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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

समाधि-निरूपण (सविकल्पक व निर्विकल्पक समाधि)

समाधि-निरूपण २६५
(ख) मनन- पूर्वप्रतिपादित छः प्रकार के लिङ्गों के तात्पर्य को
भलीप्रकार समझने के पश्चात् वेदान्त में प्रतिपादित अनुकूलयुक्तियों के
माध्यम से अद्वितीयतत्त्व ब्रह्म का निरन्तर चिन्तन करना ही 'मनन' कहलाता
है।
(ग) निदिध्यासन-शरीर से लेकर बुद्धिपर्यन्त भिन्न-भिन्न सभी जड़
पदार्थों में भिन्नता की भावना का परित्याग करके, सभी को एकमात्र ब्रह्म
मानकर, विश्वास करना ही निदिध्यासन कहा गया है।
विशेष-(1) उपर्युक्त दो गद्यखण्डों के अभिप्राय को संक्षेप में इसप्रकार
प्रस्तुत कर सकते हैं-
चित्र-५७
ब्रह्म का साक्षात्कार होने तक अपेक्षित अनुष्ठान
श्रवण मनन निदिध्यासन समाधि
सविकल्पक निर्विकल्पक
षड्लिङ्ग युक्त षड्लिङ्गयुक्त एकमात्र ब्रह्म
वेदान्तवाक्यों का वेदान्त वाक्यों को में विश्वास
अद्वितीय वस्तु समझकर निरन्तर (विस्तृत विवरण अग्रिम
में तात्पर्य ब्रह्मचिन्तन खण्ड में)
षड्लिङ्ग
उपक्रम-उपसंहार अभ्यास अपूर्वता फल अर्थवाद उपपत्ति
आदि और बीच-बीच में अन्य प्रमाण उस प्रसंग में स्थान-स्थान सिद्धि हेतु
अन्त में भली बार-बार द्वारा प्रमाणित श्रूयमान पर प्रशंसा युक्ति की
भांति प्रतिपादन उपपादन न होना प्रयोजन प्रस्तुति
ब्रह्म का
अवतरणिका-प्रसङ्ग-प्राप्त समाधि का साङ्गोपाङ्ग विस्तृत विवरण प्रस्तुत
करते हैं-
समाधिर्द्विविधः सविकल्पको निर्विकल्पक श्चेति। तत्र सविकल्पको
नाम ज्ञातृज्ञानादिविकल्पलयानपेक्षयाद्वितीयवस्तुनि तदाकारा-
कारितायाश्चित्तवृत्तेरवस्थानम्। तदा मृन्मयगजादिभानेऽपि मृद्भानवद्
द्वैतभानेऽप्यद्वैतं वस्तु भासते। तदुक्तम्-
“दृशिस्वरूपं गगनोपमं परं सकृद्विभातं त्वजमेकमक्षरम्।

२६६ वेदान्तसार
अलेपकं सर्वगतं यदद्वयं तदेव चाहं सततं विमुक्तमोम्” इति॥
निर्विकल्पकस्तु ज्ञातृज्ञानादिविकल्पलयापेक्षयाद्वितीयवस्तुनि तदाकारा-
कारितायाश्चित्तवृत्तेरतितरामेकीभावेनावस्थानम्। तदा तु जलाकारा-
कारितलवणानवभासेन जलमात्रावभासवदद्वितीयवस्वाकाराकारितचित्त-
वृत्त्यनवभासेनाद्वितीयवस्तुमात्रमवभासते। ततश्चास्य सुषुप्तेश्चाभेदशङ्का न
भवति। उभयत्र वृत्त्यभाने समानेऽपि तत्सद्भावासद्भावमात्रेणा-
नयोर्भेदोपपत्तेः॥३०॥
पदच्छेद-समाधिः द्विविधः सविकल्पकः निर्विकल्पकः च इति। तत्र
सविकल्पकः नाम ज्ञातृ-ज्ञानादि-विकल्प-लय-अनपेक्षया-अद्वितीयवस्तुनि तद्
आकार-आकारितायाः चित्तवृत्तेः अवस्थानम्। तदा मृण्मय-गजादिभाने अपि
मृद्भानवत् द्वैतभाने अपि अद्वैतं वस्तु भासते। तद उक्तम्-
“दृशिस्वरूपम् गगन-उपमम् परम् सकृद् विभातम् तु अजम् एकम्
अक्षरम्। अलेपकम् सर्वगतम् यद् अद्वयम् तद् एव च अहम् सततम् विमुक्तम्
ओम्”
निर्विकल्पकः तु ज्ञातृ-ज्ञानादि-विकल्प-लय-अपेक्षया-अद्वितीय वस्तुनि
तद् आकार-आकारितायाः चित्तवृत्तेः अतितराम् एकी भावेन अवस्थानम्। तदा
तु जल-आकार-आकारित-लवण-अनवभासेन जलमात्र-अवभासवद्-अद्वितीय
वस्तु-आकार-आकारित-चित्तवृत्ति-अनवभासेन अद्वितीयवस्तुमात्रम् अवभासते।
ततः च अस्य सुषुप्तेः च अभेदशङ्का न भवति। उभयत्र वृत्ति-अभाने समाने
अपि तत् सद्भाव-असद्भावमात्रेण अनयोः भेद-उपपत्तेः॥३०॥
अनुवाद-समाधि दो प्रकार की हैं-सविकल्पक एवं निर्विकल्पक। उनमें
ज्ञाता एवं ज्ञेय के भेद का लोप न होकर केवल अद्वितीयवस्तु के आकार से
आकारित चित्तवृत्ति की स्थिति ही सविकल्पक समाधि है। उस अवस्था में
मिट्टी के बने हाथी आदि की प्रतीति में मिट्टी के भान के समान द्वैत की
प्रतीति होते हुए भी, अद्वैतरूप वस्तु की ही प्रतीति होती है। जैसा कि कहा
भी गया है-
“इसका साक्षात्स्वरूप आकाश के समान है, जो हमेशा परमसूक्ष्म
परात्पर सदैव एक जैसा प्रतीत होने वाला, अजन्मा, अविनाशी, अद्वितीय,
निर्लिप्त, सर्वव्यापक अद्वितीय एवं विनिर्मुक्त ओ३म् है, वही मैं हूँ।”
किन्तु ज्ञाता एवं ज्ञेय के भेद का लोप होकर मात्र अद्वैतवस्तु ब्रह्म में
तदाकार से आकारित चित्तवृत्ति का अत्यधिक एकीभाव से स्थित होना

