वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
इस ग्रन्थ के बारे में
वेदान्तसार सदानन्द योगीन्द्र का अद्वैत वेदान्त पर लिखा संक्षिप्त प्रकरण-ग्रन्थ है, जो अद्वैत के मुख्य सिद्धान्तों को व्यवस्थित क्रम में प्रस्तुत करता है। अनुबन्ध-चतुष्टय से आरम्भ करके यह अज्ञान, अध्यारोप और अपवाद की पद्धति, महावाक्यों के अर्थ और समाधि तक पहुँचता है, इसलिए इसे वेदान्त का प्रवेश-ग्रन्थ माना जाता है।
यह संस्करण परिमल संस्कृत ग्रन्थमाला का ६४वाँ ग्रन्थ है, जिसका द्वितीय संस्करण २००४ में परिमल पब्लिकेशन्स, दिल्ली से प्रकाशित हुआ। इसकी 'चन्द्रिका' हिन्दी व्याख्या डॉ० राकेश शास्त्री ने लिखी है, जो हरिदेव जोशी राजकीय कन्या महाविद्यालय, बाँसवाड़ा में संस्कृत विभागाध्यक्ष हैं। व्याख्या में पदच्छेद, अनुवाद, विशेष टिप्पणियाँ और आरेख (डायग्राम) दिए गए हैं।
विस्तृत भूमिका में दर्शन का अर्थ, भारतीय दर्शनों का परिचय, वेदान्त के मूल स्रोत और वेदान्त के ५७ आचार्यों तथा उनके ग्रन्थों की सूची है। मूल ग्रन्थ के प्रकरण इस प्रकार हैं: प्राज्ञ और ईश्वर, तुरीय, आवरण और विक्षेप शक्ति, सत्रह अवयवों वाला सूक्ष्म शरीर, पञ्चीकरण, स्थूल सृष्टि, चार्वाक आदि मतों का निराकरण, 'तत्त्वमसि' और 'अहं ब्रह्मास्मि' का अर्थ, सविकल्पक और निर्विकल्पक समाधि, और जीवन्मुक्त का स्वरूप। स्नातक स्तर के विद्यार्थियों के लिए यह व्याख्या विशेष रूप से उपयोगी है।
पञ्चीकरण प्रक्रिया २९७
परिशिष्ट-१
सहायक ग्रन्थ-सूची
- वेदान्तसार, नृसिंह सरस्वती टीका, निर्णयसागर प्रेस बम्बई
- वेदान्तसार, स्वामी रामतीर्थ टीका, निर्णयसागर प्रेस बम्बई
- वेदान्तसार, रामशरण त्रिपाठी, भावबोधिनी, चौखम्बा, वाराणसी
- वेदान्तसार, डा. नरेन्द्रदेव सिंह, साहित्य भण्डार, मेरठ
- वेदान्तसार, श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी, साहित्य भण्डार, मेरठ
- वेदान्तपरिभाषा, धर्मराज अध्वरीन्द्र, शिवदत्तकृत दीपिकाटीका,
चौखम्बा, संस्कृत प्रकाशन, बनारस - वेदान्तसार, एम० हिरियन्ना, पूना
- वेदान्तसार, सुरेन्द्रनाथ शास्त्री, भारती प्रकाशन, इन्दौर
- वेदान्तसार, महेशचन्द्र भारतीय-विमल प्रकाशन, गाजियाबाद
- वेदान्तसार, डा. राममूर्ति शर्मा, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली
- वेदान्तसार, बद्रीनाथ शुक्ल, मोतीलाल बनारसीदास, दिल्ली
- शाङ्करवेदान्त तत्त्वमीमांसा, कालीप्रसाद सिंह-विश्वविद्यालय प्रकाशन,
वाराणसी - सर्वदर्शन संग्रह, माधवाचार्य, व्याख्या- उमाशङ्करऋषि; चौखम्बा
प्रकाशन, वाराणसी - वेदान्तदर्शन, पाल डायसन, उ० प्र० हिन्दी ग्रन्थ अकादमी
- भारतीयदर्शन का इतिहास, एस० एन० दासगुप्त, राजस्थान हिन्दी ग्रन्थ
