वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
कारण-निरूपण
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को प्रमाणरूप में प्रस्तुत करते हैं। उपर्युक्त गद्यखण्ड के अन्त में उन्होंने
दृग्दृश्यविवेक के वचनों को अपने कथन की पुष्टि के लिए प्रयुक्त किया
है।
(2) ग्रन्थकार ने प्रस्तुत खण्ड के पूर्व अंश में सांसारिकभावना को
तुच्छ बताया है। वेदान्त वस्तुतः दृश्यमान सम्पूर्णजगत् को यों भी मिथ्या
कहकर उसकी तुच्छता का प्रतिपादन करता ही है। उसकी दृष्टि में ब्रह्म ही
एकमात्र सत् (एवं उत्कृष्ट वस्तु है)।
(3) अज्ञान की आवरण एवं विक्षेप नामक दो महत्त्वपूर्ण शक्तियों का
अत्यन्त सुन्दर एवं सरलशैली में विवेचन किया गया है।
अवतरणिका-यहाँ तक अज्ञान एवं उसकी शक्तिद्वय का विवेचन करने
के पश्चात् सोदाहरण अज्ञानोपहितचैतन्य को ही सूक्ष्म एवं स्थूलसृष्टि का
उपादान एवं निमित्त दोनों कारण बताते हैं-
शक्तिद्वयवदज्ञानोपहितं चैतन्यं स्वप्रधानतया निमित्तं
स्वोपाधिप्रधानतयोपादानं च भवति। यथा लूता तन्तुकार्यं प्रति
स्वप्रधानतया निमित्तं स्वशरीरप्रधानतयोपादानं च भवति॥१९॥
पदच्छेद-शक्तिद्वयवद् अज्ञान-उपहितम् चैतन्यम् स्वप्रधानतया निमित्तम्,
स्व-उपाधिप्रधानतया उपादानम् च भवति। यथा लूता तन्तुकार्यम् प्रति
स्वप्रधानतया निमित्तम्, स्वशरीरप्रधानतया उपादानम् च भवति॥11॥
अनुवाद-दो शक्तियों से युक्त अज्ञान से उपहित चैतन्य (सम्पूर्ण जगत्
प्रपञ्च का) अपनी प्रधानता के कारण निमित्तकारण एवं अपनी उपाधि की
प्रधानता से उपादानकारण होता है। जिसप्रकार मकड़ी (अपने) तन्तुरूप कार्य
के प्रति अपने (चैतन्य की) प्रधानता के कारण निमित्तकारण तथा अपने
शरीर की प्रधानता से उपादानकारण होती है।
'चन्द्रिका'-प्रस्तुत गद्यखण्ड आकार में छोटा होते हुए भी जहाँ एक
ओर अपने में गम्भीर अर्थ को संजोए हुए है, वहीं 'आवरण' एवं 'विक्षेप'
नामक दो महत्त्वपूर्ण शक्तियों से युक्त अज्ञान से उपहित चैतन्य सूक्ष्मशरीर
से लेकर ब्रह्माण्डपर्यन्त दृश्यमान सम्पूर्ण जगत्प्रपञ्च का उपादान और
निमित्तकारण दोनो है' इत्यादि वेदान्त के महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त का प्रतिपादन
करता है।
वस्तुतः प्रस्तुत खण्ड के अभिप्राय को समझने से पूर्व हमें उपादान और
निमित्तकारण इन दोनों को समझना होगा। किसी भी वस्तु के निर्माण में इन
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दो कारणों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। इनमें से एक के भी अभाव में
किसी भी वस्तु का निर्माण असम्भव है। उपादान एवं निमित्तकारण इन दोनों
को हम घड़े के उदाहरण द्वारा भलीप्रकार समझ सकते हैं। घड़े के निर्माण
में हमें मिट्टी की आवश्यकता होती है, जो उसके निर्माण की स्थूल एवं
अनिवार्य सामग्री है। अतः मिट्टी घड़े का उपादानकारण कहलाएगी। न्याय
