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वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya

महर्षि कणाद द्वारा

स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished160 पृष्ठ

गये, अगले सूत्र में वेद की साक्षी भी देते हैं-

९२ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
इसी अर्थ की पुष्टि में अनुमान प्रमाण और ऐतिहासिक प्रमाण तो कहे
गये, अगले सूत्र में वेद की साक्षी भी देते हैं-
१८४-वेदलिङ्गाच्च ॥ १२ ॥
(वेदलिङ्गात्) वेदों में चिन्ह पाये जाने से (च) भी ॥
ऋग्वेद अष्टक ८ अध्याय ४ वर्ग १८ ऋचा ५ "विश्वाञ् देवान् जगत्या विवेश।
तेन चाक्लृपे ऋषयो मनुष्याः" तथा ऋग्वेद अष्टक ८ अध्याय ४ वर्ग १८ ऋचा १०
"तस्मादश्वा अजायन्त ये के चोभयादतः। गावो ह जज्ञिरे तस्मात्तस्माज्जाता
अजावयः" तथा यजुर्वेद अध्याय ३१ मन्त्र ८ भी अक्षरशः इसी ऋचा के
समान है तथा अथर्व काण्ड १० अनुवाक ४ मन्त्र ८ " प्रजापतिः ससृजे
विश्वरूपम्। इत्यादि अनेक वेदमन्त्रों में पाया जाता है कि परमात्मा ने
उपादान कारण से बिना योनिविशेष के अनेक ऋषि मुनि आदि मनुष्यों,
पशुओं और पक्षी आदि की सृष्टि को अयोनिज उत्पन्न किया । जैसा कि
सूत्र संख्या १६० में भी कुछ विस्तार से निरूपण किया गया है। वे वेदमन्त्र
भी अयोनिज सृष्टि में प्रमाण हैं ॥ १२ ॥
इस चतुर्थाध्याय के द्वितीय आह्निक में पृथिवी आदि का शरीर इन्द्रिय
विषयभेद से त्रिविध होना तथा फिर योनिज अयोनिज भेद से शरीर का
द्विविध होना कहा गया ॥
इति चतुर्थाध्याये द्वितीयमाह्निकम्
—**—
इति श्री तुलसीराम स्वामि कृते
वैशेषिक दर्शन भाषानुवादे
चतुर्थोऽध्यायः
॥ ४ ॥

ओ३म्
अथ पञ्चमोऽध्यायः
तत्र
प्रथममाह्निकम्
द्रव्यों की परीक्षा हो चुकी, आगे गुणों की परीक्षा करनी है, उस में
गुणों की परीक्षा से पहले कर्मों की परीक्षा करना चाहते हुए पञ्चमाध्याय
का आरम्भ करते हुवे वैशेषिकाचार्य मुनिवर कणाद ग्रन्थ पढ़नेवालों के
उपकारार्थ प्रथम उत्क्षेपण नाम कर्म के विषय में कहते हैं कि-
१८३-आत्मसंयोगप्रयत्नाभ्यां हस्ते कर्म ॥ १ ॥
( आत्मसंयोगप्रयत्नाभ्याम् ) मन सहित आत्मा के संयोग और प्रयत्न से
( हस्ते ) हाथ में ( कर्म ) उठाने वा उछलने की क्रिया होती है ॥
जब कि कोई पुरुष यज्ञ वा वेदपाठ आदि कर्मों में हाथ उठाना चाहता
है तब उस के आत्मा में एक प्रकार का प्रयत्न उत्पन्न होता है, उस प्रयत्न से
मन और आत्मा हाथ से संयोग करते हैं और तब हाथ में उठाने वा
उछलने का कर्म प्रकट होता है ॥
आशय यह है कि यद्यपि आत्मा अणु और सूक्ष्म है तथा हृदय में
रहता है इस लिये आत्मा का संयोग हाथ के साथ साक्षात् नहीं हो सक्ता
तथापि मन जो कि आत्मा और हाथ के बीच में है, वह एक ओर से आत्मा
के प्रयत्न को ग्रहण करलेता है और दूसरी ओर हाथ से छूकर आत्मा से
लिये हुए प्रयत्न को हाथ से लगा देता है तब उस प्रयत्न से प्रेरा हुवा हाथ
उठने वा उछलने का काम करने लगता है ॥ १ ॥
हाथ का उठना कहकर आगे मूसल का उठना कहते हैं-
१८४-तथा हस्तसंयोगाच्च मुशले कर्म ॥ २ ॥
( तथा ) इसी प्रकार ( हस्तसंयोगात् ) हाथ के संयोग से ( च ) और
भारी होने से ( मुशले ) मूसल में ( कर्म ) क्रिया होती है ॥
जिस प्रकार आत्मा की प्रेरणा से मन में प्रयत्न होता है और मन के संयोग
से हाथ में, इसी प्रकार मूसल के बोझ से मूसल में उत्क्षेपणकर्म होता है ॥ २ ॥

