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वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya

महर्षि कणाद द्वारा

स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished160 पृष्ठ

पृष्ठ 101, कुल 160 में से

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प्रकार अग्नि के संयोग से थोड़े फुंके हुए पत्थर या फल आदि के फोड़ने
या फाड़ने में उस पत्थर वा फल आदि के अवयवों का दायें बायें या ऊपर
को फटकर जाना इत्यादि क्रिया भी विशेष प्रेरणा के विना केवल साधारण
प्रेरणा से होजाती है ॥ १२ ॥
प्रश्न जब कि मनुष्य सो जाता है वा मर जाता है वा अन्य कारण से
अचेत होजाता है, तब भी कभी २ उस के हाथ पांव हिल जाते हैं, तब
प्रयत्न के विना भी हाथ पांव के हिलने में क्या कारण होता है ? उत्तर-
१८५-यत्नाभावे प्रसुप्तस्य चलनम् ॥ १३ ॥
१८६-तृणे कर्म वायुसंयोगात् ॥ १४ ॥
(प्रसुप्तस्य) सोये हुए वा अचेत हुए के (यत्नाभावे) प्रयत्न न होने पर
(चलनम्) हाथ पांव का हिलना (तृणे) तिनके में (कर्म) हिलने की
क्रिया (वायुसंयोगात्) वायु के संयोग से होती है ॥
अचेत अवस्था में पड़े हुए मनुष्य के हाथ पांव हिलने में अथवा तृण आदि
के हिलने में जो क्रिया होती है, उस का कारण वायु का संयोग है ॥ १३-१४ ॥
प्रश्न-चुम्बक पत्थर आदि के साथ लोहे की सुई आदि के चलने में क्या
कारण है ? उत्तर-
१८७-मणिगमनं सूच्यभिसर्पणमदृष्टकारणम् ॥ १५ ॥
(मणिगमनम्) कोई २ तृण विशेष जो तृणकान्तमणि की ओर चलता
है और (सूच्यभिसर्पणम्) चुम्बकमणि की ओर सुई चलती है सो (अदृष्ट
कारणम्) अदृष्टकारण वाली है ॥
इसी सूत्र के भाष्य में शङ्कर मिश्रादिकों ने कैसी मोटी भूल की है कि जो अदृष्ट
शब्द का अर्थ पाप पुण्य कर दिया है। भला चुम्बक पत्थर के अभिमुख लोह
शङ्कु वा सुई के चलने में सुई ने क्या पाप वा पुण्य किया है ? वास्तव में यहां
अदृष्ट शब्द का अर्थ प्रारब्ध पाप पुण्य कर्म नहीं किन्तु तृणकान्तमणि और
चुम्बक मणि में स्थित अदृष्ट (विना देखी) आकर्षणशक्ति कारण है ॥१५॥ तथा-
१८८-इषावयुगपत् संयोगविशेषाः कर्मान्यत्वे हेतुः ॥ १६ ॥
(इषौ) धनुष् के रोदे से भिन्न हुए बाण में (अयुगपत्) अनेक समयों
में (संयोगविशेषाः) भिन्न २ संयोग (कर्मान्यत्वे) कर्म के अन्य होने में
(हेतुः) कारण बन जाते हैं ॥
१३