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अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

षष्ठेमासिचसंप्राप्ते अन्नप्राशनमाचरेत् ।

विष्णुस्मृतिः ॥

जातकर्मतथाकुर्यात्-पुत्रेजातेयथोदितम् ।
बहिर्निष्क्रमणंचैव तस्यकुर्याच्छिशोःशुभम् ॥११॥
षष्ठेमासिचसंप्राप्ते अन्नप्राशनमाचरेत् ।
ततोऽब्देचेक्सम्प्राप्ते केशकर्मसमाचरेत् ॥१२॥
गर्भाष्टमेतथाकर्म ब्राह्मणस्योपनयनम् ।
द्विजत्वेत्वथसम्प्राप्ते सावित्र्यामधिकारभाक् ॥१३॥
गर्भादेकादशेशैके कुर्यात्क्षत्रियवैश्ययोः ।
कारयेद्द्विजकर्माणि ब्राह्मणेनयथाक्रमम् ॥१४॥
शूद्रश्चतुर्थोवर्णस्तु सर्वसंस्कारवर्जितः ।
उक्तस्तस्यानुसंस्कारो द्विजेष्वात्मनिवेदनम् ॥१५॥
योयस्यविहितोदण्डो मेखलाजिनधारणम् ।
सूत्रंवस्त्रंचगृह्णीया-द्ब्रह्मचर्येणयन्त्रितः ॥१६॥
ब्राह्मेमुहूर्तेउत्थाय चोपस्पृश्यपयस्तथा ।


भा०- पुत्र के पैदा होते ही शास्त्र के अनुसार जातकर्म करे और उस बालक का मंगल महिने बहिर्निष्क्रमण (घर से बाहर ले जाना) करे अर्थात् चौथे महिने में मन्त्रपूर्वक सूर्यनारायण का दर्शन करावे ॥११॥ जब छः महीने का बालक हो तब उस का अन्न प्राशन संस्कार करे और जब तीन वर्ष का हो तब केशकर्म (मुण्डन) करे ॥१२॥ गर्भ से आठवें वर्ष ब्राह्मण का यज्ञोपवीत करे क्योंकि द्विज होने पर ही गायत्री का अधिकारी होता है ॥१३॥ गर्भ से ग्यारवें वर्ष क्षत्रिय का और बारहवें वर्ष वैश्य का यज्ञोपवीत ब्राह्मण से करवावे ॥१४॥ और चौथा जो शूद्र वर्ण है वह सब संस्कारों से हीन है उस का संस्कार यही कहा है कि उक्त तीनों वर्णों को अपने आत्मा को निवेदन (अधीन) कर दे ॥१५॥ ब्रह्मचर्य (यज्ञोपवीत के समय) में जिस वर्ण का जो २ दण्ड मेखला, मृगछाला-सूत्र-वस्त्र गृह्यसूत्रकारों ने कहा है उस २ को वह २ ब्राह्मणादि धारण करे ॥१६॥ ब्राह्म मुहूर्त में उठ कर स्नान-करके तीन

४ | भाषार्थसहिता ॥

त्रिराचम्यततः प्राणां-स्तिष्ठेन्मौनीसमाहितः । १७॥
अब्दैवतैःपवित्रैस्तु कृत्वाऽऽत्मपरिमार्जनम् ।
सावित्रींचजपंस्तिष्ठे-दासूर्योदयनात्पुरा ॥१८॥
अग्निकार्यंततःकुर्यात्-प्रातरेवव्रतंचरेत् ।
गुरवेतुततःकुर्यात् पादयोरभिवादनम् ॥१९॥
समित्कुशांश्चोदकुम्भ- माहृत्यगुरवेव्रती ।
प्राञ्जलिःसम्यगासीन उपस्थाययतःसदा ॥२०॥
यंयंग्रन्थमधीयीत तस्यतस्यव्रतंचरेत् ।
सावित्र्युपक्रमात्सर्वं-मावेदग्रहगोत्तरम् ॥२१॥
द्विजातिषुचरेद्भैक्ष्यं भिक्षाकालसमागते ।
निवेद्यगुरवेऽश्नीयात्संमतोगुरुणाव्रती ॥ २२ ॥
सायंसन्ध्यामुपासीनो गायत्र्यष्टशतंजपेत् ।
द्विकालभोजनार्थंच तथैवपुनराहरेत् ॥ २३ ॥


