
श्रीमद्भागवत (३.१.३२) में विदुर की उद्धव से जिज्ञासा है, "हे
सखे! अक्रूरजी सुखपूर्वक तो हैं न? वे विद्वान् और निर्मलचित्त होने के
साथ ही भगवान् के भक्त भी हैं। मैंने स्वयं देखा है कि कृष्ण के प्रेम में
अधीर होकर वे श्रीकृष्ण के चरणचिह्नों से अंकित भूमि पर लोट गए थे।"
इसी प्रकार किसी गोपी ने श्रीकृष्ण से कहा कि उनकी अभिनव अनुरागवती
राधारानी उनकी वनमाला की सुगन्ध से मत्त होकर विरहवश कठोर भूमि
पर लोट-लोट कर अपने मृदु शरीर का मर्दन कर रही हैं।
उच्च स्वर से गाना
एक गोपी ने श्रीकृष्ण को बताया कि राधाजी उनका गुणगान कर रही

१६० ] भक्तिरसामृतसिन्धु
हैं। उन्होंने सखियों को कुछ इस प्रकार मुग्ध कर लिया है कि वे पाषाणवत्
जड़ हो गयी हैं, जबकि उस प्रेम से पत्थर द्रवीभूत हो चले हैं।
हरेकृष्ण कीर्तन करते-करते नारदजी ऐसे चिल्लाने लगे कि
नृसिंहदेव को प्रकट हुआ समझकर दानवदल भयवश तुरन्त सब दिशाओं
में भाग खड़े हुए।
देह मोड़ना
उल्लेख है कि कभी-कभी जब वीणाधारी नारदजी तीव्र भावावेश
में श्रीकृष्ण का स्मरण करते हैं तो उनका शरीर कुछ इतने वेग से मोड़
खाता है कि यज्ञोपवीत खण्डित हो जाता है।
चिल्लाना
एक गोपी ने श्रीकृष्ण से कहा, "हे व्रजराजकुमार ! तुम्हारी मुरली-
ध्वनि को सुनकर व्याकुल हुई सुन्दरी राधा रुद्ध कण्ठ से कुररी के समान
चिल्ला रही है।"
हुंकार करना
श्रीकृष्ण की वंशीध्वनि को सुनकर चकित हुए शंकरजी आकाश में
हुंकारने लगे जिससे दानवों का विनाश हो गया और भक्तों के हृदय में
आनन्दसिन्धु उमड़ आया।
जंभाई लेना
चन्द्रोदय होने पर कुमुद प्रस्फुटित होते हैं। इसी प्रकार जब श्रीकृष्ण
राधारानी के सामने आते हैं तो राधा का मुखरूप कमल जंभाई के रूप में
विकास को प्राप्त होता है।
दीर्घ श्वास लेना
एक श्लोक में उल्लेख है, "ललिता उस चातकी जैसी है जो केवल
मेघजल को ग्रहण करती है।" यहाँ श्रीकृष्ण को श्याम मेघ की उपमा दी
गई है और ललिता को उस चातकी के समान बताया है जो केवल कृष्ण-
मेघ के संग के लिए उत्कण्ठित है। अलंकार में आगे कहा है, "झंझावात
से मेघ के तिरोहित हो जाने के समान वह अपने दीर्घ विश्वास के कारण
श्रीकृष्ण को खो बैठी, जो उसके फिर सचेत होने तक अदृश्य हो गए।"

प्रेम के लक्षण (अनुभाव) [ १६१
अन्य लोगों की चिन्ता न करना
मथुरा के याज्ञिक ब्राह्मणों की पत्नियों ने जैसे ही सुना कि श्रीकृष्ण
निकट आए हैं, वे तुरन्त घर छोड़कर वहाँ चल पड़ीं। उन्होंने अपने विद्वान्
पतियों की ओर ध्यान नहीं दिया। पति आपस में कहने लगे, “श्रीकृष्ण
की रति में कैसा अद्भुत आकर्षण है जो ये स्त्रियाँ हमारी आज्ञा के बिना
ही श्रीकृष्ण के पास चली गयीं।” यह श्रीकृष्ण का प्रभाव है। श्रीकृष्ण की
ओर आकृष्ट भाग्यवान् जन्म-मृत्यु के बन्धन से मुक्त हो जाता है, जो उन
यज्ञपत्नियों द्वारा परित्यक्त बन्द घरों जैसा है।
पद्यावली में कोई भक्त कहता है, “हमें संसार के लोगों की चिन्ता
नहीं है। यदि वे हमारी निन्दा करते हैं तो किया करें। हम तो बस
हरेकृष्ण महामन्त्र के कीर्तनरूपी दिव्यरस का पान करेंगे और भूमि पर
लोटते हुए भावोन्मत्त नृत्य करेंगे। हमें परमानन्द सुलभ हो गया है।”
लार टपकाना
कभी-कभी हरेकृष्ण महामन्त्र जपते हुए नारदजी कुछ क्षण के लिए
सर्वथा निश्चेत हो जाते हैं और उनके मुख से लार टपकने लगती है।
उन्मत्त के समान अट्टहास करना
जब कोई भक्त पागल जैसा अट्टहास करता है, तो ऐसा हृदय में
प्रेम के विलक्षण विक्षेप के कारण होता है। अट्टहास हृदय की एक विशिष्ट
अवस्था को प्रकट करता है। इस मनोभाव से भक्त का प्रेम अधरों पर
