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सर्वकोश
अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj

गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

पृष्ठ 86, कुल 128 में से

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पृष्ठ 86

[ १६ ]
चतुः कलालयेनापि निद्राभावो निवर्तते ।
हृदि स्फुलिंगवद् योगी तेजोबिन्दुं प्रपश्यति ॥ ६१ ॥
चार घड़ी तक के लय से योगी का निद्राभाव निवृत्त हो जाता है और
वह हृदय में चिनगारी के सदृश तेजो बिन्दु का दर्शन करता है ॥ ६१ ॥
दिनपादलयेनापि स्वल्पाहारो भवेन्नरः१ ।
स्वल्पमूत्रपुरीषश्च लघुता स्निग्धता तनोः२ ॥ ६२ ॥
चौथाई दिन तक के लय से भी योगी पुरुष का आहार बहुत घट जाता
है, उसका मूत्र और पुरीष ( मल ) भी बहुत अल्प मात्रा में होता है एवं
शरीर में हल्कापन और स्निग्धता आ जाती है ॥ ६२ ॥
वासरार्धलयेनापि स्वात्मज्योतिः प्रकाशते ।
सूर्यो गोभिरिवोद्दीप्तो३ योगी विश्वं प्रकाशते ॥ ६३ ॥
आधे दिन तक के लय से आत्मज्योति प्रकट होती है। सूर्य जैसे किरणों
से उद्दीप्त रहता है वैसे ही योगी उद्दीप्त होकर विश्व को प्रकाशित
करता है ॥ ६३ ॥
दिनमात्रलयेनापि स्वात्मतत्त्वं प्रकाशते ।
इन्द्रियज्ञानविस्तारो ब्रह्माण्डेऽप्यनुवर्तते४ ॥ ६४ ॥
दिन भर तक रहने वाले लय से आत्मतत्त्व प्रकाशित होता है और
इन्द्रियों के ज्ञान का विस्तार सारे ब्रह्माण्ड तक हो जाता है ॥ ६४ ॥
१. (ख) भवेत्ततः ।
२. (ख) स्वल्पमूत्रपुरीषत्वं लघुता स्निग्धता तथा ।
३. (ख) स सुगोभिरिवोद्धीप्तो ।
४. (ख) ब्रह्माण्डेप्यस्य जायते ।