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अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

पादैवस्त्रयुगंचैव द्विपादेकांस्यभाजनम् ।

भाषार्थसहिता ॥

त्रिपादेतुशिखावर्जं सशिखंतुनिपातने ॥ १४ ॥
पादैवस्त्रयुगंचैव द्विपादेकांस्यभाजनम् ।
त्रिपादेगोवृषंदद्याच्चतुर्थेगोद्वयंस्मृतम् ॥ १५ ॥
निष्पन्नसर्वगात्रेषु दृश्यतेवासचेतनः ।
अङ्गप्रत्यङ्गसंपूर्णो द्विगुणं गोव्रतंचरेत् ॥१६ ॥
पाषाणेनैवदण्डेन गावोयेनाभिघातिताः ।
शृङ्गभङ्गेचरेत्पादं द्वौपादौनेत्रघातने ॥ १७ ॥
लाङ्गूलेपादकृच्छ्रंतु द्वौपादावस्थिभञ्जने ।
त्रिपादंचैवकर्णंतु चरेत्सर्व्वनिपातने ॥ १८ ॥
शृङ्गभङ्गेऽस्थिभङ्गेच कटिभङ्गेतथैवच ।
यदिजीवतिषण्मासान्प्रायश्चित्तंनविद्यते ॥ १९ ॥
व्रणभङ्गेचकर्त्तव्यः स्नेहाभ्यङ्गस्तुपाणिना ।

आधे कृच्छ्र व्रत में दाढ़ी मूंछे भी मुंडावे, त्रिपाद (पौन) व्रत में शिखा को छोड़कर मुंडावे और पूरे कृच्छ्र व्रत में शिखा सहित बालों को मुंडावे ॥ १४॥

चौथाई व्रत में दो वस्त्र, आधे व्रत में कांसे का पात्र, त्रिपाद (पौन) व्रत में एक बैल, और चौथे पूर्ण प्रायश्चित्त में दो गौ दक्षिणा देवे ॥ १५ ॥ यदि सब अंग जिस के बन गये हों ऐसा अंग प्रत्यंगों सहित पूरा २ चेतन गर्भ दीखता हो तो उस के गिराने में पूर्व कहे गोवध के प्रायश्चित्त से दूना प्रायश्चित्त करै॥१६॥

पत्थर वा दंड से जिसने गौ को ताड़ना की हो उस से यदि सींग टूट जाय तो पादव्रत, और नेत्र फूटजाय तो आधा व्रत प्रायश्चित्त करै ॥ १७ ॥ पूंछ टूट जावे तो चौथाई व्रत, हाड़ टूट जाय तो आधा व्रत, कान टूट जाय तो तीन पाद (पौन) व्रत और उस पशु के मरजाने पर संपूर्ण प्रायश्चित्त करै ॥ १८ ॥

सींग टूटने पर, वा गोड़ आदि का हाड़ टूटने पर, छः महीने तक जीवित रहे तो प्रायश्चित्त नहीं है अर्थात् १७ । १८ । श्लोकों में कहे प्रायश्चित्त सींगादि टूटने पर छः महिने से पहिले पशु के मरने पर जानो ॥ १९ ॥ यदि बैलादि के घाव हो जाय तो हाथ से उस घाव पर तैलादि दवा लगाया करे

६० | पराशरस्मृतिः ॥

यवसश्चोपहर्त्तव्यो यावद्दृढबलोभवेत् ॥ २० ॥
यावत्संपूर्णासर्वाङ्गस्तावत्तंपोषयेन्नरः ।
गोरूपंब्राह्मणस्याग्रे नमस्कृत्याविसर्जयेत् ॥ २१ ॥
यद्यसंपूर्णसर्वाङ्गो हीनदेहोभवेत्तदा ।
गोघातकस्यतस्यार्द्धं प्रायश्चित्तंविनिर्दिशेत् ॥ २२ ॥
काष्ठलोष्टकपाषाणैः शस्त्रेणैवोद्धतोबलात् ।
व्यापादयतियोगांतु तस्यशुद्धिविनिर्दिशेत् ॥ २३ ॥
चरेत्सांतपनंकाष्ठे प्राजापत्यंतुलोष्टके ।
तप्तकृच्छ्रंतुपाषाणे शस्त्रेचैवातिकृच्छ्रकम् ॥ २४ ॥
पञ्चसान्तपनेगावः प्राजापत्येतथात्रयः ।
तप्तकृच्छ्रेभवन्त्यष्टावतिकृच्छ्रेत्रयोदश ॥ २५ ॥
प्रमापणेप्राणभृतां दद्यात्तत्प्रतिरूपकम् ।
तस्यानुरूपंमूल्यंवा दद्यादित्यब्रवीन्मनुः ॥ २६ ॥