फूट पड़ता है। लगता है कि हृदय में भक्तिलता खिल उठी है जिस कारण
मुख से अट्टहास रूपी पुष्पों का समुदाय बार-बार बिखर रहा है। चैतन्य
चरितामृत के अनुसार भक्ति वह लता है जो गोलोक वृन्दावन में श्रीकृष्ण
के चरणकमल तक बढ़ती है।
चक्कर आना
गोपी कहती है, “हे सखि मुरलि ! लगता है अधारि तुम्हारे भीतर
फूँक मारने के व्याज से आंधी का प्रवेश करा देते हैं, जो तुम्हारे सिर को
घुमाता है और अब कमलनयना गोपियों की भी वही दशा कर रहा है।”
हिचकी आना
कभी-कभी हिचकी भी कृष्णप्रेम का अनुभाव बन जाती है। इसके

१६२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
प्रमाण में पौर्णमासी राधा की एक सखी से कहती है, "हे पुत्रि ! प्रिय
सखी राधारानी के हिक्कार के लिए औषधि रचने की आवश्यकता नहीं है
और उसके अनिष्ट की आशंका भी व्यर्थ है। हे मृगनयनी ! तुम चिल्लाती
क्यों हो ? इसका कारण अपच नहीं है; यह तो कृष्णप्रेम का ही विकार
है। इसीलिए कृष्णनाम के साथ हिचकी पर हिचकी हो रही है।"
पौर्णमासी का यह वाक्य इस बात का प्रमाण है कि कृष्णप्रेम कभी-कभी
हिक्कार के रूप में भी अभिव्यक्त होता है।
कदाचित् सम्पूर्ण शरीर का कंपित होना या फूल जाना तथा किसी
अंग से रक्त निकलना आदि अनुभाव भी होते हैं। परन्तु ये अतीव दुर्लभ
हैं; इसलिए श्रील रूप गोस्वामी ने इनका अधिक वर्णन नहीं किया है।

अध्याय २८
सात्त्विक भाव
श्रीकृष्ण सम्बन्धी भावों से साक्षात् रूप में अथवा थोड़े व्यवधान
से अभिभूत हुए चित्त को मनीषीजन 'सत्त्व' कहते हैं। ऐसे सात्त्विक
भाव से उत्पन्न होने वाले लक्षण तीन प्रकार के होते हैं—स्निग्ध, दिग्घ
तथा रुक्ष।
स्निग्ध सात्त्विक भाव के मुख्य और गौण दो भेद हैं। राधारानी
कुन्द पुष्पों की माला गूंथ रही थीं। उसी समय श्रीकृष्ण की वंशी बज उठी
और उसे सुनते ही उन्होंने तुरन्त अपना कार्य बन्द कर दिया। यह मुख्य
स्निग्ध सात्त्विक भाव का उदाहरण है। गौण स्निग्ध सात्त्विक भाव का
वर्णन इस प्रकार है, "अपने नेत्ररूप चातक के लिए मेघ के समान श्रीकृष्ण
को मथुरा जाते देखकर यशोदा क्रोधवश लाल-लाल मुख से मथुरानरेश
पर चिल्लाने लगी।"
दिग्ध सात्त्विक भाव के तीन भेद हैं, जिन का एक उदाहरण इस
प्रकार है—"रात्रि में स्वप्न में पूतना को अपने प्रांगण में पड़ा देखकर
यशोदा को कम्प हो आया और वे तुरन्त अपने लाल कृष्ण को खोजने
लगीं।"
जब भाव के लक्षण अभक्त के शरीर पर प्रकट होते हैं तो उन्हें रुक्ष
कहा जाता है। अभक्त वस्तुतः विषयी होते हैं, परन्तु किसी शुद्धभक्त के
संग से उनमें भी कभी भाव के लक्षण अभिव्यक्त हो सकते हैं। भक्ति के
विद्वान् इन्हें रुक्ष सात्त्विक भाव कहते हैं।
सात्त्विक भाव के आठ लक्षण हैं : स्तम्भ, स्वेद, रोमांच, स्वरभेद,
कम्पन, विवर्णता, अश्रुधारा, तथा प्रलय।
श्रील रूप गोस्वामी ने इन भावों का वैज्ञानिक विवरण दिया है।
जब प्राण पृथ्वी में स्थिर हो जाता है तो स्तम्भ को उत्पन्न करता है, जल
के संसर्ग में आने पर अश्रु, अग्नि के संग में स्वेद और वैवर्ण्य को तथा

१६४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
आकाश में आश्रित प्राण मूर्च्छा उत्पन्न करता है। जब प्राण स्वयं अपने में
स्थिर होता है तो तीव्रता के भेद से क्रमशः कम्प, स्वरभेद और रोमांच को
जन्म देता है।
ये सात्त्विक भाव कभी बाह्य रूप से प्रकट होते हैं तो कभी अन्तर
में ही रहते हैं। शुद्धभक्त इन सब भावों का हृदय में निरन्तर अनुभव
करता है; परन्तु बहिर्मुख मनुष्यों के सामने उन्हें प्रायः बाहर प्रकट नहीं
होने देता ।
स्तम्भ
स्तम्भ की उत्पत्ति हर्ष, भय, आश्चर्य, शोक तथा क्रोध से होती