की दृष्टि में यही समवायीकारण भी कहलाता है, क्योंकि मिट्टी घड़े के
साथ समवायसम्बन्ध से विद्यमान रहती है।
दूसरा, निमित्तकारण है जो वस्तु की संरचना में महत्त्वपूर्ण भूमिका
निर्वाह करता है। घड़े के निर्माण में दण्ड, चक्र, चीवर और कुम्हार ये सभी
निमित्तकारण कहलाएंगे, क्योंकि इनमें से एक के भी अभाव में घटनिर्माण
असम्भव है। सामान्यरूप से ये दोनों कारण अलग-अलग स्थानों पर
विद्यमान रहते हैं अर्थात् इनकी पृथक् सत्ता रहती है, किन्तु वेदान्त सृष्टि-
प्रक्रिया में इन दोनों की स्थिति एक ही स्थान पर मानते हुए कहता है
कि-
जिसप्रकार एक मकड़ी अपने जालानिर्माणरूप कार्य के प्रति अपने शरीर
के चैतन्य की प्रधानता के कारण निमित्तकारण है तथा अपने शरीर से
निकलने वाले लारवे की प्रधानता की दृष्टि से उपादानकारण भी होती है।
ठीक उसीप्रकार अज्ञान से उपहित आत्मा अपने चैतन्य की प्रधानता होने से
दृश्यमान सांसारिकप्रपञ्च का निमित्तकारण तथा अज्ञान की प्रधानता के
समय उपादानकारण होता है।
क्योंकि मकड़ी का शरीर चैतन्य के अभाव में जाल बनाने में असमर्थ
होता है। साथ ही केवल चैतन्य होने पर शरीर के न होने पर भी जाल नहीं
बनाया जा सकता है। इस दृष्टि से एक ही मकड़ी शरीर की प्रधानता होने
पर जालेरूप कार्य के लिए उपादानकारण तथा चैतन्य की प्रधानता होने पर
निमित्तकारण हो जाती है।
ठीक उसीप्रकार सृष्टिरूपकार्य के प्रति आवरण एवं विक्षेप दो शक्तियों
से युक्त अज्ञान से उपहित चैतन्यरूप आत्मा अज्ञानरूप उपाधि की प्रधानता
होने से उपादानकारण तथा चैतन्य की प्रधानता से निमित्तकारण भी होता है।
इसमें किसीप्रकार की कोई विसंगति नहीं है, क्योंकि यह संसार अज्ञानजन्य
है और वह अज्ञान आत्मनिष्ठ है। इसलिए माया से युक्त ईश्वर को जगत्
का उपादानकारण कहने में कोई बाधा नहीं है। जिसप्रकार मकड़ी को
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तन्तुरूप कार्य के लिए तुरी, वेमा, कपास आदि बाह्यसाधनों की आवश्यकता
नहीं पड़ती है, उनके बिना ही उसके शरीर की सहायता से वह अपने जाले
का निर्माण कर लेती है। ठीक उसीप्रकार एकमात्र ईश्वर भी बिना किसी
बाह्यसाधन एवं सहयोग से अपनी माया नामक शक्ति द्वारा सूक्ष्मशरीर से
लेकर ब्रह्माण्डपर्यन्त सम्पूर्ण स्थूलसंसार की रचना कर डालता है।
इसी बात को मुण्डकोपनिषद् इसप्रकार कहता है-
यथोर्णनाभिः सृजते गृह्यते च यथा पृथिव्यामोषधयः सम्भवन्ति।
यथा सतः पुरुषात् केशलोमानि, तथाऽक्षरात्सम्भवतीह विश्वम्।। (1.7)
इस प्रसङ्ग में प्रतिपक्षी द्वारा यह शङ्का की जा सकती है कि यदि ईश्वर
सृष्टि का उपादानकारण है तो यह चराचरसंसार जड़ एवं नश्वर नहीं हो
सकता है, क्योंकि इसका उपादान चेतन एवं अविनाशी है। इसका समाधान
यह है कि यह चराचरसंसार वस्तुतः ब्रह्म का विवर्त है, परिणाम नहीं। अपने