और जब तक बैल बलवान् हो तब तक घास खिलाया करे काम कुछ न लेवे ॥२०॥

जब तक ठीक घाव पूरा होके रुष्ट पुष्ट हो जाय तब तक मनुष्य उस का पोषण करे । फिर गौ रूप बैल को ब्राह्मण के आगे नमस्कार करके छोड़ देवे ॥ २१ ॥ यदि उस बैल का कोई अंग ठीक अच्छा न हो किन्तु लूता लंगड़ा ही रहे और हीनदेह (दुबला) होजाय तो गौ के मारने वाले को कहे से आधा प्रायश्चित्त बतावे ॥ २२ ॥ लकड़ी, ढेला, पत्थर, वा किसी हथियार से बल पूर्वक मारी हुई गौ मरजाये तो उस का निम्न लिखित प्रायश्चित्त जानो ॥ २३ ॥ लकड़ी से मरने पर कृच्छ्र सान्तपन, ढेला से मरने पर प्राजापत्य, पत्थर से मरने पर तप्तकृच्छ्र, और हथियार (बर्छी भालादि) से मरने पर अतिकृच्छ्र व्रत करे ॥ २४ ॥ सान्तपन में पांच, प्राजापत्य में तीन, तप्त कृच्छ्र में आठ और अतिकृच्छ्र व्रत करने में तेरह गौ दक्षिणा देवे ॥ २५ ॥ प्राणियों के मारने पर उन २ की प्रतिमा सुवर्ण की बनवा के दान करे अथवा उस २ प्राणी का जितना २ उचित मूल्य हो उतना दान करे यह बात मनु जी ने कही है ॥ २६

भाषार्थसंहिता ॥ ६१

अन्यत्राङ्कनलक्ष्मभ्यां वहनेदोहनेतथा ।
सायंसंगोपनार्थंच नदुष्येद्रोधबन्धयोः ॥२७ ॥
अतिदाहेऽतिवाहेच नासिकाभेदनेतथा ।
नदीपर्वतसंचारे प्रायश्चित्तंविर्निदिशेत् ॥ २८ ॥
अतिदाहेचरेत्पादं द्वौपादौवाहनेचरेत् ।
नासिक्येपादहीनंतु चरेत्सर्व्वनिपातने ॥२९ ॥
दहनात्तुविपद्येत अनड्‌वान्योक्त्रयन्त्रितः ।
उक्तंपराशरेणैव ह्येकंपादंयथाविधि ॥ ३० ॥
रोधनंबन्धनंचैव भारःप्रहरणंतथा ।
दुर्गप्रेरणयोक्त्रंच निमित्तानिवधस्यषट् ॥ ३१ ॥
बन्धपाशसुगुप्ताङ्गो म्रियतैयदिगोपशुः।
भुवनेत्तस्यनाशस्य पापेकृच्छ्रार्द्धमर्हति ॥ ३२ ॥


दाग देने ( अङ्कित करने ) वा चिह्न लगाने, जोतने तथा दुहने में और सायं-
काल रात्रि में रक्षा करने के लिये रोकने बांधने में गौओं को जो कुछ कष्ट
हो वा कोई गौ दैवयोग से मर भी जायतो दोष नहीं लगेगा ॥ २७ ॥ दाग
देने में अत्यन्त जलाने, वा बहुत काल तक सख्ती से हलादि में जोतने पर,
नाथने में और नदी में घुसाने तथा पर्वत पर चढ़ाने पर यदि बैल मर
जाय तो निम्न लिखित प्रायश्चित्त जानो ॥ २८ ॥ दाग ने से मरने पर चौ-
थाई, जोतने से मरने पर आधा, नाथने से मरने पर पौना और नदी पर्व-
त पर घुसाने चढ़ाने से मरने पर पूरा प्रायश्चित्त करे ॥ २९ ॥ यदि रस्सी से
बांधे हुए बैल को गिरा कर दाग देने मात्र से मर जावे तो महर्षि पराशर
की सम्मत्यनुसार चौथाई प्रायश्चित्त करे ॥ ३० ॥ रोकना, बांधना, बोझाला-
दना, लकड़ी आदि से मारना पीटना, किसी कठिन जगह नदी आदि में
घुसाना वा चढ़ाना, और नाथ डालने आदि के लिये गिराने को रस्सी आ-
दि से बांधना इन ६ निमित्तों से बैल आदि पशु की हिंसा होती है ॥३१॥
खूंटी पर बांधा हुआ रस्सी की फांसी लग कर यदि बैल मर जावे । तब घर
में उस बैल के नाश का पाप लगने पर आधा कृच्छ्र व्रत प्रायश्चित्त करे ॥३२॥

६२ पराशरस्मृतिः ॥

ननारिकेलैर्नचशाणवालैर्नचापिमौञ्जैर्नचवल्कशृङ्खलैः।
एतैस्तुगावो ननिबन्धनीया बद्ध्वातुतिष्ठेत्परशुंगृहीत्वा ॥३३॥
कुशैःकाशैश्चबध्नीयाद्गोपशुंदक्षिणामुखम् ।
पाशलग्नाग्निदग्धेषु प्रायश्चित्तंनविद्यते ॥ ३४ ॥
यदparentit-यदि तत्रभवेत्काण्डं प्रायश्चित्तंकथंभवेत् ।
जपित्वापावनींदेवीं मुच्यतेतत्रकिल्विषात् ॥ ३५ ॥
प्रेरयन्कूपवापीषु वृक्षच्छेदेषूपातयन् ।
गवाशनेषुविक्रीणंस्ततःप्राप्नोतिगोवधम् ॥ ३६ ॥
आराधितस्तुयःकश्चिद् भिन्नकक्षोयदाभवेत् ।
श्रवणंहृदयंभिन्नं मग्नोवाकूपसंकटे ॥ ३७ ॥
कूपादुत्क्रमणेचैव भग्नोवाग्रीवपादयोः ।
सएवम्रियतेतत्रत्रीन्पादांस्तुसमाचरेत् ॥ ३८ ॥