है। वाणी का अभाव, निश्चलता, शून्यता तथा परम विरह का भाव इसके
लक्षण हैं।
श्रीकृष्ण की लीलाओं का वर्णन करते हुए उद्धवजी विदुर से कहने
लगे, “एक दिन श्रीकृष्ण ने मालिन का श्रृंगार किया और उद्यान में प्रवेश
कर गोपियों को हास-परिहास से आनन्दित किया। गोपियाँ स्तब्ध हो
उठीं। फिर श्रीकृष्ण को जाते हुए गोपियाँ इस भाव से देख रही थीं मानो
उनके चित्त और नेत्र श्रीकृष्ण का अनुगमन कर रहे हों।” इन लक्षणों से
यद्यपि गोपियाँ तृप्त नहीं हुई थीं, वे प्रेम से स्तब्ध हो गई । यह हर्ष-जनित
स्तम्भता का दृष्टान्त है।
भय के कारण स्तम्भ का उदाहरण इस प्रकार है। जब श्रीकृष्ण
कंस के यज्ञमण्डप में पर्वत के समान मल्लों से घिरे हुए थे तो माता देवकी
स्तम्भित हो गई, उनके दोनों नेत्र आकुल हो उठे।”
ब्रह्मा को आश्चर्य से स्तम्भ हुआ था। श्रीमद्भागवत (१०.१३.५६)
के अनुसार अपने द्वारा चुराए गो-गोपबालकों को पुनः श्रीकृष्ण के पास
देखकर जब ब्रह्मा ने जाना कि ये गोपकुमार और कोई नहीं, साक्षात्
भगवान् है तो आश्चर्यवश उनकी सारी इन्द्रियाँ स्तम्भित हो गई। वे
स्वर्णमयी चतुर्भुज मूर्ति के समान खड़े के खड़े रह गए। श्रीकृष्ण को
अपने वाम कर से गोवर्धन पर्वत को धारण किए देखकर व्रजवासी भी
स्तब्ध हुए थे।
जिस समय श्रीकृष्ण ने बकासुर के उदर में प्रवेश किया, उस समय
सारे देवता शोक से स्तब्ध रह गए थे। क्रोध के कारण कुछ ऐसा ही अर्जुन
के साथ भी हुआ, अब उसने देखा कि अश्वत्थामा श्रीकृष्ण पर ब्रह्मास्त्र
चलाने जा रहा है।

सात्त्विक भाव [ १६५
स्वेद
हर्ष से उत्पन्न स्वेद का उदाहरण श्रीमद्भागवत में है। एक गोपी
अपनी सखी राधारानी से कहती है, "हे राधे ! धूप की निन्दा करके अपनी
चतुराई क्यों दिखा रही हो। श्रीकृष्ण को देखकर काम-पीड़ित होकर
पसीने-पसीने हो रही हो, यह तो मैं जान ही गई हूँ।"
श्रीकृष्ण के सेवक रक्तक में भय से स्वेदस्राव हुआ था। एक दिन
श्रीकृष्ण ने राधारानी के पति अभिमन्यु का वेष धारण किया। अभिमन्यु
को श्रीकृष्ण से राधा का प्रणय रुचिकर न था। इसलिए रक्तक ने श्रीकृष्ण
को उस रूप में देखा तो वह भी प्रेम से उन्हें अभिमन्यु समझ बैठा; अतः
उन्हें फटकारने लगा। फिर जैसे ही उनसे पहचाना कि यह तो अभिमन्यु
के वेष में श्रीकृष्ण ही हैं, तो पसीने-पसीने हो गया। यह स्वेद भयजन्य था।
क्रोध के कारण स्वेद की उत्पत्ति विष्णुवाहन गरुड में हुई है। जिस
समय इन्द्र वृन्दावन पर मूसलाधार वर्षा कर रहा था, गरुड़जी इस दृश्य
को मेघों के ऊपर से देख रहे थे और क्रोध के कारण उनके शरीर से स्वेद
बहने लगा।
रोमांच
श्रीकृष्ण के मुख में त्रिलोकी को देखकर माता यशोदा को रोमांच हो
आया। उन्होंने श्रीकृष्ण से मुख खोलने को कहा था यह देखने के लिए कि
उन्होंने मृद-भक्षण किया है या नहीं। परन्तु जब श्रीकृष्ण ने मुख खोला तो
उन्हें सम्पूर्ण पृथ्वी के साथ अन्य लोक भी कृष्ण के मुख में दृष्टिगोचर हुए।
इससे वे रोमांचित हो गईं।
हर्ष से होने वाले रोमांच का वर्णन गोपियों के रासविलास के
सम्बन्ध में श्रीमद्भागवत (१०.३०.१०) में है। इस रास में श्रीकृष्ण
अकस्मात् अन्तर्हित हो गये और गोपियों सहित राधारानी उन्हें ढूँढने
लगीं। वे पृथ्वी से बोलीं, "हे धरा ! तुमने कितना तप किया होगा जो
तुम्हें श्रीकृष्ण के चरणकमलों का निरन्तर स्पर्श प्राप्त रहता है। अवश्य
ही आनन्द से पुलकित होकर इस वनस्पतिरूप रोमांच से शोभित हो रही
हो। तुममें प्रेम के ये लक्षण प्रथम कब विकसित हुए ? तुम्हारा यह आनन्द
महोत्सव वामनावतार के स्पर्श से प्रारम्भ हुआ है अथवा भगवान् वराह ने
जब तुम्हारा उद्धार किया था, तब से ?"