रूप का परित्याग न करके दूसरे रूप को प्रदर्शित करना ही विवर्त है।
जिसप्रकार रस्सीविषयक अज्ञान रस्सी के रूप का परित्याग न करता हुआ
भी सर्परूप अन्यरूप को प्रदर्शित करता है, ठीक उसीप्रकार ईश्वर
चैतन्यनिष्ठ अज्ञानशक्ति भी अपने चैतन्यरूप का परित्याग न करती हुई,
आकाश आदि अन्य रूपों को भी प्रदर्शित करती है। इसलिए आकाशादि
प्रपञ्च, ईश्वर के उपादानकारण होने पर भी नित्य नहीं होते हैं।
विशेष-(1) प्रस्तुत गद्यखण्ड में अज्ञानोपहितचैतन्य को चराचरसृष्टि का
उपादान और निमित्तकारण बताया गया है।
(2) अज्ञानोपहितचैतन्य के लिए वेदान्त में ईश्वर, चैतन्य एवं आत्मा
आदि अनेक शब्दों का प्रयोग मिलता है।
(3) लूता यहाँ मकड़ी के लिए प्रयुक्त हुआ है। मकड़ी की विशेषता है
कि वह अपने द्वारा निर्मित जाले में अन्य किसी बाह्य उपादान का सहयोग
नहीं लेती है।
(4) अज्ञान अथवा माया को जड़ात्मक माना गया है, इसमें ब्रह्म अथवा
आत्मा के कारण चैतन्य ठीक उसीप्रकार आ जाता है। जैसे-चुम्बक के
समीप होने से लौहकणगति करने लगते हैं।
(5) प्रस्तुत अंश के अभिप्राय को इसप्रकार भी प्रदर्शित कर सकते हैं-
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चित्र-३८
आत्मा। ईश्वर
अज्ञान ब्रह्म अविद्या
माया
चैतन्य की प्रधानता से सूक्ष्मशरीर से लेकर ब्रह्माण्ड शरीर की
पर्यन्त संसार के प्रधानता से
निमित्तकारण उपादानकारण
प्रति
लूता (मकड़ी) वत् चैतन्य की प्रधानता से
निमित्तकारण
तन्तु (जाला) रूप शरीर की प्रधानता से
कार्य के प्रति उपादानकारण
अवतरणिका-आवरण एवं विक्षेपशक्ति से युक्त अज्ञान से उपहित
चैतन्य अर्थात् ईश्वर को सम्पूर्णसृष्टि का उपादान एवं निमित्तकारण बताने
के पश्चात् उसकी विक्षेपशक्ति द्वारा सर्वप्रथम जगत् की सूक्ष्मसृष्टि का
कथन करते हैं-
तमःप्रधानविक्षेपशक्तिमदज्ञानोपहितचैतन्यादाकाश आकाशा-
द्वायुर्वायोरग्निरग्नेरापोऽद्भ्यः पृथिवी चोत्पद्यते "तस्माद्वा एतस्मादात्मन
आकाशः सम्भूत" इत्यादिश्रुतेः। तेषु जाड्याधिक्यदर्शनात्तमःप्राधान्यं
तत्कारणस्य। तदानीं सत्त्वरजस्तमांसि कारणगुणप्रक्रमेण तेष्वाकाशादि-
षूत्पद्यन्ते। एतान्येव सूक्ष्मभूतानि तन्मात्राण्यपञ्चीकृतानि चोच्यन्ते। एतेभ्यः
सूक्ष्मशरीराणि स्थूलभूतानि चोत्पद्यन्ते॥१२॥
पदच्छेद-तमः प्रधानविक्षेपशक्तिमद् अज्ञानोपहित-चैतन्याद् आकाशः,
आकाशाद् वायुः, वायोः अग्निः, अग्नेः आपः, अद्भ्यः पृथिवी च उत्पद्यते।
“तस्माद् वा एतस्माद् आत्मनः आकाशः सम्भूतः” इत्यादि श्रुतेः। तेषु
जाड्याधिक्य-दर्शनात् तमः प्राधान्यम् तत्कारणस्य।
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तदानीम् सत्त्व-रजस्-तमांसि कारणगुणप्रक्रमेण तेषु आकाश-आदिषु
उत्पद्यन्ते। एतानि एव सूक्ष्मभूतानि तन्मात्राणि अपञ्चीकृतानि च उच्यन्ते।
एतेभ्यः सूक्ष्मशरीराणि स्थूलभूतानि च उत्पद्यन्ते।।12।।
