अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)
Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj
गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा
[ ४ ]
तारको यं भवाम्भोधौ तारणे गुरुशिष्ययोः १ ।
तारकोन्मेषयुक्तत्वादपि तारक उच्यते ॥ १२ ॥
यह तारक योग भवसागर में गुरु और शिष्य दोनों का तारण करता है।
तारिका के उन्मेष२ से युक्त होने के कारण यह “तारक” कहा जाता है ॥१२॥
न मीमांसातर्कग्रह३गणितसिद्धान्तपठनै -
र्न वेदैर्वेदान्तैः स्मृतिभिरभिधानैरपि न च ।
न चापिच्छन्दोव्याकरणकवितालंकृतिगणै४ -
र्मुनेस्तद्व्याप्ति५र्निजगुरुमुखादेव विहिता ॥ १३ ॥
मुनि को तारक योग की विशिष्टरूप से प्राप्ति न तो मीमांसा, तर्क (न्याय)
तथा फलित, गणित और सिद्धान्तरूप त्रिस्कन्ध ज्योतिष पढ़ने से होती है,
न वेद, वेदान्त, स्मृति और कोषों के अनुशीलन से होती है एवं न छन्दःशास्त्र,
व्याकरण, काव्य और अलंकारों के अध्ययन से होती है। एकमात्र अपने गुरु
के मुखारविन्द से उसकी विशिष्ट प्राप्ति शास्त्रों में कही गई है ॥ १३ ॥
दृष्टिः स्थिरा यस्य विनैव दृश्यं,
वायुः स्थिरो यस्य विना प्रयत्नम् ।
चित्तं स्थिरं यस्य विनावलम्बं,
स एव योगी स गुरुः स सेव्यः ॥ १४ ॥
दृश्य के बिना ही जिसकी दृष्टि स्थिर हो जाय, विना किसी प्रकार के
प्रयत्न के जिसका वायु स्थिर हो जाय एवं विना किसी अवलम्बन के जिसका
चित्त स्थिर हो जाय, वही योगी, है वह गुरु होने योग्य है, उसी की सेवा
करनी चाहिये ॥ १४ ॥
१. (ख) ११ और १२ वाँ श्लोक नहीं है ।
२. संसार सागर से उत्तीर्ण करनेवाली शक्ति का जागरण । इस शक्ति को
चित्-शक्ति, बोध शक्ति या कुण्डलिनी शक्ति कहते हैं ।
३. (ख) तर्कसंग्रह । ४. (ख) लंकृतिमयै-
५. (ख) तत्वं प्राप्ति ।
गोरक्षासन ( आगेकी बाजू )
ऊर्ध्व पद्मासन
शीर्षासन
गोरक्षासन ( पीछेकी बाजू )
अर्ध मत्स्येन्द्रासन ( पीछेकी बाजू )
पद्मासन
पूर्ण मत्स्येन्द्रासन ( आगेकी बाजू )
कर्णपीडासन
[ ५ ]
एवंविधगुरोः१शब्दात् सर्वचिन्ताविवर्जितः ।
स्थित्वा मनोहरे देशे योगमेव समभ्यसेत् ॥ १५ ॥
इस प्रकार के गुरु के उपदेशानुसार सब प्रकार की चिन्ताओं से
रहित होकर सुन्दर प्रदेश में बैठकर योग का ही सम्यक् अभ्यास करना
चाहिये ॥१५॥
विविक्तदेशे सुखसंनिविष्टः
समासने किञ्चिदुपेत्य पश्चात् ।
बाहुप्रमाणं स्थिरदृक् स्थिराङ्ग-
श्चिन्ताविहीनोऽभ्यसनं कुरुष्व ॥ १६ ॥
सब प्रकार की चिन्ताओं से रहित हो एकान्त स्थान में सम आसन पर
कुछ पीछे की ओर झुक कर यानी तन कर स्थिर अंग हो सुख पूर्वक बैठ कर
एक हाथ तक स्थिर दृष्टिकर योग का अभ्यास करो ॥ १६ ॥
एवमभ्यसतो योगं मनो भवति सुस्थिरम् ।
वायुवाक्कायदृष्टीनां स्थिरता च तथा तथा ॥ १७ ॥
इस प्रकार योग का सभ्यास करते करते मन सुस्थिर हो जाता है, क्रमशः
वायु, वाणी, देह और दृष्टि में भी स्थिरता आ जाती है ॥ १७ ॥
जायमानामनस्कस्य उदासीनस्य सर्वतः ।