९४ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
क्यों जी ! जब मूसल ओखली में चोट खाकर फिर ऊपर को उछलता है,
तब उस के ऊपर उठने में कारण क्या है ? क्या हाथ का संयोग ही उस का
कारण है ? उत्तर, नहीं-
१८५-अभिघातजे मुशलादौ कर्मणि व्यतिरेका-
दऽकारणं हस्तसंयोगः ॥ ३ ॥
(अभिघातजे) चोट देने से उत्पन्न हुए (मुशलादौ) मूसल आदि में
(कर्मणि) जो क्रिया उत्पन्न होती है उस में (हस्तसंयोगः) हाथ का संयोग
(अकारणम्) कारण नहीं है (व्यतिरेकात्) तद्भिन्न होने से ॥
हाथ से पकड़ कर जब मूसल को ओखली में मारते हैं तब मूसल फिर
ऊपर को उठता है उस के उठने में केवल हाथ का संयोग कारण नहीं है क्यों
कि चोट खाया हुवा मूसल आदि विना हाथ लगाये अपने आप भी ऊपर को
उछलता है इस लिये हाथ का संयोग मूसल के उठने में कारण नहीं है
किन्तु वेग कारण है ॥ ३ ॥ और भी-
१८६-तथात्मसंयोगो हस्तकर्मणि ॥ ४ ॥
(तथा) इसी प्रकार (आत्मसंयोगः) आत्मा का संयोग (हस्तकर्मणि)
हाथ के उठने रूप कर्म में [कारण नहीं है ] ॥ ४ ॥
प्रश्न-तौ फिर हाथ के उठने में कारण क्या है ? उत्तर-
१८७-अभिघातान्मुशलसंयोगाद्धस्ते कर्म ॥ ५ ॥
(अभिघातात्) चोट मारने से (मुशलसंयोगात्) मूसल को पकड़े रहने
से (हस्ते) हाथ में (कर्म) उठने की क्रिया होती है ॥
मूसल को ओखली में मारने से मूसल में वेग उत्पन्न होता है और वेग-
वान् मूसल के संयोग से हाथ में ऊपर को उठना रूप कर्म होता है, उस कर्म
में आत्मा का संयोग वा मन का संयोग कारण नहीं, किन्तु मूसल में उत्पन्न
हुवा वेग ही हाथ लगने से हाथ के उठने में कारण है ॥ ५ ॥
क्यों जी ! हाथ के उठने में तौ मूसल का वेग कारण है परन्तु हाथ के
साथ २ अन्य शरीर के उभार में क्या कारण है ? उत्तर-
१८८-आत्मकर्म हस्तसंयोगाच्च ॥ ६ ॥
(हस्तसंयोगात्) हाथ के संयोग से (च) और वेग से (आत्मकर्म)
आपे [देह] में कर्म होता है ॥

