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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

प्रारंभिक मंगलाचरण एवं शत्रुंजय, उज्जियंत (गिरनार) कल्प

प्रकाशक
श्री जैन श्वेताम्बर नाकोडा पार्श्वनाथ तीर्थ
मेवानगर वाया बालोतरा (राज०)
प्रथम संस्करण
१९७८
मूल्य ३५ रुपये
५०)

प्रकाशकीय
भगवान् पार्श्वनाथ के अनेक नाम हैं, अनेक तीर्थ है। उनके
गुण अनन्त हैं, उनकी महिमा अपार है, जिनका वर्णन करना
कठिन है। नाकोडा पार्श्वनाथ तीर्थ, राजस्थान का सर्वाधिक प्रसिद्ध
तीर्थ है। यहाँ भगवान् पार्श्वनाथ की सेवा मे भैरवजी सदा जागृत
हैं जिनके चमत्कारो से प्रतिदिन तीर्थ पर मेला लगा रहता है।
जगल में मगल हो रहा है। इस तीर्थ पर वहुत ही सुन्दर व कला-
पूर्ण मन्दिर एव पटशालाएँ वनी हुई हैं जो यात्रियों को दिनोदिन
अधिकाधिक सख्या मे आकर्षित करती हैं। यात्रियों के ठहरने के
लिए विशाल धर्मशाला भी वनी हुई है। पहाडियो के बीच स्थित
होने से यह तीर्थ और भी रमणीक बन गया है।
वीकानेरके जैन साहित्य सेवी श्री अगरचन्द नाहटा के सुझाव
पर तीर्थ की ट्रस्ट कमेटी ने अपनी आमदनी का कुछ अश ज्ञान
वृद्धि और ग्रन्थ प्रकाशन मे खर्च करने का तय किया है। इसी
उद्देश्य की पूर्ति हेतु तीर्थ पर एक अच्छा ग्रन्थालय भी स्थापित
किया जा चुका है जिसको शनै शनैः एक वृहद् शोध सस्थान का
रूप देने की भावना है।
चौदहवी शताब्दी के शासन प्रभावक और महान् विद्वान्
वादशाह मोहम्मद तुगलक के प्रतिशोधक श्री जिनप्रभसूरि जी ने
अनेक जैन तीर्थों के सम्बन्ध में समय-समय पर जो कल्प रचे
उनका एक सग्रह ग्रन्थ "विविध तीर्थ कल्प" के नाम से प्रसिद्ध है
जो मूल रूप मे तो प्रकाशित हो चुका है परन्तु वह प्राकृत सस्कृत
मे होने से जन साधारण उससे वाछित लाभ नही उठा पाता है।

( घ )
इसलिए इसका हिन्दी अनुवाद प्रकाशित किया जाना बहुत
आवश्यक था ।
बडे हर्ष का विषय है कि श्री अगरचन्द जी नाहटा के साहित्य
सहयोगी उनके भतीजे श्री भंवरलाल जी नाहटा ने उक्त ग्रन्थ का
हिन्दी अनुवाद कड़ी मेहनत व लग्न के साथ कर इस तीर्थ को
प्रकाशन का अवसर दिया जिसके लिए हम उनके बहुत आभारी
हैं । इस ग्रन्थ की भूमिका तैयार करने व परिशिष्टों की सामग्री
जुटाने मे श्री अगरचन्द जी नाहटा का प्रशमनीय महयोग रहा है ।
ग्रन्थ की प्रस्तावना लिखने मे डाक्टर ज्योतिप्रसाद जी जैन का
भी सराहनीय कार्य रहा हैं । इस ग्रन्थ मे छपे चित्रो के लिए
ब्लाक उपलब्ध करवाने मे श्री गणेश ललवाणी ( जैन भवन
कलकत्ता ) एव श्री महेन्द्र कुमार सिन्धी, कलकत्ता का भी सरा-
हनीय सहयोग रहा है । तीर्थ की ट्रस्ट कमेटी इन सभी महानुभावो
के प्रति अपना हार्दिक आभार प्रकट कग्ती है ।
विविध तीर्थकल्प अपने ढग का एक ही ग्रन्थ हैं । इसको
सुसम्पादित करके गुजराती भाषा मे प्रकाशित करवाने वाले मुनि
श्री जिनविजय जी ने इसके महत्त्व पर अच्छा प्रकाश डाला है ।
उनके वक्तव्य का आवश्यक अंश इस ग्रन्थ मे अन्यत्र उद्धृत किया
गया है ।
तीर्थ की ट्रस्ट कमेटी शीघ्र ही "जैन कथा सचय" नाम का
एक और प्रकाशन करने जा रही है जिसका सम्पादन स्वय श्री
अगरचन्द जी नाहटा कर रहे हैं ।
नाकोडा तीर्थ के सम्बन्ध मे एक प्रामाणिक सचित्र इतिहास की
भी माग श्रद्धालुओ की ओर से काफी समय से आ रही थी । इस
सम्बन्ध मे भी महोपाध्याय विनयसागर जी से नाकोडा तीर्थ का
इतिहास लिखवाया जा रहा है ।

