अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
द्वादशइत्येव पुत्राः पुराणदृष्टाः ॥१२॥ स्वयमुत्पादितः स्व-
६८ वसिष्ठस्मृतिः ॥
द्वादशइत्येव पुत्राः पुराणदृष्टाः ॥१२॥ स्वयमुत्पादितः स्व-
क्षेत्रे संस्कृतायां प्रथमः ॥ १३ ॥ तदलाभे नियुक्तायां क्षेत्रजो
द्वितीयः ॥ १४॥ तृतीयः पुत्रिका विज्ञायते ॥ १५ ॥ अभ्रातृका
पुंसः पितॄनभ्येति प्रतीचीनं गच्छति पुत्रत्वम् ॥ १६ ॥ तत्र
श्लोकः ॥ १७ ॥
अभ्रातृकांप्रदास्यामि तुभ्यंकन्यामलङ्कृताम् ।
अस्यांयोजायतेपुत्रः समेपुत्रोभवेदिति ॥ १८ ॥
पौनर्भवश्चतुर्थः ॥ १९ ॥ या कौमारं भर्त्तारमुत्सृज्यान्यैः
सह चरित्वा तस्यैव कुटुम्बमाश्रयति सा पुनर्भूभवति ॥२०॥
या च क्लीबं पतितमुन्मत्तं वा भर्त्तारमुत्सृज्यान्यं पतिं विन्द-
ते मृते वा सा पुनर्भूभवति ॥ २१ ॥ कानीनः पञ्चमः ॥ २२ ॥
लोगों ने वा पुराण ग्रन्थों में बारह ही प्रकार के पुत्र देखे जाने वा माने जाते हैं ॥१२॥ अपनी विवाहिता पत्नी में स्वयं उत्पन्न किया पहिला औरस ॥१३॥ औरस के न होने पर नियुक्त स्त्री में उत्पन्न किया द्वितीय क्षेत्रज ॥ १४ ॥ पुत्री में होने वाले सन्तान को अपना दायभागी स्वीकार करना तीसरा ॥१५॥ श्रुति वेद में लिखा है कि "जिस के कोई भाई नहीं होता ऐसी कन्या पति के घर जाकर पति के मेल से आप ही पुत्र भाव को प्राप्त होती और फिर उलटी आ कर पिता की दायभागिनी बनती तथा पिण्ड देके पिता को संसार से पार करती है"॥१६॥ उसमें श्लोक भी प्रमाण है ॥१७॥ कन्या का पिता वरसे कहता है कि विना भाई वाली वस्त्रों तथा आभूषणों से शोभित कन्या मैं तुम को दूंगा। इस कन्या में जो पुत्र उत्पन्न होगा वह मेरा पुत्र हो ॥१८॥ पुनर्भू (जिस ने पहिले पति को त्याग के अन्य पति कर लिया हो) से उत्पन्न प्रथम पतिका चौथा पौनर्भव पुत्र कहाता है ॥ १९ ॥ जो स्त्री अपने कुमारपति को त्याग कर अन्य पुरुषों के साथ सब प्रकार का व्यवहार करके उसी पहिले पति का फिर सहारा लेवे वह स्त्री पुनर्भू कहाती है ॥२०॥ और जो स्त्री नपुंसक पतित वा उन्मत्त हुए वा मर जाने पर अपने पति को त्याग के अन्य पति को प्राप्त होती वह भी पुनर्भू कहाती है ॥ २१ ॥ विवाह से पहिले कन्या में पैदा हुआ पांचवां कानीन पुत्र कहाता है ॥२२॥ जो विना विवाही पिता के घर में काम
भाषार्थसहिता ॥ ६९
या पितृगृहेऽसंस्कृता कामादुत्पादयेत्, मातामहस्य पुत्रो भ-
वतीत्याहुः ॥ २३ ॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥ २४ ॥
अप्रत्तादुहितायस्य पुत्रंविन्देततुल्यतः ।
पुत्रीमातामहस्तेन दद्यात्पिण्डंहरेद्धनम् , इति ॥ २५ ॥
गृहे च गूढोत्पन्नः षष्ठः ॥ २६ ॥ इत्येते दायादा बान्ध-
वास्त्रातारो महतो भयादित्याहुः ॥ २७ ॥ अथादायादबन्धू-
नां सहोढएव प्रथमो या गर्भिणी संस्क्रियते तस्यां जातः
सहोढः पुत्रो भवति ॥ २८ ॥ दत्तको द्वितीयो यं मातापितरौ
दद्याताम् ॥२९॥ क्रीतस्तृतीयस्तच्छुनःशेपेन व्याख्यातम् ॥३०॥
हरिश्चन्द्रो हवै राजा सोऽजीगर्तस्य सौयावसेः पुत्रं चिक्राय
॥ ३१ ॥ स्वयं क्रीतवान् स्वयमुपागतश्चतुर्थः, तच्छुनःशेपेन
व्याख्यातम् ॥ ३२ ॥ शुनःशेपो हवै यूपे नियुक्तो देवतास्तु-
वश होकर किसी से पुत्र को उत्पन्न करे वह कानीन अपने मातामह—नाना का पुत्र होता ऐसा ऋषि लोग कहते हैं ॥२३॥ और भी श्लोक का प्रमाण कहते हैं कि॥ २४ ॥ बिना विवाही जिस की पुत्री अपने तुल्य पुरुष से पुत्र को प्राप्त होतो नाना उस पुत्र से पुत्र वाला हो जाता है वह कानीन पुत्र अपने नाना का पिण्डदान करे और धन का दायभागी (वारिस) बने ॥ २५ ॥ अपने घर में गुप्त रूप से उत्पन्न हुआ गूढोत्पन्न छठा पुत्र है ॥२६॥ ये छहों पुत्र पिता के धन के दायभागी और बड़े भय से बचाने वाले हैं ऐसा ऋषि लोग कहते हैं ॥ २७ ॥ अब अदायाद (जो पिता के धन में हक़दार नहीं उन) पुत्रों में पहिला सहोढ कहाता है। जो स्त्री गर्भवती हो तब जिस के साथ गर्भिणी का विवाह हो उस स्त्री से उत्पन्न हुआ सहोढ पुत्र होता है ॥