समाधि-निरूपण २६७
निर्विकल्पकसमाधि है। तब तो जल के आकार से आकारित नमक के प्रतीत
न होने से जलमात्र की प्रतीति के समान, अद्वितीयवस्तु ब्रह्म के आकार से
आकारित के प्रतीत न होने से, अद्वितीयवस्तु ब्रह्ममात्र ही प्रकाशित होता है।
तब इसकी सुषुप्ति में अभेद की आशङ्का नहीं होती है, (क्योंकि) दोनों
स्थानों पर वृत्ति की अप्रतीति समान होने पर भी उनके सद्भाव एवं
असद्भावमात्र से इन दोनों में भेद की सिद्धि होती है।
‘चन्द्रिका'—सविकल्पक, निर्विकल्पक भेद से समाधि दो प्रकार की
होती है। इनमें प्रथम, सविकल्पक-समाधि की स्थिति में साधक को ज्ञाता,
ज्ञान और ज्ञेय इन तीनों का भेदज्ञान होते हुए भी 'अहं ब्रह्मास्मि' इसप्रकार
की अखण्ड आकार से आकारित स्थिति बनी रहती है। इसे समझाने के
लिए ग्रन्थकार मिट्टी के हाथी का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं-जिसप्रकार
मिट्टी से बने हुए हाथी को देखने पर मिट्टी और हाथी दोनों का
अलग-अलग भान होते हुए भी, उसे 'यह हाथी है', ऐसा ही कहा जाता
है। जबकि वास्तविककारण उसमें मिट्टी ही होता है।
उसीप्रकार सविकल्पक, समाधि में ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय की भेदप्रतीति
वस्तुतः वाणी का प्रपञ्चमात्र होता है। जबकि उसमें स्थित अद्वैत का प्रतीत
होना ही वास्तविकता होती है। इसी बात को स्पष्ट एवं प्रमाणित करने के
लिए ग्रन्थकार 'दृशिस्वरूपम्' इत्यादि कारिका प्रस्तुत करते हैं, जिसका
अभिप्राय है-
जो परब्रह्म साक्षिस्वरूप है। आकाश के समान सर्वत्र व्याप्त है। जो
पूर्णतया निर्लिप्त है। जो हमेशा एक ही रूप में प्रकाशमान रहता है अर्थात्
सूर्य अथवा चन्द्रमा आदि के समान, जिसका तेज कभी भी कम अथवा
अधिक नहीं होता है। जिसका कभी जन्म नहीं होता है। जिसका कभी
विनाश नहीं होता है। साथ ही जो अविद्या आदि दोषों से रहित है। जो
सर्वत्र विद्यमान रहता है तथा जो सजातीय अथवा विजातीय इसप्रकार के
भेद से रहित है, एक है। जो न कारण है, न कार्य है अर्थात् इसप्रकार की
दोनों उपाधियों से सर्वथा मुक्त है। परमानन्दस्वरूप वह ओ३म् इस नाम से
उच्चारण किया गया परब्रह्म ही है और वह और कोई नहीं, अपितु मैं
(साधक) ही हूँ।
प्रस्तुत प्रसङ्ग में यह उल्लेखनीय है कि यद्यपि उस परमब्रह्म की अनेक
उपाधियों का उल्लेख शास्त्रों में किया गया है, किन्तु वे सभी वाणी के

