अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)
Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj
गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ १७ ]
अहोरात्रलयेनापि योगी च स्वासने स्थितः१ ।
चित्तवृत्तिनिरोधेन२ गन्धं जानाति दूरतः ॥ ६५ ॥
एक दिनरात तक के लय से भी अपने आसन पर स्थित ही योगी चित्त-
वृत्ति का निरोध होने से दूर से ही गन्ध जान जाता है ॥ ६५ ॥
अहोरात्रद्वयेनापि लयेनानन्दमूर्च्छितः।३
दूरादपि रसं वेत्ति योगी संकल्पवर्जितः ॥ ६६ ॥
दो दिनरातों तक के लय से भी लयजनित आनन्द से मूर्छित हुआ
संकल्परहित योगी दूर से ही रस को जान जाता है ॥ ६६ ॥
अहोरात्रत्रयेणापि लयेनान्तस्थयोगिनः४।
दूरदर्शनविज्ञानं५ स्वभावेनैव वर्तते ॥ ६७ ॥
तीन अहोरात्रव्यापी लय से अन्तर्मुख हुए योगी का स्वभावतः ही दूर-
दर्शन विज्ञान हो जाता है ॥ ६७ ॥
अहोरात्रचतुष्केण लयभावप्रभावतः ।
स्पर्शं जानाति योगीन्द्रो दूरादपि न संशयः ॥ ६८ ॥
चार अहोरात्र व्यापी लयभाव के प्रभाव से योगिराज दूर से भी स्पर्श
को जान जाता है इसमें सन्देह नहीं है ॥ ६८ ॥
पंचरात्रलयेनापि तस्याप्युत्पद्यते ध्रुवम् ।
दूरश्रवणविज्ञानं मनसाश्चर्य कारणम् ॥ ६६ ॥
पांच अहोरात्रव्यापी लय से उस योगिराज का निश्चय ही आश्चर्यजनक
मन से दूर के शब्द को सुनने का विज्ञान उत्पन्न हो जाता है ॥ ६६ ॥
१. (क) लयादानन्दमूर्च्छितः ।
२. (ख) स्थितिवृत्तिनिरोधेन ।
३. (ख) लयानन्दसमूर्च्छितः । (क) लयनादेषु मूर्च्छित ।
४. (ख) लयानन्दस्य योगिनः ।
५. (ख) दूराद् दर्शन विज्ञानं ।
२