अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
प्रारंभिक पृष्ठ व विषय-सूची
* ओ३म् धर्मात्मने नमः *
अष्टादश-स्मृतयः
ब्राह्मणसर्वस्व मासिकपत्रसम्पादकेन
भीमसेनशर्म्मणा लोकोपकारमत्या
सम्पादितेन देवनागरीभाषानु-
वादेन समलङ्कृताः
ताश्च
इटावा
* दुगाख्यपत्तने स्वीयब्रह्मयन्त्रालये *
* मुद्रापयित्वा प्राकाश्यं नीताः *
आसां मुद्रणविक्रयाधिकारः यन्त्राधीशेन स्वाधीनश्च रक्षितः ॥
18 SMRITIES DHARMA SHASHTRA
by
Pandit Bhimsan Sharma with Hindi
tarnslatian.
Printed at the Brahma Press Etawah.
| प्रथमवार १५०० | वि० संवत् १९६३ ।<br>सन् १९०७ ई० | मूल्य ३) |
|---|
अथाष्टादशस्मृति प्रस्तावः ॥
यद्यपि स्मृतियों के विषय में जो २ विचार वा संशोधन जिस २ प्रकार का अपेक्षित है वह ठीक २ हम ने अभी तक नहीं कर पाया है। क्योंकि ठीक २ शुद्ध पुस्तकादि साधन प्राप्त नहीं हुए। तथापि न होने से फिर भी बहुत कुछ अच्छा हुआ है। हम इस प्रस्तावना में संक्षेप से कुछ विचार दिखाते हैं जिन को पुस्तकों के अवलोकन से पहिले पाठक लोग बड़ी सावधानी से पढ़ के ध्यान में रख लेवे तब स्मृतियों को देखने से अवश्य कुछ लाभ होगा कल्याण का मार्ग भी देख पड़ेगा । याज्ञवल्क्य० अ० १ । ३ ।
पुराणन्यायमीमांसा धर्मशास्त्राङ्गमिश्रिताः ।
वेदाःस्थानानि विद्यानां धर्मस्य च चतुर्दश ॥ ३ ॥
अ०- ( १-पुराण ) ब्रह्मवैवर्त्तादि अठारह पुराण जिन के ( सृष्टि रचना, प्रलय, वंश, मन्वन्तर, और वंशों के चरित वर्णन ये ) पांच विषय हैं। (२-न्याय ) न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, ये चारो एक २ प्रकार से अपने २ उद्दिष्ट विषय का न्याय नाम निर्णय ( फैसला ) करने वाले होने से न्याय पद वाच्य हो सकते हैं। ( ३-मीमांसा ) धर्म का विचार करने के लिये पूर्व मीमांसा, और साक्षात सच्चिदानन्द स्वरूप ब्रह्मतत्त्व का निश्चय करने के लिये उत्तर मीमांसा ( वेदान्त दर्शन ) ये दोनों मीमांसा पद वाच्य हैं। (४-धर्म शास्त्र ) मनुआदि बीशस्मृति ( धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः) इस मनुजी के कथनानुसार स्मृति और धर्मशास्त्र एक ही हैं। ( ५-अङ्ग ) वेद के छः अङ्ग हैं ( शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष, ) ये छः ( ६-चार वेद ) ऋग्यजुः साम अथर्व ये सब चौदह, विद्या और धर्म के स्थाने हैं। इन चतुर्दश प्रकार की विद्या से धर्म जाना जाता है। चार वेद, छः वेदाङ्ग, पुराण, न्याय, मीमांसा, धर्मशास्त्र ये सब चौदह होते हैं। ये ही चौदह विद्या हैं। महाभारत आदि इतिहास का विषय वही है कि जो पुराणों का है इस कारण पुराणके अन्तर्गत इतिहास भी आजाते हैं। वाल्मीकीय रामायण और महाभारत ये दो इतिहास मुख्य हैं। तुलसीदास की रामायण वाल्मीकीय की