आचमन तथा तीन बार प्राणायाम कर के सावधान होकर मौन होके खड़ा रहे ॥ १७ ॥ जल देवता (आपोहिष्ठा०) इत्यादि तथा पवित्र मन्त्रों से देह का मार्जन कर के सूर्योदय पर्यन्त खड़े होके गायत्री का जप करे ॥ १८ ॥ उस के बाद अग्निहोत्र करे और प्रातःकाल के समय ही व्रत (महानाम्न्यादि) करे तत्पश्चात् गुरु के पगों में अभिवादन करे ॥ १९ ॥ फिर वह शिष्य समिधा कुश-और जल का घट गुरु के लिये लाकर हाथ जोड़ और भले प्रकार सदा गुरु के समीप बैठ कर ॥ २० ॥ जिस २ ग्रन्थ को पढ़े उस २ का व्रत करे और गायत्री के उपदेश से लेकर सब वेद के पठन पर्यन्त ॥ २१ ॥ भिक्षा के समय ब्राह्मणादि तीनों द्विजों के घरों से भिक्षा मांगकर लावे उस भिक्षा को गुरु जी को निवेदन करके गुरु की आज्ञा होने पर ब्रह्मचारी नियमबद्ध हुआ भोजन करे ॥ २२ ॥ सायंकाल की सन्ध्या में बैठा हुआ एक सौ आठबार गायत्री जपे और सायंकालको भोजन चाहे तो उसी प्रकार भिक्षा मांगलावे ॥२३॥

विष्णुस्मृतिः ॥
५

वेदस्वीकरणेहृष्टो गुर्वधीनो गुरुहिंतः ।
निष्ठांतञ्चैवयोगच्छेन्नैष्ठिकस्सउदाहृतः ॥ २४ ॥
अनेनविधिनासम्यक्कृत्वावेदमधीत्यच ।
गृहस्थधर्ममाकांक्षन्गुरुगेहादुपागतः ॥ २५ ॥
अनेनैवविधानेन कुर्याद्दारपरिग्रहम् ।
कुलेमहतिसंभूतां सवर्णांलक्षणांन्विताम् ॥ २६ ॥
परिणीयतुषण्मासान्वत्सरंवानसंविशेत् ।
औदुंबरायणोनाम ब्रह्मचारीगृहेगृहे ॥ २७ ॥
ऋतुकालेतुसंप्राप्ते पुत्रार्थीसंविशेत्तदा ।
जातेपुत्रेत्तथाकुर्यादग्न्याधेयंगृहेवसन् ॥ २८ ॥
पुत्रेजातेऽनृनौगच्छन्संप्रदुष्येत्सदागृही ।
चतुर्थेब्रह्मचारीचगृहेतिष्ठेन्नविस्मृतः ॥ २९ ॥
इति वैष्णवधर्मशास्त्र प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥


भा०- जो ब्रह्मचारी वेद पढने में प्रमत्त, गुरु के आधीन तथा गुरु का हितकारी होकर मरण पर्यंत गुरु की सेवा में ही रहे उसे नैष्ठिक ब्रह्मचारी कहते हैं ॥ २४ ॥ इस विधि से ब्रह्मचर्य धर्म को कर और वेद को पढ़के गृहस्थ धर्म की इच्छा करता हुआ गुरु के घर से आया ॥२५॥ बड़े प्रतिष्ठित कुल में पैदा हुई शुभ चिह्नोंवाली अपने वर्ण की स्त्री के साथ शास्त्रोक्त विधिसे विवाह करे ॥२६॥ विवाह करके जो छःमहीने अथवा एक वर्ष पर्यंत स्त्री से संग नहीं करता ब्रह्मचारी रहता है घर में रहते हुए भी उस ब्रह्मचारी को औदुबरायण कहते हैं ॥ २७ ॥ जब स्त्री को रजोधर्शन हो तब पुत्र की इच्छा से स्त्री का संग करे पुत्र के होने पर घर में रहता हुआ ही विधि पूर्वक अग्नि स्थापन करे ॥ २८ ॥ पुत्र के होने पर ऋतुकाल के बिना स्त्री संग करने से गृहस्थी सदा दोषी होता है और चौथे पुत्र के होने पर गृहस्थी पुरुष ब्रह्मचारी रहता हुआ भी भूल कर घर में न ठहरे किन्तु वन में जाकर तपकरे॥२९॥