अनुवाद-तमोगुण की प्रधानता वाली विक्षेपशक्ति से युक्त अज्ञान से
उपहित चैतन्य से (सर्वप्रथम) आकाश, आकाश से वायु, वायु से अग्नि,
अग्नि से जल और जल से पृथिवी उत्पन्न होती है। “उसप्रकार के (अज्ञान
से आच्छादित) इस आत्मा से आकाश उत्पन्न हुआ” इत्यादि श्रुतिवचन
(इसमें प्रमाण है।) उन सबमें जड़ता की अधिकता दिखायी देने के कारण,
उनके कारण (अज्ञानोपहितचैतन्य) का तमोगुणप्रधान होना (सिद्ध होता है।)
उन आकाश आदि पञ्चभूतों में अपने-अपने (साक्षात्) कारणों के गुणों
के आधार पर ही उससमय सत्त्व, रजस् और तमस् गुण (प्रधानरूप से)
उत्पन्न होते हैं। (वेदान्त में) ये ही सूक्ष्मभूत, तन्मात्र और अपञ्चीकृत
कहलाते हैं। इन्हीं (अपञ्चीकृतभूतों) से सूक्ष्मशरीर एवं स्थूलभूत उत्पन्न
होते हैं।
‘चन्द्रिका’-वेदान्त के अनुसार अज्ञानोपहित चैतन्य अर्थात् ईश्वर से होने
वाली सृष्टि के विषय में आचार्य सदानन्द कहते हैं कि यद्यपि प्रलयकाल में
माया अथवा अज्ञान में सत्त्व, रजस् एवं तमोगुण की स्थित समानरूप से
विद्यमान रहती है तथापि सृष्टि का प्रारम्भ होने की स्थिति में इन गुणों में
गुणविशेष का न्यूनाधिक्य भी देखा जाता है। इसलिए तमोगुणप्रधान, किन्तु
सत्त्व एवं रजस् गुणों की भी थोड़ी-बहुत सत्ता से युक्त विक्षेपशक्ति से
सम्पन्न अज्ञान से आवृत चैतन्य, जिसे वेदान्त में ‘ईश्वर’ संज्ञा प्रदान की
गई है, से सर्वप्रथम सूक्ष्मतन्मात्रारूप आकाश की सृष्टि होती है। पुनः उसी
तन्मात्रारूप आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल तथा जल से
सूक्ष्मतन्मात्रारूप पृथिवी की उत्पत्ति होती है।
इसप्रकार पञ्चभूतों के इन सूक्ष्मतन्मात्राओं की उत्पत्ति के कथन की
पुष्टि में अपनी शैली के अनुसार ग्रन्थकार ‘तस्माद्वा’ इत्यादि श्रुतिवचन को
प्रमाणरूप में प्रस्तुत करते हुए कहते हैं कि श्रुतियों में भी इस बात का
उल्लेख हुआ है कि उसप्रकार की विशेषताओं से सम्पन्न अज्ञान से
आच्छादित इस शुद्धचैतन्यरूप आत्मा से ही आकाश की उत्पत्ति हुई है।
कारण-निरूपण १८३
इस प्रसङ्ग में प्रतिपक्षी द्वारा यह शङ्का किए जाने पर कि अज्ञान में तो
सत्त्व, रजस् एवं तमस् तीनों गुण विद्यमान हैं, फिर आपने यह कैसे कहा
कि आकाशादि की उत्पत्ति तमोगुणप्रधान अज्ञान से आवृत चैतन्य से ही
हुई? स्वयं ही इसप्रकार की शङ्का को मन में धारणकर अग्रिमपंक्ति में
इसका समाधान प्रस्तुत करते हैं-
कारण-कार्यसिद्धान्त के आधार पर कार्य के गुणों से कारण के गुणों का
अनुमान सहज ही किया जा सकता है, क्योंकि आकाश, वायु, अग्नि, जल
एवं पृथ्वी इन सभी में जड़भाग् की अधिकता के कारण ये जडरूप हैं।
अतः इनमें तमोगुण की प्रधानता की परिकल्पना का औचित्य प्रतीत होता
है। इस दृष्टि से यही कहना अधिक संगत होगा कि तमोगुणप्रधान
विक्षेपशक्ति युक्त चैतन्य ही आकाशादिप्रपञ्च का कारण है। इस प्रसङ्ग में