२८॥ माता पिता ने जिस को दे दिया वह उस का द्वितीय दत्तक पुत्र कहाता है ॥२९॥ धन देकर मोल लिया तीसरा क्रीत पुत्र कहाता है कि जैसे शुनःशेप ऋषि हुए ॥३०॥ हरिश्चन्द्र नामक राजा हुआ था उस ने सूयवस के सन्तान अजीगर्त के पुत्र शुनःशेप को द्रव्य देकर खरीद लिया ॥ ३१ ॥ स्वयं राजा ने खरीदा और शुनःशेप अपनी इच्छा से स्वयं राजा के निकट आगया इस से चौथा क्रीत पुत्र शुनःशेप के साथ व्याख्यात जानो ॥ ३२ ॥ फिर शुनःशेप यज्ञ के यूपस्तम्भ में बांधा गया, वहां उस ने मन्त्रों द्वारा देवता
१० वसिष्ठस्मृतिः ॥
ष्टाव, तस्येह देवताः पाशं विमुमुचुः, तमृत्विजऊचुर्ममैवार्यं पुत्रोऽस्त्विति,तान् ह न संपेदे ते संपादयामासुरेषएव यं कामयेत तस्य पुत्रोऽस्त्विति, तस्य ह विश्वामित्रो होताऽऽसीत्तस्य पुत्रत्वमियाय ॥ ३३ ॥ अपविद्धः पञ्चमो यं मातापितृभ्यामपास्तं प्रतिगृह्णीयात् ॥ ३४ ॥ शूद्रापुत्रएव षष्ठो भवतीत्याहुः ॥ ३५ ॥ इत्येतेऽदायादा बान्धवाः ॥३६॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥ ३७ ॥ यस्य पूर्वेषां षष्णां न कश्चिद्दायादः स्यादेते तस्य दायं हरेरन्निति ॥ ३८ ॥ अथ भ्रातॄणां दायविभागः ॥ ३९ ॥ द्व्यंशं ज्येष्ठो हरेद्,गवाश्वस्य चानुदशमम् ॥ ४० ॥ अजावयो गृहं च कनिष्ठस्य ॥४१॥ कार्ष्णायसं गृहोपकरणानि च मध्यमस्य ॥४२॥ मातुः पारिणेयं स्त्रियो विभजेरन्॥४३॥
ओं की स्तुति की, इस संसार में उस शुनःशेप को देवताओं ने बन्धनों से मुक्त किया, उस यजमान राजा से ऋत्विज् लोगों ने पृथक् कहा कि यह मेरो पुत्र हो जाय यह मेरा हो इत्यादि । उन ऋत्विजों के पास शुनःशेप नहीं गया, तब ऋत्विजों ने यह सिद्धान्त स्थिर किया कि यह बालक हम सब में जिस के पास रहने की कामना करे उसी का पुत्र हो जाय । उस राजा हरिश्चन्द्र के यज्ञ में ऋग्वेदी काम के सात होताओं में प्रधान होता ऋत्विज् ब्रह्मर्षि विश्वामित्र हुए थे उन का पुत्र शुनःशेप बना ॥ ३३ ॥ जिस को माता पिता ने त्याग दिया वा फेंक दिया उस को जो लाकर रक्षा करे उस का वह पांचवां अपविद्ध पुत्र कहाता है ॥ ३४ ॥ और शूद्रा का पुत्र छठा होता है ॥ ३५ ॥ ये छः अदायाद पुत्र हैं ॥ ३६ ॥ और भी ऋषि लोग कहते हैं कि ॥ ३७ जिस पुरुष के पूर्व कहे औरसादि छहों में से कोई भी दाय भागी पुत्र न हो उस के धन को ये छहों ले सकते हैं ॥३८॥ अब भाइयों का दायभाग दिखाते हैं ॥ ३९ ॥ ज्येष्ठ भाई दो हिस्सा लेवे और गौ घोड़ों में से दशवां हिस्सा अधिक लेवे ॥ ४० ॥ भेड़ बकरी और घर इन के दो भाग छोटा भाई लेवे ॥ ४१ ॥ लोहादि काले वस्तु तथा घर के अन्य सामान को मंझला भाई दो भाग लेवे ॥ ४२ ॥ माता के पास अपने विवाह के समय का जो आभूषणादि होवें उन में सब बहुओं को बराबर भाग मिले ॥ ४३ ॥
भाषार्थसहिता ॥ ३९
यदि ब्राह्मणस्य ब्राह्मणीक्षत्रियावैश्यासु पुत्राः स्युस्त्र्यं-
शं ब्राह्मण्याः पुत्रो हरेत, द्व्यंशं राजन्यायाः पुत्रः सम-
मितरे विभजेरन् ॥४४॥ येन चैषां स्वयमुत्पादितं स्याद् द्व्यंश
मेव हरेत् ॥ ४५ ॥ अनंशास्त्वाश्रामान्तरगताः ॥ ४६ ॥ क्लीवो-
न्मत्तपतिताश्च ॥ ४७ ॥ भरणं क्लीवोन्मत्तानाम् ॥४८॥ प्रेत-
पत्नी षण्मासान् व्रतचारिण्यक्षारलवणं भुञ्जानाऽधःशयीतो-
र्ध्वं षड्भ्यो मासेभ्यः स्नात्वा श्राद्धं च पत्ये दत्त्वा विद्याकर्म
गुरुयोनिसंबन्धान् सन्निपात्य पिता भ्राता वा नियोगं कार-
येत्तपसे ॥४९॥ न सोन्मत्तामवशां व्याधितां वा नियुञ्ज्यात्
॥५०॥ ज्यायसीमपि षोडशवर्षाणि, नचेदामयावी स्यात्॥५१॥