नारियल की, शण की, बालों की, मूंज की, तथा बक्कल की रस्सी से और लोहे की सांकल से इन सब से गौ को नहीं बांधना चाहिये। यदि कदाचित् इन से बांधे तो हाथ में फरसा लिये गौ के समीप रक्षार्थ खड़ा रहे ॥ ३३ ॥ किन्तु कुशों तथा कांसों की रस्सी से दक्षिणा को मुख करके गौ को बांधे। कुशादि की रस्सी से रक्षार्थ बांधने पर फांसी लगजाय वा अग्नि लग कर गौ बैल जल जाय तो प्रायश्चित्त नहीं करने पड़ेगा क्योंकि बांधने वाले का दोष नहीं है ॥ ३४ ॥ यदि वहां सरपता का ढेर लगा हो और उस में अग्नि लगकर गौ जल जावे तो प्रायश्चित्त कैसे हो? इस का उत्तर यह है कि वहां जगतपावनी गायत्री का जप करके उस पाप से छूट जाता है ॥ ३५ ॥ कुआ वा बाउली में घुमाने की प्रेरणा करता हुआ, कटे हुए पड़े वृक्षों पर घेर २ कर गिराते हुए गौ मर जावे वा गोभक्षक कसाई आदि के हाथ बेंचने पर गोहत्या लगती है ॥ ३६ ॥ यदि उक्त हालत में गौके बचाने का उपाय करने पर भी उस की कोख फटजाय, कान टूट जाय, हृदय फटजाय, वा कुए में डूब कर मरजाय ॥ ३७ ॥ अथवा कुए पर इधर से उधर फंदाने से भी उस बैल की गर्दन वा टांग टूट जावे और इसी कारण यदि वह मर जाय तो त्रिपाद (तीन हिस्सा) प्रायश्चित्त करे ॥ ३८ ॥

भाषार्थंसहिता ॥ ६३

कूपखातेतटीबन्धे नदीबन्धेप्रपासुच ।
पानीयेषुविपन्नानां प्रायश्चित्तंनविद्यते ॥ ३९ ॥

कूपखातेतटीखाते दीर्घखातेतथैवच ।
अन्येषुधर्मखातेषु प्रायश्चित्तंनविद्यते ॥ ४० ॥

वेश्मद्वारेनिवासेपु योनरःखातमिच्छति ॥ *
स्वकार्येगृहखातेषु प्रायश्चित्तंविनिर्दिशेत् ॥ ४१ ॥

निशिबन्धनिरुद्धेषु सर्पव्याघ्रहतेषुच ।
अग्निविद्युद्विपन्नानां प्रायश्चित्तंनविद्यते ॥ ४२ ॥

ग्रामघातेशरौघेषु वेश्मबन्धननिपातने ।
अतिवृष्टिहतानांच प्रायश्चित्तंनविद्यते ॥ ४३ ॥

संग्रामेऽपहतानांच येदग्धावेश्मकेषुच ।
दावाग्निग्रामघातेषु प्रायश्चित्तंनविद्यते ॥ ४४ ॥


कुए, गढे, वा पोखरेमें, बांधपर, नदी में, प्याऊ में पानी पिलाते समय यदि गौ वा बैल मरजावे तो प्रायश्चित्त नहीं लगेगा ॥३९॥ कुए के समीप खोदे हुए गढ़े में, नदी के गढ़े में वा बहुत काल से खांदे हुए गधे में अथवा धर्मार्थ खोदे हुए तालाब आदि में जल पिलाने को घुसाये गौ वा बैल के मरजाने पर भी प्रायश्चित्त नहीं लगता है ॥ ४० ॥ घर के द्वार पर, गोशाला में, वा अपने किसी प्रयोजन से घर के भीतर कोई गढ़ा खोदा हो और उस में गिर कर यदि गौ वा बैल मर जावे तो यथोचित प्रायश्चित्त करे ॥ ४१ ॥ रक्षा के लिये रात्रि में बांधने वा रोकने पर यदि सांप काट ले, अथवा बाघ आदि जानवर मार डाले, अकस्मात् आग लग जाय अथवा बिजली गिरकर मरजाय तो प्रायश्चित्त नहीं लगेगा ॥ ४२ ॥ गांव में लूट हो, डांका पड़े और अनेक बाण चलने से गौहत्या हो, वा घरकी भीत गिरजाने से मरे अथवा अत्यन्त वर्षा होने से गो वा बैल मरें उनका भी प्रायश्चित्त नहीं लगेगा ॥ ४३ ॥