२ अष्टादशस्मृति प्रस्तावः ॥
छाया रूप होने से उसी के अन्तर्गत जानो ॥
चार वेदों की ११३१ शाखा, प्रत्येक शाखा के साथ ११३१ ब्राह्मण ग्रन्थ, कल्पवेदाङ्ग के ११३१ श्रौत सूत्र, तथा ११३१ गृह्यसूत्र, ४ वेदों की चार शिक्षा, एक व्याकरण, एक निरुक्त, एक छन्दः, एक ज्योतिष, बीश २० धर्म शास्त्र, ६ मीमांसा, चार ४ न्याय, बीश २० इतिहास पुराण, ये सब कम से कम सनातन धर्म तथा विद्या के भण्डार ४५१८ चार हजार पांच सौ अठहत्तर विद्या धर्म के पुस्तक पूर्वकाल में विद्यमान थे । इन से भिन्न उपपुराणादि अन्य भी ग्रन्थ बाकी रहते हैं। उपपुराणादि का पुराणों में अन्तर्भाव हो सकेगा । परन्तु मुख्य कर यही चौदह प्रकार की विद्या प्राणी को संसार समुद्र से पार करने वाली है । उपनिषद् पुस्तक, शाखा तथा ब्राह्मणों के अन्तर्गत आजाने से पृथक् नहीं गिनाये गये हैं । तथा उस २ वेद के उपनिषद् भी उसी २ वेद के अन्तर्गत माने जाते हैं । उपवेद पुस्तकों का धर्मके साथ विशेष सम्बन्ध न होने पर भी विद्या पुस्तक अवश्य माने जायेंगे । पर उन का अपने २ वेद के साथ अन्तर्भाव हो जाने से चार वेदों में आ सकते हैं इस से पृथक् नहीं गिनाये गये हैं। याज्ञवल्क्यस्मृति अ० १ ।
मन्वत्रिविष्णुहारीत याज्ञवल्क्योशनोऽङ्गिराः ।
यमापस्तम्बसंवर्त्ताः कात्यायनबृहस्पती ॥ ४ ॥
पराशरव्यासशंख लिखितादक्षगौतमौ ।
शातातपोवासिष्ठश्च धर्मशास्त्रप्रवर्त्तकाः ॥ ५ ॥
भाषार्थ—मनु, अत्रि, विष्णु, हारीत, याज्ञवल्क्य, उशना, अङ्गिरा, यम, आपस्तम्ब, संवर्त्त, कात्यायन, बृहस्पति, पराशर, व्यास, शंख, लिखित, दक्ष, गौतम, शातातप, और वसिष्ठ, ये बीश महर्षि वा आचार्य धर्मशास्त्रों के प्रवर्त्तक वा बनाने वाले हैं । अर्थात् मनुआदि के नाम से बीश धर्मशास्त्र प्रधान वा मुख्य हैं । इन में से कई ऋषियों के नाम से लघु बृहत् दो २ पुस्तक बने हुए मिलते हैं। सो अनुमान होता है कि काल क्रम से एक ही महर्षि के उपदेश को उन २ के शिष्यादि लोगों ने धर्म शास्त्र पढ़ने वालों का थोड़ा पढ़ने से काम चल सके इत्यादि प्रयोजन से समय २ पर भिन्न २ आवश्यकता देख समझ कर दो २ भाग किये होंगे। परन्तु इन धर्मशास्त्रों में कोई २ (वृद्धहारीत ) पुस्तक बृहत् नाम से ऐसा भी है कि जिसको स्मृति वा धर्मशास्त्र ही नहीं कह सकते। क्योंकि लोकव्यवहार की व्यवस्था करना धर्मशास्त्रों का विषय है । और स्मृतियों के जो २ विषय लोक व्यवहार के नियमार्थ महर्षियों ने रक्खे हैं वे सब पाठक महाशयों को अष्टादशस्मृतियों के सूचीपत्र से ज्ञात
अष्टादशस्मृति प्रस्तावः ॥ ३
