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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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प्रकाशकीय
भगवान् पार्श्वनाथ के अनेक नाम हैं, अनेक तीर्थ है। उनके
गुण अनन्त हैं, उनकी महिमा अपार है, जिनका वर्णन करना
कठिन है। नाकोडा पार्श्वनाथ तीर्थ, राजस्थान का सर्वाधिक प्रसिद्ध
तीर्थ है। यहाँ भगवान् पार्श्वनाथ की सेवा मे भैरवजी सदा जागृत
हैं जिनके चमत्कारो से प्रतिदिन तीर्थ पर मेला लगा रहता है।
जगल में मगल हो रहा है। इस तीर्थ पर वहुत ही सुन्दर व कला-
पूर्ण मन्दिर एव पटशालाएँ वनी हुई हैं जो यात्रियों को दिनोदिन
अधिकाधिक सख्या मे आकर्षित करती हैं। यात्रियों के ठहरने के
लिए विशाल धर्मशाला भी वनी हुई है। पहाडियो के बीच स्थित
होने से यह तीर्थ और भी रमणीक बन गया है।
वीकानेरके जैन साहित्य सेवी श्री अगरचन्द नाहटा के सुझाव
पर तीर्थ की ट्रस्ट कमेटी ने अपनी आमदनी का कुछ अश ज्ञान
वृद्धि और ग्रन्थ प्रकाशन मे खर्च करने का तय किया है। इसी
उद्देश्य की पूर्ति हेतु तीर्थ पर एक अच्छा ग्रन्थालय भी स्थापित
किया जा चुका है जिसको शनै शनैः एक वृहद् शोध सस्थान का
रूप देने की भावना है।
चौदहवी शताब्दी के शासन प्रभावक और महान् विद्वान्
वादशाह मोहम्मद तुगलक के प्रतिशोधक श्री जिनप्रभसूरि जी ने
अनेक जैन तीर्थों के सम्बन्ध में समय-समय पर जो कल्प रचे
उनका एक सग्रह ग्रन्थ "विविध तीर्थ कल्प" के नाम से प्रसिद्ध है
जो मूल रूप मे तो प्रकाशित हो चुका है परन्तु वह प्राकृत सस्कृत
मे होने से जन साधारण उससे वाछित लाभ नही उठा पाता है।