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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

भूमिका: (ख) भारतीयदर्शन एक परिचय

२ वेदान्तसार
इसप्रकार दर्शनरूपी ज्ञान की इस स्रोतस्विनी का प्रवाह आदिकाल से
अबाधगति से चला आ रहा है। जिसका उद्गमस्थल हमें वैदिकज्ञान के
अक्षयभण्डार ऋग्वेद में दृष्टिगोचर होता है। उसमें प्रयुक्त दार्शनिक
सूक्त-नासदीय, पुरुष आदि तत्कालीन मानव की नैसर्गिकजिज्ञासा के
परिचायक हैं।
तत्पश्चात् उपनिषद्ग्रन्थों में साक्षात्कृतधर्मा ऋषियों का मौलिक एवं
स्वतन्त्रचिन्तन उपलब्ध होता है। इन उपनिषदों की संख्या एक सौ आठ
मानी गई है, जिनमें ग्यारह प्रमुख हैं। सभी भारतीय आस्तिकदर्शनों का मूल
आधार ये उपनिषद् ग्रन्थ ही हैं। इनमें भी बृहदारण्यक, छान्दोग्य, तैत्तिरीय,
श्वेताश्वतर, कठ, प्रश्न, माण्डूक्य आदि दार्शनिक विषयों के प्रतिपादन की
दृष्टि से अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हैं।¹
(ग) भारतीयदर्शन एक परिचय-भारतीयदर्शनविषयक विचारधाराओं
को मुख्यरूप से दो भागों में विभाजित किया जा सकता है-(1) आस्तिक
एवं (2) नास्तिक। जिनमें वेदों की प्रामाणिकता को स्वीकार किया गया,
उन्हें आस्तिक तथा जो वेदों को महत्ता प्रदान नहीं करते हैं उन्हें 'नास्तिक'
दर्शन की संज्ञा प्रदान की गई। नास्तिक-दर्शनों के अन्तर्गत मुख्यरूप से
चार्वाक, जैन और बौद्धदर्शनों की गणना की गई तथा आस्तिकदर्शनों की
संख्या छः मानी गई-पूर्वमीमांसा, उत्तरमीमांसा, (वेदान्त), सांख्य, योग,
न्याय और वैशेषिकदर्शन। इन सभी दर्शनों का संक्षिप्त परिचय निम्न प्रकार
है-
(अ) नास्तिकदर्शन-(क) इनमें सर्वाधिक प्राचीन चार्वाक-दर्शन
माना गया है। इसीको लोकायत के नाम से भी जाना जाता है। यह वस्तुतः
भौतिकवादी दर्शन है। आचार्य बृहस्पति एवं चार्वाक इसके प्रमुख आचार्य
रहे हैं। यह दर्शन आत्मा, परमात्मा, परलोक आदि को स्वीकार नहीं करता
है। इसके अनुसार प्रत्यक्षरूप से दिखायी देने वाला जगत् ही सब कुछ है।
अतः व्यक्ति इस संसार में जब तक जीवित रहे तब तक उसे सुखपूर्वक
जीने का ही प्रयास करना चाहिए। दुःखों से हमेशा दूर रहना चाहिए,
क्योंकि शरीर की मृत्यु के बाद जला दिए जाने पर इसका पुनः इस संसार
में आगमन कैसे हो सकता है?