मृदुत्वं च लघुत्वं च शरीरस्योपजायते ॥ १८ ॥
जिसको अमनस्क योग की प्राप्ति हो रही हो और जो सब ओर से
उदासीन हो ऐसे योगी के शरीर में मृदुता ( कोमलता ) लघुत्व ( हल्कापन )
हो जाता है ॥ १८ ॥
१. ऐसे सद्गुरु के विषयमें हठयोगप्रदीपिका में लिखा है कि—
“दुर्लभो विषयत्यागो दुर्लभं तत्त्वदर्शनम् ।
दुर्लभा सहजावस्था सद्गुरोः करुणां विना ॥
[ ६ ]
काषायग्रहणं कपालधरणं केशावलीलुंचनं¹।
पाखण्डव्रतभस्मचीवरजटाधारित्वमुन्मत्तता ॥
नग्नत्वं निगमागमादिकवितागोष्ठीसभाभ्यन्तरे,
सर्वं चोदरपूरणाय² पठनं न श्रेयसः कारणम् ॥ १६ ॥
काषाय ( गेरुवे ) वस्त्र धारण करना, खप्पर धारण करना, केशों को
नोचना, पाखण्डव्रत लेना, भस्म, कन्था और जटा धारण करना, उन्मत्तवत्
रहना, नग्न रहना, सभाओं में निगम और आगमों पर व्याख्यान
झाड़ना, काव्य गोष्ठी में भाग लेना यह उदरपूर्ति के लिए है। पढ़ना
निःश्रेयस् का साधन नहीं है। अर्थात् पठन से निःश्रेयस् की प्राप्ति नहीं हो
सकती ॥ १६ ॥
³द्वेषोच्चाटनमारणादि कुहकैर्मन्त्रैः प्रपंचोद्गमः⁴
सर्वाभ्यास⁵ विचित्रदन्धकरणाद्यज्ञानयोगः परः⁶।
ध्यानं देहपदेषु नाडिषु षडाधारे च चेतोभ्रम-
स्तस्मात् तत्सकलं मनोविरचितं त्यक्त्वाऽमनस्कं भज ॥२०॥
द्वेष ( विद्वेषण ), उच्चाटन, मारण आदि प्रवचनाओं से युक्त मन्त्रों से
प्रपंच की उत्पत्ति होती है, पूर्ण अभ्यास, भाँति भाँति के आसनबन्धों का
करना केवल अज्ञान ही ह, देहस्थित नाड़ियों में तथा षडाधार चक्रों में
ध्यान केवल चित्त का विभ्रम है, इसलिए मन से कल्पित इन सब का त्याग
कर अमनस्क का सेवन करो ॥ २० ॥
१. (ख) मुंचनं । यही पाठ अच्छा प्रतीत होता है। उसका अर्थ होगा केशों का
त्याग अर्थात् मुण्डित होना ।
२. (ख) पूरणार्थपठनम् ।
३. (ख) रक्षोच्चाटन ।
४. (ख) मन्त्रप्रपंचोद्गमैः ।
५. (क) पूर्णाभ्यास ।
६. (क) अज्ञानबोधिः परम् (ख) अज्ञानभोगः परः ।
[ ७ ]
अन्ये च जगतो भावा ये च तिष्ठन्त्यनेकधाः।
तेषां तु लक्षकेणापि परतत्त्वं न मीयते¹ ॥ २१ ॥
और भी जगत् के जो विविध प्रकार के पदार्थ हैं उनके लक्ष से भी परम
तत्त्व की बराबरी नहीं की जा सकती। अर्थात् उनकी लाख लाख संख्या से
भी पर तत्त्व की समता नहीं की जा सकती, क्योंकि जागतिक पदार्थों में और
परतत्त्व में अत्यन्त विलक्षणता है। मूल में 'परतत्त्वं न गीयते' यह पाठ
मानने पर 'लाखों जागतिक पदार्थों से परतत्त्व का निरूपण नहीं किया जा
सकता' यह अर्थ होगा ॥ २१ ॥
अथाहं वच्मि मोक्षाय ज्ञानरागजितां² नृणाम्।
निष्कलं निष्प्रपञ्चं च³ परतत्त्वं तदुच्यते ॥ २२ ॥
अब मैं ज्ञान से राग पर विजय प्राप्त करनेवाले लोगों की मुक्ति के लिये
परतत्त्व का निरूपण करता हूँ। निष्कल और निष्प्रपंच जो तत्त्व है वह
परतत्त्व कहा जाता है ॥ २२ ॥
यस्मादुत्पद्यते सर्वं यस्मिन् सर्वं प्रतिष्ठितम्।
यस्मिन् विलीयते सर्वं परतत्त्वं⁴ तदुच्यते ॥ २३ ॥