यदि ब्राह्मण की ब्राह्मणी क्षत्रिया वैश्या ये तीनों वर्ण की विवाहित स्त्रियां हों और उन सब में पुत्र उत्पन्न हुए हों तो तीन भाग ब्राह्मणी के पुत्र को, दो भाग क्षत्रिया के पुत्र को मिलें और बाकी बचे पुत्र बराबर भाग बांट लेवें ॥ ४४ ॥ इन पुत्रों में से जिस ने जितना धनादि स्वयं पैदा किया हो उस में से भी वह दो ही भाग लेवे ॥ ४५ ॥ गृहाश्रम से भिन्न आश्रम में गये भाई लोग पिता के धन में दायभागी नहीं हैं ॥ ४६ ॥ नपुंसक, उन्मत्त ( पागल ) और पतित भाई भी दायभागी नहीं हैं ॥ ४७ ॥ नपुंसक और उन्मत्तों को भी भोजन वस्त्र मिलना चाहिये ॥ ४८ ॥ मरे हुए पुरुष की पत्नी छः महिने तक खार और लवण को छोड़ कर हविष्य भोजन करती हुई व्रत करके पृथ्वी पर सोवे छः महिने के उपरान्त स्नान कर पति का श्राद्ध करके, पति को विद्या पढ़ाने और कर्म कराने वाले गुरु लोगों और पति के भाई आदि की सभा करके सबकी राय होतो स्त्री के लिये सन्तान की विशेष अपेक्षा होने पर स्त्री का पिता वा भाई तप के लिये नियोग करा देवे ( कि उत्पन्न हुआ सन्तान मृत पिता का स्थानापन्न होकर श्राद्धादि कर्म रूप तप करेगा ) ॥४९॥ यदि वह मृत पुरुष की पत्नी उन्मत्त ( पागल ) स्वेच्छा चारिणी अथवा रोगिणी होतो वह पितादि नियोग न करावे ॥ ५० ॥ यदि उन्मत्तादि न हो किन्तु श्रेष्ठ हो तो भी सोलह वर्ष की आयु से पहिले नियोग न करावे । और जिस से नियोग कराना चाहे वह भी रोगी न हो ॥ ५१ ॥ नियुक्त पु-
७२ वसिष्ठस्मृतिः ॥
प्राजापत्ये मुहूर्त्ते पाणिग्राहवदुपचरेत् ॥ ५२ ॥ अन्य-
त्र संप्रहास्याद् वाक्पारुष्याद् दण्डपारुष्याच्च ॥ ५३॥ ग्रासा-
च्छादनस्नानानुलेपनेषु प्राग्गामिनी स्यात् ॥ ५४ ॥ अनि-
युक्तायामुत्पन्न उत्पादितुः पुत्रो भवतीत्याहुः ॥ ५५ ॥ स्या-
च्चेन्नियोगिनो रिक्थम् ॥ ५६॥ लोभान्नास्ति नियोगः ॥ ५७ ॥
प्रायश्चित्तं वाऽप्युपनियुञ्ज्यादित्येके ॥५८ ॥ कुमार्यृतुमती
त्रीणि वर्षाण्युपासीतोर्ध्वं त्रिभ्यो वर्षेभ्यः पतिं विन्देत्तुल्यम्
॥ ५९ ॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥ ६० ॥
पितुःप्रमादान्नुयदीहकन्या वयःप्रमाणंसमतीत्यदीयते ।
साहन्तिदातारमुदीक्षमाणा कालातिरिक्तागुरुदक्षिणेव ॥६१॥
प्रयच्छेन्नग्निकांकन्यामृतुकालभयात्पिता ।
रुप चार घड़ी रात रहे विवाहित पति के तुल्य नियुक्ता स्त्री से व्यवहार
करे ॥ ५२ ॥ परन्तु स्त्री के साथ उपहास वा किसी प्रकार की बात चीत न
करे । न धमकावे और किसी अनुचित को देख कर मृत पति के तुल्य नियुक्त
पुरुष को पीटने का भी अधिकार नहीं है ॥ ५३ ॥ भोजन वस्त्र स्नान और
अनुलेपन इन कामों में पूर्व मृत पति के ध्यान से चलने वाली हो अर्थात्
नियुक्त को पति मान भोजनादि न करे ॥५४॥ नियुक्त न हुई अन्य की स्त्री में
उत्पन्न किया पुत्र उत्पादक पुरुष का होगा ऐसा ऋषि लोग कहते हैं ॥५५॥
यदि नियुक्ता स्त्री में उत्पन्न पुत्र भी उत्पादक का हो तो वह नियुक्त पिता
के धन का भागी होगा ॥ ५६ ॥ काम भोगादि के लालच से नियोग नहीं है
॥ ५७ ॥ लोभ से नियोग करने में कोई आचार्य प्रायश्चित्त करना कहते हैं
॥ ५८॥ यदि पिता वा भाई कन्या का विवाह न करें और वह ऋतुमती (रजस्व-
ला ) होने लगे तो तीन वर्ष तक रजस्वला होती हुई पितादि की बाट देखे ।
तीन वर्ष के उपरान्त अपने तुल्य योग्य वर से स्वयं विवाह कर लेवे ॥ ५९ ॥
इस पर श्लोकों का भी प्रमाण कहते हैं कि ॥ ६० ॥ गृहस्थाश्रम में पिता के
प्रमाद से यदि कन्या ऋतुमती होने पर विवाही जाती है तो वह कन्या
विवाह की बाट देखती हुई कन्यादान करने वाले का नाश करती है । जैसे कि
देने का समय निकल जाने पर गुरु को दी दक्षिणा शिष्य का नाशक करती
है ॥ ६१ ॥ रजस्वला होने का अवसर आने से पहिले ऋतुमती होने के भय
भाषार्थसहिता ॥ ३३
ऋतुमत्यंाहितिष्ठन्त्यां दोषःपितरमृच्छति ॥ ६२ ॥
यावश्वकन्यामृतवःस्पृशन्ति तुल्यैःसकामामहियाच्यमानाम्।
भ्रूणानितावन्तिहतानिताभ्यां मातापितृभ्यामितिधर्मवादः।६३
अद्भिर्वाचाचदत्तायां म्रियेतादौवरोयदि ।
नचमन्त्रोपनीतास्यात् कुमारीपितुरेवसा ॥ ६४ ॥
बलाच्चेत्प्रहताकन्या मन्त्रैर्यदिनसंस्कृता ।
अन्यस्मैविधिवद्देया यथाकन्यातथैवसा ॥ ६५ ॥
पाणिग्राहेमृतेबाला केवलंमन्त्रसंस्कृता ।