२६८ वेदान्तसार
प्रपञ्चमात्र हैं अर्थात् नाममात्र के लिए ही हैं। वास्तविकस्थिति में ये सब
एकमात्र परमब्रह्म के ही अलग-अलग नाम हैं, जो उसकी महिमा का कथन
करने के लिए कहे गए हैं। इसीप्रकार सविकल्पकसमाधि में जो ज्ञाता, ज्ञान
और ज्ञेय की भिन्नता की प्रतीति होती है, वह तो नाममात्र के लिए है।
वास्तव में ज्ञाता, ज्ञान एवं ज्ञेय ये तीनों और कुछ नहीं, अपितु एकमात्र ब्रह्म
ही हैं। इसलिए इस समाधि में भिन्नता में भी एकता विद्यमान रहती है।
जबकि निर्विकल्पक-समाधि में ज्ञाता, ज्ञान एवं ज्ञेय का भेद ठीक
उसीप्रकार समाप्त हो जाता है, जिसप्रकार जल में नमक डालने पर वह
उसमें पूर्णरूप से घुल जाता है, उसकी अलग से प्रतीति नहीं होती है,
केवल जलमात्र ही प्रतीत होता है। अतः निर्विकल्पकसमाधि में उस
अद्वैतवस्तु परमब्रह्म के आकार से आकारित चित्तवृत्ति का अलग से आभास
होना पूरी तरह समाप्त हो जाता है। उस स्थिति में केवल अद्वितीयवस्तु
परमब्रह्म मात्र शेष बचता है, जिसका साधक को निरन्तर भान होता रहता
है।
तत्पश्चात् ग्रन्थकार निर्विकल्पकसमाधि एवं सुषुप्ति की अवस्था की
भिन्नता को स्पष्ट करते हैं। यद्यपि निर्विकल्पकसमाधि एवं सुषुप्ति दोनों में
ही वृत्ति का आभास नहीं होता है तथापि समाधि में वृत्ति की स्थिति
विद्यमान रहती है, किन्तु जल में 'नमक के समान' उसका अद्वैततत्त्व
परमब्रह्म के साथ तादात्म्य हो जाने के कारण अलग से आभासित नहीं होता
है। इसके विपरीत सुषुप्ति की अवस्था में वृत्ति का पूर्णतया अभाव हो जाता
है, क्योंकि वहाँ अन्तःकरण अपने कारणभूत अज्ञान में विलीन हो जाता है।
इसलिए अन्तःकरण की वृत्तियों का पूर्णरूप से अभाव होना स्वाभाविक है।
अतः निर्विकल्पकसमाधि एवं सुषुप्ति अवस्था दोनों को अभिन्न प्रतिपादित
करना भ्रान्ति ही है।
विशेष-(1) समाधि के भेदद्वय-सविकल्पक एवं निर्विकल्पक को
सोदाहरण समझाने के बाद सुषुप्ति अवस्था से निर्विकल्पकसमाधि का भेद
बताया गया है।
(2) निर्विकल्पकसमाधि के विषय में पञ्चदशीकार का कथन इसप्रकार
है-
“ध्यातृ ध्याने परित्यज्य क्रमाद् ध्येयैकगोचरम्।
निर्वात दीपवच्चित्तं समाधिरभिधीयते।।"

समाधि-निरूपण २६९
(३) विद्वन्मनोरञ्जिनीकार स्वामी रामतीर्थ ने निर्विकल्पकसमाधि को
असम्प्रज्ञात समाधि बताते हुए, इसे आलम्बनरहित प्रतिपादित किया है।
(४) इससे पूर्व के गद्यखण्ड में प्रतिपादित श्रवण, मनन, निदिध्यासन
आदि का समाधि के साथ आपेक्षिकमहत्त्व आचार्य शङ्कर भी स्वीकार करते
हैं-
श्रुतेः शतगुणं विद्यान्मननं मननादपि।
निदिध्यासं लक्षगुणमनन्तं निर्विकल्पकम्॥
(५)प्रस्तुत अंश के अभिप्राय को इसप्रकार भी प्रदर्शित कर सकते हैं-१
चित्र-५८
समाधि
सविकल्पक निर्विकल्पक
ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय में भेद प्रतीति होते हुए भी ब्रह्म की प्रतीति | ज्ञाता, ज्ञान, ज्ञेय के भेद की प्रतीति का पूर्ण अभाव एकमात्र ब्रह्म की प्रतीति
मिट्टी के हाथी के समान भेदप्रतीति होते हुए भी मिट्टीमात्र की प्रतीति के समान | सुषुप्ति अवस्था से भिन्नता | जल में नमक घुलने पर एकाकार प्रतीति (जल) के रूप में ब्रह्म की प्रतीति
निर्विकल्पक समाधि में जल में नमक के समान वृत्ति की विद्यमानता रहती है। ब्रह्म के साथ उसके तादात्म्य के कारण आभास नहीं होता है। | सुषुप्ति में वृत्ति का पूर्णतया अभाव हो जाता है।
अन्तःकरण के अपने कारणभूत अज्ञान में लय होने से।
अवतरणिका-समाधि के दो भेदों का उल्लेख करने के बाद अङ्ग एवं
उपाङ्गों का वर्णन करते हैं-
अस्याङ्गानि यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयः। तत्र
"अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः"। "शौचसन्तोषतपः
स्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः"। करचरणादिसंस्थानविशेषलक्षणानि
पद्मस्वस्तिकादीन्यासनानि। रेचकपूरककुम्भकलक्षणाः प्राणनिग्रहोपायाः

