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सर्वकोश
अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj

गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

पृष्ठ 81, कुल 128 में से

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पृष्ठ 81

" is there a space?
Yes.
In L8, is it "काष्ठवत्तिष्ठेत्"?
क + ा + ष + ठ + व + त् + त् + ि + ष + ् + ठ + े + त् = काष्ठवत्तिष्ठेत्.
Wait, let's look at "लयस्थश्चाभिधीयते":
ल - य - स्थ - श्च - ा - भि - धी - य - ते. Yes!

Let's check L9-10:
"जो पुरुष न जीवित है, न मृत है, न पलक खोलता है और न पलक"
"गिराता है, निर्जीव काष्ठ के तुल्य रहता है वह लयस्थ कहा जाता है ॥ ३६ ॥"
Yes, perfectly clear.

Let's check L11-12:
"निर्वातस्थापितो दीपो भासते निश्चलो यथा ।"
"जगद्व्यापार निर्मुक्तस्तथा योगी लयं गतः ॥ ४० ॥"
Wait, in L12:
"जगद्व्यापार निर्मुक्तस्तथा" or "जगद्व्यापारनिर्मुक्तस्तथा"?
There is a slight space: "जगद्व्यापार निर्मुक्तस्तथा" (or maybe space between words). Let's keep the space if there is one, or look: "जगद्व्यापार निर्मुक्तस्तथा". Yes, there's a space.

Let's check L13-15:
"वायु रहित स्थान पर रखा हुआ