से पिता कन्या का दान कर देवे । यदि ऋतुमती होती हुई विवाह से पहिले पिता के घर पर कन्या रहे तो पिता को दोष लगता है ॥ ६२ ॥ कामना रखती हुई कन्या को चाहने वाले योग्य वरों के विद्यमान होते हुए भी जितने मास तक पिता के न देने से कन्या रजस्वला होतो रहे उतनी ही गर्भहत्याओं का पाप कन्या के माता पिता को लगता है यह धर्मशास्त्रकारों का कथन है ॥६३॥ हाथ में जल लेके या वाणीमात्र से टीका लगन सब हो गयी हो अथवा कन्या दान भी पिताने कर दिया हो परन्तु मन्त्रों के साथ पति ने पाणिग्रहण न किया हो तथा सप्तपदी न हुई हो और ऐसे अवसर में यदि वर पति मर जावे तो वह पिता की अविवाहिता कुमारी कन्या ही मानी जायगी । इस दशा में पिता अन्य वर के साथ उसका विधिपूर्वक विवाह कर देवे ॥ ६४ ॥ मन्त्रों द्वारा विवाह संस्कार होनेसे पहिले यदि किसीने बल पूर्वक कन्या को हर लिया (लेगया) हो तो विधिपूर्वक वह कन्या अन्य वर को देदेनी चाहिये क्योंकि जैसी कन्या होती वैसी ही वह है ॥ ६५ ॥ और यदि पाणिग्रहण तक भी मन्त्रों द्वारा संस्कार हो गया हो किन्तु सप्तपदी न हुई हो और उसने किसी के साथ संग भी न किया हो या किसी ने बल पूर्वक भी दूषित न की हो तो भी उस का अन्य वर के साथ विवाह संस्कार हो सकता है (सब धर्मशास्त्रों का निचोड़ सिद्धान्त यह है कि यदि मन से वर का स्वीकार हो जाने पर भी अन्य वर के साथ विवाह न हो तो उत्तम कोटि है उदाहरण सावित्री है । वाग्दान (टीका लगुन ) हो जाने पर अन्यवर के साथ विवाह, होना, मध्यम कोटि है । जिस के उदाहरण संप्रति अनेक हैं। और कन्यादान तथा पाणिग्रह तक भी हो जाने पर सप्तपदी से पहिले अन्यवर के साथ विवाह होना
७४ | वसिष्ठस्मृतिः ॥
साचेदक्षतयोनिःस्यात् पुनःसंस्कारमर्हति । इति ॥ ६६ ॥
प्रोषितपत्नी पञ्चवर्षाण्युपासीतोर्ध्वं पञ्चभ्यो वर्षेभ्यो भ-
र्तृसकाशं गच्छेत् ॥ ६७ ॥ यदि धर्मार्थाभ्यां प्रवासं प्रत्यनुका-
मा न स्याद् यथाप्रेतएवं वर्त्तितव्यं स्यात् ॥ ६८ ॥ एवं ब्राह्म-
णी पञ्च प्रजाताऽप्रजाता चत्वारि, राजन्या प्रजाता पञ्चाऽप्रजाता
त्रीणि, वैश्या प्रजाता चत्वार्यप्रजाता द्वे, शूद्रा प्रजाता त्रीण्यप्र-
जातैकम् ॥ ६६ ॥ अत ऊर्ध्वं समानोदकपिण्डजन्मर्षिगोत्रा-
णां पूर्वः पूर्वो गरीयान् ॥ ७० ॥ नतु खलु कुलीने विद्यमाने
परगामिनी स्यात् ॥ ७१॥ यस्य पूर्वेषां षण्णां न कश्चिद् दायादः
निकृष्ट कोटि है। इस से आगे शास्त्र मर्यादा से द्वितीय विवाह कदापि नहीं हो सकता किन्तु सप्तपदी के बाद में अन्य के साथ विवाह करना विवाहित स्त्रियों के अन्य व्यभिचार के तुल्य वह भी व्यभिचार नाम जार कर्म माना जायगा ) ॥ ६६ ॥ विदेश में गये पुरुष की पत्नी पांच वर्ष तक अपने पति की बाट देखे उस के उपरान्त पति के समीप देशान्तर में चली जाये ॥६७॥ यदि धर्म वा धन के कारण पति का विदेश जाना न चाहती हो और वह चला ही जावे तो पति के मर जाने पर विधवा होने के समान विधवाओं के धर्म का पालन करे ॥ ६८ ॥ इसी प्रकार ब्राह्मणी के कोई सन्तान हो तो पाच वर्ष तक और सन्तान न हुआ हो तो चार वर्ष तक विदेश गये पति की बाट देख कर विदेश को जावे । क्षत्रिया स्त्री सन्तान वाली हो तो पांच वर्ष तक तथा सन्तान न हुए हों तो तीन वर्ष तक बाट देखे । वैश्या स्त्री सन्तान वाली हो तो चार वर्ष तक तथा बिना सन्तान की हो तो दो वर्ष तक बाट देखे । और शूद्रा स्त्री सन्तान वाली हो तो तीन वर्ष और बिना सन्तान की हो तो एक वर्ष तक विदेश गये पति की बाट देख कर पति के समीप चली जावे । ब्राह्मणी आदि स्त्रियों में क्रमशः धर्म के न्यूनाधिक भाव से काम भी न्यूनाधिक सतावेगा यह आशय धर्म शास्त्र कार ने दिखाया जताया है ॥ ६९ ॥ समानोदक, सपिण्ड, और एक गोत्र इन में पर २ की अपेक्षा पूर्व २ के साथ सम्बन्ध वा मेल होना अन्तरङ्ग होने से श्रेष्ठ है ॥ ७० ॥ कुलीन स-मानोदकादि पुरुष के विद्यमान होते हुए स्त्री अन्य के साथ नियोगादि न करे ॥ ७१ ॥ जिस पुरुष के पूर्वोक्त छः पुत्रों में से कोई भी दायभागी न हो