  1. विस्तृत अध्ययन के लिए द्रष्टव्य लेखककृत भारतीयदर्शन-मूलअवधारणाएँ।

भूमिका ३
(२) जैनदर्शन भी नास्तिकदर्शनों के अन्तर्गत ही आता है। प्रथम शती
के 'उमा स्वाति' इसके प्राचीन आचार्य माने गए हैं तथा पञ्चम शती में
स्थित 'सिद्धसेन दिवाकर' को जैनन्याय के प्रणेता के रूप में जाना जाता है।
इसके अतिरिक्त अकलंकदेव, विद्यानन्द, प्रभासचन्द्र, हेमचन्द्र सूरि, मल्लिसेन
आदि इस दर्शन के प्रमुख आचार्य हैं। इस दर्शन में जीवन की सूक्ष्मातिसूक्ष्म
समस्याओं पर विचार किया गया है। इसका अनेकान्तवाद का सिद्धान्त
सर्वाधिक प्रसिद्ध है, जो भिन्न-भिन्न दृष्टियों से वस्तु के अलग-अलग रूपों
की सत्यता का प्रतिपादन करता है। इस विचारधारा में कुल चौबीस तीर्थंकर
हुए, जिनमें प्रथम ऋषभदेव तथा अन्तिम भगवान् महावीर माने गए हैं।
जैनदर्शन के अन्तर्गत तीर्थंकरों के उपदेश तथा जैन साधुओं के चरित्र
को विशेष महत्ता प्रदान की गई है। इसके प्रमुखतया दो सम्प्रदाय हैं-(अ)
श्वेताम्बर एवं (ब) दिगम्बर। यहाँ पञ्च परमेष्ठियों की पूजा का विधान
किया गया है। जिनमें अर्हत्, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधु आते हैं।
दिगम्बरजैन साधु पूर्णतया नग्न रहते हैं तथा श्वेताम्बर श्वेतवस्त्र धारण करते
हैं। इस दर्शन में अहिंसा का सर्वाधिक महत्त्व है। किसी भी प्राणी को मन,
वचन अथवा कर्म द्वारा कष्ट पहुँचाना यहाँ हिंसा के अन्तर्गत माना गया है।
इसके अतिरिक्त यह दर्शन पुनर्जन्म, कर्म तथा स्याद्वाद के सिद्धान्तों को
भी मान्यता प्रदान करता है।
(३) बौद्धदर्शन भी नास्तिकदर्शन के अन्तर्गत माना गया है। इसके
मुख्यतया चार सम्प्रदायों का उल्लेख मिलता है-(1) वैभाषिक, (2)
सौत्रान्तिक, (3) विज्ञानवादी तथा (4) शून्यवादी। पालिभाषा में लिखे गए
त्रिपिटक ग्रन्थों में इस दर्शन के सिद्धान्तों का उल्लेख मिलता है। द्वितीय
शती में स्थित 'नागार्जुन' इसके प्राचीन आचार्य हैं। इसके अतिरिक्त
वसुबन्ध, दिङ्नाग, धर्मकीर्ति, शान्तरक्षित, कमलशील, रत्नकीर्ति तथा ज्ञानश्री
मिश्र आदि भी प्रसिद्ध आचार्य हैं। इन आचार्यों द्वारा लिखे गए
प्रमाण-समुच्चय, प्रमाण-वार्तिक, न्यायबिन्दु, हेतु-बिन्दु, तत्त्वसंग्रह तथा
तत्त्वसंग्रहपञ्जिका इस दर्शन के आधारभूत ग्रन्थ माने गए हैं।
यह दर्शन सविकल्पक ज्ञान को प्रत्यक्ष के अन्तर्गत स्वीकार नहीं करता
है। साथ ही अवयवों से भिन्न अवयवी की सत्ता को भी नहीं मानता है।
बुद्ध ने इसे जनमानस में प्रतिष्ठापित किया तथा संसार को दुःखमय मानते
हुए निर्वाण का मार्ग प्रशस्त किया। इसके अनुसार दुःख का मूलकारण