युद्ध के समय पर, घर में आग लगजाने पर, बन के अग्नि से, अथवा गांव के नष्ट होने पर जो गौ मरजावें उनका प्रायश्चित्त किसी को नहीं लगेगा ॥४४॥

६४ पराशरस्मृतिः ॥

यन्त्रितागौश्चिकित्सार्थं मूढगर्भविमोचने ।
यत्नेकृतेविपद्येत प्रायश्चित्तंनविद्यते ॥ ४५ ॥
व्यापन्नानांबहूनांचरोधनेबन्धनेपिवा ।
भिषङ्मिथ्याप्रचारेण प्रायश्चित्तंविनिर्दिशेत् ॥ ४६ ॥
गोवृषाणांविपत्तौच यावन्तःप्रेक्षकाजनाः।
अनिवारयतांतेषां सर्वेषांपातprefixकं भवेत् ॥ ४७ ॥
एकोहतोयैर्बहुभिःसमेतैर्नज्ञायतेयस्यहतोभिघातात् ।
दिव्येनतेषामुपलभ्यहन्ता,निवर्त्तनीयोनृपसन्नियुक्तैः ४८
एकाचेद्बहुभिःकाचिद्दैवाद्व्यापादिताक्वचित्।
पादंपादंतुहत्यायाश्चरेयुस्तेपृथक्पृथक् ॥ ४९ ॥
हतेतुरुधिरंदृश्यं व्याधिग्रस्तःकृशोभवेत् ।
ग्रासार्थंचोदितोवापि अध्वननैवगच्छति ।


यदि दवाई करने के लिये गौ को रस्सी से बांध कर गिराने से, और अटके हुए गर्भ को निकालने से उपाय करने पर भी गौ मरजाय तो गोहत्या का दोष नहीं लगेगा ॥ ४५ ॥ यदि बहुतों को एक साथ थोड़ी जगह में रोकने वा बांधने पर अनेक गौ मरजावें । अथवा वैद्य डाक्टरादि की विरुद्ध हानिकारफ दी ओषधि से गौ मरजांवे तो प्रायश्चित्त यथोचित करना चाहिये ॥४६॥ जहां गौ वा बैल मारे पीटे वा वध किये जाते हों तत्र जितने देखने वाले ब्राह्मणादि सनातनधर्मी देखते रहें वा सुनते जानते रहें और गोहत्या का निवारण न करें तो गोहत्या का पाप सब को लगता है ॥ ४७ ॥ एक मनुष्य वा पशु को इकट्ठे हुए बहुतों ने मारा हो पर यह न जानपड़े कि किन की चाट से मारा गया तो वहां अग्नि का गोला हाथ पर रखना आदि दिव्य उपाय से अपराधी को जानकर राजकर्मचारी राजदण्ड दिलावें ॥ ४८ ॥ यदि एक गौ को बहुत मनुष्यों ने मिलकर मारा हो तो हत्या का चौथाई २ प्रायश्चित्त सब करें ॥ ४९ ॥ कोई गौ मारी पीटी गई हो तो रुधिर निकलने से, वा रोग से दुबली हो जावे, वा दाना घास आदि खिलाने पर भी न खावे, वा मार्गमें हांकने पर भी न चले और फेन गिरावे तो जान लेकि गौ को किसी ने मारा पी

भाषाधर्मसंहिता ॥ ६५

लालाभ्रतिदृष्टेषु एवमन्वेषणंभवेत् ॥ ५० ॥
मनुनाचैवमेकेन सर्वशास्त्राणिजानता ।
प्रायश्चित्तंतुतेनोक्तं गोघ्नश्चान्द्रायणंचरेत् ॥ ५१ ॥
केशानांरक्षणार्थाय द्विगुणं व्रतमाचरेत् ।
द्विगुणेव्रतआदिष्टे दक्षिणाद्विगुणाभवेत् ॥ ५२ ॥
राजावाराजपुत्रोवा ब्राह्मणोवाबहुश्रुतः ।
अकृत्वावपनंतेषां प्रायश्चित्तंविनिर्दिशेत् ॥ ५३ ॥
यस्यनद्विगुणन्दानङ्केशश्चपरिरक्षितः ।
तत्पापंतस्यतिष्ठेत वक्ताचनरकंव्रजेत् ॥ ५४ ॥
यत्किंचित्क्रियतेपापं सर्वंकेशेषुतिष्ठति ।
सर्वान्केशान्समुद्धृत्य छेदयेदङ्गुलद्वयम् ॥ ५५ ॥
एवंनारीकुमारीणां शिरसोमुण्डनंस्मृतम् ।
नस्त्रियाःकेशवपनं नदूरे शयनासनम् ॥ ५६ ॥
नचगोष्ठेवसेद्रात्रौ नदिवागाअनुव्रजेत् ।