श्रीकृष्ण कभी-कभी गोपबालकों के साथ बनावटी युद्ध का आयोजन
किया करते थे। ऐसे समय जब वे अपना श्रृंग बजाते तो विरोधी पक्ष के

१६६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
श्रीदामा को उत्साहवश रोमांच हो जाता । इसी प्रकार श्रीकृष्ण के
विश्वरूप को देखकर अर्जुन भय से रोमांच को प्राप्त हुआ ।
स्वरभेद
अक्रूर के रथ पर बैठ कर मथुरा जाते हुए श्रीकृष्ण के पथ को
रोकने के लिए यशोदा और सारी गोपियाँ सामने आकर खड़ी हो गई ।
राधारानी की दशा तो विशेष रूप से इतनी दयनीय हो गई थी कि काँपती
हुई वाणी में उन्होंने यशोदा से अक्रूर को रोकने का निवेदन किया ।
ब्रह्मा को आश्चर्यजनित स्वरभेद का अनुभव हुआ । श्रीमद्भागवत
(१०.१३.६४) में उल्लेख है कि श्रीकृष्ण को दण्डवत् प्रणाम करके ब्रह्मा ने
गद्गद् वाणी में उनकी स्तुति की ।
श्रीमद्भागवत (१.२६.३०) में ही गद्गद् वाणी का एक अन्य
उदाहरण है । गोपीजन रात्रि में सब कुछ त्याग कर श्रीकृष्ण के साथ रास
करने आयी थीं, परन्तु श्रीकृष्ण ने उन्हें वापस अपने पतियों और घर को
लौट जाने को कहा । इस पर वे क्रोध के कारण गद्गद् वाणी से श्रीकृष्ण से
प्रतिभाषण करने लगीं ।
हर्ष-जनित स्वरभेद का प्रकाश अक्रूर ने श्रीमद्भागवत (१०.३६.५६-
५७) में किया है, जब उन्होंने सम्पूर्ण वैकुण्ठों को यमुना जल पर आश्रित
देखा । तब उन्हें ज्ञान हुआ कि श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् हैं और वे श्रीकृष्ण
के चरणकमलों में सिर झुकाकर गद्गद वाणी से करबद्ध स्तुति करने लगे ।
भय के कारण भी स्वरभेद होने के उदाहरण है । श्रीकृष्ण के एक सखा ने
उनकी प्रशंसा में कहा, "हे सखे ! तुम्हारी वंशी तुम्हारे ही एक सेवक पात्री
को दी थी और जब मैंने वह वापस माँगी तो उसकी वाणी गद्गद हो गई
और मुख का रंग पीला पड़ गया ।"
कम्प
श्रीकृष्ण को शंखासुर को पकड़ता देखकर राधारानी भयवश काँपने
लगीं । इसी प्रकार का कम्पन सहदेव में उस समय देखा गया जब शिशुपाल
भगवान् श्रीकृष्ण को भीषण अपशब्द कह रहा था ।
पीड़ावश शरीर का कम्प राधाजी में भी प्रकट हुआ । वे काँपते हुए
गोपी से बोलीं, "इस निष्ठुर से हँसी मत कर । इसने सदा हमें दुःख ही
दुःख पहुँचाया है, इसलिए यहाँ आने से इसे मना कर दे ।"

सात्त्विक भाव [ १६७
विवर्णता
कभी-कभी श्रीकृष्ण के व्यवहार से हुए महान् विषाद आदि से देह
का रंग बदल जाता है। अतः गोपियाँ उनसे कहती हैं, "हे कृष्ण ! तुम्हारे
विरह में सारे ब्रजवासी विवर्ण हो गए हैं। इस कारण देवर्षि नारद
को वृन्दावन में श्वेतद्वीप का भ्रम हो रहा है।"
कृष्ण-बलराम को यज्ञशाला में आया देखकर कंस का रंग उड़ गया।
इसी प्रकार इन्द्र भी यह देख कर विवर्ण हो गया था कि कृष्ण गोवर्धन
धारण करके सारे ब्रज की रक्षा कर रहे हैं। यदि विवर्णता अतिशय हर्ष के
कारण होती है तो रक्तिमा देखी जाती है। यह विकार बड़ा दुर्लभ है, अतः
श्रील रूप गोस्वामी ने इसका इतना ही विवरण दिया है।
अश्रु
हर्ष, रोष, विषाद, आदि कारणों से नेत्रों से अश्रु-प्रवाह निकल
पड़ता है। हर्ष से उत्पन्न आंसू ठण्डे और क्रोधजनित आंसू गरम होते हैं।
सभी प्रकार के आँसुओं में नेत्रों में क्षोभ, लालिमा और खुजली के कारण
पोंछना आदि होता है।
द्वारका में भगवान् श्रीकृष्ण की पट्टमहिषी रुक्मिणीजी भाव के