इति विष्णुस्मृतौ प्रथमोऽध्यायः ॥

६ | भाषार्थसहिता ॥

अतःपरं प्रवक्ष्यामि गृहीणांधर्ममुत्तमम् ।
प्राजापत्यपदस्थानं सम्यक्कृत्यान्निबोधत ॥ ३० ॥
सर्वःकल्ये समुत्थाय कृतशौचः समाहितः ।
स्नात्वासंध्यामुपासीत सर्वकालमतन्द्रितः ॥ ३१ ॥
अज्ञानाद्यदिवामोहाद्रात्रौयद्दुरितंकृतम् ।
प्रातःस्नानेनतत्सर्वं शोधयन्तिद्विजोत्तमाः ॥ ३२ ॥
प्रविश्याथाग्निहोत्रंतु हुत्वाग्निंविधिवत्ततः ।
शुचौदेशे समासीनः स्वाध्यायं शक्तितोऽभ्यसेत् ॥३३॥
स्वाध्यायान्ते समुत्थाय स्नानंकृत्वातुमंत्रवित् ।
देवानृषीन्पितॄंश्चापि तर्पयेत्तिलवारिणा ॥ ३४ ॥
मध्यान्हे त्वथसंप्राप्ते शिष्टंभुञ्जीतवाग्यतः ।
भुक्तोपविशे विश्रान्तो ब्रह्मकिंचिद्विचारयेत् ॥३५॥
इतिहासैर्नयुंजीत त्रिकालसमयंगृही ।


भा०-इस से आगे गृहस्थियों के उत्तम धर्म को कहते हैं ब्रह्मलोक प्राप्ति फलके दाता उस कर्म को भली प्रकार सुनिये ॥३०॥ सब ब्राह्मणादि द्विज गृहस्थ प्रभात समय उठ सावधानी से शौचादि करके सदैव आलस को छोड़ कर स्नान करके संध्योपासन करें॥३१॥ अज्ञान से वा मोह से रात्रि में जो पाप किया हो उस सब को नित्य प्रातःकाल के स्नान से ब्राह्मण लोग दूर कर देते हैं ॥३२॥ फिर अग्निशाला में जाकर कल्प सूत्रोक्त विधान से अग्निहोत्र करके शुद्ध स्थान में बैठा हुआ शक्ति के अनुसार वेद का पाठ करे ॥ ३३॥ वेद पाठ के अंत में उठकर मन्त्र विधि जानने वाला द्विज फिर मन्त्र पूर्वक स्नान करके तिल और जल से देवता, ऋषि, और पितर, इनका तर्पण करे ॥ ३४ ॥ फिर मध्यान्ह काल आने पर शिष्ट ( पंच महायज्ञों से बचे हुए ) अन्न को मौन होकर भोजन विधिकरके भोग लगावे । भोजन के पीछे बैठ, और कुछ विश्राम करके कुछ वेद का विचार करे ॥ ३५ ॥ गृहस्थ पुरुष दिन के तृतीय भाग में इतिहास