यह विशेषरूप से उल्लेखनीय है कि इनकी उत्पत्ति के समय तमोगुण का
आधिक्य रहता है, किन्तु सत्त्व एवं रजस् का पूर्णतया अभाव नहीं रहता,
क्योंकि उनके अभाव में तो तमोगुण में क्रियाशीलता का अभाव ही हो
जाएगा, जो उचित नहीं है। अतः इस अवस्था में सत्त्वगुण एवं रजोगुण,
तमोगुण की तुलना में अत्यल्प मात्रा में विद्यमान रहते हैं। इसका यही
अभिप्राय ग्रहण करना चाहिए।
इसप्रकार आकाश आदि की उत्पत्ति होने पर अपने-अपने कारण के गुण
के अनुरूप ही उत्तरोत्तर उत्पन्न होने वाले उन आकाश आदि में सत्त्व, रजस्
एवं तमस् तीनों ही गुणों की विद्यमानता देखी जाती है। उत्पन्न हुए इन
आकाश, वायु, अग्नि, जल एवं पृथिवी को अपञ्चीकृत, सूक्ष्मभूत एवं
तन्मात्र इत्यादि नामों से जाना जाता है। इन पांचों में क्रमशः शब्द, स्पर्श,
रूप, रस एवं गन्धरूप गुण अत्यन्तसूक्ष्म अर्थात् तन्मात्ररूप में ही विद्यमान
रहते हैं।
जो क्रमशः शब्दतन्मात्र, स्पर्शतन्मात्र, रूपतन्मात्र, रसतन्मात्र एवं
गन्धतन्मात्र कहलाते हैं। इन्हीं सूक्ष्मभूत अपञ्चीकृत आकाशादि से सूक्ष्मशरीर,
पञ्चीकृतमहाभूत आदि की उत्पत्ति होती है तथा पञ्चीकृत महाभूतों से
स्थूलशरीर उत्पन्न होते हैं। इसप्रकार वेदान्त के अनुसार सृष्टि का क्रम
प्रारम्भ होता है।
विशेष-(1) प्रस्तुत गद्यखण्ड में वेदान्त की सृष्टिप्रक्रिया की ओर
संकेत किया गया है।
१८४ वेदान्तसार
(२) गद्यखण्ड के आरम्भ में उल्लिखित अज्ञान की विक्षेपशक्ति के
साथ-साथ आवरणशक्ति का भी अध्याहार करना चाहिए, क्योंकि यही
आवरण नामक शक्ति शुद्धचैतन्यरूप तत्त्व के वास्तविकरूप को आवृत
करती है।
(३) सृष्टिक्रम में यहाँ सर्वप्रथम सूक्ष्म आकाश की उत्पत्ति को मान्यता
प्रदान की गई है।
(४) अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूतों को इस अवस्था में स्थूल इन्द्रियों द्वारा देखा
नहीं जा सकता है।
(५) इस अवस्था में इन सूक्ष्मभूतों में रूप, रस, गन्धादि गुण सूक्ष्मरूप
में एवं स्वतन्त्ररूप में विद्यमान रहते हैं।
(६) प्रस्तुत अंश के भाव को इसप्रकार भी प्रदर्शित कर सकते हैं-
चित्र-३९
विक्षेपशक्तिसम्पन्न तमोगुणप्रधान
┌─────────────────┐
│ अज्ञान से उपहित │
└────────┬────────┘
│
( चैतन्य )
│
सूक्ष्मशरीराणि ── आकाश
│ │ ┌───────────────────────┐
│ ├───> │ जाड्याधिक्या दर्शनात् │ ──> ( तमः प्राधान्यम् )
│ │ └───────────────────────┘
│ │ ▲ ▲ ▲
│ वायु ──────┘ │ │
│ │ │ │
│ अग्नि ──────────┘ │
│ │ │
उत्पद्यन्ते │ जल ─────────────────┘
▲ │
│ पृथिवी ──────┬───────────────┐
सूक्ष्म महाभूतानि ◄────┘ │ │
सूक्ष्मभूत तन्मात्र अपञ्चीकृत
└───────────┼──────────┘
कथ्यते
अवतरणिका—आकाशादि सूक्ष्मपञ्चतन्मात्राओं की उत्पत्ति के पश्चात्
इनमें भी सत्त्वादिगुणों की प्रधानता से सत्रह अवयवों से युक्त सूक्ष्मशरीर की
सृष्टि का कथन करते हैं-