आनन्द में अश्रु वहा रही थीं, परन्तु वे उन्हें अप्रिय लगे क्योंकि श्रीकृष्ण के
दर्शन में बाधा डाल रहे थे। 'हरिवंश' के एक श्लोक में सत्यभामाजी
श्रीकृष्ण पर प्रणयकोप के कारण आँसू बहाने लगीं।
रोषजनित अश्रुपात का एक अन्य उदाहरण यह है। राजसूय यज्ञ में
शिशुपाल को श्रीकृष्ण का तिरस्कार करते देखकर भीमसेन को भयंकर
रोष हुआ। वह शिशुपाल को तुरन्त मार डालना चाहता था; परन्तु
श्रीकृष्ण ने उसे ऐसा करने से रोक दिया। इससे वह क्रोध से तिलमिला
उठा। वर्णन है कि उस समय उसके नेत्र गरम आँसुओं से अभिभूत हो रहे
थे, जैसे सांध्यकालीन चन्द्रमा पर कोई हल्का सा मेघ छा जाय। संध्या का
मेघाच्छादित चन्द्रमा बड़ी शोभा पाता है। इसी प्रकार क्रोधवश अश्रु-
विमोचन करता हुआ भीम भी अतिशय शोभित हुआ।
श्रीमद्भागवत (१०.६०.२३) में रुक्मिणी द्वारा विषादवश अश्रु-
विमोचन करने का सुन्दर उदाहरण हैं। श्रीकृष्ण और रुक्मिणी का वार्ता-
लाप हो रहा था प्रसंगवश रुक्मिणी श्रीकृष्ण के विरह की आशंका से भय-
भीत हो गयीं। रक्तकमल के समान नखों से भूमि कुरेदती हुई रुक्मिणी
के नेत्रों की अंजन अश्रुधारा के साथ कुंकुम से उपलिप्त वक्षःस्थल पर

१६८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
बह चली। इतनी विषाद-मग्न हो गयी कि उसकी वाणी भी गद्गद्
हो चली।
प्रलय
एक साथ दुःख और सुख की अतिशयता के कारण जब यह बोध
नहीं रहता कि क्या करना है, क्या नहीं करना—उस स्थिति को प्रलय
कहते हैं। प्रलय की अवस्था में भक्त पृथ्वी पर गिर पड़ता है और प्रेम के
सम्पूर्ण लक्षण (अनुभाव) प्रकट हो जाते हैं। गोपियाँ श्रीकृष्ण को खोज
रही थीं। तभी अचानक वनलता में से उन्हें स्तब्ध और इन्द्रियज्ञान शून्य
करते हुए वे सामने प्रकट हो गए। इस अवस्था में गोपियाँ सौन्दर्यातिशय
को प्राप्त हो गयीं। यह सुख के कारण प्रलय का एक उदाहरण है।
दुःखजनित प्रलय के भी अनेक उदाहरण हैं। श्रीमद्भागवत
(१०.३६.१५) में शुकदेव गोस्वामी महाराज परीक्षित को कहते हैं, “हे
राजन् ! श्रीकृष्ण के विरह में गोपियाँ श्रीकृष्ण के चिन्तन में ऐसी तन्मय
हो गयीं कि उनकी इन्द्रियों के सब व्यापार रुक गए और वे शरीर की
सुध-बुध से बिल्कुल रहित हो गयीं मानो सम्पूर्ण भवबन्धन से मुक्त हो
गयी हों।
सात्त्विक के न्यूनाधिक तारतम्य
शरीर के विविध सात्त्विक भावों में स्तम्भन का विशेष स्थान है।
स्तम्भन के न्यूनाधिक्य के अनुसार प्राण और शरीर के विक्षोम में भी
तारतम्य होता है। इसीलिए अन्य सात्त्विक भावों में भी न्यूनाधिक्य है।
ये सात्त्विक भाव शनैः-शनैः विकसित होते हैं और क्रमशः धूमायित,
ज्वलित, दीप्त तथा उद्दीप्त कहलाते हैं। ये भाव बहुत काल तक रहते
हैं और शरोर के अनेक अंगों में व्याप्त रहते हैं। अश्रुपात और स्वरभेद के
विपरीत स्तम्भन सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त होता है। अश्रुपात और स्वरभेद
तो केवल एकांगी भाव हैं।
अश्रुओं में दो विशेषताएँ हैं—आँखों को अवदात और सुजा देना
तथा आंखों के तारों को विलक्षण कर देना। स्वरभेद से गला रुक जाना,
कुण्ठा और अत्यन्त व्याकुलता होती है। इन सात्त्विक भावों के लक्षण
एकदेशीय हैं, इसलिए उनके साथ अन्य अंग-विकार भी होते हैं। उदाहर-
णार्थ, स्वरभेद के कारण गला रुक जाने पर घुर-घुर ध्वनि होती है। ऐसी