१. विस्तृत विवरण के लिए द्रष्टव्य भूमिका पृष्ठ...............।

२७० वेदान्तसार
प्राणायामाः। इन्द्रियाणां स्वस्वविषयेभ्यः प्रत्याहरणं प्रत्याहारः।
अद्वितीयवस्तुन्यन्तरिन्द्रियधारणं धारणा। तत्राद्वितीयवस्तुनि विच्छिद्य
विच्छिद्यान्तरिन्द्रियवृत्तिप्रवाहो ध्यानम्। समाधिस्तूक्तः सविकल्पक
एव॥३१॥
पदच्छेद-अस्य-अङ्गानि यम-नियम-आसन-प्राणायाम-प्रत्याहार- धारणा-
ध्यान-समाधयः। तत्र “अहिंसा-सत्य-अस्तेय-ब्रह्मचर्य-अपरिग्रहाः यमाः”।
“शौच-सन्तोष-तपः-स्वाध्याय ईश्वरप्रणिधानानि नियमाः”। कर-चरणादि-
संस्थान-विशेष-लक्षणानि पद्म-स्वस्तिकादीनि आसनानि। रेचक-पूरक-
कुम्भक-लक्षणाः प्राण-निग्रहोपायाः प्राणायामाः।
इन्द्रियाणाम् स्व-स्वविषयेभ्यः प्रत्याहरणम् प्रत्याहारः। अद्वितीय-वस्तुनि-
अन्तः-इन्द्रियधारणम् धारणा। तत्र-अद्वितीय-वस्तुनि विच्छिद्य-विच्छिद्य-
अन्तःइन्द्रियवृत्तिप्रवाहः ध्यानम्। समाधिः तु उक्तः सविकल्पकः एव॥३१॥
अनुवाद-यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और
समाधि इसके (आठ) अङ्ग हैं। उनमें अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य,
अपरिग्रह (ही) यम हैं। शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय एवं ईश्वर की
आराधना, नियम हैं। हाथ, पैर आदि की स्थितिविशेष के बोधक पद्म एवं
स्वस्तिक आदि आसन हैं। रेचक, पूरक, कुम्भक लक्षणों से युक्त प्राण को
नियन्त्रित करने के उपाय ही प्राणायाम हैं।
अपने-अपने विषयों से इन्द्रियों को निवृत्त कर लेना 'प्रत्याहार' है।
अद्वितीयवस्तु (ब्रह्म) में अन्तरिन्द्रियों (मन, बुद्धि एवं चित्त) को नियोजित
करना 'धारणा' है। अन्तरिन्द्रियों (मन एवं बुद्धि आदि) को रुक-रुककर
उस अद्वितीयवस्तु (ब्रह्म) में प्रवृत्त करना (ही) ध्यान है। समाधि तो
सविकल्पक ही है, जो ऊपर कही जा चुकी है।
'चन्द्रिका'-तत्पश्चात् ग्रन्थकार निर्विकल्पकसमाधि के सहयोगी आठ
अङ्गों का उल्लेख करते हैं-यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार,
धारणा, ध्यान और समाधि, ये ही निर्विकल्पकसमाधि के आठ अङ्ग हैं।
पुनः इन्हें क्रमशः स्पष्ट करते हैं-उपर्युक्त अङ्गों में से 'यम' नामक अङ्ग
के पुनः अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य एवं अपरिग्रह ये पाँच उपाङ्ग माने
गए हैं।
इनमें किसी भी जीव को मन, वचन अथवा कर्म से कष्ट न पहुँचाना
ही 'अहिंसा' है। सदैव सत्यभाषण करना, झूठ न बोलना ही 'सत्य' है।
किसी की वस्तु न चुराना ही 'अस्तेय' कहा गया है। मन अथवा शरीर से
स्त्री की संगति न करना ही 'ब्रह्मचर्य' माना गया है। सांसारिक