जिससे सब कुछ उत्पन्न होता है, जिसमें सब स्थित हैं और जिसमें सब
लीन होते हैं वह "पर तत्त्व" कहा जाता है ॥ २३ ॥
भावाभावविनिर्मुक्तं विनाशोत्पत्तिवर्जितम्।
सर्वसंकल्पनातीतं परतत्त्वं⁵ तदुच्यते ॥ २४ ॥
सत् (अस्ति), असत् (नास्ति), सदसत् (अस्तिनास्ति) और असत्-
असत् (नास्तिनास्ति) इस चतुष्कोटि से विनिर्मुक्त, विनाश और उत्पत्ति से
रहित एवं सर्व कल्पनाओं से अतीत जो तत्त्व है वह "परतत्त्व" कहा
जाता है ॥ २४ ॥
१. (ख) तेषां तु लक्षणेनापि परं तत्त्वं न गीयते। (क) परतत्त्वं न गीयते ।
२. (ख) ज्ञानं रागजिताम् । ३. (ख) निष्प्रपंचं यत् परं तत्त्वं ।
४. (ख) परं तत्त्वं तदुच्यते ।
५. (ख) परं तत्त्वं तदुच्यते ।
[ ८ ]
अनाकारमविच्छिन्नमग्राह्यमचलं ध्रुवम् ।
सर्वोपाधिविनिर्मुक्तं सर्वकामविवर्जितम् ॥ २५ ॥
परम तत्त्व निराकार, अविच्छिन्न अर्थात् जन्म, मरण आदि से रहित
अर्थात् शाश्वत, मन और वाणी का अगम्य, निश्चल, अविनश्वर, सब उपा-
धियों से रहित एवं सब कामनाओं से शून्य है ॥ २५ ॥
प्रथमं पृथिवीतत्त्वं जलतत्त्वं द्वितीयकम् ।
तेजस्तत्त्वं तृतीयं च¹ वायुतत्त्वं चतुर्थकम् ॥ २६ ॥
आकाशं पंचमं तत्त्वं मनः षष्ठमुदीरितम् ।
सप्तमं परमं तत्त्वं यो जानाति स मोक्षभाक् ॥ २७ ॥
पहला पृथिवी तत्त्व कहा गया है, दूसरा जलतत्त्व, तीसरा तेजस्तत्त्व,
चौथा वायुतत्त्व, पाँचवाँ आकाश तत्त्व, एवं छठाँ मनस्तत्त्व कहा गया
है । सातवाँ परम तत्त्व है उसे जो जानता है वह मोक्ष को प्राप्त
होता है ॥ २६ ।: २७ ॥
परं तत्त्वं समाख्यातं जन्मबन्धविनाशनम् ।
तस्याभ्यासं प्रवक्ष्यामि येन संजायते लयः ॥ २८ ॥
“परतत्त्व” जन्मरूप बन्धन का विनाशक कहा गया है। मैं उसके अभ्यास
की विधि बतलाऊंगा जिससे लय होता है ॥ २८ ॥
विविक्तदेशे सुखसंनिविष्टः
समासने किंचिदुपेत्य पश्चात् ।
बाहुप्रमाणं स्थिरदृक् स्थिरांग-
श्चिन्ताविहीनोऽभ्यसनं² कुरुष्व ॥२६॥³
निर्जन और पवित्र स्थान में सम आसन पर कुछ पीछे की ओर झुक कर
अर्थात् तन कर सुख से बैठे हुए तुम एक हाथ दूर तक दृष्टि को स्थिर कर
निश्चल शरीर और चिन्ताविहीन होकर उस परमतत्त्व का अभ्यास
करो ॥ २६ ॥
१. (ख) स्यात् ।
२. (ख) स्थिरांगं । ३. श्लोक १६ की यहाँ पर जो पुनरावृत्ति हुई है
इसका कारण आसन के पश्चात् ही ध्यान की प्रक्रिया द्वारा अमनस्क
योग का निरूपण करना है ।
भुजंगासन
पश्चिमोत्तानासन
मत्स्यासन
पृर्वोत्तानासन ( हलासन )
शवासन
मयूरासन ( सव्य )
[ ६ ]
सुखासने समासीनस्तत्त्वाभ्यासं समाचरेत् ।
सदाभ्यासेन तत्कुर्यात् परतत्त्वप्रकाशनम्१ ॥ ३० ॥
सुखासन पर बैठकर परतत्त्व का अभ्यास करना चाहिये । साधक को
चाहिये कि सदा के अभ्यास द्वारा उस परतत्त्व को प्रकाश में लावे ॥ ३० ॥
ब्रह्माण्डं पंचभूतस्थं पंचभूतमयी तनुः ।
सर्वं भूतमयं चेति२ त्यक्त्वा नास्तीति चिन्तय३ ॥३१॥
सारा ब्रह्माण्ड पंचभूतों पर आधृत है, शरीर भी पंचभूतमय है, यही