हो ही जायंगे । अर्थात् संप्रदायी कृत्यों का आग्रह करना बीश में से किसी भी स्मृति में जब नहीं आया तो वृद्धहारीतादि में केवल वैष्णव संप्रदाय के शंख चक्रादि संस्कारों का सब के लिये आग्रह करना स्मृति का विषय कैसे होगा ? । अर्थात् कदापि नहीं । हमारा अनुमान है कि ऐसी स्मृति महर्षि हारीत की कही हुई नहीं है किन्तु किसी वैष्णव सम्प्रदायी विद्वान् ने अपने मत के प्रचारार्थ महर्षि हारीत के नाम से बना दी है । इससे हमारा प्रयोजन किसी सम्प्रदाय को बुरा कहने वा खण्डन करने का नहीं है । किन्तु प्रयोजन इतना ही है कि सम्प्रदाय के चिन्हादि का आग्रह करना स्मृति का विषय कदापि सिद्ध नहीं होता । इससे उनको स्मृति नहीं कह सकते क्योंकि उससे लोक व्यवहार की कुछ भी व्यवस्था नहीं होती है । तथा शंख चक्रादि चिन्ह धारण किये बिना पूर्ण भक्ति से पूजा उपासना करनेवाले पर विष्णु भगवान् प्रसन्न न हों यह भी समझ में नहीं आता । इस से हम इतना ही कहना उचित समझते हैं कि जिनके यहां कुल परम्परा से जो सम्प्रदाय चला आता है उन्हीं के लिये वह ग्राह्य है । उसी सम्प्रदाय के नियमानुसार वे लोग श्रद्धाभक्ति से देवाराधन करें, यही सनातन धर्मका मूल है । किन्तु यह न कहें वा मानें कि जो ऊर्ध्व पुण्ड्र वा शंख चक्रादि धारण न करें वे चाण्डाल वा नीच हैं ।
अब एक बात यह भी विचारणीय है कि याज्ञवल्क्य स्मृति के ऊपर लिखे दो श्लोकों में स्मृतियों के २० ही होनेका कोई नियम नहीं कियागया किन्तु ऊपर लिखे याज्ञवल्क्य के दो श्लोकों में मुख्यकर धर्मशास्त्र कर्त्ताओं के नाम दिखाये हैं कि ये स्मृतिकारों में प्रधान हैं । यह अभिप्राय नहीं है कि ये ही स्मृतिकार हैं इनसे भिन्न कोई भी धर्मशास्त्र कर्त्ता नहीं है । इस से पुलस्त्य, बौधायन, देवलादि की स्मृतियों को भी धर्मशास्त्र मानना चाहिये ।
इन ऊपर लिखी २० स्मृतियों में भी मनु और याज्ञवल्क्य स्मृति विशेष मान्य तथा प्रतिष्ठित हैं । इसी कारण इस अष्टादशस्मृतियों के संग्रह में उक्त दोनों स्मृति नहीं रक्खी गयीं हैं। हम इन स्मृतियों के बाद में ही मनु, याज्ञवल्क्य, बौधायनादि कई उपयोगी स्मृतियां शीघ्र छपाने की इच्छा रखते हैं। जिसको श्रीकृष्ण भगवान् पूरी करेंगे ऐसी आशा है ।
इन अठारह स्मृतियों में एक से ही कई विषय आये हैं। जिनको बार२ आये देखकर पाठक महाशय पुनरुक्त दोष ग्रस्त न समझें क्योंकि एक ऋषिकेकथन में एक विषय वार २ होने से पुनरुक्त कह सकते थे। पूर्वकाल में जब छापेखानों
४ अष्टादशस्मृति प्रस्तावः ॥
का प्रचार नहीं था तब अपने२ कुल गोत्र के महर्षि ने कहे अपने२ धर्मशास्त्र को भिन्न२ प्रान्तों में रहने वाले ब्राह्मणादि लोग पढ़ते पढ़ाते थे। अब जैसे२ छापे खाने बढ़े वैसे२ सब पुस्तक सर्वत्र फैलने लगे हैं। परन्तु पूर्वकाल के तुल्य सामयिक ब्राह्मणादि द्विज लोग धर्मशास्त्रों के जानकार अब नहीं हैं। हम अपने पाठकों से सानुनय प्रार्थना करते हैं कि आप लोग कई बार इन धर्मशास्त्रों को ध्यान देकर अवश्य पढ़ जाइये। तो आप को बड़ा लाभ होगा सो आप स्वयमेव पीछे जान लोगे।