ध्वनियाँ वाणी को कुण्ठित कर देती हैं और परम व्याकुलता के साथ

सात्त्विक भाव [ १६६
नाना प्रकार से अभिव्यक्त होती हैं। ये सब लक्षण रुक्ष सात्त्विक भाव धूमा-
यित अवस्था के हैं।
कभी-कभी श्रीकृष्ण के महोत्सवों अथवा भक्त-समाज में नृत्य-उन्माद
होता है। ये भाव 'ज्वलित' कहलाते हैं।
श्रीकृष्ण में दृढ़ रति रूपी मूलभूत आधार के अभाव में उपरोक्त
कोई भी लक्षण प्रकट नहीं हो सकता। ये सात्त्विक जब तनिक से ही व्यक्त
होते हैं और छिपाए जा सकते हैं, तब धूमायित अवस्था के सात्त्विक भाव
माने जाते हैं। नन्द महाराज के प्रासाद में वैदिक कर्म कहते हुए पुरोहित
गर्ग मुनि में ये लक्षण हुए थे। जब उन्होंने सुना कि बालक कृष्ण ने अघासुर
को मार डाला तो उनके नेत्र अश्रुओं से आर्द्र प्रतीत हुए, कण्ठ में कम्प
होने लगा तथा सम्पूर्ण शरीर पसीने से तर हो गया। इस अवस्था में गर्ग
मुनि का सुन्दर मुखमण्डल बड़ा शोभित हुआ।
जब दो या तीन या अधिक सात्त्विक भाव स्पष्ट रूप में प्रकट हो
कर कठिनाई से छिपने के योग्य हो जाते हैं तब उन्हें ज्वलित कहा जाता
है। उदाहरण के लिए, श्रीकृष्ण के सखा ने उनसे कहा, "हे सखे ! वन में
बज रही तुम्हारी वंशी के कानों में प्रविष्ट होते ही हाथ सर्वथा निश्चेष्ट
हो गये हैं और नेत्र अश्रुधारा से अभिभूत हो रहे हैं। अब वे तुम्हारे मोर-
पंख को भी नहीं पहचान पाते। जांघें स्तम्भित हो गई हैं, जिससे पग भर
चलना भी सम्भव नहीं रहा है। इसलिए हे मित्र ! तुम्हारी वंशीध्वनि
निश्चय ही अद्भुत है।"
इसी प्रकार का भाव एक गोपी दूसरी पर प्रकट करती है, "हे
सखि ! वंशी की ध्वनि को सुनकर मैंने उसके प्रभाव को रोकने की पूरी
चेष्टा की। परन्तु शरीर के कम्प को नहीं रोक सकी, जिससे परिजनों ने
मेरे मन के कृष्णप्रेम को भाँप ही लिया।"
चार-पाँच सात्त्विक-भाव एक साथ प्रौढ़ रूप में उदित हो कर
छिपाने के बिलकुल अयोग्य हो जाते हैं तो विद्वान् उन्हें 'दीप्त' कहते
हैं। श्रीकृष्ण को सामने खड़ा देखकर नारदजी कुछ ऐसे कम्प से आक्रान्त
हुए कि देर तक.वीणा भी नहीं बजा सके। गद्गद् वाणी के कारण उनमें
श्रीकृष्ण का स्तवन करने का सामर्थ्य न रही और आँखें अश्रुओं से परिपूर्ण
हो गयीं। इस प्रकार वे सर्वथा अवश हो गए।
जब कुछ ऐसे ही भाव राधारानी में प्रस्फुटित हुए तो सखी उन्हें
उपालम्भ देने लगीं, "हे सखि ! नेत्र में अश्रुधारा के लिए पुष्पों की सुगन्ध
को क्यों व्यर्थ दोष देती हो ? शरीर पर रोमांच के लिए क्यों वायु पर

२०० ] भक्तिरसामृतसिन्धु
कोप करती हो। जांघों के स्तम्भन के लिए वन-विहार से द्वेष क्यों करती
हो। तुम्हारा स्वरभेद बता रहा है कि इसका कारण तो कुछ और ही
है—कृष्ण के लिए तुम्हारा प्रेम ही इसमें हेतु है।"
श्रील रूप गोस्वामी कहते हैं कि पाँच-छः अथवा सारे ही सात्त्विक
भाव एक साथ प्रकट होकर परम उत्कर्ष को प्राप्त होने पर 'उद्दीप्त'
कहलाते हैं। श्रीकृष्ण के एक सखा ने उनसे कहा, "हे पीताम्बर ! तुम्हारे
विरह में सारे वृन्दावनवासी स्वेदयुक्त हो रहे है, नाना ध्वनियों से विलाप
करते हैं; उनके शरीरों में कम्प, रोमांच और स्तम्भन हो चला है, नेत्र
अश्रुधारा से अभिभूत हैं। अत्यन्त व्याकुल हैं।"
प्रेम का एक चरम लक्षण 'महाभाव' है। इस महाभाव की अनुभूति
केवले राधारानी के लिए ही सम्भव है। पाँच सौ वर्ष पूर्व श्रीचैतन्य