क्यों सब कुछ भूतमय है, इसलिए उन सबका परित्याग कर “ये है ही नहीं”
ऐसी भावना करो ॥ ३१ ॥
न किंचिन्मनसा ध्यायेत्सर्वचिन्ता विवर्जितः ।
सबाह्याभ्यन्तरे योगी जायते तत्त्वसंमुखः ॥ ३२ ॥४
सब तरह की चिन्ताओं से रहित होकर मन से किसी का भी चिन्तन न
करे ऐसे योगी के बाहर और भीतर तत्त्व सम्मुख हो जाता है अर्थात् उसे
बाहर और भीतर तत्त्व का स्फुरण हो जाता है ॥ ३२ ॥
तत्त्वस्य संमुखे जाते अमनस्क५ प्रजायते ।
असनस्केऽपि संजाते चित्तादि६विलयो भवते ॥ ३३ ॥
तत्त्व के संमुख होने पर७ अमनस्क योग हो जाता है । अमनस्क योग की
प्राप्ति होने पर चित्त आदि का भली भांति लय हो जाता है ॥ ३३ ॥
१. (ख) परं तत्त्वं प्रकाशते ।
२. (ख) वेति ।
३. (ख) भावयेत् ।
४. हठयोगप्रदीपिका में भी लिखा है कि :-
बाह्यचिन्ता न कर्तव्या तथैवान्तरचिन्तनम् ।
सर्वचिन्ता परित्यज्य न किंचिदपि चिन्तयेत् ॥
५. (ख) त्वमनस्कं ।
६. (ख) चिन्तादिविलयो ।
७. आत्मा के संमुख होने पर ।
[ १० ]
चित्तादिविलये जाते पवनस्य लयो भवेत्¹ ।
मनःपवनयोर्नाशादिन्द्रियार्थं विमुञ्चति ॥ ३४ ॥
चित्त आदि का विलय हो जाने पर पवन ( वायु ) का लय हो जाता
है । मन और पवन दोनों का विनाश ( विलय ) होने पर साधक इन्द्रियार्थों
( रूप, शब्द, गन्ध, रस और स्पर्श ) का त्याग कर देता है । 'इन्द्रियार्थाद्
विमुच्यते' ऐसा पाठ मानने पर इन्द्रियार्थों से मुक्त हो जाता है, यह अर्थ
करना चाहिये ॥ ३४ ॥
इन्द्रियार्थैर्यदा मुक्तो² बाह्यज्ञानं न जायते ।
बाह्यज्ञाने विनष्टे च ततः सर्वसमो भवेत् ॥ ३५ ॥
जब साधक इन्द्रियार्थों से ( रूप, शब्द, गन्ध आदि से ) मुक्त हो जाता
है तब उसे बाहरी ज्ञान नहीं होता है । बाहरी ज्ञान के विनष्ट होने पर वह
“सर्वसम” यानी विषमता रहित हो जाता है ॥ ३५ ॥
यदा सर्वसमे जाते³ भवेद् व्यापारवर्जितः ।
परब्रह्मणि⁴ सम्पन्नो⁵ योगी प्राप्तलयस्तदा ॥ ३६ ॥
जब साधक सर्वसम होने पर व्यापाररहित होता है तब परब्रह्म में सम्पन्न
योगी लय को प्राप्त कहा जाता है । ३६ ॥
सदाभ्यासरतानां च यः परो जायते लयः ।
तस्याहं संप्रवक्ष्यामि लक्षणं मुक्तचेतसः ॥ ३७ ॥
सदा परतत्त्व के अभ्यास में निरत योगियों का जो उत्कृष्ट लय होता
है उसका, जिसमें चित्त मुक्त हो जाता है, लक्षण मैं आगे कहूँगा ॥ ३७ ॥
१. ( ख ) यह पूरी पंक्ति नहीं है ।
२. (ख) इन्द्रियार्थे विनिर्मुक्ते ।
३. (ख) यदासर्वसमो जातो ।
४. (ख) परे ब्रह्मणि ।
५. (ख) संबुद्धः ।
" is there a space?
Yes.
In L8, is it "काष्ठवत्तिष्ठेत्"?
क + ा + ष + ठ + व + त् + त् + ि + ष + ् + ठ + े + त् = काष्ठवत्तिष्ठेत्.
Wait, let's look at "लयस्थश्चाभिधीयते":
ल - य - स्थ - श्च - ा - भि - धी - य - ते. Yes!
Let's check L9-10:
"जो पुरुष न जीवित है, न मृत है, न पलक खोलता है और न पलक"
"गिराता है, निर्जीव काष्ठ के तुल्य रहता है वह लयस्थ कहा जाता है ॥ ३६ ॥"
Yes, perfectly clear.
