वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
परिभाषा
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(5) वेदान्तसार वेदान्तदर्शन का प्रकरणग्रन्थ है। प्रकरणग्रन्थ की शास्त्रों
में इसप्रकार परिभाषा प्रस्तुत की गई है-
शास्त्रैकदेशसम्बद्धं शास्त्रकार्यान्तरे स्थितम्।
आहुः प्रकरणं नाम ग्रन्थभेदं विपश्चितः॥
अवतरणिका-वेदान्तसार के उपदेश की प्रतिज्ञा करने के उपरान्त
'वेदान्त' शब्द की व्याख्या करके अनुबन्धचतुष्टय का उल्लेख करते हुए
सदानन्द योगीन्द्र कहते हैं-
वेदान्तो नामोपनिषत्प्रमाणं तदुपकारीणि शारीरकसूत्रादीनि च। अस्य
वेदान्तप्रकरणत्वात्तदीयैरेवानुबन्धैस्तद्गतासिद्धेर्न ते पृथगालोचनीयाः।
तत्रानुबन्धो नामाधिकारिविषयसम्बन्धप्रयोजनानि॥३॥
पदच्छेद-वेदान्तः नाम उपनिषद् प्रमाणम्, तत् उपकारीणि शारीरक
सूत्रादीनि च। अस्य वेदान्त-प्रकरणत्वात् तदीयैः एव अनुबन्धैः तद्गता-सिद्धेः,
न ते पृथक् आलोचनीयाः। तत्र अनुबन्धः नाम अधिकारी-विषय-
सम्बन्ध-प्रयोजनानि॥
अनुवाद-उपनिषद् को प्रमाण मानकर चलने वाला शास्त्र वस्तुतः वेदान्त
कहा गया है और ब्रह्मसूत्र (शारीरकसूत्र) आदि उनके उपकारक (व्याख्या)
ग्रन्थ हैं। इस (वेदान्तसार) के वेदान्तदर्शन का प्रकरणग्रन्थ होने से, उसके
अनुबन्धों के साथ ही इसकी भी अनुबन्धवत्ता सिद्ध होने के कारण, उन्हें
अलग मानना उचित नहीं है।
'चन्द्रिका'-प्रस्तुत खण्ड में ग्रन्थकार ने मुख्यरूप से चार बातों की
ओर संकेत किया है। प्रथम, वेदान्त की परिभाषा देते हुए उसे उपनिषदों को
आधार मानकर चलने वाला शास्त्र बताना। द्वितीय, ब्रह्मसूत्र, श्रीमद्भगवद्-
गीता आदि ग्रन्थों को वेदान्त के ही उपकारक अर्थात् व्याख्याग्रन्थ प्रतिपादित
करना। तृतीय, प्रस्तावित वेदान्तसार वेदान्तदर्शन का प्रकरणग्रन्थ होने, वेदान्त
के सभी अनुबन्ध प्रस्तुतग्रन्थ पर भी लागू होने से उनको पृथक् मानने का
निषेध तथा अन्त में अनुबन्ध चतुष्टय-अधिकारी, विषय, सम्बन्ध एवं
प्रयोजन का नामोल्लेख किया गया है।
अब हम इन चार बातों को ध्यान में रखकर ही इस खण्ड की व्याख्या
प्रस्तुत करेंगे।
(क) वेदानाम् अन्तः, इति वेदान्तः इस व्याख्या के अनुसार-वेदों के
अन्तिमभाग अर्थात् उपनिषद् ही वेदान्त हैं। अतः इनमें प्रतिपादित सिद्धान्त
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अथवा दर्शन का नाम भी वेदान्त हुआ, किन्तु विद्वानों ने वेदान्त शब्द की
भिन्न-भिन्न व्याख्याएँ प्रस्तुत की हैं-
(1) वेद शब्द से संहिताग्रन्थ, ब्राह्मणग्रन्थ, आरण्यक एवं उपनिषद्ग्रन्थों
तक अभिप्राय लिया जाता है। इन सभी में उपनिषदों की रचना सबसे अन्त
में होने के कारण उपनिषद्ग्रन्थों को 'वेदान्त' कहा गया।
(2) प्राचीनसमय में लेखन तकनीक के विकास के अभाव में वेदों को
मौखिकरूप में ही कण्ठस्थ करके सुरक्षित रखने की परम्परा रही। यह
परम्परा ज्ञान को गुरुमुख से शिष्यों द्वारा श्रवण करके सुरक्षित रखी गयी।
इस क्रम में गुरुजन उपनिषदों का अध्यापन अपने शिष्यों को अन्त में कराते
थे। इसलिए उपनिषदों को वेदान्त कहा गया। उपनिषदों को अन्त में पढ़ाने
के पीछे उनका दृष्टिकोण यही था कि इनमें प्रतिपादित यज्ञादि के रहस्य
एवं दार्शनिकविचार अत्यन्त जटिल थे, उनका आरम्भ में ज्ञान कराना
अत्यन्त कठिन था।
(3) इसके अतिरिक्त अध्यापनक्रम में उत्तरोत्तरज्ञान कराने की दृष्टि से
भी उपनिषदों को अन्तिमस्थान सर्वसम्मति से दिया गया था, क्योंकि