टा है ॥ ५० ॥ धर्म शास्त्रों का मर्म जानने वाले एक मनुजी ने गोहत्या करने वाले को चान्द्रायण व्रत प्रायश्चित्त कहा है ॥ ५१ ॥ यदि कोई मनुष्य प्रायश्चित्त में शिर के बाल न मुंडाना चाहे तो उसे दूना प्रायश्चित्त व्रत करना चाहिये । और उस में दक्षिणा भी द्विगुणी देनी चाहिये ॥ ५२ ॥ ऐसे द्विगुण प्रायश्चित्त करने वालों को राजा, वा राजपुत्र अथवा बहुत शास्त्रों को जानने वाला ब्राह्मण विद्वान् प्रायश्चित्त करावे ॥ ५३ ॥ जो अपराधी शिर के बाल न मुंडावे और दक्षिणा भी दूनी न देवे उस का पाप प्रायश्चित्त से निवृत्त नहीं होता किन्तु पाप वैसा ही बना रहता है । और प्रायश्चित्त बताने वा कराने वाले को भी नरक होता है ॥ ५४ ॥ जो कुछ पाप किया जाता है वह सब बालों में ठहरता है । इस लिये जो कोई प्रायश्चित्ती केश न मुंडाना चाहे वह भी शिर के सब बालों को इकट्ठा करके ऊपर से दो अंगुल पुछल्ला कटा देवे ॥ ५५ ॥ यदि स्त्री वा कुमारी कन्या को किसी अपराध में प्रायश्चित्त करना पड़े तो स्त्री के शिर के बाल न मुड़ावे किन्तु सब बाल इकट्ठे करके ऊपर से दो अंगुल कटवा देवे । और प्रायश्चित्त के लिये स्त्री अपने घर से दूर कहीं एकान्त में अकेली न सोवे न निवास करे ॥ ५६ ॥ प्रायश्चित्त के समय स्त्री

६६ पराशरस्मृतिः ॥

नदीपुसंगमेचैव अरण्येषुविशेषतः ॥ ५७ ॥
नस्त्रीणामजिनंवासो व्रतमेवंसमाचरेत् ।
त्रिसंध्यंस्नानमित्युक्तं सुराणामर्चनंतथा ॥ ५८ ॥
बन्धुमध्येव्रतंतासां कृच्छ्रचान्द्रायणादिकम् ।
गृहेषुसततंत्तिष्ठेच्छुचिर्नियममाचरेत् ॥ ५९ ॥
इहयोगोवधंकृत्वा प्रच्छादयितुमिच्छति ।
सयातिनरकंधोरं कालसूत्रमसंशयम् ॥ ६० ॥
विमुक्तोनरकात्तस्मान्मर्त्यलोकेप्रजायते ।
क्लीबोदुःखीचकुष्ठीच सप्तजन्मानिवैनरः ॥ ६१ ॥
तस्मात्प्रकाशयेत्पापं स्वधर्मंसततंचरेत् ।
स्त्रीबालभृत्यगोविप्रेष्वतिकोपंविवर्जयेत् ॥ ६२ ॥
इति पाराशरीये धर्मशास्त्रे नवमोऽध्यायः ॥ ६ ॥


रात को गोशाला में भी न बसे, न दिन में गौओं के पीछे २ जंगल में जावे, नदियों में तथा नदी के संगम पर भी स्नान को अकेली न जावे और एकान्त बन में भी न रहे ॥ ५७ ॥ प्रायश्चित्त में स्त्रियों के लिये मृग चर्म धारण का भी निषेध है किन्तु स्त्री तीन बार स्नान करे और देवताओं की प्रतिमाओं का पूजन करती हुई प्रायश्चित्त व्रत पूरा करे ॥ ५८ ॥ स्त्रियों को भाई बन्धुओं के बीच अपने घर में कृच्छ्र चान्द्रायणादि व्रत करना उचित है । निरन्तर अपने घर में ही रहे और शुद्धि आदि के नियमों का पालन ब्रह्मचर्य रखती हुई करे ॥ ५९॥ इस जगत् में जो कोई पुरुष गोवध करके छिपाना चाहता है वह अवश्यमेव काल सूत्र नामक घोर नरक को प्राप्त होता है इसमें कुछ सन्देह नहीं है ॥ ६० ॥ वह गोहिंसक पुरुष उस नरक से छूटने पर मनुष्य लोक में जन्म लेता है । तब सात जन्मों तक नपुंसक तथा कोढ़ी होता हुआ अनेक बड़े २ कठिन दुःख पाता है । इससे गोहत्या बन पड़े तो उसे न छिपा कर प्रायश्चित्त अवश्य करे ॥ ६१ ॥ तिस से गोहत्यादि पाप को प्रकाशित करे और अपना धर्म निरन्तर करे । स्त्री, बालक, अपना दास, गौ और ब्राह्मणों पर अत्यन्त क्रोध कदापि न करे ॥ ६२ ॥

यह पाराशरीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में नवम अध्याय पूरा हुआ ॥

