अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)
Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj
गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा
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दशरात्रलयेनपि योगीन्द्रः स्वात्मनि स्थितः ।
यानि कानि च गुप्तानि१ महाचित्राणि पश्यति ॥ ७५ ॥
दस अहोरात्रव्यापी लय से स्वात्मनिष्ठ योगीन्द्र भाँति-भाँति के गुप्त
महाश्चर्यों को देखता है ॥ ७५ ॥
२ततश्चैकादशाहेन३ लयस्थस्य जवोदयात् ।
मनसा सहितस्यापि गन्तुमिच्छति विग्रहः ॥ ७६ ॥
ग्यारह अहोरात्र तक लय में स्थित योगीन्द्र की मन के साथ-साथ काया
की गति होती है ॥ ७६ ॥
द्वादशाहलयेनापि भूचरत्वं हि सिद्धयति ।
निमेषार्धप्रमाणेन४ पर्यटत्येव भूतले५ (लम् ?) ॥ ७७ ॥
बारह अहोरात्रव्यापी लय से योगिराज को भूचरत्व की सिद्धि होती है
जिसके कारण केवल आधे निमेष ( पलक मारने ) में सारे भूतल में चारो
ओर घूम लेता है इसमें सन्देह नहीं है ॥ ७७ ॥
ततस्त्रयोदशाहेन लयेनापि महाद्भुताम्६ ।
योगीन्द्रः खेचरीसिद्धिं लभते चिन्तनादपि७ ॥ ७८ ॥
तदनन्तर तेरह अहोरात्रव्यापी लय से योगिराज को केवल चिन्तनमात्र
( ख्याल करने ) से अद्भुत खेचरी सिद्धि प्राप्त होती है ॥ ७८ ॥
१. (ख) सुगुप्तानि ।
२. (क) तथा ।
३. (क) तस्य चैकादशाहेन लयस्थस्य जयोदयात् ।
४. (क) निमिषार्धप्रमाणेन ।
५. (ख) भूतलम् ।
६. (क) और (ख) महाद्भुतम् ।
७. (ख) चेतनादपि ।