विष्णुस्मृतिः ॥ ९

काले चतुर्थे संप्राप्ते गृहे वा यदि वा बहिः ॥ ३६ ॥
आसीनः पश्चिमां सन्ध्यां गायत्रीं शक्तितो जपेत् ।
हुत्वा चाथाग्निहोत्रं तु कृत्वा चाग्निपरिक्रियाम् ॥ ३७॥
बलिं च विधिवद्धुत्वा भुञ्जीत विधिपूर्वकम् ।
दिवा वा यदि वा रात्रौ अतिथित्वत्राव्रजेद्यदि ॥ ३८॥
तृणभूवारिवाग्भिस्तु पूजयंत्तद्यथाविधि ।
कथाभिः प्रीतिमाहृत्य विद्यादीन्विचारयेत् ॥ ३९॥
संनिवेश्याथ विप्रं तु संविशेत्तदनुज्ञया ।
यदि योगी तु संप्राप्तो भिक्षार्थी समुपस्थितः ॥ ४० ॥
योगिनं पूजयेन्नित्य--मन्यथा किल्विषी भवेत् ।
पुरे वा यदि वा ग्रामे योगी सन्निहितो भवेत् ॥ ४१ ॥
पूज्या नित्यं भवन्त्येव सर्वे चैत्रनिवासिनः ।


(महा भारत आदि) का भी कुछ पाठ वा विचार करे और सायंकाल होने पर घर में वा बाहर ॥ ३६ ॥ पश्चिम दिशा के सम्मुख बैठा हुआ सन्ध्योपा-सन करे और यथाशक्ति गायत्री का जप करे फिर सायंकाल का अग्निहोत्र अग्नि की सेवा ॥ ३७॥ और गृह्योक्त विधि से केवल बलि कर्म नामक भूतयज्ञ करके विधि पूर्वक भोजन करे । अर्थात् रात में देवयज्ञ रूप होम का निषेध है । जो दिन में वा रात्रि में कोई अभ्यागत आजाय तो ॥ ३८ ॥ तृण (आ-सन) भूमि बैठने का जगह, जल, और आदर सूचक वाणी से उस का सत्कार करे जाने आने की कथा (बड़ी कृपा की कि आप आये इत्यादि) से उस को संतुष्ट करके विद्या आदि का विचार करे ॥ ३९ ॥ अतिथि को प्रथम निद्रा करा उसकी आज्ञा लेकर आप सोवे । यदि भिक्षा के लिये योगी आजावे तो उस के समीप जाकर ॥ ४० ॥ योगी का विशेष पूजन करे अन्यथा पाप लगता है । नगर में वा ग्राम में यदि योगी प्राप्त हो ॥ ४१ ॥ तो उस योगी के आने से-वहा के निवासी सब पूजने योग्य होते हैं क्यों कि स्थान और वहां के

८ भाषार्थसहिता ॥

तस्मात्पूजयेन्नित्यं योगिनंगृहमागतम् ॥ ४२ ॥
तस्मिन्प्रयुक्तायापूजा साक्षयायोपकल्पते ।
गृहमेधिनांयत्प्रोक्तं स्वर्गसाधनमुत्तमम् ॥४३॥
ब्राह्मेमुहूर्तउत्थाय तत्सर्वं सम्यगाचरेत् ।
चतुःप्रकारंभिद्यन्ते गृहिणोधर्मसाधकाः ॥४४॥
वृत्तिभेदेनसततं ज्यायांस्तेषांपरःपरः ।
कुसूलधान्यकोवास्यात्कुंभीधान्यकएववा ॥ ४५ ॥
त्र्यहैहिकोवापिभवे-त्सद्यःप्रक्षालकोपिवा ।
श्रौतंस्मार्तचयत्किंचिद्विधानंधर्मसाधनम् ॥४६॥
गृहेतद्वसताकार्य-मन्यथादोषभाग्भवेत् ।
एवंविप्रोगृहस्थस्तु शान्तःशुक्लांबरःशुचिः ॥ ४७ ॥