परन्तु धर्मशास्त्रों का पाठ करने से पहिले निम्न लिखित विचारों को अवश्य ध्यान में रख लेना।
१—जहां लिखा हो कि ऐसा काम करने से अमुक २ उत्तम अदृष्ट फल होता है। तब आपको समयानुसार यदि सन्देह हो कि ऐसा फल होगा इस में प्रमाण ( सबूत ) क्या है ? तब शोच लेना कि—किसी ने कहा कि नदी के किनारे फल हैं जाकर लेआओ। इस शब्दप्रमाण पर अन्य प्रमाण की हुज्जत करने वाला न तो नदी तक जायगा और न उस को वे फल मिलेंगे। कर्म का फल उस के अन्त में होता है।
२—यह भी ध्यान रहे कि धर्मशास्त्रादि पुस्तक अधिक वा अपरिमित देशकालों में होने वाले असंख्य प्राणियों के लिये हैं। इन में लिखे विचार प्रत्येक देश वा काल में प्रत्येक प्राणी के लिये उपकारी नहीं हो सकते हैं। जैसे पंसारी की दुकान में तिक्त, कटु, मिष्ट और विष आदि भी रहते हैं। उनमें से कभी किसी को विष भी अमृत का सा काम देता और कभी जीवन का आधार अन्न भी विष के तुल्य मनुष्य को मार डालता है ( अजीर्णे भोजनं विषम् )। इस लिये जो अंश आप को अपने उपयोगी न जान पड़ें उन के लिये हुज्जत न मचाइये। पंसारी की दुकान पर कुछ प्रयोजनीय वस्तु लेने को गया हुआ मनुष्य विषादि के लिये झगड़ा करने लगे कि तुम ने यह दूकान में रक्खा हीं क्यों ? । तो उस का समय झगड़े में ही चला जायगा किन्तु प्रयोजनीय वस्तु लेने से भी वंचित रहेगा। इसी के अनुसार, मांसादि प्रतिकूल विषयों पर झगड़ा छोड़ के अपने कल्याणार्थ किन्हीं उत्तम अंशों पर चित्त लगा के तद्नुसार आचार विचार सुधार के अपना कल्याण कीजिये। अन्यथा यही कहावत सिद्ध होगी कि (आये थे हरिभजन को ओटन लगे कपास)
३—धर्मशास्त्रों में बार २ लिखी विशेष उपयोगी बातों को बार २ देखिये तो कण्ठस्थ हो जाने से विशेष लाभ होगा।
अष्टादशस्मृति प्रस्तावः ॥ ५
४-इन धर्मशास्त्रों में अनेक विचार आप को ऐसे मिलेंगे कि जिन को न जानने के कारण ही आप उन कामों को विरुद्ध करते होंगे । और जब जान लोगे तो ठीक २ करने लगोगे । तब उस से आप का कुछ कल्याण भी अवश्य होगा । जैसे शिर बांध के भोजन न करना, शिर खोल के मल मूत्र त्याग न करना, पूर्व को पग करके कदापि न सोना, इत्यादि कामों के करने में जो कुछ समय वा श्रम आप करते हैं वही आगे भी लगेगा पर यदि शास्त्र की आज्ञानुकूल उन २ कामों को करोगे तो सहज में ही कुछ धर्म कर लोगे ।
५-यद्यपि सभी धर्मशास्त्र अनेक प्रकार से मनुष्य को कल्याण का मार्ग दिखाने वाले होने से अत्युम हैं तथापि कात्यायन, व्यास, पराशर, शंख, दक्ष, गौतम और वसिष्ठादि कई स्मृतियां उन में और भी अत्यन्त उपकारी हैं । कात्यायन में कर्मकाण्ड, व्यास में पातिव्रताधर्म, दानधर्मादि, पराशर में ब्रह्मकूर्च व्रतादि, शंख में वर्णाश्रम धर्मादि, दक्ष में दिनचर्या वा रात्रिचर्या-योगाभ्यासादि, गौतम में ४८ अड़तालीस संस्कारादि, वसिष्ठ में संन्यासादि, विषय अधिक प्रशंसनीय हैं ।