समाधि-निरूपण २७१
भौतिकपदार्थों का संग्रह न करना ही 'अपरिग्रह' माना गया है। स्पष्ट है कि,
इन सभी के माध्यम से व्यक्ति अपनी इन्द्रियों को नियन्त्रित अर्थात् नियमित
करता है। इसीलिए ये यम के सहायक उपाङ्ग कहे गए हैं।
शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय एवं ईश्वर की आराधना करना ही नियमों
के अन्तर्गत माने गए हैं। यहाँ शौच से अभिप्राय शरीर एवं मन की शुद्धि से
ग्रहण करना चाहिए। जितना प्राप्त हो गया, उसी से जीवनयापन करना.
अधिक प्राप्त करने की इच्छा न करना ही संतोष है। शरीर को विपरीत
परिस्थितियों के भी अनुकूल बनाना, उनमें कष्ट का अनुभव न करना ही
तप है। इसीप्रकार वेदादि ब्रह्मविषयक ग्रन्थों का निरन्तर नियमितरूप से
अध्ययन करना ही स्वाध्याय है। स्वाध्याय के पश्चात् परमब्रह्म का
श्रद्धापूर्वक चिन्तन, उसकी महिमा का कथन आदि प्राणिधान अर्थात् ईश्वर
की आराधना माना गया है।
शरीर को सात्त्विक, हल्का एवं तपयोग्य बनाए रखने के लिए, हाथ पैर
आदि की विशेष आकृति को प्रदर्शित करने वाले स्वस्तिक एवं पद्मासन
आदि आसन माने गए हैं। इनके अभ्यास से साधक का अपने शरीर एवं
मन पर नियन्त्रण होता है। अतः समाधि के लिए इनकी उपयोगिता मानी गई
है। प्राणवायु को धीरे-धीरे नासिकारन्ध्र से बाहर की ओर निकालना 'रेचक'
कहलाता है। इसीप्रकार शनैः शनैः उसे शरीर में खींचना 'पूरक' तथा
धैर्यपूर्वक उसे शरीर में रोकना 'कुम्भक' माना गया है। इन तीनों क्रियाओं
को पद्मासन लगाकर, क्रमशः धीरे-धीरे सम्पादित करना ही 'प्राणायाम' है।
ऐसा करने से प्राणवायु पर नियन्त्रण के साथ-साथ शरीर की शुद्धि तथा
सत्त्वगुण में वृद्धि होती है।
सामान्यतः इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों की ओर आकर्षित होती हैं,
क्योंकि उनके भोग में प्रवृत्त रहना उनका स्वभाव है। इसमें मन भी इन्द्रियों
का ही साथ देता है, किन्तु अपनी अन्तःइन्द्रियों (मन, बुद्धि आदि) तथा
बाह्य इन्द्रियों को उनके अपने-अपने विषयों की ओर जाने से रोकना,
नियन्त्रित करना ही 'प्रत्याहार' कहा गया है। इसके अतिरिक्त विषयों से
नियन्त्रित किए गए अन्तःकरण मन, बुद्धि आदि को अद्वितीयवस्तु ब्रह्म में
लगाना ही धारणा है। इसीप्रकार अद्वितीयब्रह्म में नियोजित किया जाता हुआ
अन्तःकरण, जब इधर-उधर सांसारिक वस्तुओं की ओर जाता है। इसप्रकार
इधर-उधर भटकते हुए अन्तःकरण मन, बुद्धि आदि को अद्वितीय वस्तु
परमब्रह्म में थोड़ा रुक-रुककर बार-बार प्रवृत्त करना ही ध्यान है। इसके

२७२ वेदान्तसार
अतिरिक्त यहाँ बताई गई समाधि से अभिप्राय 'सविकल्पक' समाधि से है।
जिसका पूर्व में विस्तारपूर्वक कथन किया जा चुका है।
विशेष-(1) अङ्गानि-अङ्ग्यन्ते ज्ञायन्ते अमीभिरिति अङ्गानि' इत्यादि
व्युत्पत्ति के अनुसार निर्विकल्पकसमाधि में सहायक होने के कारण इन्हें
अङ्ग कहा गया है।
(2) पातञ्जलसूत्र में भी इनकी संख्या आठ ही बतायी गई है।
(3) शङ्कराचार्य ने यम की इसप्रकार व्याख्या की है-
“सर्वं ब्रह्मेति विज्ञानादिन्द्रियग्रामसंयमः।
यमोऽयमिति सम्प्रोक्तोऽभ्यसनीयो मुहुर्मुहुः।।
(4) महर्षि पतञ्जलि ने पातञ्जलयोगदर्शन में समाधि के आठ अङ्गों
का विस्तारपूर्वक उल्लेख किया है।
(5) धारणा के विषय में आचार्य नृसिंहसरस्वती का कथन इसप्रकार
है-
“सर्वेषां बुद्धिसाक्षितया विद्यमानेऽद्वितीयवस्तुनिचित्तनिक्षेपणं धारणा”
(6) प्रस्तुत अंश के अभिप्राय को संक्षेप में इसप्रकार भी समझा जा
सकता है-
चित्र-५९
निर्विकल्पक समाधि के आठ अङ्ग
यम | नियम | आसन | प्राणायाम | प्रत्याहार | धारणा | ध्यान | समाधि
पद्मा-स्वस्तिकादि हाथ पैर की विशेष स्थिति
अहिंसा सत्य अस्तेय ब्रह्मचर्य अपरिग्रह | पूरक कुम्भक रेचक | अन्तःकरण को ब्रह्म में लगाना | ज्ञाता ज्ञान आदि के भेद
संयुक्त प्रक्रिया | आभासपूर्वक चित्तवृत्ति का तदाकार आकारित होना।
शौच संतोष तप स्वाध्याय ईश्वरप्रणिधान
इन्द्रियों को स्व-स्व विषय से हटाना
अन्तःकरण को रुक-रुककर परब्रह्म की ओर प्रवृत्त करना।