महाप्रभु राधाप्रेम का आस्वादन करने प्रकट हुए। उनमें भी महाभाव
का पूर्ण प्रकाश था। श्रील रूप गोस्वामी का कथन है कि जब प्रेम के
लक्षण सुदीप्त हो जाते हैं, तो वह अवस्था महाभाव कहलाती है।
श्रील रूप गोस्वामी आगे चार प्रकार के सात्त्विकाभास का विवेचन
करते हैं।
कभी-कभी निर्विशेषवादी भी, जो यथार्थ में भक्ति से रहित हैं, प्रेम
के इन भावों को प्रकट कर सकते हैं; परन्तु ये यथार्थ में भाव नहीं हैं,
वरन् आभासमात्र हैं। उदाहरण के लिए, निर्विशेषवादियों की पावन नगरी
वाराणसी में कदाचित् ऐसा संन्यासी दृष्टिगोचर हो सकता है जो भगवान्
की महिमा का श्रवण कर अश्रुविमोचन कर रहा हो। निर्विशेषवादी कभी-
कभी हरे कृष्ण महामन्त्र का कीर्तन और नृत्य भी करते हैं, पर उनका
लक्ष्य भगवान् की सेवा करना नहीं है। वे यह सब भगवान् एक होकर
उनके अस्तित्व में लीन होने के लिए ही करते हैं। अतः श्रील रूप गोस्वामी
का कथन है कि निर्विशेषवादी के शरीर में कीर्तन से हुए विकार भाव के
यथार्थ लक्षण नहीं हैं; वरन् आभासमात्र हैं, जैसे चमकदार शीशे में से सूर्य
किसी अंधेरे कक्ष में प्रतिभासित होता है। परन्तु हरेकृष्ण जप इतना
अतिशय प्रभावशाली और दिव्य है कि कालान्तर में निर्विशेषवादियों के
हृदय को भी द्रवित कर देगा। रूप गोस्वामी निष्कर्ष करते हैं कि निर्विशेष-
वादियों में प्रकट विकार सात्त्विक भावों के आभासमात्र हैं, यथार्थ वस्तु
नहीं हैं।
कदाचित् देखने में आता है कि भक्ति और भगवत्-कीर्ति के लेश-
मात्र ज्ञान से रहित तार्किक भी जब भगवान् का गुणगान सुनने बैठता है तो

हृदय से द्रवीभूत होकर अश्रु बहाता पाया जाता है। इस सम्बन्ध में एक
भक्त भगवान् से कहता है, "हे मुकुन्द ! आप के लीलामृत की महिमा के
सम्बन्ध में मैं क्या कह सकता हूँ, जिसका श्रवण कर अभक्त भी प्रभावित
हो जाते हैं, उनके नेत्रों से अश्रु निर्भर प्रवाहित होने लगता है और शरीर
रोमांचित हो जाता है।" ऐसे अभक्त वास्तव में द्रवित नहीं होते; वे भीतर
से कठोर हैं। फिर भी भगवान् के गुणगान की कैसी अपार महिमा है कि
अभक्त तक रो पड़ते हैं।"
जो कृष्णरस से प्रायः सर्वथा विहीन है और जिसने किसी विधि-
नियम का पालन नहीं किया है, ऐसा अभक्त भी कभी-कभी अभ्यास के
द्वारा भक्तमण्डली में अश्रु आदि सात्त्विक भावों का दम्भ करता है।
परन्तु ये अश्रु आदि यथार्थ प्रेम के लक्षण बिलकुल नहीं हैं। यह सब तो
केवल अभ्यास के द्वारा किया जाता है। यद्यपि सात्त्विकाभासों के वर्णन से
कोई लाभ नहीं है, श्रील रूप गोस्वामी ने कुछ ऐसे उदाहरण दिए हैं,
जहाँ यथार्थ भक्ति तो नहीं है, पर ये प्रकट होते हैं।

अध्याय २६
कृष्णप्रेम के व्यभिचारिभाव
प्रेमातिशय को अभिव्यक्ति प्रदान करने वाले कतिपय शारीरिक
लक्षण हैं। ये संख्या में ३३ हैं : निर्वेद, विषाद, दैन्य, ग्लानि, श्रम, मद,
गर्व, शंका, त्रास, आवेग, उन्माद, विस्मृति, व्याधि, मोह, मृत्यु, आलस्य,
जड़ता, लज्जा (व्रीड़ा), गोपन, स्मृति, वितर्क, चिन्ता, मति, धृति, हर्ष,
उत्सुकता, उग्रता, अमर्ष, निद्रा, स्वप्न, बोध, चपलता और असूया ।
निर्वेद
जब किसी को बलात् कोई निषिद्ध विधि से कार्य करना पड़ता है
अथवा इच्छा होने पर भी वाँछनीय विधि से कार्य नहीं कर पाता तो उसे
ग्लानि होती है और वह अपने को अपमानित अनुभव करता है। ऐसे में