Let's check L11-12:
"निर्वातस्थापितो दीपो भासते निश्चलो यथा ।"
"जगद्व्यापार निर्मुक्तस्तथा योगी लयं गतः ॥ ४० ॥"
Wait, in L12:
"जगद्व्यापार निर्मुक्तस्तथा" or "जगद्व्यापारनिर्मुक्तस्तथा"?
There is a slight space: "जगद्व्यापार निर्मुक्तस्तथा" (or maybe space between words). Let's keep the space if there is one, or look: "जगद्व्यापार निर्मुक्तस्तथा". Yes, there's a space.
Let's check L13-15:
"वायु रहित स्थान पर रखा हुआ
[ १२ ]
लवणं तोयसंस्पर्शाद् यथा१ तोयमयं भवेत् ।
मनोऽपि ब्रह्म संस्पर्शात्तथा ब्रह्ममयं भवेत् ॥ ४३ ॥
जैसे नमक जल के सम्पर्क से जलमय हो जाता है वैसे ही ब्रह्म के संस्पर्श
से मन भी ब्रह्ममय हो जाता है ॥ ४३ ॥
यथाक्षारमयत्वेन प्राप्नोति२ लवणं स्वकम् ।
ब्रह्मज्ञानमयत्वेन निर्वाणं मनसस्तथा ॥ ४४ ॥
जैसे जल में लवण की सत्ता जल के क्षारमय होने से प्राप्त होती है वैसे
ही मन का ब्रह्म में निर्वाण मन के ब्रह्मज्ञानमय होने से प्रतीत होता है ॥४४॥
घृतात् पृथ'क्तारहितं घृते लीनं घृतं यथा ।
तत्त्वे लीनस्तथा योगी पृथग्भावं न विन्दति ॥ ४५ ॥
जैसे घृत में डुबा हुआ घृत घृत से पृथकता ( भेद ) रहित अर्थात् भिन्न
नहीं है वैसे ही तत्त्व ( सत्ता ) में लीन हुआ योगी पृथग्भाव अर्थात् तत्त्व से
अपना भेद नहीं जानता है ॥ ४५ ॥
निमेषेण श्वासपलै३ र्नाडी
[ १३ ]
योगी निमेषमात्रेण लयेन लभते ध्रुवम् ।
स्पर्शनं परतत्त्वस्याप्युत्थानं च पुनः पुनः ॥ ४८ ॥
योगी एक निमेषमात्र के लय से निश्चय ही परतत्त्व के स्पर्श को प्राप्त
होता है और उससे पुनः पुनः व्युत्थान को प्राप्त होता है ॥ ४८ ॥
घर्मशान्तिः प्रजायेत मुहुर्निद्रा च मूर्च्छना ।
निमेषषट्कमात्रेण लयेनान्तःस्थ योगिनः१ ॥ ४६ ॥
छह निमेषों तक के लय से अन्तर्वृत्तिवाले योगी की तापशान्ति होती है,
बार बार निद्रा और मूर्च्छा आती है ॥ ४६ ॥
श्वासमात्रलयेनापि तेन प्राणादिवायवः ।
श्वासप्रवाहसम्बन्धात् स्वे स्वे स्थाने वहन्ति ते ॥ ५० ॥
एक श्वास तक रहनेवाले लय से भी प्राण आदि वायु श्वास प्रवाह के
साथ सम्बन्ध होने से अपने अपने स्थान में बहते हैं ॥ ५० ॥
श्वासद्वयलयेनापि कूर्मनागादिवायवः२ ।
निवर्तन्ते च धातूनां बन्धं कुर्वन्ति धातुगाः३ ॥ ५१ ॥
दो श्वास तक रहने वाले लय से भी कूर्म, नाग आदि वायु निवृत्त हो
जाते हैं और धातुगत होकर धातुओं को पुष्ट करते हैं ॥ ५१ ॥
चतुःश्वासलयेनापि सप्तधातुगताः रसाः ।
रसपुष्टिं४ प्रकुर्वन्ति धातूनां समवायवः ॥ ५२ ॥
चार श्वास तक के लय से भी सातों धातुओं (कफ, पित्त, रस, रक्त,
वसा, मज्जा, शुक्र) के रस समवायु होकर धातुओं के रसों की पुष्टि
करते हैं ॥ ५२ ॥
१. (ख) लयेनिष्ठा च योगिनः ।
२. (ख) कूर्मवातादिवायवः ।
३. (ख) धातवः ।