मनुष्य पवित्र होजाते हैं तिस से घर में आये योगी का नित्य पूजन करे ॥४२॥ उस योगी अभ्यागत की जो पूजा की जाती है वह अविनाशी सुख देने वाली होती है । गृहस्थियों के लिये स्वर्ग का साधन जो उत्तम कर्म है वह यही है कि ॥४३ ॥ ब्राह्म मुहूर्त ( ३ अथवा ४ घड़ी रात रहे पर) में उठ कर उस (पू-र्वोक्त ) कर्म का भली प्रकार सेवन करै-धर्म के सिद्ध करने वाले गृहस्थी अ-पनी जीविका के भेद से चार प्रकार से भिन्न २ होते हैं ॥४४॥ उन में अगले-२ श्रेष्ठ हैं १ कुसूलधान्यक ( कोठे में इतने अन्न को जो रक्खे जिस से ३ वर्ष नि-र्वाह हो ) २ कुंभी धान्यक ( कुंडी में इतने अन्न को जो रक्खे जिस से १ वर्ष निर्वाह हो ) ॥ ४५ ॥ ३ त्र्यहैहिक (तीन दिनका जो अन्न रक्खै ) महा प्रक्षा-लक ( प्रति दिन खाने को लाने वाला ) श्रुति वा स्मृतियों में कहा जो धर्म का साधन कर्म है ॥ ४६ ॥ घर में बसते हुये मनुष्य को यह सब करना चाहिये क्योंकि न करने से दोष का भागी होता है इस प्रकार शांत स्वभाव-शुक्ल व-स्त्रों वाला-शुद्ध-गृहस्थी ब्राह्मण ॥ ४७ ॥

विष्णुस्मृतिः ॥

प्रजापतेः परं स्थानं सम्प्राप्नोति न संशयः ।
इति वैष्णवे धर्मशास्त्रे द्वितीयोऽध्यायः ॥२॥

गृहस्थो ब्रह्मचारी वा वनवासं यदाचरेत् ॥ ४८ ॥
चीरवल्कलधारी स्यादाकृष्टान्नशनो मुनिः ।
गत्वा च विजनं स्थानं पञ्चयज्ञान्न हापयेत् ॥४९॥
अग्निहोत्रं च जुहुयादन्नैर्नीवारकादिभिः ।
श्रावणेनाग्निमादाय ब्रह्मचारी वने स्थितः ॥५०॥
पञ्चयज्ञविधानेन यज्ञं कुर्यादतन्द्रितः ।
संचितं तु यदारण्यं भक्तार्थं विधिवद्वने ॥ ५१ ॥
त्यजेदाश्वयुजे मासि वन्यमन्यत्समाहरेत् ।
आकाशशायी वर्षासु हेमन्ते च जलाशयः ॥ ५२ ॥
ग्रीष्मे पञ्चाग्निमध्यस्थो भवेन्नित्यं वने वसन् ।


अच्छा उत्तम स्थान को प्राप्त होता है इस में सन्देह नहीं है ॥
इति विष्णुस्मृतौ द्वितीयोऽध्यायः ॥

गृहस्थी वा ब्रह्मचारी जब वन में निवास करना चाहे ॥ ४८ ॥ तब चीर (चीथड़े) वा वृक्षों के वक्कल को वस्त्रों की जगह धारण करे और अकृष्टान्न (जो बिना जोते बोए पैदा हो) वन के मुन्यन्न को भक्षण करे और मौन रहे और निर्जन स्थान में जाकर भी पञ्चयज्ञों का परित्याग न करे ॥ ४९ ॥ नीवार आदि अन्न से अग्निहोत्र भी करे और श्रावण मास में अग्नि को लेकर वन में जावे और ब्रह्मचर्य धारण कर वहां रहे ॥ ५० ॥ निरालस होकर पञ्चयज्ञके विधान से यज्ञ करे। जो भोजन के लिये वनका अन्न इकट्ठा किया हो ॥५१॥ उस को आश्विन के मास में त्याग दे और वन में पैदा हुए नये अन्न को संग्रह करे और वर्षा काल में आकाश (खुले ऊंचे स्थान) में जाड़ों में जल में ॥ ५२ ॥ तथा ग्रीष्म ऋतु (गरमी) में पंचाग्नि [चारों दिशामें अग्नि जलता ता हो उसके बीच में बैठे ऊपर से सूर्य्य तपते हों इसको पञ्चाग्नि तप कहते हैं]