समाधि-निरूपण २७३
अवतरणिका- तत्पश्चात् निर्विकल्पकसमाधि के मार्ग में आने वाले
विघ्नचतुष्टय को प्रस्तुत करते हैं-
एवमस्याङ्गिनो निर्विकल्पकस्य लयविक्षेपकषायरसास्वादलक्षणा
श्चत्वारो विघ्नाः सम्भवन्ति। लयस्तावदखण्डवस्त्वनवलम्बनेन
चित्तवृत्तेर्निद्रा। अखण्डवस्त्वनवलम्बनेन चित्तवृत्तेरन्यावलम्बनं विक्षेपः।
लयविक्षेपाभावेऽपि चित्तवृत्ते रागादिवासनया स्तब्धीभावादखण्ड-
वस्त्वनवलम्बनं कषायः। अखण्डवस्त्वनवलम्बनेनापि चित्तवृत्तेः
सविकल्पकानन्दास्वादनं रसास्वादः। समाध्यारम्भसमये
सविकल्पकानन्दास्वादनं वा॥३२॥
पदच्छेद-एवम् अस्य अङ्गिनः निर्विकल्पकस्य लय-विक्षेप-कषाय-
रसास्वाद-लक्षणाः चत्वारः विघ्नाः सम्भवन्ति। लयः तावद्
अखण्डवस्तु-अनवलम्बनेन चित्तवृत्तेः निद्रा। अखण्डवस्तु-अनवलम्बनेन
चित्तवृत्तेः अन्य-अवलम्बनम् विक्षेपः। लयविक्षेप-अभावे अपि चित्तवृत्तेः
राग-आदि वासनया स्तब्धी-भावाद् अखण्डवस्तु-अनवलम्बनम् कषायः।
अखण्डवस्तु-अनवलम्बनेन अपि चित्तवृत्तेः सविकल्पक-आनन्द-आस्वादनम्
रसास्वादः। समाधि-आरम्भसमये सविकल्पक-आनन्द-आस्वादनम् वा।।३२।।
अनुवाद-इसप्रकार इस मुख्य निर्विकल्पक (समाधि) के लय, विक्षेप,
कषाय और रसास्वाद (नामक) चार विघ्न होते हैं। अखण्डवस्तु (ब्रह्म) का
आश्रय प्राप्त किए बिना, चित्तवृत्ति का निद्रा के वशीभूत होना तो 'लय'
(नामक विघ्न) है। अखण्डवस्तु को प्राप्त करने से पहले चित्तवृत्ति का
आनन्द (बाह्य सांसारिक) विषयों में अटक जाना 'विक्षेप' कहलाता है।
लय और विक्षेप के अभाव में भी चित्तवृत्ति का राग आदि संस्कारों से
जड़तावश अखण्डवस्तु (ब्रह्म) तक न पहुँच पाना ही कषाय है।
अखण्डवस्तु (ब्रह्म) का आश्रय प्राप्त किये बिना ही चित्तवृत्ति का
सविकल्पकसमाधि के आनन्द का आस्वादन ही 'रसास्वाद' (नामक विघ्न)
है अथवा समाधि के आरम्भिकसमय में 'सविकल्पकसमाधि के आनन्द से
ही संतुष्ट होना रसास्वाद' है।
'चन्द्रिका'- प्रमाता अधिकारी जब गुरु के उपदेश एवं श्रवण आदि
उपायों के अपने अभ्यास से सविकल्पक समाधि तक पहुँचकर, अपने
चरमलक्ष्य निर्विकल्पकसमाधि की ओर बढ़ता है तो इस मार्ग में उसे कुछ
व्यवधानों का सामना करना पड़ता है, जिनकी संख्या चार मानी गई है,
इनका विवरण क्रमशः इसप्रकार है-

२७४ वेदान्तसार
(१) लय-समाधि की अवस्था में साधक अपनी बाह्य एवं आन्तरिक
इन्द्रियों को सांसारिकविषयों से हटाकर, अन्तरात्मा परमशुद्धचैतन्य की ओर
उन्मुख होने का प्रयास करता है, किन्तु प्रत्यगात्मा के स्वरूप की प्रतीति के
अभाव में तन्द्रावश निद्रा के वशीभूत हो जाता है। इसलिए अद्वितीयवस्तु
ब्रह्मप्राप्तिरूप निर्विकल्पकसमाधि के मार्ग में इसे ‘लय' नामक प्रथम विघ्न
बताया गया है। इस स्थिति में चित्तवृत्ति वस्तुतः शब्दादि बाह्यविषयों को भी
आलस्य के कारण ग्रहण नहीं कर पाती है। साथ ही इसीकारण प्रत्यगात्मा
का स्वरूप भी अवभासित न होने से चित्तवृत्ति लगभग निवृत्त ही हो जाती
है। वस्तुतः लय में स्थित साधक की उपमा हम ऐसे यात्री से दे सकते हैं
जो चलते-चलते थकान के कारण मार्ग में ही निद्रा के आगोश में समाकर
अपने लक्ष्य को विस्मृत कर बैठा हो।
(२) विक्षेप-अद्वितीयवस्तु परब्रह्म को प्राप्त करने के लिए जब
चित्तवृत्ति अन्तर्मुखी होती है, किन्तु वहाँ उसके दर्शन न करके पुनः बाह्य
वस्तुओं को ग्रहण करने में प्रवृत्त हो जाती है। इसप्रकार की स्थिति को
निर्विकल्पकसमाधि के मार्ग में 'विक्षेप' नामक विघ्न के रूप में कहा गया
है। विक्षेप में स्थित प्रमाता की उपमा हम ऐसे पक्षी से दे सकते हैं, जो
फलदारवृक्ष पर बैठा हुआ है, किन्तु अच्छे फल खाने की अभिलाषा से
अन्य वृक्षों की ओर उड़ता है, किन्तु वहाँ अच्छे फल न पाकर पुनः अपने
पूर्ववृक्ष पर ही आ बैठता है।
(३) कषाय-लय और विक्षेप नामक दोनों प्रकार के विघ्नों के न होते
हुए भी जब साधक की चित्तवृत्ति राग आदि वासनाओं के वशीभूत होने के
कारण स्तब्ध हो जाती है, मानो ठहर सी जाती है। जिसके कारण उसका
अद्वितीयवस्तु परब्रह्म के दर्शन का प्रयास निष्फल हो जाता है। इस विघ्न
को 'कषाय' के नाम से जाना गया है। इसे समझाने के लिए प्रसिद्ध
टीकाकार नृसिंहसरस्वती ने इसप्रकार उदाहरण प्रस्तुत किया है-
जिसप्रकार कोई व्यक्ति राजा के दर्शन हेतु राजमहल की ओर प्रस्थान
करे, किन्तु मार्ग में द्वारपाल द्वारा रोक दिया जाए और द्वार पर ही खड़ा रह
जाए। ठीक इसीप्रकार शब्दादि बाह्यविषयों का परित्याग करके चित्तवृत्ति को
साधक अद्वितीयवस्तु की ओर प्रवृत्त करता है, किन्तु अतीत की अनुभूतियों
की परम्परा के कारण उसकी चित्तवृत्ति रागादि की वासना से जड़ सी हो
जाती है। यही कषाय है।