४. (ख) समं पुष्टिं ।
[ १४ ]
लयेन पलमात्रेण१ चासनस्थो न खिद्यते२ ।
स्वल्पश्वासो भवेद् योगी स्वल्पोन्मेषयुतस्तदा३ ॥ ५३ ॥
एक पल तक के लय से भी आसन पर चाहे कितनी ही देर तक क्यों न
बैठे, योगी को थकान मालूम नहीं होती है । तब उसके श्वास-प्रश्वास कम हो
जाते हैं और निमेष-उन्मेष भी बहुत कम होते हैं ॥ ५३ ॥
पलद्वयलयेनापि हृन्नाड्याश्चालनं४ भवेत् ।
अनाहतः स विज्ञेयो मनस्तत्रैव विन्यसेत्५ ॥ ५४ ॥
दो पल तक के लय से भी हृदय-नाड़ी का चालन ( जागना ) होता
है६, उसे अनाहत जानना चाहिये । योगी मन को उसी में लगावे ॥ ५४ ॥
चतुःपलप्रमाणेन लयेनानुभवो भवेत् ।
अकस्मान्निपतत्येव शब्दः कर्णो शुभावहः७ ॥ ५५ ॥
चार पल तक के लय से अनुभव होता है । अकस्मात् कान में सुन्दर
सुमधुर शब्द सुनाई पड़ता है ॥ ५५ ॥
पलाष्टकलयेनापि कामस्तस्य निवर्तते ।
कदापि८ नैव जायेत कामिन्यालिंगितस्य च ॥ ५६ ॥
आठ पल तक के लय से उसकी कामवासना निवृत्त हो जाती है । कामिनी
द्वारा आलिंगित होने पर उसे कभी भी कामोत्पत्ति नहीं होती है ॥ ५६ ॥
१. (ग) लयेन लयमात्रेण ।
२. (ख) विद्यते ।
३. (ख) स्वल्पो मेखलयस्तथा ।
४. (ख) हृन्नाड्याश्चलनं ।
५. (ख) तत्रैवमभ्यसेन्मनः ।
६. "हृदय-नाडी का चालन" का अर्थ है अनाहत का क्रियाशील होना ।
७. (ख) शब्दस्पातं शुभाशुभम् ।
८. (क) तथापि ।
[ १५ ]
कलापादलयेनापि सुषुम्णां यान्ति वायवः¹ ।
सुषुम्णावदने गत्या आशु शुद्ध्यन्ति वायवः² ॥ ५७ ॥
चौथाई कला ( घड़ी ) तक के लय से भी प्राणादि वायु सुषुम्णा में चले
जाते हैं । सुषुम्णा के मुख में गमन से तत्काल सब वायु शुद्ध हो जाते हैं ॥५७॥
घटिकार्द्धलयेनापि शक्तिः कुण्डलिनी परा³ ।
मनोवातनिरोधेन जागर्त्याधारसंस्थिता⁴ ॥ ५८ ॥
आधी घड़ी तक के लय से निश्चय ही मूलाधार में स्थित परा कुण्डलिनी
शक्ति मन और वायु के निरोध से जाग जाती है ॥५८ ॥
कलामात्रलयेनापि⁵ शक्तिः संचलते ध्रुवम् ।
⁶ऊर्द्ध्वपश्चिममार्गेण वातरोधेन जाग्रती⁷ ॥ ५६ ॥
एक घड़ी तक के लय से भी वायु का रोध होने पर जगी हुई कुण्डलिनी
शक्ति पश्चिम मार्ग ( सुषुम्णा मार्ग ) द्वारा ऊर्ध्वमुखी होकर चलने लगती
है ॥ ५६ ॥
कलाद्वयलयेनापि शक्तेः संचलनेन वा⁸ ।
क्षणादुत्पद्यते तस्य मनसः कम्पनं सकृत् ॥ ६० ॥
दो घड़ी तक के लय से तथा शक्ति के संचलन से एक क्षण में एक बार
योगी के मन कम्पन उत्पन्न होता है ॥ ६० ॥
१. (ख) सुषुम्णामार्गवाहिनी ।
२. (ख) तदा पश्चिममार्गेण तस्य भोगेन गच्छति । (क) मील्या
(शुचिवद्यान्ति ) वायवः ।
३. (क) शक्तिः संचलते ध्रुवम् । (ख) शक्ति कुण्डलिनी परा ।
४. (क) ऊर्ध्वपश्चिममार्गेण वातरोधेन जाग्रति ( जाग्रती ? ) ।
५. (क) घटिकैकलयेनापि सुषुम्णा मार्गवाहिनी ।
६. कला ।
७. गच्छति ।
८. (क) शक्तिसंचालनेन वा । (ख) शक्ते संचलनेन च ।
