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अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

पृष्ठ 93, कुल 805 में से

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पृष्ठ 93

८ भाषार्थसहिता ॥

तस्मात्पूजयेन्नित्यं योगिनंगृहमागतम् ॥ ४२ ॥
तस्मिन्प्रयुक्तायापूजा साक्षयायोपकल्पते ।
गृहमेधिनांयत्प्रोक्तं स्वर्गसाधनमुत्तमम् ॥४३॥
ब्राह्मेमुहूर्तउत्थाय तत्सर्वं सम्यगाचरेत् ।
चतुःप्रकारंभिद्यन्ते गृहिणोधर्मसाधकाः ॥४४॥
वृत्तिभेदेनसततं ज्यायांस्तेषांपरःपरः ।
कुसूलधान्यकोवास्यात्कुंभीधान्यकएववा ॥ ४५ ॥
त्र्यहैहिकोवापिभवे-त्सद्यःप्रक्षालकोपिवा ।
श्रौतंस्मार्तचयत्किंचिद्विधानंधर्मसाधनम् ॥४६॥
गृहेतद्वसताकार्य-मन्यथादोषभाग्भवेत् ।
एवंविप्रोगृहस्थस्तु शान्तःशुक्लांबरःशुचिः ॥ ४७ ॥


मनुष्य पवित्र होजाते हैं तिस से घर में आये योगी का नित्य पूजन करे ॥४२॥ उस योगी अभ्यागत की जो पूजा की जाती है वह अविनाशी सुख देने वाली होती है । गृहस्थियों के लिये स्वर्ग का साधन जो उत्तम कर्म है वह यही है कि ॥४३ ॥ ब्राह्म मुहूर्त ( ३ अथवा ४ घड़ी रात रहे पर) में उठ कर उस (पू-र्वोक्त ) कर्म का भली प्रकार सेवन करै-धर्म के सिद्ध करने वाले गृहस्थी अ-पनी जीविका के भेद से चार प्रकार से भिन्न २ होते हैं ॥४४॥ उन में अगले-२ श्रेष्ठ हैं १ कुसूलधान्यक ( कोठे में इतने अन्न को जो रक्खे जिस से ३ वर्ष नि-र्वाह हो ) २ कुंभी धान्यक ( कुंडी में इतने अन्न को जो रक्खे जिस से १ वर्ष निर्वाह हो ) ॥ ४५ ॥ ३ त्र्यहैहिक (तीन दिनका जो अन्न रक्खै ) महा प्रक्षा-लक ( प्रति दिन खाने को लाने वाला ) श्रुति वा स्मृतियों में कहा जो धर्म का साधन कर्म है ॥ ४६ ॥ घर में बसते हुये मनुष्य को यह सब करना चाहिये क्योंकि न करने से दोष का भागी होता है इस प्रकार शांत स्वभाव-शुक्ल व-स्त्रों वाला-शुद्ध-गृहस्थी ब्राह्मण ॥ ४७ ॥