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अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

पृष्ठ 5, कुल 805 में से

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४ अष्टादशस्मृति प्रस्तावः ॥

का प्रचार नहीं था तब अपने२ कुल गोत्र के महर्षि ने कहे अपने२ धर्मशास्त्र को भिन्न२ प्रान्तों में रहने वाले ब्राह्मणादि लोग पढ़ते पढ़ाते थे। अब जैसे२ छापे खाने बढ़े वैसे२ सब पुस्तक सर्वत्र फैलने लगे हैं। परन्तु पूर्वकाल के तुल्य सामयिक ब्राह्मणादि द्विज लोग धर्मशास्त्रों के जानकार अब नहीं हैं। हम अपने पाठकों से सानुनय प्रार्थना करते हैं कि आप लोग कई बार इन धर्मशास्त्रों को ध्यान देकर अवश्य पढ़ जाइये। तो आप को बड़ा लाभ होगा सो आप स्वयमेव पीछे जान लोगे।

परन्तु धर्मशास्त्रों का पाठ करने से पहिले निम्न लिखित विचारों को अवश्य ध्यान में रख लेना।

१—जहां लिखा हो कि ऐसा काम करने से अमुक २ उत्तम अदृष्ट फल होता है। तब आपको समयानुसार यदि सन्देह हो कि ऐसा फल होगा इस में प्रमाण ( सबूत ) क्या है ? तब शोच लेना कि—किसी ने कहा कि नदी के किनारे फल हैं जाकर लेआओ। इस शब्दप्रमाण पर अन्य प्रमाण की हुज्जत करने वाला न तो नदी तक जायगा और न उस को वे फल मिलेंगे। कर्म का फल उस के अन्त में होता है।

२—यह भी ध्यान रहे कि धर्मशास्त्रादि पुस्तक अधिक वा अपरिमित देशकालों में होने वाले असंख्य प्राणियों के लिये हैं। इन में लिखे विचार प्रत्येक देश वा काल में प्रत्येक प्राणी के लिये उपकारी नहीं हो सकते हैं। जैसे पंसारी की दुकान में तिक्त, कटु, मिष्ट और विष आदि भी रहते हैं। उनमें से कभी किसी को विष भी अमृत का सा काम देता और कभी जीवन का आधार अन्न भी विष के तुल्य मनुष्य को मार डालता है ( अजीर्णे भोजनं विषम् )। इस लिये जो अंश आप को अपने उपयोगी न जान पड़ें उन के लिये हुज्जत न मचाइये। पंसारी की दुकान पर कुछ प्रयोजनीय वस्तु लेने को गया हुआ मनुष्य विषादि के लिये झगड़ा करने लगे कि तुम ने यह दूकान में रक्खा हीं क्यों ? । तो उस का समय झगड़े में ही चला जायगा किन्तु प्रयोजनीय वस्तु लेने से भी वंचित रहेगा। इसी के अनुसार, मांसादि प्रतिकूल विषयों पर झगड़ा छोड़ के अपने कल्याणार्थ किन्हीं उत्तम अंशों पर चित्त लगा के तद्नुसार आचार विचार सुधार के अपना कल्याण कीजिये। अन्यथा यही कहावत सिद्ध होगी कि (आये थे हरिभजन को ओटन लगे कपास)

३—धर्मशास्त्रों में बार २ लिखी विशेष उपयोगी बातों को बार २ देखिये तो कण्ठस्थ हो जाने से विशेष लाभ होगा।