६-इन स्मृतियों में, शिक्षा, विद्या, सामान्यनीति, राजनीति, स्त्रीशिक्षा, योग, ज्ञान, उपासना, देवपूजा और धर्मादि का विचार ऐसा भी है जो सभी के लिये उपयोगी होगा ।
७-विशेष कर स्मृतियों के संक्षिप्त विषय-१-प्रायश्चित्त, २-वर्णधर्म, ३-आश्रम धर्म, ४-सूतक शुद्धि, ५-द्रव्यशुद्धि, ६-गर्भाधानादि संस्कार, ७-सन्ध्या, ८-श्राद्ध-तर्पण, ९-पञ्चमहायज्ञ, १०-पातिव्रतधर्म, ११-भक्ष्याभक्ष्य, १२-आपद्धर्म, १३-वेद का अभ्यास तथा महत्त्व, १४-आचार, इत्यादि संक्षेप से धर्मशास्त्रों का विषय जानो ॥
८-हमारी राय जाति निर्णय के विषय में यह है कि जो कायस्थ, रथकार, स्वर्णकार, आदि जाति हैं वे लोग धर्मशास्त्रों में लिखे निर्विवाद उत्तमाचरणों के द्वारा श्रेष्ठ बनने का उद्योग करें तो उन के लिये भविष्यत् में कल्याण की संभावना है ।
९-दक्षस्मृति में नौ २ की संख्या वाले नौनवें इकासी उपदेश देखने योग्य सब के लिये विशेष उपकारी हैं ।
१०-इन स्मृतियों के जो २ पारिभाषिक शब्द (ब्रह्मकूर्च, कृच्छ्र, समकृच्छ्र, अतिकृच्छ्र, कृच्छ्रातिकृच्छ्र, कृच्छ्रसान्तपन, प्राजापत्य, पराककृच्छ्र, चान्द्रा-
६
अष्टादशस्मृति प्रस्तावः ॥
यण ) इत्यादि के लक्षण वा अर्थ गोतमस्मृति के २७ । २८ अध्यायादि में वा अन्यस्मृतियों में जहां २ कहे हैं वहीं से पाठक महाशय जानकर सर्वत्र वही लक्षण जान लेवें । इसीसे जहां २ कृच्छ्रादि शब्द आये हैं वहां २ सर्वत्र उनके लक्षण हमने नहीं दिखाये हैं । ब्रह्मकूर्च व्रत की प्रशंसा धर्मशास्त्रों में बहुत बढके की गयी है । इस ब्रह्मकूर्च का लक्षण व्याख्यान वा विधान पराशर स्मृति के ११ वें अध्याय में देखिये ।
११-कृच्छ्रादि सभी व्रतों के लिये सामान्य विचार ये हैं कि-ब्राह्मणादि द्विज शिखा को छोड़ के अन्य सब मूंछों सहित बाल मुड़ा के अपने २ वर्ण के दण्ड, कमण्डलु, मेखला, श्वेत लाल पीले वस्त्र तथा मृग चर्मादि ब्रह्मचर्य के चिह्न धारण कर के बाग, देवस्थान, वा जलाशय के तट पर शुद्ध एकान्त स्थान में रहें, संसारी काम अथवा बात चीत कुछ न करें, शूद्रादिनीचों से कुछ भी न बोलें, प्रयोजन मात्र द्विजों से बोलें, प्रायः मौन रहें, तीन बार स्नान करें वा छः बार स्नान करें अपने २ गुरु मन्त्र सावित्री का जप करें, व्याहृतियों से होम करें इत्यादि नियम भी पाठकों को इन्हीं धर्म शास्त्रों के देखने से ज्ञात होंगे ।