अर्थात् उछलते हुए मूसल के साथ संयुक्त हुवा हाथ ऊपर को उठता है
और उठते हुए हाथ के साथ संयुक्त होने से शरीर भी ऊपर को उठता है,
तब शरीर के ऊपर उठने में भी आत्मा का प्रयत्न कारण नहीं, किन्तु हाथ
का संयोग और वेग ही कारण है ॥ ६ ॥
प्रश्न-अच्छा, हाथ और मूसल के उठने में तो वेग कारण हुवा परन्तु
मूसल के फिर नीचे गिरने में क्या कारण है क्योंकि हाथ अलग करलेने पर
भी मूसल नीचे गिरा करता है ? उत्तर-
१८६-संयोगाभावे गुरुत्वात् पतनम् ॥ ७ ॥
( संयोगाभावे ) हाथ का संयोग न रहने पर ( गुरुत्वात् ) भारी होने
से ( पतनम् ) गिरना होता है ॥ ७ ॥
क्यों जी ! भारी होने से केवल नीचे ही को गिरना क्यों होता है
जब कि उठे हुए मूसल के चारों ओर एकसा आकाश है तब मूसल केवल
नीचे ही को क्यों गिरता है ? पूर्व, पश्चिम, दक्षिण, उत्तर वा ऊपर को क्यों
न गिरने लगे ? उत्तर-
१९०-नोदनविशेषाभावान्नोर्ध्वं न तिर्यग् गमनम् ॥ ८ ॥
( नोदनविशेषाभावात् ) प्रेरणा विशेष के न होने से ( ऊर्ध्वम् ) ऊपर
को ( न ) नहीं और ( तिर्यग् ) पूर्व पश्चिम दक्षिण उत्तर को तिरछा ( गम-
नम् ) गमन भी ( न ) नहीं होता ॥
ऊपर को उठा हुवा मूसल और भी ऊपर को उठता अथवा पूर्व पश्चि-
मादि दिशाओं को तिरछा जाता, यदि आत्मा में प्रेरणा विशेष होती,
परन्तु प्रेरणा विशेष न होने से मूसल किसी अन्य दिशा को नहीं चलता
किन्तु सूत्र ७ में कहे गुरुत्वकारण से जिस में पृथिवी और मूसल का गुरुत्वधर्म
आकर्षक है, केवल नीचे को गिरता है ॥ ८ ॥
प्रश्न-प्रेरणा विशेष क्यों नहीं होती और क्यों होती है ? उत्तर-
१९१-प्रयत्नविशेषात्नोदनविशेषः ॥ ९ ॥
( प्रयत्नविशेषात् ) विशेष प्रयत्न से ( नोदनविशेषः ) विशेष प्रेरणा
होती है ॥