भाषार्थसहिता ॥ ७५
स्यात् सपिण्डाः पुत्रस्थानीया वा तस्य धनं विभजेरन् ॥ ७२ ॥ तेषामलाभआचार्यान्तेवासिनौ हरेयाताम् ॥ ७३ ॥ तयोरलाभे राजा हरेत् ॥ ७४ । नतु ब्राह्मणस्य राजा हरेत् ॥ ७५ ॥ ब्रह्मस्वं तु विषं घोरम् ॥ ७६ ॥
नविषंविषमित्याहुर्ब्रह्मस्वंविषमुच्यते ।
विषमेकाकिनंहन्ति ब्रह्मस्वंपुत्रपौत्रकम् । इति ॥७७॥
त्रैविद्यसाधुभ्यः संप्रयच्छेदिति ॥ ७८ ॥
इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे सप्तदशाऽध्यायः ॥ १७ ॥
शूद्रेण ब्राह्मण्यामुत्पन्नश्चाण्डालो भवतीत्याहुः,राजन्यायां वैणो वैश्यायामन्त्यावसायी ॥१॥ वैश्येन ब्राह्मण्यामुत्पन्नो रामको भवतीत्याहुः, राजन्यायां पुल्कसः ॥२॥ राजन्येन ब्राह्मण्यामुत्पन्नः सूतो भवतीत्याहुः ॥३॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥ ४ ॥॥
उस के धनादि को पुत्र के स्थानापन्न वा सपिण्ड के मनुष्य आपस में बांट कर लेलेंवे ॥ ७२ ॥ यदि सपिण्ड नाम सात पीढ़ी में भी कोई न हो तो गुरु और शिष्य लोग उस के धनादि को लेंवें ॥ ७३ ॥ यदि गुरु शिष्य भी नहीं तो उस का धन राजा लेवे ॥ ७४ ॥ परन्तु ब्राह्मण का धन राजा न लेवे ॥ ७५ ॥ ब्राह्मण का धन लेना घोर विष है ॥ ७६ ॥ विष को विद्वान् लोग विष नहीं कहते किन्तु ब्राह्मण का धन विष कहाता है । क्योंकि विष एक मनुष्य को मारता है और ब्राह्मण का धन पुत्र पौत्रादि सहित सब कुल का नाश कर देता है ॥ ७७ ॥ इस से लावारिस ब्राह्मण के धन को राजा तीनों वेदों के जानने वाले सुपात्र ब्राह्मणों को दे देवे ॥ ७८ ॥
यह वासिष्ठ धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में सत्रहवां अध्याय पूरा हुआ ॥ १७ ॥
शूद्र पुरुष से ब्राह्मणी में उत्पन्न हुआ चाण्डाल है ऐसा ऋषि लोग कहते हैं । शूद्र से क्षत्रिया कन्या में हुआ वैण और शूद्र पुरुष से वैश्य स्त्री में अन्त्यावसायी नामक नीच सन्तान पैदा होता है ॥ १॥ वैश्य पुरुष से ब्राह्मणी में उत्पन्न हुआ रामक, और वैश्य से क्षत्रिय कन्या में पैदा हुआ पुल्कस जाति होता ऐसा कहते हैं ॥ २ ॥ क्षत्रिय पुरुष से ब्राह्मणी में पैदा हुआ सूत होता ऐसा कहते हैं ॥ ३ ॥ और भी श्लोक का प्रमाण कहते हैं कि ॥ ४ ॥ नीच पुरुष
१०
१६ वसिष्ठस्मृतिः ॥
छन्नोत्पन्नास्तुयेकेचित् प्रातिलोम्यगुणाश्रिताः ।
गुणाचारपरिभ्रंशात् कर्मभिस्तान्विभावयेत् । इति ॥५॥
एकान्तरद्व्यन्तरत्र्यन्तरानुजाता ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यैर-
म्बष्ठोग्रनिषादा भवन्ति ॥ ६ ॥ शूद्रायां पारशवः पारय-
न्नेव जीवन्नेव शवो भवतीत्याहुः ॥ ७॥ शवइति मृताख्या ॥८॥
एके वै तच्छ्मशानं ये शूद्रास्तस्माच्छूद्रसमीपे नाध्येतव्यम्
॥ ९ ॥ अथापि यमगीतान् श्लोकानुदाहरन्ति ॥१०॥
श्मशानमेतत्प्रत्यक्षं येशूद्राःपापचारिणः ।
तस्माच्छूद्रसमीपेच नाध्येतव्यंकदाचन ॥ ११ ॥
नशूद्रायमतिंदद्यान्नाच्छिष्टंनहविष्कृतम् ।
नचास्योपदिशेद्धर्मं नचास्यव्रतमादिशेत् ॥ १२ ॥
यञ्चास्योपदिशेद्धर्मं यश्चास्यव्रतमादिशेत् ।
से उत्तम वर्ण की स्त्री में प्रतिलोम के द्वारा प्रच्छन्न गुप्त रूप से जो उत्पन्न होते उन गुण कर्मों के आचार से भ्रष्ट पुरुषों की कर्मों से परीक्षा करके जाने कि यह अमुक से पैदा हुआ है जैसे हिंसाशील सन्तान हो तो जानो व्याधा वा कसाई आदि हिंसक से पैदा हुआ है ॥५॥ ब्राह्मण से वैश्य की स्त्री में अम्बष्ठ, क्षत्रिय से शूद्र कन्या में उग्र और वैश्य शूद्र की कन्या में निषाद नामक जाति उत्पन्न होती है (मनु० अ० १० में ब्राह्मण से शूद्र कन्या में निषाद की उत्पत्ति लिखी है) ॥६॥ शूद्र कन्या में पैदा हुआ निषाद जीवित रहता हुआ उसी जन्म में मुर्दो के तुल्य अशुद्ध होता इससे उन को पारशव भी कहते हैं ॥ ७॥ शव यह मृत शरीर का नाम है ॥ ८॥ कोई आचार्य कहते हैं कि—शूद्र श्मशान के तुल्य अपवित्र है इस से शूद्र के समीप वेद को न पढ़े॥९॥ और भी महर्षि यम के कहे श्लोकों का प्रमाण कहते हैं ॥ १० ॥ जो पापाचरणी शूद्र हैं वे प्रत्यक्ष ही श्मशान (मरघट) हैं तिस से शूद्र के समीप में कदापि वेद को न पढ़े ॥ ११ ॥ शूद्र को न अच्छी धर्म की सम्मति देवे न जूठन देवे और न होम का शेष देवे । न इस को धर्म करने का उपदेश करे और न कृच्छ्रादि व्रतों का उपदेश करे (यह निषेध धर्म के विरोधी शूद्रों के लिये जानो क्यों कि धर्म के प्रेमी वा श्रद्धालु शूद्रों के लिये स्मार्त्त तथा पौराणिक धर्म का उपदेश करना विहित भी है) ॥ १२ ॥ जो पुरुष शूद्र को धर्म तथा व्रत करने का उपदेश करता है
भाषार्थसहिता ॥ ९९
सोऽसंवृतंतमोधोरं सहतेनप्रपद्यते, इति ॥ १३ ॥
व्रणद्वारेकृमिर्यस्य संभवेत्कदाचन ।
प्राजापत्येन शुद्ध्येत हिरण्यं गौर्वासो दक्षिणा, इति ॥१४॥
नाग्निं चित्वा रामामुपेयात् ॥ १५॥ कृष्णवर्णा या रा-
मा रमणायैव न धर्माय न धर्मायेति ॥ १६ ॥
इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रेऽष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥
स्वधर्मो राज्ञः पालनं भूतानां तस्यानुष्ठानात्सिद्धिः ॥१॥
भयकारुण्यहान जरामर्यं वै तत् सत्रमाहुर्विद्वांसस्तस्माद्गा-
र्हस्थ्यानैयमिकेषु पुरोहितं दध्यात् ॥ २॥ विज्ञायते ॥ ३ ॥
ब्रह्मपुरोहितो राष्ट्रमृध्नोतीति ॥ ४ ॥ उभयस्य पालनासाम-
र्थ्याच्च देशधर्मजातिकुलधर्मान् सर्वानिवैताननुप्रविश्य रा-
जा चतुरो वर्णान् स्वधर्मे स्थापयेत् ॥५॥ तेष्वपचरत्सु दण्डं
वह उस शूद्र के सहित विस्तृत घोर अन्धकार रूप नरक को प्राप्त होता है ॥ १३ ॥ जिस ब्राह्मण के फोड़े में कदाचित् कीड़े पड़ जावें वह प्राजापत्य व्रत करके सुवर्ण, गौ और वस्त्र दक्षिणा में देवे तब शुद्ध होता है ॥ १४ ॥ अग्नि-चयन यज्ञ करके सुन्दरी स्त्री से फिर संग न करे ॥ १५ ॥ काले वर्ण की सुन्दरी स्त्री रमण के लिये ही हो सकती है किन्तु उस को पत्नी बना कर दान यज्ञादि धर्म कृत्य न करे ॥ १६ ॥
यह वासिष्ठ धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में अठारहवां अध्याय पूरा हुआ ॥१८॥
सब प्राणियों की रक्षा करना राजा का निज धर्म है उसो निज धर्म के ठीक २ धर्मानुकूल करने से राजा की सिद्धि होती है ॥ १ ॥ वृद्ध होके समरण पर्यन्त सेवन करने को राजा का यह राजधर्म रूप सत्र यज्ञ विद्वानों ने कहा है कि जिस में भय तथा दया दोनों का त्याग है । तिस से गृहाश्रम के नित्य नैमित्तिक वेदशास्त्रोक्त काम करने के लिये राजा एक विद्वान् को पुरोहित नियत करे । राजा को अग्निहोत्रादि का अवकाश न होने से राज पुरोहित ही उन कामों को राजा की ओर से किया करे ॥ २ ॥ श्रुति से जाना जाता है कि ॥ ३ ॥ अथर्ववेदी राजपुरोहित के ठीक योग्य होने पर राज्य की उन्नति होती है ॥ ४ ॥ अपना निज धर्म तथा वेदाध्ययन, यज्ञ करना, दान देना, इस दोनों प्रकार के धर्म की रक्षा एक से न हो सकने के कारण पुरोहित सहित करे और देश धर्म जाति धर्म, और कुल धर्म इन सब में प्रवेश (यथोचित ज्ञान) करके चारो वर्णों को अपने २ धर्म पर स्थापित करे ॥ ५ ॥ ये ब्राह्मण आदि वर्ण
१२ वसिष्ठस्मृतिः ॥
धारयेत्॥६॥ दण्डस्तु देशकालधर्मवयोविद्यास्थानविशेषैर्हिंसा-
क्रोशयोः कल्प्य आगमादृष्टान्ताच्च ॥ ७॥ पुष्पफलोपगान्पा-
दपान्न हिंस्यात्कर्षणकरणार्थं चोपहन्यात् ॥८॥ गार्हस्थ्याङ्-
गानां च मानोन्माने रक्षिते स्याताम् ॥ ९ ॥ अधिष्ठानान्न-
नीहारः स्वार्थानां,मानमूल्यमात्रं नैहारिकंस्यात्॥१०॥ महा-
महयोः स्थानात् पथः स्यात् ॥ ११ ॥ संय्याने दशवाहवाहिनी
द्विगुणकारिणी स्यात् ॥ १२ ॥ प्रत्येकं प्रयास्यः पुमान् ॥१३॥
पुंसां शतावराध्यं चाऽऽहवयेद्व्यर्थाः स्त्रियः स्युः ॥ १४ ॥ क-
रा अष्टौ कृष्णलमाषसुवर्णमध्यधरणपलपादकार्षापणाः स्यु-