अकादमी, जयपुर - भारतीयदर्शन, नन्दकिशोर, उ० प्र० हिन्दी संस्थान, लखनऊ
- वेदान्त ज्ञानमीमांसा, मलकानी, म० प्र० हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, भोपाल
- भारतीयदर्शन, उमेश मिश्र, हिन्दी समिति सूचना विभाग, उ० प्र०
- भारतीयदर्शन, डा. राधाकृष्णन, राजपाल एण्ड सन्स, दिल्ली
- वेदान्तदर्शन का इतिहास, उदयवीर शास्त्री, गाजियाबाद
२९८ वेदान्तसार
21. भारतीय दर्शनशास्त्र का इतिहास,-डा० नरेन्द्रदेव सिंह, साहित्य
भण्डार, मेरठ
22. वेदान्त का विकास एवं स्वरूप, -शेखावत, म०प्र० हिन्दी ग्रन्थ
अकादमी, भोपाल
23. वेदान्तविमर्श, डा. अभिमन्यु, परिमल प्रकाशन, दिल्ली
24. भारतीयदर्शन की रूपरेखा, हरेन्द्र प्रसाद सिन्हा, मोतीलाल बनारसी
दास, दिल्ली
25. भारतीयदर्शन की रूपरेखा, एम० हिरियन्ना, राजकमल प्रकाशन,
दिल्ली
26. ब्रह्मसूत्र शांकरभाष्य, गोविन्दानन्द, निर्णयसागर प्रेस, बम्बई
27. पञ्चदशी, विद्यारण्यस्वामी, निर्णयसागर प्रेस, बम्बई
28. मनुस्मृति-हरगोविन्दशास्त्री, चौखम्बा संस्कृत प्रकाशन, वाराणसी
29. भारतीयदर्शन, बलदेव उपाध्याय, शारदा मन्दिर, वाराणसी
30. भारतीयदर्शन, वाचस्पति गैरोला, लोकभारती, इलाहाबाद
31. वेदान्तसार-कर्नल जेकब, चौखम्बा भवन, वाराणसी
32. वेदान्तसार चिन्तामणि-सीतारामशास्त्री, वेंकटेश्वर वि० वि०, तिरुपति
रिक्त पृष्ठ
वेदान्तसार वेदान्तदर्शन का प्रकरणग्रन्थ है। इसके 38 खण्डों में
ग्रन्थकार ने वेदान्तदर्शन के सिद्धान्तों का सरलरूप में प्रतिपादन मशरअमे का
प्रयास किया है। इससे पूर्व ब्रह्मसूत्रादि में प्रतिपादित वेदान्त के सिद्धान्तों को
समझना सामान्य व्यक्ति के लिए दुष्करकार्य हो गया था। इसीकारण आचार्य
सदानन्द ने वेदान्तसार की रचना की आवश्यकता अनुभव की जो अत्यन्त
लोकप्रिय हुई।
यहाँ 108 पृष्ठों की विस्तृत भूमिका में जहाँ वेदान्त-विषयक अनेक
जिज्ञासाओं का समाधान किया गया है। वहीं मूलग्रन्थ के रूप को सुरक्षित रखते
हुए विषय को स्पष्ट किया गया है। सरलता की दृष्टि से मुख्य खण्डों को
उपखण्डों में विभाजित किया गया है। प्रखण्डों के विभाजन में विषय-विशेष के
सर्वांगीण विवेचन की दृष्टि ही प्रमुख रही है।
पूर्व प्रतिपादित विषय को अग्रिम विषय के साथ जोड़ने के लिए
अवतरणिका, पुन: पदच्छेद एवं हिन्दी अनुवाद के बाद 'चन्द्रिका' हिन्दी
व्याख्या में विषय का सर्वांगीण एवं विस्तृत विवेचन प्रस्तुत किया गया है। साथ
ही विशेष शीर्षक में तत्सम्बन्धित अनेक महत्त्वपूर्ण विशेषताओं का उल्लेख
किया है। तत्पश्चात् उस खण्ड के अभिप्राय को डायग्राम बनाकर अध्येता
जिज्ञासु के लिए विषय को सहज हृदयंगम कराना ही मुख्य उद्देश्य है।
मूल्य : 100
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