९६ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
जब आत्मा में कोई विशेष प्रयत्न होता है तब उस प्रयत्न से मन में,
मन से हाथ में, और हाथ से मूसल में प्रेरणा उत्पन्न होती है तब मूसल
तिरछा वा ऊपर को चलता है और प्रेरणा नहीं होती तब नहीं चलता ॥९॥
प्रश्न-अच्छा, विशेष प्रयत्न से विशेष प्रेरणा होती है सही परन्तु भारी द्रव्य
के ऊपर को वा तिरछा चलने में क्या कहा गया ? उत्तर-यह कहा गया है कि-
१६२-नोदनविशेषादुदसनविशेषः ॥ १० ॥
(नोदनविशेषात्) विशेष प्रेरणा से (उदसनविशेषः) विशेष उछाल
होता है ॥
अर्थात् जैसी प्रेरणा होती है वैसा उछाल होता है। दूर फेंकने की
प्रेरणा हो तो दूर तक उछाल होता है और अति दूर फेंकने की प्रेरणा हो
तो अति दूर तक उछाल होता है। उछाल में ही तिरछा फेंकना भी अन्तर्गत
समझना चाहिये ॥१०॥
प्रश्न-यदि प्रेरणा विशेष से विशेष उछलना होता है तो फिर खेलते
हुए बालक के हाथ पांव चलना न होना चाहिये क्योंकि बालक में कोई
प्रेरणा विशेष नहीं होती तो भी इधर उधर हाथ पांव चलते हिलते देखे
जाते हैं ? उत्तर-
१६३-हस्तकर्मणा दारककर्म व्याख्यातम् ॥ ११ ॥
(हस्तकर्मणा) हाथ की क्रिया से (दारककर्म) बालकों की क्रिया
(व्याख्यातम्) व्याख्या की गयी ॥
कन्दुक आदि फेंकने के समय आत्मा का संयोग और प्रयत्न मन की
सहायता से हाथ में पहुंचता है, उस से हाथ चलता है, उस के साथ अन्य
अङ्गों में भी क्रिया उत्पन्न हो जाती है ॥ ११ ॥
प्रश्न-क्या कोई और भी ऐसा कर्म है जो विशेष प्रेरणा के बिना ही
प्रेरणा मात्र से उत्पन्न हो जाता हो ? उत्तर, हां-
१६४-तथा दग्धस्य विस्फोटने ॥ १२ ॥
(तथा) इसी प्रकार (दग्धस्य) फुंकी हुई वस्तु के (विस्फोटने) फोड़ने में॥
जैसे कन्दुक आदि फेंकने में बालकों के हाथ आत्मा और मन के प्रयत्न
से चलते हैं और उस से अन्य अङ्गों में क्रिया उत्पन्न हो जाती है। इसी

प्रकार अग्नि के संयोग से थोड़े फुंके हुए पत्थर या फल आदि के फोड़ने
या फाड़ने में उस पत्थर वा फल आदि के अवयवों का दायें बायें या ऊपर
को फटकर जाना इत्यादि क्रिया भी विशेष प्रेरणा के विना केवल साधारण
प्रेरणा से होजाती है ॥ १२ ॥
प्रश्न जब कि मनुष्य सो जाता है वा मर जाता है वा अन्य कारण से
अचेत होजाता है, तब भी कभी २ उस के हाथ पांव हिल जाते हैं, तब
प्रयत्न के विना भी हाथ पांव के हिलने में क्या कारण होता है ? उत्तर-
१८५-यत्नाभावे प्रसुप्तस्य चलनम् ॥ १३ ॥
१८६-तृणे कर्म वायुसंयोगात् ॥ १४ ॥
(प्रसुप्तस्य) सोये हुए वा अचेत हुए के (यत्नाभावे) प्रयत्न न होने पर
(चलनम्) हाथ पांव का हिलना (तृणे) तिनके में (कर्म) हिलने की
क्रिया (वायुसंयोगात्) वायु के संयोग से होती है ॥
अचेत अवस्था में पड़े हुए मनुष्य के हाथ पांव हिलने में अथवा तृण आदि
के हिलने में जो क्रिया होती है, उस का कारण वायु का संयोग है ॥ १३-१४ ॥
प्रश्न-चुम्बक पत्थर आदि के साथ लोहे की सुई आदि के चलने में क्या
कारण है ? उत्तर-
१८७-मणिगमनं सूच्यभिसर्पणमदृष्टकारणम् ॥ १५ ॥
(मणिगमनम्) कोई २ तृण विशेष जो तृणकान्तमणि की ओर चलता
है और (सूच्यभिसर्पणम्) चुम्बकमणि की ओर सुई चलती है सो (अदृष्ट
कारणम्) अदृष्टकारण वाली है ॥
इसी सूत्र के भाष्य में शङ्कर मिश्रादिकों ने कैसी मोटी भूल की है कि जो अदृष्ट
शब्द का अर्थ पाप पुण्य कर दिया है। भला चुम्बक पत्थर के अभिमुख लोह
शङ्कु वा सुई के चलने में सुई ने क्या पाप वा पुण्य किया है ? वास्तव में यहां
अदृष्ट शब्द का अर्थ प्रारब्ध पाप पुण्य कर्म नहीं किन्तु तृणकान्तमणि और
चुम्बक मणि में स्थित अदृष्ट (विना देखी) आकर्षणशक्ति कारण है ॥१५॥ तथा-
१८८-इषावयुगपत् संयोगविशेषाः कर्मान्यत्वे हेतुः ॥ १६ ॥
(इषौ) धनुष् के रोदे से भिन्न हुए बाण में (अयुगपत्) अनेक समयों
में (संयोगविशेषाः) भिन्न २ संयोग (कर्मान्यत्वे) कर्म के अन्य होने में
(हेतुः) कारण बन जाते हैं ॥
१३