भाषार्थसहिता ॥ ६१

चातुर्वर्ण्येषुसर्वेषु हितांवक्ष्यामिनिष्कृतिम् ।
अगम्यागमनेचैव शुद्धौचान्द्रायणंचरेत् ॥ १ ॥
एकैकंह्रासयेद्ग्रासं कृष्णेशुक्लेचवर्द्धयेत् ।
अमावास्यांनभुञ्जीत ह्येषचान्द्रायणेविधिः ॥ २ ॥
कुक्कुटाण्डप्रमाणंतु ग्रासंवैपरिकल्पयेत् ।
अन्यथाभावदुष्टस्य नधर्मोनचशुद्ध्यति ॥ ३ ॥
प्रायश्चित्तेततश्चीर्णे कुर्याद्ब्राह्मणभोजनम्।
गोद्वयंवस्त्रयुग्मंच दद्याद्विप्रेषुदक्षिणाम् ॥ ४ ॥
चाण्डालींवाश्वपाकींवा अनुगच्छतियोद्विजः ।
त्रिरात्रमुपवासीस्याद् विप्राणामनुशासनात् ॥ ५ ॥
सशिखंवपनंकृत्वा प्राजापत्यत्रयंचरेत् ।
ब्रह्मकूर्चंततःकृत्वा कुर्याद्ब्राह्मणतर्पणम् ॥ ६ ॥
गायत्रींचजपेन्नित्यं दद्याद्गोमिथुनद्वयम् ।

सब ब्राह्मणादि चारों वर्गों के लिये हितकारी प्रायश्चित्त इस अगले दशवें अध्याय में हम कहेंगे । अगम्या स्त्री के साथ गमन करने पर शुद्धि के लिये चान्द्रायण व्रत करे ॥ १ ॥ जिस मास में चान्द्रायण करे तब पौर्णमासी को १५ ग्रास खाकर कृष्ण प्रतिपदा से एक २ ग्रास घटाता जाय फिर अमा-वस्या को कुछ न खाय निराहार रहे फिर शुक्ल प्रतिपदा को एक द्विती-या को दो ग्रास खाय ऐसे ही प्रति दिन एक २ बढ़ा के पौर्णमासी को फिर १५ ग्रास खावे यही चान्द्रायण का विधान है ॥२॥ मुरगा के अण्डा के बराबर एक ग्रास का प्रमाण जाने। जिस का मन छल कपटादि से दूषित हो वह धर्म करने योग्य नहीं और न उस की प्रायश्चित्तों से शुद्धि होती है ॥ ३ ॥ प्राय-श्चित्त पूरा होने पर ब्राह्मणों को भोजन करावे । तथा दो गौ और दो वस्त्र ब्राह्मणों को दक्षिणा देवे ॥ ४ ॥ चाण्डाली वा डोमिनी स्त्री से जो ब्राह्मण समागम करै वह ब्राह्मणों की आज्ञा लेकर प्रथम तीन दिन रात उपवास करे ॥ ५ ॥ फिर शिखा सहित शिर के बाल मुंडा के दो प्राजापत्य व्रत करे । तदनन्तर ब्रह्मकूर्च व्रत करके ब्राह्मणों को भोजन करावे ॥ ६ ॥ नित्य गायत्री

६८ पराशरस्मृतिः ॥

विप्रायदक्षिणांदद्याच्छुद्धिमाप्नोत्यसंशयम् ॥ ७ ॥
क्षत्रियोवाऽथवैश्योवा चाण्डालींगच्छतोयदि ।
प्राजापत्यद्वयंकुर्याद् दद्याद्गोमिथुनंतथा ॥ ८ ॥
श्वपाकीमथचाण्डालीं शूद्रोवैयदिगच्छति ।
प्राजापत्यंचरेत्कृच्छ्रं चतुर्गोमिथुनंददेत् ॥ ९ ॥
मातरंयदिगच्छेत्तु भगिनींस्वसुतांतथा ।
एतास्तुमोहितोगत्वा त्रीणिकृच्छ्राणि संचरेत् ॥ १० ॥
चान्द्रायणत्रयंकुर्याच्छिश्नच्छेदेनशुद्ध्यति ।
मातृष्वसृगमेचैव आत्ममेढ्रनिकृन्तनम् ॥ ११ ॥
अज्ञानेनतुयोगच्छेत्कुर्याच्चान्द्रायणद्वयम् ।
दशगोमिथुनंदद्याच्छुद्धिंपाराशरोऽब्रवीत् ॥ १२ ॥
पितृदारान्समारुह्य मातुराप्तांचभ्रातृजाम् ।