( ङ )
भगवान् श्री पार्श्वनाथ जी की पूर्ण कृपा से ट्रस्ट कमेटी के
मनोरथ सफल होगे । उनके परमभक्त भैरव जी महाराज हमे सदा
ही इस तीर्थ क्षेत्र की नानाविध उन्नति में निरन्तर प्रेरणा व
उत्साह देते रहे है और हमे पूर्ण आशा है कि भविष्य मे भी वे
हमारे प्रयत्नो को सफलीभूत करेंगे ।
सुल्तानमल जैन
अध्यक्ष
वाडमेर, श्री जैन श्वेताम्बर नाकोडा पार्श्वनाथ तीर्थ
दिनाक २-९-७८ मेवानगर (राजस्थान)

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भगवान् पार्श्वनाथ, नाकोडा तीर्थ

श्री भैरुजी नाकोडा तीर्थ

(१)
श्री जैन श्वेताम्बर नाकोडा पार्श्वनाथ तीर्थ

जैनमन्दिर शत्रुञ्जय महातीर्थ, पालीताना (सौराष्ट्र)
(जैन भवन, कलकत्ता के सौजन्य से)

जैनमन्दिर गिरनार महातीर्थ, जूनागढ (सौराष्ट्र)
(जैन भवन, कलकत्ता के सौजन्य से)

लूणिगवसही-तेजपाल वस्तुपाल जिनालय, आबू (राजस्थान)
(जैन भवन, कलकत्ता के सौजन्य से)

श्री महावीर निर्वाण स्थान-चरणपादुका गाँवमन्दिर पावापुरी (बिहार)
(जैन श्वे० सेवासमिति कलकत्ता के सौजन्य से)

महाबोधि मन्दिर, गया (बिहार)

प्राचीन शान्तिनाथ प्रतिमा, नालन्दा (बिहार)

जलमंदिर पावापुरी महातीर्थ (बिहार)

श्री वासुपूज्य जिनालय, चम्पापुरी तीर्थ (बिहार)

श्री कुल्पाक जी तीर्थ जिनालय का शिखर (आन्ध्र प्रदेश)

श्री पद्मप्रभु जिनालय, प्रतिमाएँ, कौशाम्बी तीर्थ (उ० प्र०)
आयागपट्ट, मथुरा स्तूप

श्री महावीर स्वामी
(पिरोजे की प्रतिमा)
६
• ऋषभ देव (माणिक्य स्वामी)
कुल्पाक जी तीर्थ (आन्ध्रप्रदेश)

पद्मप्रभु जिनालय, कौशाम्बी तीर्थ (उ० प्र०)
कौशाम्बी के भग्नावशेष व प्राचीन स्तम्भ