निर्वेद का भाव उसे अभिभूत कर लेता है । निर्वेद में चिन्ता, अश्रु,
विवर्णता, दैन्य तथा दीर्घ उच्छ्वास आदि लक्षण प्रकट होते हैं।
जब नन्द महाराज को लगा कि कालिया नाग को दण्ड देते-देते
श्रीकृष्ण यमुना के विषाक्त जल में डूब गए हैं तो वे यशोदा देवी से कहने
लगे, "हे देवी ! श्रीकृष्ण गहरे जल में चले गए हैं और इसलिए अब इन
पापमय शरीरों को धारण करने से क्या लाभ ! अपने पापों का प्रायश्चित
करने के लिए आओ हम विषममय कालीदह में भस्म हो जाएँ ।" यह महती
विपत्ति से भक्त को होने वाले निर्वेद का उदाहरण है।
श्रीकृष्ण के वृन्दावन से चले जाने पर उनके अंतरंग सखा सुबल ने
भी वहाँ न रहने का निश्चय किया । जाते-जाते सुबल सोच रहा था कि
कृष्ण के बिना वृन्दावन में कुछ भी आनन्द शेष नहीं रहा है। जैसे नीरस
पुष्प को भ्रमर त्याग जाते हैं, वैसे ही वृन्दावन को दिव्य रसानन्द से हीन
जानकर सुबल उसे त्याग कर चला गया ।
'दानकेलिकौमुदी' में श्रीमती राधारानी अपनी सखी से कहती हैं,
"हे सखि ! श्रीकृष्ण की कीर्ति न सुन पाने से तो अच्छा हो यदि मैं बहरी

कृष्णप्रेम के व्यभिचारिभाव [ २०३
हो जाऊँ । माधव के दर्शन के बिना इन नेत्रों का अन्धा हो जाना ही उचित
है।" यह कृष्णविरह जनित निर्वेद का उदाहरण है।
हरिवंश में सत्यभामाजी श्रीकृष्ण से कहती हैं, "हे कृष्ण ! जब
से मैंने नारद को तुम्हारे सामने रुक्मिणी का गुणगान करते सुना है, तब
से सोचती हूँ कि मेरे विषय में बोलना तो व्यर्थ ही है।" यह ईर्ष्या से उत्पन्न
निर्वेद है। रुक्मिणी और सत्यभामा दोनों श्रीकृष्ण की पत्नियाँ थीं, इसलिए
यह स्वाभाविक ही है कि उनमें परस्पर स्त्रियों के योग्य ईर्ष्याभाव हो।
कारणतः रुक्मिणी की कीर्ति सुनकर सत्यभामा ईर्ष्यावश निर्वेद को
प्राप्त हुई।
श्रीमद्भागवत (१०.४७.२६) का वाक्य है, "हे कृष्ण ! राज्यलक्ष्मी
से मदमत्त, स्त्री, पुत्र और कोष में ही आसक्त तथा देह को आत्मा समझने
वाले मुझ अविवेकी का सारा समय कभी न समाप्त होने वाली चिन्ता
में ही व्यर्थ नष्ट हो गया।" यह विवेक से उत्पन्न निर्वेद का दृष्टान्त है।
भरतमुनि के अनुसार यह निर्वेद अमंगल है। परन्तु अन्यान्य विद्वानों
ने इसे शान्तरस की श्रेणी में और प्रेम का स्थायिभाव भी माना है।
विषाद
जीवन के इष्ट लक्ष्य की प्राप्ति में असफलता, कार्य की असिद्धि,
विपत्ति और अपने को अपराधी समझने से होने वाला अनुताप विषाद
कहलाता है।
इन उपायों और सहायकों की खोज, चिन्ता, रोना, विलाप, दीर्घ-
श्वास, विवर्णता, मुख का सूखना आदि लक्षण विषाद की अवस्था में अभि-
व्यक्त होते हैं।
श्रीकृष्ण का एक वृद्ध भक्त प्रार्थना करता है, "हे अघासुर के हन्ता
कृष्ण ! वृद्धावस्था के कारण मेरा शरीर विवश हो गया है। वाणी क्षीण
हुई और मन निर्बल हो गया तथा स्मरण-शक्ति जाती रही है। हे नाथ !
आपका मुख क्या है, चन्द्रमा है। परन्तु दुर्भाग्यवश आपकी शीतल चन्द्रिका
के लिए रुचि न होने से मैं कृष्णभावना का विकास नहीं कर सका।" यह
वाक्य इष्ट-अप्राप्ति जनित विषाद का उदाहरण है।
एक भक्त का उद्गार है, "आज स्वप्न में मैंने उद्यान से नाना
पुष्पों का चयन करके श्रीकृष्ण के लिए सुन्दर माला रची; पर हाय ! उसे
श्रीकृष्ण के गले में पहनाने से पूर्व ही मेरी निद्रा भंग हो गई।" इसमें
कार्य-असिद्धि का विषाद है।