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९८ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
धनुष के रोदे से छूटे हुए बाण से उस बाण के गिरने तक बीच में अनेक
कर्म होते हैं, उनका हेतु क्या है ? उत्तर- अनेक समयों में होने वाले अनेक संयोग
उन अन्य अनेक कर्मों का कारण होते हैं। कल्पना करो कि किसी धनुर्धरी ने
धनुष में बाण लगाकर और बलपूर्वक आकर्णान्त खींच कर एक बाण चलाया
और वह बाण रोदे से छूटकर इतने बल से आगे बढ़ा कि आधे कोस पर भूमि
पर गिरेगा। बीच में कहीं वृक्षों की पत्तियों में को और कहीं लघुकाय पक्षियों
में को होकर बाण निकला चलागया तो बाण के छोड़ने में प्रथम कारण धनुर्धारी
के आत्मा, मन, हाथ और धनुष की प्रत्यञ्चा; ये चार कारण हैं, परन्तु बीच में
आने वाले वृक्षों की पत्तियों में छिद्र होना और पक्षियों के देहों का बिन्धना
इत्यादि अनेक कर्मों का कारण बीच में होने वाले अनेक संयोग हैं ॥ १६ ॥
प्रश्न-किस २ कारण से बाण के गिरने तक बाण में अनेक कर्म उत्पन्न
होते हैं ? उत्तर-
१९९-नोदनादाद्यमिषोः कर्म, तत्कर्मकारिताच्च
संस्कारादुत्तरं तथोत्तरमुत्तरं च ॥ १७ ॥
( नोदनात् ) प्रेरणा से ( इषोः ) बाण का ( आद्यम् ) पहला ( कर्म )
काम आरम्भ होता है ( च ) और ( तत्कर्मकारितात् ) उस कर्म के कर्त्ता
पने से (संस्कारात् ) संस्कार वश ( उत्तरम् ) अगला ( तथा ) इसी प्रकार
( उत्तरम् ) अगला ( च ) और ( उत्तरम् ) अगला [ कर्म उत्पन्न होता है ] ॥
जब बाण को प्रेरणा से छोड़ते हैं तब बाण के चलने में प्रेरणा कारण
होती है, फिर बाण का चलना और वृक्षादि की पत्तियों का संयोग उन के
बिन्धने का कारण होता है, इसी प्रकार आगे २ होने वाले कर्मों का कारण
उन के पिछले २ कर्म होते हैं ॥ १७ ॥ परन्तु-
२००-संस्काराभावे गुरुत्वात् पतनम् ॥ १८ ॥
( संस्काराभावे ) संस्कार के न रहने पर ( गुरुत्वात् ) भारी होने से
( पतनम् ) पतन हो जाता है ॥
जब बाण में धनुर्धारी की प्रेरणा का बलसंस्कार समाप्त हो जाता है
तब बाण अपने बोझ से आप गिर पड़ता है अर्थात् पृथिवी की आकर्षण
शक्ति से पृथिवी की ओर खिंच जाता है ॥ १८ ॥
जिस प्रकार लोक में हर एक कर्म किसी प्रयत्न का परिणाम होता है वही
बात प्रसङ्गवश इस आह्निक में अच्छे प्रकार से वर्णित की गई है ॥
इति पञ्चमाध्याये प्रथममाह्निकम् ॥ १ ॥

CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.