[ १६ ]
चतुः कलालयेनापि निद्राभावो निवर्तते ।
हृदि स्फुलिंगवद् योगी तेजोबिन्दुं प्रपश्यति ॥ ६१ ॥
चार घड़ी तक के लय से योगी का निद्राभाव निवृत्त हो जाता है और
वह हृदय में चिनगारी के सदृश तेजो बिन्दु का दर्शन करता है ॥ ६१ ॥
दिनपादलयेनापि स्वल्पाहारो भवेन्नरः१ ।
स्वल्पमूत्रपुरीषश्च लघुता स्निग्धता तनोः२ ॥ ६२ ॥
चौथाई दिन तक के लय से भी योगी पुरुष का आहार बहुत घट जाता
है, उसका मूत्र और पुरीष ( मल ) भी बहुत अल्प मात्रा में होता है एवं
शरीर में हल्कापन और स्निग्धता आ जाती है ॥ ६२ ॥
वासरार्धलयेनापि स्वात्मज्योतिः प्रकाशते ।
सूर्यो गोभिरिवोद्दीप्तो३ योगी विश्वं प्रकाशते ॥ ६३ ॥
आधे दिन तक के लय से आत्मज्योति प्रकट होती है। सूर्य जैसे किरणों
से उद्दीप्त रहता है वैसे ही योगी उद्दीप्त होकर विश्व को प्रकाशित
करता है ॥ ६३ ॥
दिनमात्रलयेनापि स्वात्मतत्त्वं प्रकाशते ।
इन्द्रियज्ञानविस्तारो ब्रह्माण्डेऽप्यनुवर्तते४ ॥ ६४ ॥
दिन भर तक रहने वाले लय से आत्मतत्त्व प्रकाशित होता है और
इन्द्रियों के ज्ञान का विस्तार सारे ब्रह्माण्ड तक हो जाता है ॥ ६४ ॥
१. (ख) भवेत्ततः ।
२. (ख) स्वल्पमूत्रपुरीषत्वं लघुता स्निग्धता तथा ।
३. (ख) स सुगोभिरिवोद्धीप्तो ।
४. (ख) ब्रह्माण्डेप्यस्य जायते ।
[ १७ ]
अहोरात्रलयेनापि योगी च स्वासने स्थितः१ ।
चित्तवृत्तिनिरोधेन२ गन्धं जानाति दूरतः ॥ ६५ ॥
एक दिनरात तक के लय से भी अपने आसन पर स्थित ही योगी चित्त-
वृत्ति का निरोध होने से दूर से ही गन्ध जान जाता है ॥ ६५ ॥
अहोरात्रद्वयेनापि लयेनानन्दमूर्च्छितः।३
दूरादपि रसं वेत्ति योगी संकल्पवर्जितः ॥ ६६ ॥
दो दिनरातों तक के लय से भी लयजनित आनन्द से मूर्छित हुआ
संकल्परहित योगी दूर से ही रस को जान जाता है ॥ ६६ ॥
अहोरात्रत्रयेणापि लयेनान्तस्थयोगिनः४।
दूरदर्शनविज्ञानं५ स्वभावेनैव वर्तते ॥ ६७ ॥
तीन अहोरात्रव्यापी लय से अन्तर्मुख हुए योगी का स्वभावतः ही दूर-
दर्शन विज्ञान हो जाता है ॥ ६७ ॥
अहोरात्रचतुष्केण लयभावप्रभावतः ।
स्पर्शं जानाति योगीन्द्रो दूरादपि न संशयः ॥ ६८ ॥
चार अहोरात्र व्यापी लयभाव के प्रभाव से योगिराज दूर से भी स्पर्श
को जान जाता है इसमें सन्देह नहीं है ॥ ६८ ॥
पंचरात्रलयेनापि तस्याप्युत्पद्यते ध्रुवम् ।
दूरश्रवणविज्ञानं मनसाश्चर्य कारणम् ॥ ६६ ॥
पांच अहोरात्रव्यापी लय से उस योगिराज का निश्चय ही आश्चर्यजनक
मन से दूर के शब्द को सुनने का विज्ञान उत्पन्न हो जाता है ॥ ६६ ॥
१. (क) लयादानन्दमूर्च्छितः ।
२. (ख) स्थितिवृत्तिनिरोधेन ।
३. (ख) लयानन्दसमूर्च्छितः । (क) लयनादेषु मूर्च्छित ।
४. (ख) लयानन्दस्य योगिनः ।
५. (ख) दूराद् दर्शन विज्ञानं ।
२
[ १८ ]
एकत्वं चेन्द्रियज्ञानं महत्त्वानुभवात्मकम्¹।