यदि अपने २ धर्म से च्युत होते हों तो दण्ड देकर ठीक धर्म की व्यवस्था करे ॥ ६ ॥ देश, काल, धर्म, अवस्था, विद्या और स्थान इन सब की विशेषताओं का हिंसा होने तथा रोने चिल्लाने के विषय में विचार करके शास्त्र द्वारा और लौकिक दृष्टान्तों से दण्ड की भिन्न २ न्यूनाधिक कल्पना करे ॥ ७ ॥ फल फूल देनेवाले वृक्षों को न कटवावे परन्तु खेती कराने के उपयोगी वृक्षों को भलेही कटावे ॥ ८ ॥ गृहाश्रम सम्बन्धी पदार्थों की तौल नाप ठीक सुरक्षित रक्खे ॥ ९ ॥ अपने नगर के व्यापारी आदि से अन्नादिका नियत भाग राज कर में न लेवे किन्तु उस भाग का मूल्य नियत करके उतनाइ धन उनर से लिया करे ॥ १० ॥ देवस्थान पाठशाला धर्मशालादि के धन पर, श्मशान ( मरघट ) और मार्ग ( सड़क ) इनका महसूल वा इनपर कर ( टैक्स ) राजा न लेवे ॥ ११ ॥ युद्ध के लिये यात्रा करे तब ( ८१ रथ। ८१ हाथी । २४३ सवार और ४०५ पैदल सिपाही इतनी फौज को एक वाहिनी कहते हैं ) ऐसी वीश पल्टनें लेकर युद्ध में चढ़ाई करे ॥ १२ ॥ फौज में प्रत्येक मनुष्य तथा हाथी घोड़ादि रुष्टपुष्ट नीरोग परिश्रमी हो ॥१३॥ ऐसी रीति युक्ति से युद्ध करावे जिसमें माँसे भी बहुत कम योद्धा मारे जावें। जिनसे विधवा होकर उनर की स्त्रियों का जन्म व्यर्थ न होवे ॥ १४ ॥ कृष्णल, माष, सुवर्ण, मध्य, धरण, पल, पाद, कार्षापण ये आठ प्रकार के तौल वाचक कर हैं। वस्तुओं के न्यूनाधिकलाभ देखकर भिन्न२ कर नियत करे । जल-
भाषार्थसहिता ॥ ९९
निरुदकस्तरोमोष्योऽकरः श्रोत्रियो राजपुमाननाथप्रव्रजित-वालवृद्धतरुणप्रदातारः प्राग्गामिकोः कुमार्यो मृतपत्न्यश्च॥१५॥ बाहुभ्यामुत्तरञ्छतगुणं दद्यात् ॥ १६ ॥ नदीकक्षवनदाहशैलोपभोगा निष्कराः स्युस्तदुपजीविनो वा दद्युः ॥१७ ॥ प्रति मासमुद्वाहकरं त्यागमयेद्राजनि च प्रेते दद्यात्प्रासङ्गिकम् ॥ १८ ॥ एतेन मातृवृत्तिर्व्याख्याता ॥ १९ ॥ राजमहिष्याः पितृव्यमातुलान् राजा बिभृयात्तद्बन्धूंश्चान्यांश्च ॥ २० ॥ राजपत्न्या ग्रासाच्छादनं लभेरन् ॥ २१ ॥ अनिच्छन्त्यो वा प्रव्रजेरन् ॥ २२ ॥ क्लीबोन्मत्तान् राजा बिभृयात्तद्गामित्वादृक्थस्य ॥ २३॥ शुल्के चापि मानवं श्लोकमुदाहरन्ति ॥२४॥
नभिन्नकार्षापणमस्तिशुल्के नशिल्पवृत्तौनशिशौनदूते ।
हीन खेत, वर्षा से डूबनेवाले खेत, और जिनके अन्न को चोर लेजाते हों ऐसे खेतोंपर कर न लेवे। वेद पाठी, तथा राजकर्मचारियों से भी कर न लेवै। अनाथ, साधु संन्यासी, बालक, वृद्ध, और ब्रह्मचारियों को भोजनादि देनेवाले, कुमारी स्त्री और जिन के पति मरगये हों ऐसी विधवाओं से भी कर नहीं लेना चाहिये ॥ १५ ॥ भुजाओं के द्वारा नदी के पार जानेवाला सौगुणा दण्ड देवे ॥ १६ ॥ नदी का कछार, जलनेवाले बन के खेत और पर्वत के खेतों पर कर न बांधे वा कछार आदि से जिनकी जीविका हो उन लोगों से प्रति मास उचित कर लिया करे ॥ १७ ॥ विवाहों पर भी यथोचित कर लिया करे। और राजा का स्वर्गवास होने पर वा किसी उत्सव पर प्रजा को भोजनादि प्रसङ्गानुसार दिया करे ॥ १८ ॥ इससे राजा में माता कासा वर्त्ता सिद्ध होता है कि सन्तान लोग धनादि लार के माता को देवें और माता फिर उन्हीं को खिलावे ॥ १९॥ राज महिषी (मुख्य रानी) के चाचा, मामा, भाई, तथा अन्य कृपापात्रों का राजा भरण पोषण करे ॥ २० ॥ राजा की अन्य स्त्रियों को भोजन वस्त्रादि मिला करे ॥ २१ ॥ यदि राजपत्नी भोजन वस्त्र न चाहें तो भलेही विरक्त होकर तप करें ॥ २२ ॥ नपुंसक (हिजड़ों) और पागलों की राजा रक्षा करे क्योंकि उनके धनादि का मालिक राजा ही है ॥ २३ ॥ महसूल लेने में भी मनुजी के श्लोक का प्रमाण देते हैं ॥ २४ ॥ महसूल में फूटा रुपया नहीं लेवे। कारीगरी, बालक, दूत, भिक्षावृत्ति, चोरी वा लूट से बचे,
८० वसिष्ठस्मृतिः ॥
नभैक्षलब्धेनहतावशेषे नश्रोत्रियेप्रव्रजितेनयज्ञे,इति ॥ २५ ॥
स्तेनोऽनुप्रवेशान्नदुष्यते शस्त्रधारी सहोढो व्रणसंपन्नो व्यप-
दिष्टस्त्वेकेषां दण्ड्योत्सर्गे राजैकरात्रमुपवसेत् ,त्रिरात्रं पुरो-
हितः ॥२६॥ कृच्छ्रमदण्ड्यदण्डने पुरोहितस्त्रिरात्रं राजा॥२७॥
अथाप्युदाहरन्ति ॥ २८ ॥
अन्नादेभ्रूणहामार्ष्टि पत्यौभार्याऽपचारिणी ।