समाधि-निरूपण २७५
(४) रसास्वाद-रसास्वाद नामक विघ्न के ग्रन्थकार ने दो लक्षण किये
हैं। प्रथम के अनुसार-अद्वितीयवस्तु ब्रह्म की प्राप्ति न होने पर सम्पूर्ण
बाह्यप्रपञ्च की निवृत्ति होने से साधक को ब्रह्मानन्द के भ्रमवश जो
सविकल्पक आनन्द की अनुभूति होती है, उसे रसास्वाद कहते हैं। द्वितीय
लक्षण के अनुसार-सविकल्पकसमाधि में स्थित साधक ज्यों ही निर्विकल्पक
समाधि की ओर अग्रसर होता है। उसी समय अनुभूत आनन्द से
अनिच्छावश ही संतुष्ट होकर ठहर जाता है। इसीको रसास्वाद नामक विघ्न
कहा जाता है।
विशेष-(1) पञ्चदशीकार ने रसास्वाद विघ्न की व्याख्या इसप्रकार की
है-
'मग्नस्याब्धौ यथाक्षाणि विह्वलानि तथास्य धीः।
अखण्डैकरसं श्रुत्वा निष्प्रचारा बिभेत्यतः॥
(२) प्रस्तुत गद्यखण्ड के अभिप्राय को इसप्रकार भी प्रदर्शित किया जा
सकता है-
चित्र-६०
विघ्न चतुष्टय
┌───────────────┬────────────────┬────────────────┬─────────────────┐
लय विक्षेप कषाय रसास्वाद
│ │ │ │
┌─────────────┐ ┌──────────────┐ ┌──────────────┐ ┌─────────────────┐
│निद्रावस्था को│ │बाह्य सांसारिक│ │वासनावश रागादि│ │भ्रमवश सविकल्पक │
│प्राप्त होना │ │विषयों से │ │से स्तब्ध होना│ │आनन्द से ही │
│ │ │अवरुद्ध होना │ │ │ │सन्तुष्ट हो जाना │
└─────────────┘ └───────▲──────┘ └──────▲───────┘ └────────▲────────┘
│ │ │
┌─────┴─────────────┴─────────────────┴┐
│ अद्वितीय वस्तु के आश्रय │
│ से पूर्व चित्तवृत्ति का। │
└──────────────────────────────────────┘
अवतरणिका-तत्पश्चात् निर्विकल्पकसमाधि की स्थिति का कथन करते
हुए, उससे पूर्व चित्तवृत्ति में विघ्नों का प्रादुर्भाव होने पर उनके निवारण-
विषयक उपायों की कारिका प्रस्तुत करते हैं-
अनेन विघ्नचतुष्टयेन विरहितं चित्तं निर्वातदीपवदचलं सदखण्ड-
चैतन्यमात्रमवतिष्ठते यदा तदा निर्विकल्पकः समाधिरित्युच्यते। तदुक्तम्-
“लये सम्बोधयेच्चित्तं विक्षिप्तं शमयेत्पुनः।
सकषायं विजानीयाच्छमप्राप्तं न चालयेत्॥