आचार्यों ने इसे पुण्य प्रदान करने वाली उचित विधि माना था। अतः
उपनिषदों को वेदान्त-संज्ञा प्राप्त हुई।
(4) कुछ अन्य आचार्यों ने उपनिषदों में ज्ञान की पराकाष्ठा को इनके
'वेदान्त' कहे जाने के हेतुरूप में स्वीकार किया, क्योंकि इन ग्रन्थों में हमें
ज्ञान की उत्कृष्टतम स्थिति अर्थात् चरमसीमा देखने को मिलती है। इसलिए
इनका 'वेदान्त' नामकरण उचित है।
(ख) उपनिषदों के लिए प्रयुक्त वेदान्त शब्द की उपर्युक्त चारों ही
व्याख्याएँ हमें युक्तिसंगत प्रतीत होती हैं। अतः उपनिषद् ही वस्तुतः वेदान्त
हैं। इसलिए उनमें प्रतिपादित सिद्धान्त अथवा दर्शन का नाम भी आचार्यों
द्वारा 'वेदान्त' ही रखा गया। वेदान्तदर्शन में स्थल-स्थल पर उपनिषद्वाक्यों
को श्रुतिवचन के रूप में प्रस्तुत करते हुए प्रमाण भी माना गया है।
इसके अतिरिक्त यहाँ प्रयुक्त उप एवं नि उपसर्गपूर्वक सद् धातु से
क्विप् प्रत्यय करके निष्पन्न 'उपनिषद्' शब्द की भी आचार्यों ने विभिन्न
व्याख्याएँ प्रस्तुत की हैं। क्योंकि 'षदॢविशरणगत्यवसादनेषु' के अनुसार
'सद्' धातु के विशरण (नष्ट होना), गति (जाना) एवं अवसादन (शिथिल
करना) इन तीन अर्थों के आधार पर उपनिषद् के भी तीन अर्थ किए जा
सकते हैं।
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(१) इन ग्रन्थों के अध्ययन से मोक्ष के इच्छुक साधकों की संसार की
कारणरूप अविद्या नष्ट (विशरण) हो जाती है एवं उनका मोक्षमार्ग प्रशस्त
होता है।
(२) इनके अध्ययनपूर्वक चिन्तन से ब्रह्म की प्राप्ति अथवा ज्ञान होता
है। इसलिए इन्हें उपनिषद् कहते हैं (गति)।
(३) इन ग्रन्थों के अध्ययन द्वारा व्यक्ति के आध्यात्मिक, आधिभौतिक
एवं आधिदैविक तीन प्रकार के दुःख शिथिल होते हैं। (अवसादन) इसलिए
इन्हें उपनिषद् कहा जाता है।
शङ्कराचार्य ने उपनिषद् का मुख्य अर्थ ब्रह्मविद्या तथा अप्रधान अर्थ
'ब्रह्मविद्या का प्रतिपादन करने वाला विशेषग्रन्थ' किया है-
तस्माद् विद्यायां मुख्यया वृत्त्या उपनिषच्छब्दो वर्तते ग्रन्थे तु भक्त्या...
वस्तुतः नि उपसर्गपूर्वक सद् धातु का एक अर्थ बैठना भी है तथा यहाँ
प्रयुक्त 'उप' उपसर्ग 'समीप' अर्थ का द्योतक है। अतः यज्ञ की दृष्टि से
अग्नि के समीप बैठना, ज्ञान की दृष्टि से गुरु के समीप बैठना, तपस्या
अथवा ध्यान की दृष्टि से निश्चल होकर ब्रह्म के समीप बैठना इत्यादि अर्थ
भी इस शब्द के किए जा सकते हैं। जो उपनिषद्ग्रन्थों के विविध अभिप्रायों
को अभिव्यक्त करते हैं।
इसप्रकार की विशेषताओं से सम्पन्न ज्ञानराशि के अथाह आगार
उपनिषद्ग्रन्थों को प्रमाणरूप में मानकर चलने वाला दर्शन 'वेदान्त' कहा
गया। शारीरकसूत्र आदि ग्रन्थ इन्हीं उपनिषद् एवं वेदान्त की व्याख्या करने
के कारण इनका उपकार करने वाले हैं। शारीरकसूत्र से यहाँ अभिप्राय महर्षि
व्यास विरचित ब्रह्मसूत्र से है तथा 'आदि' शब्द श्रीमद्भगवद्गीता के लिए
प्रयुक्त हुआ है, अर्थात् श्रीमद्भगवद्गीता एवं ब्रह्मसूत्र आदि ग्रन्थ इसी
वेदान्त की सरलतम व्याख्या के लिए लिखे गए हैं। यहाँ प्रयुक्त 'शारीरक
सूत्र' शब्द भी व्याख्या की अपेक्षा रखता है-
(ग) शारीरकसूत्रादीनि-"शरीरमेव शरीरकं तत्र भवो जीवः शारीरकः
स सूत्र्यते यथातथ्येन निरुप्यते यैस्तानि शारीरकसूत्राणि अथातो
ब्रह्मजिज्ञासेत्यादीनि" अर्थात् शरीर शब्द से 'कुत्सा' अर्थ में 'क' प्रत्यय
करने पर शरीरक शब्द निष्पन्न होता है। तत्पश्चात् 'तत्र भवः' इस अभिप्राय
की अभिव्यक्ति के लिए 'अण्' प्रत्यय करने पर आदिवृद्धि होकर शारीरक