गुरौशिष्यश्चयाज्यश्च स्तेनोराजनिकिल्विषम् ॥२९॥
राजभिर्धूतदण्डास्तु कृत्वापापानिमानवाः ।
निर्मलाःस्वर्गमायान्ति सन्तःसुकृतिनोयथा ॥ ३० ॥
एनोरा जानमृच्छति उत्सृजन्तंसकिल्विषम् ।
तं चेद्घातयतेराजा हन्तिधर्मेणदुष्कृतम् , इति ॥ ३१ ॥
राज्ञामात्ययिकेकार्ये सद्यःशौचंविधीयते ।
वेदपाठी, संन्यासी और यज्ञ इन सब पर महसूल वा कर न लेवे ॥ २५ ॥ विवाह के समय गर्भवती जो कन्या उससे उत्पन्न सहोढ सन्तान शस्त्रधारी तथा रोगी हो तथा चोर के तुल्य किसी के घर में घुसे तो दोष नहीं है। और किन्हीं के मत से दोष युक्त भी कहा गया है। दण्ड के योग्य मनुष्य को सजा न करके छोड़ देवे तो एक दिन राजा और तीन दिन राजपुरोहित उपवास करे ॥२६॥ दण्ड देने योग्य को दण्ड देने पर पुरोहित कृच्छ्र व्रत करे और राजा तीन दिन उपवास करे ॥२७॥ और भी श्लोकों का प्रमाण कहते हैं कि ॥२८॥ भ्रूणहत्या करनेवाला पुरुष उस का अन्न खाने वाले पर, व्यभिचारिणी स्त्री अपने पति पर, शिष्य और यजमान गुरु पर और चोर राजा पर अपना पाप शुद्ध करता नाम छोड़ता है। अर्थात भ्रूण हत्यारे आदि का पाप उस का अन्न खाने वाले को, स्त्री का पाप पति को, शिष्य और यजमान का पाप गुरु पुरोहित को और चोर का पाप राजा को लगजाता है ॥२९॥ जिन मनुष्यों को उन के पापों का दण्ड राजा ठीके २ देता है वे लोग शुद्ध निर्दोष हुए पुण्यात्मा सज्जनों के समान अन्त में स्वर्ग को प्राप्त होते हैं। यदि फिर २ उन कामों को न करें तो ॥ ३० ॥ अपराधी को बिना दण्ड दिये छोड़ देने से उस का पाप राजा को लगता है। और यदि उस पापी को राजा मरवा डाले तो धर्म के द्वारा पाप का नाश करता है ॥ ३१ ॥ राजाओं को मृत्यु संबन्धी कार्य में तत्काल शुद्धि
भाषार्थसहिता ॥ ८१
तथाऽनात्ययिके नित्यं कालएवात्रकारणम्, इति ॥३२॥
यमगीतं चात्र श्लोकमुदाहरन्ति ॥ ३३ ॥
नाघदोषोऽस्तिराज्ञां वै व्रतिनांचसत्रिणाम् ।
ऐन्द्रंस्थानमुपासीना ब्रह्मभूतोहितेसदा,इति,हितेसदा,इति॥३४॥
इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे एकोनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥
अनभिसंधिकृते प्रायश्चित्तमपराधे ॥१॥ अभिसंधिकृते ऽप्येके ॥ २ ॥
गुरुरात्मवतांशास्ता राजाशास्तादुरात्मनाम् ।
इहप्रच्छन्नपापानां शास्ता वैवस्वतोयमः,इति ॥ ३ ॥
तत्र च सूर्याभ्युदयतः सन्नहस्तिष्ठेत् ॥ ४ ॥ सावित्रीं च जपेत् ॥५॥ एवं सूर्याभिनिर्मुक्तो रात्रावासीत ॥ ६ ॥ कुनखी श्यावदन्तस्तु कृच्छ्रं द्वादशरात्रं चरेत् ॥७॥ परिवित्तिः कृच्छ्रं
करलेने का विधान शास्त्र में कहा है । वैसे ही पुत्र जन्मादि में भी तत्काल ही शुद्धि करे । इस में काल ही कारण है ॥ ३२ ॥ यहां महर्षि यमराज के कहे श्लोक का प्रमाण कहते हैं कि ॥ ३३ ॥ राजाओं को व्रतधारियों और सत्रयज्ञ के ऋत्विजों को सूतक का दोष नहीं लगता है । क्योंकि ये सब इन्द्रदेवता के स्थान पर बैठे हुए सदा ब्रह्मस्वरूप ही हैं ॥ ३४ ॥
यह वासिष्ठ धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में उन्नीशवां अध्याय पूरा हुआ ॥१९॥
भूल में बिना समझे किये अपराध में प्रायश्चित्त कर्त्तव्य है ॥ १ ॥ इच्छा पूर्वक किये पाप का भी प्रायश्चित्त कोई आचार्य कहते हैं ॥ २ ॥ जो विषयी नहीं किन्तु सीधे सच्चे हैं उनका शिक्षक गुरु, दुष्टों का शिक्षक राजा और इस जन्म में जिन के अनेक बड़े २ गुप्त पाप होते हैं उन के शिक्षक यमराज होते हैं ॥ ३ ॥ उस प्रायश्चित्त में सूर्यनारायण के उदयकाल से ले कर दिन में खड़ा हुआ जप करे ॥ ४ ॥ सावित्री का जप करे ॥५॥ इसी प्रकार सूर्य के अस्त होने समय से लेकर रात में बैठा हुआ जप करे यह सब प्रायश्चित्तों के लिये है ॥६॥ बिगड़े नखों वाला और काले दांतों वाला बारह दिन कृच्छ्र व्रत करे ॥ ७ ॥ जिस छोटे भाई ने बड़े से पहिले विवाह किया उस का बड़ा भाई बारह दिन तक कृच्छ्र व्रत करके ठहर जावे पश्चात् उस नियत की कन्या