२७६ वेदान्तसार


नास्वादयेद्रसं तत्र निःसङ्गः प्रज्ञया भवेत्" इति,
“यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता" इति च॥३३॥
पदच्छेद-अनेन विघ्नचतुष्टयेन विरहितम् चित्तम् निर्वातदीपवत् अचलम्
सद् अखण्डचैतन्यमात्रम् अवतिष्ठते यदा, तदा निर्विकल्पकः समाधिः इति
उच्यते। तद उक्तम्-
“लये सम्बोधयेत् चित्तम् विक्षिप्तम् शमयेत् पुनः।
सकषायम् विजानीयात् शमप्राप्तम् न चालयेत्॥
न आस्वादयेद् रसम् तत्र निःसङ्गः प्रज्ञया भवेत्" इति,
“यथा दीपः निवातस्थः न इङ्गते सा उपमा स्मृता" इति च॥३३॥
अनुवाद-इन चार प्रकार के विघ्नों से पूर्णतय़ारहित चित्त, जब वायुरहित
प्रदेश में स्थित दीपक के समान अचल होकर अखण्डचैतन्यमात्र में स्थित
रहता है। तब निर्विकल्पकसमाधि है, ऐसा कहा जाता है। इसलिए कहा गया
है-
“लय में चित्त को सावधान करे, तत्पश्चात् (विक्षेप में) विक्षिप्त हुए
(चित्त) को शान्त करे, कषाययुक्त चित्त को विशेषरूप से समझाए तथा
स्थिरता (शम) को प्राप्त हुए चित्त को छेड़ना नहीं चाहिए।
इसके अतिरिक्त 'रसास्वाद' (की स्थिति) में रस का आस्वादन न करे
अपितु प्रज्ञा द्वारा (ठीक उसीप्रकार) स्वयं को पूर्णरूप से आसक्तिरहित करे।
जिसप्रकार वायुरहित प्रदेश में स्थित दीपक चलायमान नहीं होता है। वह
साधक इसीप्रकार की उपमा वाला कहा गया है।"
'चन्द्रिका'-प्रस्तुत गद्यखण्ड से पूर्व बताए गए लय, विक्षेप, कषाय एवं
रसास्वाद नामक चार प्रकार के विघ्नों से पूर्णतय़ारहित होकर जब साधक,
पूर्णतया वायुरहित प्रदेश में स्थित दीपक की पूर्णरूप से स्थिर लौ के
समान, निश्चल एवं अखण्ड चैतन्यमात्ररूप में स्थित होता है, उसकी यही
अवस्था निर्विकल्पकसमाधि कहलाती है।
इस अवस्था को प्राप्त करने का प्रयास करती हुई चित्तवृत्ति में यदि
विघ्नों का प्रादुर्भाव हो जाता है, तो उसके निवारण के उपाय हेतु ग्रन्थकार
आचार्य गौडपाद की कारिका को प्रस्तुत करते हैं-
सविकल्पकसमाधि की अवस्था में प्रत्यगात्मारूप ब्रह्म के ज्ञान की
प्रतीति न होने पर यदि आलस्य के कारण निद्रा की प्राप्तिरूप 'लय' नामक

समाधि-निरूपण २७७
विघ्न आ जाए तो उसे दूर करने के लिए साधक को बार-बार चित्त को
उत्साहित करके जागृत करना चाहिए, क्योंकि निद्रामग्न होने पर वह
ब्रह्मप्राप्तिरूप अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में असमर्थ रहेगा।
पुनः अद्वितीय वस्तु ब्रह्म को प्राप्त करने के लिए प्रवृत्त हुई चित्तवृत्ति
यदि सांसारिकविषयों को ग्रहण करने में प्रवृत्त हो जाए, तो उसे सांसारिक
विषयों के प्रति वैराग्यभाव उत्पन्न करके शान्त करना चाहिए तथा धैर्य का
अवलम्बन करके पुनः उसी अद्वितीयवस्तु परमब्रह्म की ओर प्रेरित करना
चाहिए। ऐसा करने पर ही वह निर्विकल्पकसमाधि को प्राप्त करने में सक्षम
होगा।
इसप्रकार ब्रह्मेतर विषयों में लगा हुआ चित्त निरन्तर अभ्यासपूर्वक 'लय'
और 'विक्षेप' नामक विघ्नों पर विजय प्राप्त करने के पश्चात् कभी-कभी
अखण्डवस्तु के एकाकार की प्राप्ति न होने से स्तब्ध होकर जड़वत् हो
जाता है अथवा रागादि वासनावश बाह्यविषयों की ओर जाने लगता है, तो
कषायरूप इस विघ्न के उपस्थित होने पर साधक को सावधान हो जाना
चाहिए तथा यह सोचकर कि, 'इसके द्वारा अखण्डवस्तु की प्राप्ति नहीं हो
सकती है, अतः यह त्याज्य है', उसका परित्याग कर देना चाहिए।
इसप्रकार विचार करने से निरन्तर अभ्यास द्वारा जब चित्त 'शम' को
प्राप्त हो जाए तो उसे वहीं स्थिर कर देना चाहिए। उसके बाद उसे वहाँ से
विचलित करना लेशमात्र भी उचित नहीं है। अतः स्वयं को प्रज्ञा द्वारा
पूर्णतया आसक्तिरहित करके, साधक को ब्रह्मानन्द का आस्वादन करना
चाहिए। वस्तुतः साधक को सविकल्पकरस के आनन्दमात्र से स्वयं को
कृतार्थ नहीं समझना चाहिए, अपितु बुद्धिबल से सविकल्पक आनन्द से
अनासक्त रहने का निरन्तर प्रयास करना चाहिए।
इसप्रकार के योगी के चित्त की उपमा ऐसे दीपक की पूर्णतया स्थिर लौ
के साथ दी गई है, जो पूरीतरह वायुरहित प्रदेश में रखा हुआ है। अर्थात्
जिसप्रकार पूर्णतया वायुरहितप्रदेश में रखे हुए दीपक की लौ लेशमात्र भी
परिचालित नहीं होती पूर्णतया निश्चल रहती है। ठीक उसीप्रकार सभीप्रकार
के विघ्नों को पार करके निर्विकल्पकसमाधि में स्थित साधक का चित्त भी
पूर्णतया निश्चल होकर अखण्डपरमानन्द का अनुभव करते हुए एकाकार की
अनुभूति करता है। इस विषय में आचार्य गौडपाद कहते हैं-