जानात्यनेन योगीन्द्रः सकलं विश्ववर्तनम् ॥ ७० ॥
इससे योगिराज स्वानुभवात्मक एकत्व, विस्तृत ब्रह्माण्डव्यापी इन्द्रियज्ञान
तथा सकल विश्व में स्थिति जान जाता है ॥ ७० ॥
रात्रिषट्कलयेनापि² महाबुद्धिः प्ररोहति ।
तावत्कार्यमतीतं³ च विश्वज्ञानं प्रवर्तते ॥ ७१ ॥
छह अहोरात्रव्यापी लय से महाबुद्धि उत्पन्न होती है जिससे सब कार्यों
तथा अतीत और अनागत विश्व का ज्ञान होता है ॥ ७१ ॥
सप्तरात्रलयेनापि परे लीनस्य योगिनः ।
आब्रह्मविश्ववेत्तृत्वं श्रुतिज्ञानं च वर्तते⁴ ॥ ७२ ॥
सात अहोरात्रव्यापी लय से भी परतत्त्व में लीन हुए योगी का ब्रह्म-
पर्यन्त विश्वज्ञान तथा श्रुतिज्ञान हो जाता है ॥ ७२ ॥
अष्टरात्रलयेनापि भवेद् योगी निरामयः ।
क्षुत्पिपासादिभावैश्च सहजस्थो न पीड्यते⁵ ॥ ७३ ॥
आठ अहोरात्रव्यापी लय से सहजस्थ ( परतत्त्व में लीन ) योगी, निरोग
हो जाता है एवं क्षुधा, प्यास आदि से भी पीड़ित नहीं होता है ॥ ७३ ॥
नवरात्रलयेनापि निर्वेदस्यात्मवर्त्मनः⁶।
वाचः सिद्धिर्भवेत्येव⁷ शापानुग्रहकारिणी ॥ ७४ ॥
नौ अहोरात्रव्यापी लय से अपरोक्ष आत्मज्ञान के मार्गरूप निर्वेद
( वैराग्य ) की सिद्धि तथा शाप और अनुग्रहकारिणी वाक्सिद्धि अवश्य ही
होती है ॥ ७४ ॥
१. (ख) एवं पंचेन्द्रियज्ञानं महत्तत्त्वस्य कारणम् ।
२. (ख) षड्रात्रिविलयेनापि ।
३. (क) यावत्कर्ममतीतं च । (ख) यावत्तर्कमतीतं च ।
४. (ख) आब्रह्मविश्वेश्वरत्वं श्रुतिज्ञानं च जायते ।
५. (ख) सहजैरपि न पीड्यते ।
६. (ख) निर्भेदः स्वात्मवर्तिनः ।
७. (ख) वाचःसिद्धि भवेत्तस्य ।
[ १६ ]
दशरात्रलयेनपि योगीन्द्रः स्वात्मनि स्थितः ।
यानि कानि च गुप्तानि१ महाचित्राणि पश्यति ॥ ७५ ॥
दस अहोरात्रव्यापी लय से स्वात्मनिष्ठ योगीन्द्र भाँति-भाँति के गुप्त
महाश्चर्यों को देखता है ॥ ७५ ॥
२ततश्चैकादशाहेन३ लयस्थस्य जवोदयात् ।
मनसा सहितस्यापि गन्तुमिच्छति विग्रहः ॥ ७६ ॥
ग्यारह अहोरात्र तक लय में स्थित योगीन्द्र की मन के साथ-साथ काया
की गति होती है ॥ ७६ ॥
द्वादशाहलयेनापि भूचरत्वं हि सिद्धयति ।
निमेषार्धप्रमाणेन४ पर्यटत्येव भूतले५ (लम् ?) ॥ ७७ ॥
बारह अहोरात्रव्यापी लय से योगिराज को भूचरत्व की सिद्धि होती है
जिसके कारण केवल आधे निमेष ( पलक मारने ) में सारे भूतल में चारो
ओर घूम लेता है इसमें सन्देह नहीं है ॥ ७७ ॥
ततस्त्रयोदशाहेन लयेनापि महाद्भुताम्६ ।
योगीन्द्रः खेचरीसिद्धिं लभते चिन्तनादपि७ ॥ ७८ ॥
तदनन्तर तेरह अहोरात्रव्यापी लय से योगिराज को केवल चिन्तनमात्र
( ख्याल करने ) से अद्भुत खेचरी सिद्धि प्राप्त होती है ॥ ७८ ॥
१. (ख) सुगुप्तानि ।
२. (क) तथा ।
३. (क) तस्य चैकादशाहेन लयस्थस्य जयोदयात् ।
४. (क) निमिषार्धप्रमाणेन ।
५. (ख) भूतलम् ।
६. (क) और (ख) महाद्भुतम् ।
७. (ख) चेतनादपि ।