३

१० भाषार्थसहिता ॥

कृच्छ्रं चान्द्रायणंचैव तुलापुरुषमेवच ॥ ५३ ॥
अतिकृच्छ्रं प्रकुर्वीत त्यक्त्वाकामान्शुचिस्ततः ।
त्रिसन्ध्यंस्नानमातिष्ठेत्सहिष्णुर्भूतजान्गुणान् ॥ ५४ ॥
पूजयेदतिथींश्चैव ब्रह्मचारीवनंगतः ।
प्रतिग्रहनगृहणीया-त्परेषांकिंचिदात्मवान् ॥ ५५ ॥
दाताचैवभवेन्नित्यं श्रद्दधानःप्रियंवदः ।
रात्रौस्थण्डिलशायीस्या-त्प्रपदैस्तुदिनंक्षिपेत् ॥ ५६ ॥
वीरासनेनतिष्ठेद्वा क्लेशमात्मन्यचिंतयन् ।
केशरोमनखश्मश्रु नच्छिन्द्यान्नापिकर्त्तयेत् ॥ ५७॥
त्यजन्शरीरसौहार्दं वनवासरतःशुचिः ।
चतुःप्रकारंभिद्यन्ते मुनयःशंसितव्रताः ॥ ५८ ॥
अनुष्ठानविशेषेण श्रेयांस्तेषांपरःपरः ।


के मध्य में वन में बसता हुआ मनुष्य नित्य रहे और तिसके अनन्तर कृच्छ्र , चांद्रायण-तुला पुरुष॥५३॥ अतिकृच्छ्र इन व्रतों को निष्काम होकर शुद्धता से करे और पांचो भूतों के गुणों ( शब्द, स्पर्श, रूप-रस-गन्ध-) को सहता हुआ त्रिकाल स्नान करे ॥ ५४ ॥ वन में प्राप्त हुआ ब्रह्मचारी वानप्रस्थ अतिथियों का पूजन करै और अपने आपमें नियम बद्ध रहता हुआ किसी से प्रतिग्रह (दान) न ले ॥ ५५ ॥ प्रियभाषी और श्रद्धावान् होकर जो अपने पास फल मूलादि हों उनका प्रतिदिन दान दिया करे स्वयं बनाये मंच ( चबूतरे ) पर रातमें सोवे और पैरों की अंगुलियोंसे खड़ा जप करता हुआ दिनकोविता दे ॥५६॥ अथवा अपने मनमें क्लेश मानता हुआ वीरासन से दिन में बैठा रहै और शिरके केश-रोम-नख-दाढ़ी-इनको न कैंची से कतरावे और न खुरे से कटावे ॥ ५७॥ वन वास में तत्पर शुद्ध अपने शरीर की प्रीति को छोड़ता हुआ अपने पूर्वोक्त कर्म को करे इस उत्तम प्रशस्त व्रतवाले मुनि अनुष्ठान के भेद से चारप्रकार के होते हैं॥५८॥ उनमें अगला श्रेष्ठ है-१ वर्ष भरके लिये विधि पूर्वक

विष्णुस्मृतिः ॥ ११

वार्षिकं वन्यमाहार-माहृत्य विधिपूर्वकम् ॥ ५९ ॥
वनस्थधर्ममातिष्ठन्नयेत्कालं जितेन्द्रियः ।
भूरिसंवार्षिकश्चायं वनस्थः सर्वकर्मकृत् ॥ ६० ॥
आदेहपतनात्तिष्ठेन्मृत्युं चैवानकांक्षति ।
षण्मासांस्तुततश्चान्यः पञ्चयज्ञक्रियापरः ॥ ६१ ॥
कालेचतुर्थभुञ्जानो देहंत्यजतिधर्मतः ।
त्रिंशद्दिनार्थमाहृत्य वन्यान्नानिशुचिव्रतः ॥६२॥
निर्वर्त्यसर्वकार्याणि स्याच्चषष्ठान्नभोजनः ।
दिनार्थमन्नमादाय पञ्चयज्ञक्रियारतः ॥६३॥
सद्यःप्रक्षालकोनाम चतुर्थःपरिकीर्तितः ।
एवमेतेहि वैमान्या मुनयःशंसितव्रताः ॥६४॥
इति० वैष्ण० धर्म० तृतीयोऽध्यायः ॥३॥


