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अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

पृष्ठ 763, कुल 805 में से

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पृष्ठ 763

भाषार्थसहिता ॥ ३३

ऋतुमत्यंाहितिष्ठन्त्यां दोषःपितरमृच्छति ॥ ६२ ॥
यावश्वकन्यामृतवःस्पृशन्ति तुल्यैःसकामामहियाच्यमानाम्।
भ्रूणानितावन्तिहतानिताभ्यां मातापितृभ्यामितिधर्मवादः।६३
अद्भिर्वाचाचदत्तायां म्रियेतादौवरोयदि ।
नचमन्त्रोपनीतास्यात् कुमारीपितुरेवसा ॥ ६४ ॥
बलाच्चेत्प्रहताकन्या मन्त्रैर्यदिनसंस्कृता ।
अन्यस्मैविधिवद्देया यथाकन्यातथैवसा ॥ ६५ ॥
पाणिग्राहेमृतेबाला केवलंमन्त्रसंस्कृता ।

से पिता कन्या का दान कर देवे । यदि ऋतुमती होती हुई विवाह से पहिले पिता के घर पर कन्या रहे तो पिता को दोष लगता है ॥ ६२ ॥ कामना रखती हुई कन्या को चाहने वाले योग्य वरों के विद्यमान होते हुए भी जितने मास तक पिता के न देने से कन्या रजस्वला होतो रहे उतनी ही गर्भहत्याओं का पाप कन्या के माता पिता को लगता है यह धर्मशास्त्रकारों का कथन है ॥६३॥ हाथ में जल लेके या वाणीमात्र से टीका लगन सब हो गयी हो अथवा कन्या दान भी पिताने कर दिया हो परन्तु मन्त्रों के साथ पति ने पाणिग्रहण न किया हो तथा सप्तपदी न हुई हो और ऐसे अवसर में यदि वर पति मर जावे तो वह पिता की अविवाहिता कुमारी कन्या ही मानी जायगी । इस दशा में पिता अन्य वर के साथ उसका विधिपूर्वक विवाह कर देवे ॥ ६४ ॥ मन्त्रों द्वारा विवाह संस्कार होनेसे पहिले यदि किसीने बल पूर्वक कन्या को हर लिया (लेगया) हो तो विधिपूर्वक वह कन्या अन्य वर को देदेनी चाहिये क्योंकि जैसी कन्या होती वैसी ही वह है ॥ ६५ ॥ और यदि पाणिग्रहण तक भी मन्त्रों द्वारा संस्कार हो गया हो किन्तु सप्तपदी न हुई हो और उसने किसी के साथ संग भी न किया हो या किसी ने बल पूर्वक भी दूषित न की हो तो भी उस का अन्य वर के साथ विवाह संस्कार हो सकता है (सब धर्मशास्त्रों का निचोड़ सिद्धान्त यह है कि यदि मन से वर का स्वीकार हो जाने पर भी अन्य वर के साथ विवाह न हो तो उत्तम कोटि है उदाहरण सावित्री है । वाग्दान (टीका लगुन ) हो जाने पर अन्यवर के साथ विवाह, होना, मध्यम कोटि है । जिस के उदाहरण संप्रति अनेक हैं। और कन्यादान तथा पाणिग्रह तक भी हो जाने पर सप्तपदी से पहिले अन्यवर के साथ विवाह होना