का जप किया करे । दो गो दो बैल ब्राह्मण को दक्षिणा में देवे तो इतने प्रायश्चित्त से निःसन्देह शुद्ध हो जाता है ॥ ७ ॥ क्षत्रिय वा वैश्य पुरुष यदि चाण्डाली से गमन करे तो दो प्राजापत्य व्रत करके दो गौ दो बैल दक्षिणा में देवे और ब्रह्मभोज करावे ॥ ८ ॥ डोमिनी वा चाण्डाली के साथ यदि शूद्र पुरुष गमन करे तो एक प्राजापत्य कृच्छ्र व्रत करे और चार गौ चार बैल दक्षिणा देवे ॥ ९ ॥ माता, भगिनी, तथा अपनी पुत्री से जो पुरुष मोहा-ज्ञानग्रस्त हो के गमन करे तो तीन कृच्छ्रव्रत करे ॥ १० ॥ फिर तीन चान्द्रायण व्रत तीन मास तक करे तब शिश्न (लिङ्गेन्द्रिय) को काट डालने पर शुद्ध होता है। और मातृष्वसा (मौसी) से गमन करने पर भी अपने इन्द्रिय का छेदन करे काट डाले ॥ ११ ॥ और यदि अज्ञान से ऐसा पूर्वोक्त काम करे तो दो मास तक दो चान्द्रायण व्रत करे और दशगौ दश बैल दक्षिणा में देवे। यह शुद्धि महर्षि पराशर ने कही है ॥ १२ ॥ जो पुरुष पिता की अन्य किसी स्त्री (जो अपनी उत्पादिका माता न हो) से गमन करे वा माता की सगी भतीजी से गमन करे वा गुरुपत्नी, पुत्रवधू, भ्रातृ

भाषासहिता ॥ ६९

गुरुपत्नींस्नुषांचैव भ्रातृभार्यांतथैवच ॥ १३ ॥
मातुलानींसगोत्रांच प्राजापत्यत्रयंचरेत् ।
गोद्वयंदक्षिणांदत्त्वा मुच्यतेनात्रसंशयः ॥ १४ ॥
पशुवेश्यादिगमने महिष्युष्ट्रींकपींस्तथा ।
खरींचशूकरींगत्वा प्राजापत्यंसमाचरेत् ॥ १५ ॥
गोगामीचत्रिरात्रेण गामेकांब्राह्मणेददेत् ।
महिष्युष्ट्रीखरीगामी त्वहोरात्रेणशुद्ध्यति ॥ १६ ॥
डामरेसमरेवाऽपि दुर्भिक्षेवाजनक्षये ।
बन्दिग्राहेभयार्त्तोवा सदास्वस्त्रींनिरीक्षयेत् ॥१७॥
चाण्डालैःसहसंपर्कं यानारीकुरुतेततः ।
विप्रान्दशावरान्कृत्वा स्वकंदोषंप्रकाशयेत् ॥ १८ ॥
आकण्ठसंमितेकूपे गोमयोदककर्द्दमे ।
तत्रस्थित्वानिराहारा त्वहोरात्रेणनिष्क्रमेत् ॥ १६ ॥

जाया ( भौजाई—भावज ) से गमन करे ॥ १३ ॥ तथा माता की भावज और अपने गोत्र की किसी भी स्त्री से गमन करे तो तीन प्राजापत्य व्रत करे । और दो गौ दक्षिणा में देवे तो निःसन्देह पाप से छूट जाता है ॥ १४ ॥ किसी पशु बकरी आदि के साथ तथा वेश्या के साथ गमन करे वा भैंस, उंटिनी, बंदरी, गधी, और सूकरी इन सब के साथ मैथुन करने पर प्राजापत्य व्रत करे ॥ १५ ॥ यदि कोई गौ से गमन करे तो तीन उपवास करे और एक गौ ब्राह्मण को दान करे । भैंस, उंटिनी, और गधी से गमन करनेवाला एक दिन रात व्रत करने पर शुद्ध होता है ॥ १६ ॥ डामर ( महा पीड़ा ) संग्राम, दुर्भिक्ष, मनुष्यों का नाश, जेलखाना, भय से पीड़ा होने पर इन सब अवसरों में सदा अपनी स्त्री की रक्षा का ध्यान रक्खे विस्मरण न करे ॥ १७ ॥ जो स्त्री चाण्डालों के साथ संसर्ग करती है वह कमसे कम दश ब्राह्मणों से अपना दोष प्रकाशित करे ॥ १८ ॥ फिर किसी कुए में कण्ठ तक गहरा गोबर जल मिला के कीचड़ भरे, उस कीचड़ में एक दिन रात निराहार खड़ी रहने बाद निकले ॥ १९ ॥

७० पराशरस्मृतिः

सशिखंवपनंकृत्वा भुञ्जीयाद्यावकौदनम् ।
त्रिरात्रमुपवासित्वा त्वेकरात्रंजलेवसेत् ॥ २० ॥
शंखपुष्पीलतामूलं पत्रंवाकुसुमंफलम् ।
सुवर्णंपञ्चगव्यंच क्वाथयित्वापिबेज्जलम् ॥२१॥
एकभक्तंचरेत्पञ्चाद्यावत्पुष्पवतीभवेत् ।
व्रतंचरतिद्यावत्तावत्संवसतेबहिः ॥ २२ ॥
प्रायश्चित्तेततश्चीर्णे कुर्याद्ब्राह्मणभोजनम् ।
गोद्वयंदक्षिणांदद्याच्छुद्धिं पाराशरोऽब्रवीत् ॥ २३ ॥
चातुर्वर्ण्यस्यनारीणां कृच्छ्रं चान्द्रायणव्रतम् ।
यथाभूमिस्तथानारी तस्मात्तांनतुदूषयेत् ॥ २४ ॥
बन्दिग्राहेणयाभक्ता हृत्वाबद्ध्वायलाद्भयात् ।
कृत्वासांतपनंकृच्छ्रं शुद्ध्येत्पाराशरोऽब्रवीत् ॥ २५ ॥
सकृद्भुक्तातयानारी नेच्छन्तीपापकर्मभिः।