वन के आहार (नीवारादि) को संचय करके वानप्रस्थों के धर्म में ठहरा हुआ इन्द्रियोंको जीत और आलस्य को छोड़कर ॥ ५९ ॥ काल को जो व्यतीत करे इन सब कर्मों के कर्त्ता वानप्रस्थ को भूरिसंवाषिक कहते हैं ॥ ६० ॥ २ दूसरा-मरण तक वन में रहै और मृत्यु की भी इच्छा न करे पंचमहायज्ञ करने में तत्पर हुआ छः महीने तक के अन्नका संचय करके ॥ ६१ ॥ चौथे काल (सन्ध्या) में भोजन करता हुआ धर्म से देह को त्यागता है । ३ तीसरा तीस दिन के लिये वन के अन्न का संचय करके और शुद्ध व्रत होकर ॥ ६२ ॥ सब कर्मों को करके छठे प्रहर में रात को दश बजे भोजन करे । ४ चौथा एक दिन के लिये अन्न का संग्रह करके पञ्चमहायज्ञ कर्म में तत्पर रहै ॥६३॥ यह सद्यः प्रक्षालक नाम चौथा कहा है इस प्रकार ये चारों प्रशस्त व्रतवाले मुनि पूजनीय होते हैं ॥६४॥

इति विष्णुस्मृतौ ३ अध्यायः ।

१२
भाषार्थसहिता ॥

यथोत्तमानि स्थानानि प्राप्नुवन्तिदृढव्रताः ।
ब्रह्मचारी गृहस्थोवा वानप्रस्थोयतिस्तथा ॥६५॥
विरक्तःसर्वकामेषु पारिव्राज्यंसमाश्रयेत् ।
आत्मन्यग्नीन्समारोप्यदत्वाचाभयदक्षिणाम् ॥६६॥
चतुर्थमाश्रमंगच्छेद्व्राह्मणःप्रव्रजन्गृहात् ॥
आचार्येणसमादिष्टं लिङ्गंयत्नात्समाश्रयेत् ॥६७॥
शौचमाश्रमसम्वद्धं यतिधर्मांश्चशिक्षयेत् ।
अहिंसासत्यमस्तेयं ब्रह्मचर्यमफल्गुता ॥६८॥
दयांचसर्वभूतेषु नित्यमेतद्यतिश्चरेन् ।
ग्रामान्तेवृक्षमूलेच नित्यकालनिकेतनः । ६९॥
पर्यटेत्कीटवद्भूमिं वर्षास्वेकत्रसंविशेत् ।
वृद्धानामातुराणांच भीरुणांसंगवर्जितः ॥७०॥


भा०जिस प्रकार ब्रह्मचारी गृहस्थ वानप्रस्थ और यतिये चारों दृढ़ व्रत हुए उत्तम स्थान (ब्रह्म लोक) को प्राप्त होते हैं वह यह है कि ॥६५॥ सब कामनाओं से विरक्त हो संन्यास का सम्यक् आश्रय लेवे कि यही सब इष्ट का साधक है अपने शरीर ही में अग्नियों का समारोप मन्त्रपूर्वक करके और स्त्री आदिकों को अभय दक्षिणा दे (ठीक २ समझा कर) ॥ ६६ ॥

घर से चलकर ब्राह्मण चौथे आश्रम में पग धरे आचार्य के कहे हुए चिह्न (दंड आदि) को यत्न से धारण करे ॥ ६७ ॥ संन्यास के (यतीनांतुचतुर्णाश्म्) शौच और संन्यासियों के धर्मों को सीखे अहिंसा-सत्य-चोरी का त्याग-ब्रह्मचर्य-अफल्गुता (निरर्थक बोलने आदि का त्याग) ॥६८॥ सब प्राणियों पर दया इतने कर्म नित्य नियम से करे-ग्राम के समीप किसी वृक्ष के नीचे सदैव स्थान रक्खे ॥ ६९ ॥ कीड़े के समान पृथ्वी पर विचरे । वर्षा काल में एक जगह बैठे विचरे नहीं और वृद्ध-रोगी-डरपोक इन का संग न करे ॥ ७० ॥