४ वेदान्तसार
तृष्णा है। इसलिए इच्छाओं के निरोध से ही दुःख की निवृत्ति सम्भव है।
सम्यग्दृष्टि, सम्यक्संकल्प, सम्यक्वाक्, सम्यक्कर्म, सम्यक्आजीव,
सम्यग्व्यायाम, सम्यक्स्मृति, सम्यक्समाधि इसके प्रमुख आठ मार्ग हैं।
इसके मत में निर्वाण द्वारा ही व्यक्ति पुनर्जन्म के बन्धन से मुक्ति प्राप्त कर
सकता है।
(ब) आस्तिकदर्शन-वेदों में आस्था प्रदर्शित करके उन्हें प्रमाणरूप में
प्रस्तुत करने वाले आस्तिकदर्शनों की संख्या छः है-
(१) पूर्वमीमांसा-आचार्य जैमिनी इसके प्रणेता माने गए हैं। यह वेद
को स्वतः प्रमाणरूप में स्वीकार करता है। वेदसम्मत होने पर भी यह ईश्वर
के अस्तित्व को नहीं मानता है। इसके अनुसार सृष्टि अनादि एवं नित्य है।
अतः इसके कर्ता के रूप में ईश्वर की आवश्यकता नहीं है, किन्तु वैदिक
क्रियाओं के सम्पादन हेतु यहाँ वैदिकदेवों की परिकल्पना को मान्यता प्रदान
की गई है।
कर्म एवं कर्मफल के बीच सम्बन्ध स्थापित करने हेतु यहाँ अपूर्व
नामक तत्त्व की मौलिक कल्पना की गई है। शबरस्वामी, प्रभाकरभट्ट,
कुमारिलभट्ट एवं पार्थसारथि मिश्र इस दर्शन के प्रसिद्ध आचार्य हैं। इस
दर्शन में प्रत्यक्ष, अनुमान एवं शब्द के अतिरिक्त उपमान तथा अनुपलब्धि
प्रमाणों को भी मान्यता प्रदान की गई है। यद्यपि सभी आचार्य इस सम्बन्ध
में एकमत नहीं हैं। इस दर्शन का मुख्य उद्देश्य वस्तुतः कर्मकाण्ड एवं
यज्ञादि विषयक वैदिकवाक्यों की व्याख्याओं के नियमों का प्रतिपादन करना
रहा है। मोक्ष हेतु यहाँ कर्म एवं ज्ञान दोनों की ही आवश्यकता बतायी गयी
है।
इस दर्शन के आद्यग्रन्थ जैमिनीय सूत्र में 16 अध्याय 90 अधिकरण तथा
2644 सूत्र हैं, जिन पर शबरस्वामी ने उत्कृष्टभाष्य की संरचना की।
(२) उत्तरमीमांसा (वेदान्तदर्शन)- आचार्य बादरायण विरचित
'ब्रह्मसूत्र' इसका आधारग्रन्थ है। इसी का दूसरा नाम 'वेदान्तसूत्र' भी है।
इस दर्शन के प्रमुख आधार उपनिषद् ग्रन्थ रहे हैं, क्योंकि उन्हीं के वाक्यों
को यहाँ पद-पद पर उद्धृत किया गया है। ब्रह्म, जीव, जगत् और माया
इस दर्शन के प्रमुख विवेच्य रहे हैं। ब्रह्मसूत्र पर लिखा गया आचार्य शङ्कर
का 'शारीरकभाष्य' इस दर्शन का अद्भुत ग्रन्थ माना गया है। इसमें ब्रह्मसूत्रों
की अद्वैतवादी व्याख्या प्रस्तुत की गयी है। इस भाष्य के महत्त्व का इसी से

भूमिका ५
पता चलता है कि इसपर भी अनेक विद्वान् आचार्यों द्वारा अनेक टीकाएँ एवं
व्याख्याएँ प्रस्तुत की गईं। वाचस्पति की 'भामती टीका' इनमें विशेषरूप से
उल्लेखनीय है।
इसके अतिरिक्त श्रीहर्ष का खण्डनखण्डखाद्य, चित्सुखाचार्य की
तत्त्वदीपिका, विद्यारण्यस्वामी की पञ्चदशी, विवरणप्रमेयसंग्रह, जीवन्मुक्ति-
विवेक, मधुसूदन सरस्वती की अद्वैतसिद्धि, अप्ययदीक्षित का सिद्धान्त-लेश
संग्रह इस दर्शन के प्रमुख ग्रन्थ हैं, किन्तु सदानन्द विरचित वेदान्तसार को
सरलतम होने के कारण सर्वाधिक लोकप्रियता प्राप्त हुई।
इस दर्शन के अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, द्वैताद्वैत, द्वैत एवं शुद्धाद्वैत आदि
संम्प्रदाय भी हैं। ये सभी वैष्णव-वेदान्त के नाम से जाने जाते हैं।
'प्रस्थानत्रयी' के नाम से प्रसिद्ध उपनिषद्, गीता एवं ब्रह्मसूत्र सभी वेदान्त
सम्प्रदायों के प्रमुख आधारग्रन्थ हैं। ब्रह्म एवं जीव का ऐक्य प्रतिपादन करना
इस दर्शन का मुख्य उद्देश्य रहा है।
(३) सांख्यदर्शन-महर्षि कपिल इसके प्रवर्तक आचार्य हैं। पुरुष एवं
प्रकृति इन दो तत्त्वों को यहाँ नित्य माना गया है। इसलिए इसे द्वैतवादी
दर्शन भी कहा जाता है। पुरुष चेतन एवं प्रकाशस्वरूप है, जबकि सत्त्व,
रजस् एवं तमस् की साम्यावस्था का नाम प्रकृति है। इसे जड़ माना गया है।
पुरुष का प्रकाश जब इसपर पड़ता है तो ये तीनों गुण एक-दूसरे को दबाने
लगते हैं, परिणामस्वरूप सृष्टि की उत्पत्ति होती है। इस क्रम में सबसे पहले
महत् अर्थात् बुद्धि उत्पन्न होती है। तत्पश्चात् महत् से अहंकार उत्पन्न होता
है।
इसी अहंकार से श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, रसना, घ्राण (पञ्चज्ञानेन्द्रियाँ), वाक्,
पाणी, पाद, पायु और उपस्थ (पञ्चकर्मेन्द्रियाँ), शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध
(पञ्चतन्मात्राएँ) तथा मन यह सोलह का गण उत्पन्न होता है। तत्पश्चात्
इन्हीं पञ्चतन्मात्राओं से क्रमशः आकाश, वायु, अग्नि, जल एवं पृथ्वी इन
पञ्चमहाभूतों की उत्पत्ति मानी गई है। इसप्रकार यह दर्शन कुल 25 तत्त्वों
को मान्यता प्रदान करता है। इसके अनुसार इन्हीं पच्चीस तत्त्वों के
सम्यक्ज्ञान से व्यक्ति को मोक्षप्राप्ति होती है।
ज्ञानप्राप्ति के लिए यहाँ प्रत्यक्ष, अनुमान एवं शब्द इन तीन प्रमाणों की
आवश्यकता प्रतिपादित की गई है। सत्कार्यवाद इस दर्शन का महत्त्वपूर्ण
सिद्धान्त है। जिसके अनुसार कारण में कार्य की उपस्थिति को पहले से ही