फिर शिखा सहित सब बाल मुंडा के कुलथी और भात खावे । फिर तीन दिन रात उपवास करके एक दिन रात जल के भीतर बसे ॥२०॥ फिर शंखाहूलो घास की जड़, पत्ते, फूल वा फलों को और सुवर्ण तथा पञ्चगव्य इन सब का काढा बनाकर जल पीवे ॥ २१ ॥ फिर जबतक रजस्वला हो तब तक एकबार भोजन करे भूमि पर सोवे । और जबतक इस व्रत को करे तबतक घरसे पृथक् घरके किसी भाग में बसे ॥ २२ ॥ फिर प्रायश्चित्त पूरा होने पर ब्राह्मणों को भोजन करावे और दो गौ दक्षिणा में देवे यह शुद्धि महर्षि पराशर ने कही है।२३। चारो वर्ण की स्त्रियों के लिये दोष लगने पर कृच्छ्रचान्द्रायणव्रत प्रायश्चित्त है क्योंकि स्त्री भूमि के समान है इस से वह सर्वथा त्याज्य नहीं होती है ॥२४॥ यदि किसी पुरुष ने मारपीट कर वा बांधकर वा मारडालनेका भय दिखाकर वा जबरदस्ती से हाथ पांव बांध कर स्त्री से दुराचार किया हो तो वह स्त्री सान्तपन कृच्छ्र व्रत करके शुद्ध होती है यह पाराशर जी ने कहा है ॥२५॥ पापकमी व्यभिचारियों ने जिस इच्छा न रखती हुई शुद्ध स्त्री से एकवार दुराचार किया हो वह प्राजापत्य व्रत करने और रजस्वला होने से शुद्ध

भाषाऽर्थसंहिता ॥ ७१

प्राजापत्येनशुद्ध्येत ऋतुप्रस्रवणेनच ॥ २६ ॥
पतत्यर्द्धंशरीरस्य यस्यभार्यासुरांपिबेत् ।
पतिताद्र्द्धशरीरस्य निष्कृतिर्नविधीयते ॥ २७ ॥
गायत्रींजपमानस्तु कृच्छ्रं सांतपनंचरेत् ।
गोमूत्रंगोमयंक्षीरं दधिसर्पिःकुशोदकम् ॥ २८ ॥
एकरात्रोपवासश्च कृच्छ्रं सांतपनंस्मृतम् ॥ २९ ॥
जारेणजनयेद्गर्भं मृतेत्यक्तेगतेपतौ ।
तांत्यजेदपरेराष्ट्रे पतितांपापकारिणीम् ॥ ३० ॥
ब्राह्मणीतुयदागच्छेत्परपुंसासमन्विता ।
सातुनष्टाविनिर्दिष्टा नतस्यागमनंपुनः ॥ ३१ ॥
कामान्मोहाच्चयागच्छेत्त्यक्त्वाबन्धून्सुतान्पतिम् ।
साऽपिनष्टापरेलोके मानुषेषुविशेषतः ॥ ३२ ॥

होती है ॥२६॥ जिस द्विज की स्त्री मद्य पीतीहै उसका आधा अङ्ग पतित हो जाता है । और जिस का आधा शरीर पतित हो गया उसका यद्यपि कोई प्रायश्चित्त नहीं है ॥२७॥ तथापि गायत्री को जपता हुआ कृच्छ्र सान्तपन व्रत करे ॥ २८ ॥ गोमूत्र, गोमय, गोदुग्ध, गोदधि, गोघृत, और कुश पीसकर निकाला जल इन सब को मिलाकर एकदिन खावे और एकदिन उपवास करे तो यह कृच्छ्र सान्तपन व्रत कहाता है ॥२९॥ जो स्त्री अपने पति के त्याग देने पर, पति के कहीं चले जाने पर, वा पति के मर जाने पर, अन्य जार पुरुष से व्यभिचार द्वारा सन्तान पैदा कर लेवे उस पतित हुई पापिनि स्त्री को राजा स्वदेश से निकाल दे अन्य किसी राज्य में भेज देवे ॥ ३० ॥ यदि कोई ब्राह्मणी अन्य पुरुष के साथ मेल करके अपने घर से भाग जावे तो उस को नष्ट भ्रष्ट जानो । वह फिर प्रायश्चित्त द्वारा भी ग्राह्य नहीं है ॥३१॥ जो स्त्री किसी पुरुष पर कामासक्त होके वा अज्ञान रूप मोह से, अपने पति, पुत्रों और बन्धुओं को त्याग केकसी अन्य पुरुष के साथ निकल जावे वह भी परलोक से नष्ट होती उस का परलोक बिगड़ जाता और विशेष कर यह लोक तो बिगड़ता ही है ॥ ३२ ॥