१२-अब अन्तिम निवेदन यह है कि इन १८ स्मृतियों के छपाने वा अर्थ करने में यथासम्भव हम ने सावधानी से शुद्ध करने का उद्योग किया है। तथापि कई कारणों से जो २ त्रुटि हमारे पाठकों को ज्ञात हों उन को पण्डितों की राय से सम्हाल लें और हमारे गुण वा परिश्रम को सादर स्वीकार करते हुए तथा दोषों पर ध्यान न देते हुए उनसे उपेक्षा वृत्ति करें । क्योंकि मनुष्यको गुण ग्राही होने में जो लाभ तथा सुख होता है वह दोष दर्शी को कदापि नहीं होता । परन्तु जो२ अशुद्धि तथा अर्थ करने में कहीं२ भूल जान पड़े उनको विचार पूर्वक शुद्ध करने का उद्योग अवश्य करें
ह० भीमसेन शर्मा
सम्पादक ब्राह्मण सर्वस्व इटावा
अथाष्टादशस्मृतीनां सूचीपत्रम् ॥
| संख्या | विषयाः | स्मृतिनामानि | पृष्ठानि |
|---|---|---|---|
| १ | वर्णधर्माः | १-अत्रिस्मृतौ- | ३ |
| २ | ब्राह्मणधर्माः | ” | ७ |
| ३ | अभक्ष्यभक्षणादि प्रायश्चित्तानि | ” | १२ |
| ४ | कृच्छ्रमान्तपनादि व्रतानि | ” | २१ |
| ५ | स्त्रीधर्माः | ” | २४ |
| ६ | ब्राह्मणलक्षणानि | ” | २५ |
| ७ | सामान्यधर्माः | ” | २७ |
| ८ | यतिधर्माः | ” | २८ |
| ९ | महापातकादि प्रायश्चित्तानि | ” | २९ |
| १० | स्त्रीणां शौचम् | ” | ३४ |
| ११ | संन्यासान्निवृत्तौ प्रायश्चित्तम् | ” | ३८ |
| १२ | कृषिकर्मणि धर्मरक्षा | ” | ३९ |
| १३ | अगम्यागमनादि प्रायश्चित्तानि | ” | ४१ |
| १४ | अस्पर्श्यस्पर्शादि प्रायश्चित्तानि | ” | ४८ |
| १५ | पञ्चगव्यपरिमाणम् | ” | ५२ |
| १६ | अष्टावसरेषु मौनव्रतम् | ” | ५८ |
| १७ | दान धर्माः | ” | ५७ |
| १८ | श्राद्धे सुपात्रादिविचारः | ” | ५९ |
| १९ | विशेषेण चास्यां स्मृतौ सर्वविधानि प्रायश्चित्तानि सन्ति | ||
| २० | गर्भाधानादि संस्कारविचारः | २-विष्णुस्मृतौ | २ |
| २१ | ब्रह्मचर्याश्रम विचारः | ” | ३ |
| २२ | गृहाश्रम धर्म विचारः | ” | ५ |
| २३ | अतिथि पूजन विचारः | ” | ७ |
| २४ | वानप्रस्थ धर्म विचारः | ” | ९ |
| २५ | संन्यास धर्म विचारः | ” | १२ |
| २६ | क्षत्रिय धर्म विचारः | ” | १३ |
| २७ | सृष्टि रचना क्रम | ३-हारीतस्मृतौ | २ |
| २८ | ब्राह्मण धर्माः | ” | ३ |
| २९ | क्षत्रिय धर्मः | ” | ६ |
| ३० | वैश्य धर्मः | ” | ७ |
२
अष्टादशस्मृतिसूचीपत्रम् ॥
| संख्या | विषयाः | स्मृतिनाम | पृष्ठानि |
|---|---|---|---|
| ३१ | शूद्र धर्मः | ” | ८ |
| ३२ | ब्रह्मचारि धर्माः | ” | ९ |
| ३३ | गृहस्थ धर्माः | ” | ११ |
| ३४ | दन्त धावन विचारः | ” | १२ |
| ३५ | सन्ध्योपासन सूर्यार्घ्य विधिः | ” | १३ |
| ३६ | मध्याह्नस्नान सन्ध्यादि कृत्यम् | ” | १४ |
| ३७ | आचमनत्रिविधजपयज्ञादि विचारः | ” | १७ |
| ३८ | अतिथि पूजादि मध्याह्न कृत्य विधि | ” | १९ |
| ३९ | वानप्रस्थ कृत्यविधिः | ” | २३ |
| ४० | संन्यासाश्रमकर्त्तव्यविधिः | ” | २४ |
| ४१ | योगाभ्यास विधिः | ” | २८ |
| ४२ | अनुलोमप्रतिलोमाभ्यां वर्णसंकरोत्पत्तयः । | ४-औशनसस्मृतौ | १-८ |