स्वीकार किया गया है। इसके अतिरिक्त यह दर्शन पुरुष बहुत्व के सिद्धान्त
को भी मान्यता प्रदान करता है। ईश्वर की सत्ता को स्वीकार न करने के
कारण इसे 'निरीश्वर सांख्य' भी कहा जाता है। तत्त्वों की संख्या को
अत्यधिक महत्व प्रदान करने के कारण इसे सांख्यदर्शन कहा गया।
आसुरि, पञ्चशिख, विन्ध्यवासी, जैगीषव्य, वार्षगण्य आदि इस दर्शन के
प्रमुख आचार्य माने गए हैं तथा सांख्यसूत्र, षष्टितन्त्र, अर्वाचीन सांख्यसूत्र,
समाससूत्र प्रसिद्धग्रन्थ हैं, किन्तु इन सभी में सर्वाधिक लोकप्रिय ईश्वरकृष्ण
की सांख्यकारिका रही है। जिसपर गौडपादभाष्य, माठरवृत्ति, जयमंगला,
युक्तिदीपिका तथा वाचस्पतिमिश्र की सांख्यतत्त्वकौमुदी आदि प्रमुख टीकाएँ
लिखी गईं।¹
(४) योगदर्शन-भारतीयदर्शनों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण इसके प्रणेता
आचार्य महर्षि पतञ्जलि रहे हैं। अतः उनके द्वारा विरचित 'योगसूत्र' इस
दर्शन का आधारग्रन्थ है। इसी ग्रन्थ पर लिखा गया 'व्यासभाष्य' सर्वाधिक
प्रामाणिक व्याख्याग्रन्थ माना गया है। जिसपर आचार्य वाचस्पतिमिश्र की
'तत्त्ववैशारदी' तथा आचार्य विज्ञानभिक्षु की 'योगवार्तिक' दो प्रसिद्ध टीकाएँ
उपलब्ध हैं। इसके अलावा भोजवृत्ति, मणिप्रभा आदि व्याख्याग्रन्थ भी
योगसूत्रों पर लिखे गए।
यह दर्शन वस्तुतः सांख्य के सिद्धान्तों को ही स्वीकार करता है, अन्तर
केवल इतना ही है कि यह ईश्वर की सत्ता को स्वीकार करता है, सांख्य
नहीं। इसीकारण कुछ विद्वानों ने इसे 'सेश्वर सांख्य' की संज्ञा प्रदान की है।
प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति, ये पाँच चित्त की प्रवृत्तियाँ मानी
गई हैं तथा चित्त की इन प्रवृत्तियों पर नियन्त्रण करना ही योग
है-'योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः'। यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार,
धारणा, ध्यान और समाधि, ये आठ योग के अंग माने गए हैं। इनके निरन्तर
अभ्यास से चित्त की वृत्तियाँ स्वतः ही विलीन हो जाती हैं। बस इसी स्थिति
में चित्त की एकाग्रता से यह दर्शन कैवल्य (मोक्ष) की प्राप्ति स्वीकार
करता है।
(५) न्यायदर्शन- बुद्धि को तीक्ष्ण, परिष्कृत एवं विशद बनाने वाले
तर्कप्रधान न्यायदर्शन के प्रवर्तक आचार्य गौतम माने गए हैं। प्रत्यक्ष आदि
प्रमाणों द्वारा पदार्थ की परीक्षा करना ही न्याय है। इसके लिए 'आन्वीक्षिकी'