| ४३ | बहुविधानि प्रायश्चित्तानि । विशेषेणतुनीलीसंसर्गे । | ५-अङ्गिरःस्मृतौ | १-११ |
| ४४ | विविधानि प्रायश्चित्तानि | ६-यमस्मृतौ | १ |
| ४५ | पञ्चगव्यग्रहणे विशेषविचारः | ” | ११ |
| ४६ | पितृभ्यः पिण्डदाने विशेषः | ” | १२ |
| ४७ | गोवृषभबधताडनभेदेषु प्रायश्चित्तानि | ६-आपस्तम्बस्मृतौ | २ |
| ४८ | द्रव्यशुद्धि विचारः | ” | ६ |
| ४९ | म्लेच्छसंसर्गप्रायश्चित्तानि ॥ | ” | ८ |
| ५० | अशक्तप्रायश्चित्तम् | ” | ९ |
| ५१ | चाण्डालादि संसर्गप्रायश्चित्तम् | ” | १० |
| ५२ | स्पर्शादि दोष प्रायश्चित्तम् । | ” | १२ |
| ५३ | नीली वस्त्रादि धारणे प्रायश्चित्तम् | ” | १४ |
| ५४ | रजस्वलास्पर्शादौ शुद्धिविचारः | ” | १६ |
| ५५ | भोज्याभोज्यान्नादि विचारः | ” | २७ |
| ५६ | मोक्षसाधनं क्रोधादि त्यागश्च | ” | ३० |
| ५७ | ब्रह्मचर्याश्रम धर्माः | ८-संवर्त्तस्मृतौ | १ |
| ५८ | गृहाश्रम धर्मः । | ” | ६ |
| ५९ | दान धर्म माहात्म्यम् | ” | ८ |
| ६० | कन्यादान फलम् | ” | १० |
अष्टादशस्मृतिसूचीपत्रम् ॥ ३
| संख्या | विषयाः | स्मृतिनामानि | पृष्ठानि |
|---|---|---|---|
| ६१ | वानप्रस्थाश्रमः | ,, | १६ |
| ६२ | चतुर्थाश्रम विचारः | ,, | १६ |
| ६३ | ब्रह्महत्यादि महापातक प्रायश्चित्तानि | ,, | १७ |
| ६४ | क्षत्रियादि हिंसाप्रायश्चित्तानि । | ,, | २० |
| ६५ | अगम्यागमन प्रायश्चित्तानि | ,, | २३ |
| ६६ | प्रदुष्टादि प्रायश्चित्तानि | ,, | २७ |
| ६७ | सर्वानर्थनिवारणाय जपहोमादिविचारः | ,, | ३१ |
| ६८ | आचमनेन्द्रियस्पर्श विधिः | ९-कात्यायन स्मृतौ | १ |
| ६९ | षोडशमातृका पूजन विचारः | ,, | २ |
| ७० | घतोर्द्धोराकरणविचारः | ,, | ३ |
| ७१ | नान्दीश्राद्धावश्यकत्वप्रदर्शनम् | ,, | ३ |
| ७२ | कर्मकाण्डे सामान्य विचारः | ,, | ६ |
| ७३ | श्राद्ध विशेष विचारः । | ,, | ७ |
| ७४ | सर्वकर्मसु नान्दीश्राद्धादि विचारः | ,, | ८ |
| ७५ | अग्न्याधान कालादि विचारः । | ,, | १२ |
| ७६ | अरणी निर्माण विधिः | ,, | १५ |
| ७७ | अरणी मन्थन प्रकारः । | ,, | १७ |
| ७८ | यज्ञ पात्र समिधादि विचारः । | ,, | १८ |
| ७९ | अग्निहोत्र काल विचारः | ,, | २१ |
| ८० | परिसमूहन पर्युक्षणादि विचारः | ,, | २२ |
| ८१ | आहुति प्रमाणम् । ज्वलितेऽग्नौ होमविधिश्च | ,, | २३ |
| ८२ | अग्नि धमन प्रकारः । | ,, | २३ |
| ८३ | दन्त धावन विचारः । | ,, | २४ |
| ८४ | नित्य स्नान तर्पण विचारः । | ,, | २५ |
| ८५ | सन्ध्योपासन विधिः । | ,, | २६ |
| ८६ | नित्यतर्पण विधानम् | ,, | २८ |
| ८७ | पञ्चमहायज्ञ विधिः | ,, | ३१ |
| ८८ | ब्रह्मयज्ञस्य सर्वोपरि माहात्म्यम् । | ,, | ३४ |
| ८९ | दक्षिणा दान विचारः । | ,, | ३६ |
| ९० | शेष यज्ञपात्रलक्षणानि । | ,, | ३७ |