  1. विस्तृत अध्ययन हेतु द्रष्टव्य लेखककृत सांख्यकारिका 'चन्द्रिका' हिन्दी व्याख्या
    गौडपादभाष्य सहित - प्रकाशक संस्कृतग्रन्थागार, दिल्ली-1998

भूमिका ७
शब्द का प्रयोग भी किया जाता है। यहाँ प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन,
दृष्टान्त, सिद्धान्त, अवयव, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितण्डा, हेत्वाभास,
छल, जाति और निग्रहस्थान इन सोलह पदार्थों को मान्यता प्रदान की गई है।
यह दर्शन आत्मा को गुणों का आश्रय मानता है। इसके अनुसार आत्मा के
जीवात्मा और परमात्मा दो भेद होते हैं तथा आत्मा, शरीर, इन्द्रियाँ, अर्थ,
बुद्धि, मन, प्रवृत्ति, दोष, प्रत्यभाव, फल, दुःख तथा अपवर्ग ये सभी प्रमेय
विषय हैं।
यह दर्शन जगत् की सत्ता में परमाणु को समवायी तथा ईश्वर को
निमित्तकारण मानता है तथा आगमप्रमाण के माध्यम से ईश्वर की सत्ता को
सिद्ध करता है। अन्य दर्शनों के समान ही यह जीवन का अन्तिम लक्ष्य
दुःखों की हमेशा के लिए निवृत्ति मानता है। उसी को यहाँ मोक्ष माना गया
है।
आचार्य गौतम के अतिरिक्त गंगेश उपाध्याय, वात्स्यायन, उद्योतकर,
वाचस्पतिमिश्र, जयन्तभट्ट, उदयनाचार्य, रघुनाथ शिरोमणि, मथुरानाथ,
जगदीश, गदाधर भट्ट आदि उल्लेखनीय आचार्यों ने इस दर्शन के साहित्य में
श्रीवृद्धि की है। इनमें भी आचार्य केशवमिश्र की तर्कभाषा को यहाँ विशेष
प्रसिद्धि प्राप्त हुई।
(६) वैशेषिकदर्शन-'विशेष' नामक एक विलक्षण पदार्थ को मानने
के कारण इसे वैशेषिक कहा गया। सर्वदर्शनसंग्रह में इसे 'औलूक्यं दर्शन'
भी कहा गया है। तदनुसार इसके प्रणेता 'उलूक' नामक आचार्य थे। महर्षि
कणाद को भी इसका प्रणेता माना जाता है। जैन लेखक राजशेखर ने
न्यायकन्दली टीका में जनश्रुति के आधार पर इस सम्बन्ध में अपनी सम्मति
इसप्रकार दी है-
“कणाद मुनि की तपस्या से प्रसन्न होकर परमपिता परमात्मा ने स्वयं
उलूक के रूप में अवतरित होकर उन्हें इस दर्शन के सिद्धान्तों का उपदेश
दिया था। इसीलिए इसे औलूक्य दर्शन कहा जाता है।”
इसके अनुसार-पृथिवी, तेज, जल, वायु, आकाश, काल, दिक्, आत्मा
और मन ये नौ द्रव्य हैं। इनमें पृथिवी, तेज, वायु और आकाश भौतिक हैं।
आत्मा के अस्तित्व, स्वरूप, सृष्टि तथा मोक्ष के सम्बन्ध में यह दर्शन न्याय
के साथ मतैक्य रखता है। इस दर्शन के सिद्धान्तों का निरूपण प्रशस्तपाद
नामक ग्रन्थ में भलीप्रकार किया गया है। तत्पश्चात् उदयनाचार्य, श्रीधराचार्य,